Wednesday, April 17, 2013

Guru Receipt (गुरु प्राप्ति )
















गुरु प्राप्ति - एक लक्ष्य

मनुष्य अपने आप में अधूरा और अपवित्र है। वह अपने आपको पूर्ण कहता है, मगर पूर्ण है नहीं, क्योंकि उसके जीवन में कोई न कोई अधूरापन रहता ही है, धन है तो प्रतिष्ठा नहीं, प्रतिष्ठा है तो पुत्र नहीं है, पुत्र है तो सौभाग्य नहीं, सौभाग्य है तो रोग रहित जीवन नहीं है। यदि आधुनिक विज्ञान के अनुसार मानव शरीर की चीड-फाड की जाय, तो उसमे से केवल मांस निकलेगा, हड्डिया निकलेगी, रूधिर निकलेगा, मल-मूत्र निकलेगा।

इसके अलावा शरीर के अन्दर कुछ ऐसी चीज नहीं है, जिससे की इस शरीर पर गर्व किया जा सके। हम भोजन करते हैं, वह भी मल बन जाता है। हम चाहे हलवा खायें, चाहे घी खाये, चाहे रोटी खायें, उसको परिवर्तित मल के रूप में ही होना है।

सामान्य मानव शरीर में ऐसी क्रिया नहीं होती, जो उसे दिव्य और चेतना युक्त बना सके और ऐसा शरीर अपने आपमें व्यर्थ है, खोकला है, उस देह में उच्चकोटि का ज्ञान, उच्चकोटि की चेतना समाहित नहीं हो सकती।

क्यो नहीं प्राप्त हो सकती? फिर मनुष्य योनि में जन्म लेने का अर्थ ही क्या रहा? जो पुष्प मल में पडा हुआ है, उसको उठा कर भगवान् के चरणों में नहीं चढाया जा सकता। यदि हम शरीर को भगवान् के या गुरु के चरणों में चढायें - हे भगवान्! हे गुरुदेव! यह शरीर आपके चरणों में समर्पित है, तो शरीर तो ख़ुद अपवित्र है, जिसमें मल और मूत्र के अलावा है ही कुछ नहीं। ऐसे गन्दे शरीर को भगवान् के चरणों में कैसे चढ़ा सकते हैं? ऐसे शरीर को अपने गुरु के चरणों में कैसे चढ़ा सकते हैं?

देवताओं का सारभूत अगर किसी में है, तो वह गुरु रूप में है, क्योंकि गुरु प्राणमय कोष में होता है, आत्ममय कोष मैं होता है। वह केवल मानव शरीर धारी नहीं होता। उसमे ज्ञान होता है, चेतना होती है, उसकी कुण्डलिनी जाग्रत होती है, उसका सहस्रार जाग्रत होता है। न उसे अन्न की जरूरत पड़ सकती है, न पानी की जरूरत हो सकती है, न तो उसे मूत्र त्याग की जरूरत होगी, न मल विसर्जन होगा। जब भूख-प्यास ही नहीं लगेगी, तो मल मूत्र विसर्जित करने की जरूरत हे नहीं होगी।

इसलिए उच्चकोटि के साधक न भोजन करते है, न पानी पीते हैं, न मल-मूत्र विसर्जन करते है, जमीन से छः फीट की ऊंचाई पर आसन लगाते हैं और साधना करते हैं। जो इस प्रकार की क्रिया करते हैं, वे सही अर्थों में मनुष्य है। जो इस प्रकार की क्रिया नहीं कर सकते, जो मलयुक्त हैं, जो गन्दगी युक्त हैं, वे मात्र पशु हैं।

इस जगह से उस जगह तक छलांग लगाने की कौन सी क्रिया है? कैसे वहां पहुंचा जा सकता है, जीवन में मनुष्य कैसे बना जा सकता है?

जीवन में वह स्थिति कब आएगी, जब जमीन से छः फूट ऊंचाई पर बैठ करके साधना कर सकेंगे? जमीन का ऐसा कोई सा भाग नहीं है, जहां रूधिर न बहा हो। धरती का प्रत्येक इंच और प्रत्येक कण अपने आप में रूधिर से सना हुआ है, अपवित्र है, उस भूमि में साधना कैसे हो सकती है।

बिना पवित्रता के उच्चकोटि की साधनाएं सम्पन्न नहीं हो सकती, हजारो वर्षों की आयु प्राप्त नहीं की जा सकती, सिद्धाश्रम नहीं पहुंचा जा सकता और जब नहीं पहुंचा जा सकता, तो ऐसा जीवन अपने आप में व्यर्थ है, किसी काम का नहीं हैं, वह सिर्फ श्मशान की यात्रा ही कर सकता है।

ऐसा जीवन तो आपकी पिछली अनेक पीढियां व्यतीत कर चुकी है और अब उनका नामोनिशान भी बचा नहीं है। आपको अपने दादा परदादा के सब नाम तो मालूम है, लेकिन यह नहीं मालूम, की आपके परदादा के पिता कौन थे, उन्होनें क्या कार्य किया और किस प्रकार उन्होनें अपना जीवन बिताया, यदि आप भी ऐसा ही करना चाहते है, तो फिर आपको जीवन में गुरु की कोई जरूरत ही नहीं है।

यह शरीर कितना अपवित्र है, की चार दिन भी बाहर के वातावरण को झेल नहीं सकता। यदि चार दिन स्नान नहीं करें, तो आपके शरीर से बदबू आने लगेगी, कोई आपके पास बैठना भी नहीं चाहेगा, बात भी करना नहीं चाहेगा। जबकि भगवान् श्रीकृष्ण के शरीर से अष्टगंध प्रवाहित होती थी, उच्चकोटि के योगियों से अष्ठगंध प्रवाहित होती है।

तो आप में क्या कमी है, जो अष्टगंध प्रवाहित नहीं होती? आप जब निकले, तो दुनिया वाले मुड कर देखे, की पास में से कौन निकला? यह सुगंध कहां से आई, उसके व्यक्तित्व में क्या है?

और यदि ऐसा व्यक्तित्व नहीं बना, तो जीवन का मूल अर्थ, मूल लक्ष्य नहीं प्राप्त हो सकता, जिसके लिए देवता भी इस पृथ्वी लोक पर जन्म लेने के लिए तरसते हैं। राम के रूप में जन्म लेते है, कृष्ण के रूप में जन्म लेते हैं, इसा मसीह के रूप में जन्म लेते हैं, पैगम्बर मोहम्मद के रूप में जन्म लेते हैं।

इस शरीर को पवित्र बनाने के लिए, यह आवश्यक है कि हम देह तत्व से प्राण तत्व में चले जायें। जब प्राण तत्व में जायेंगे, तो फिर देह तत्व का भान रहेगा ही नहीं।

फिर जीवन के साए क्रियाकलाप तो होंगे, मगर फिर मल-मूत्र की जरूरार नहीं रहेगी, फिर भोजन और प्यास की जरूरत नहीं रहेगी, फिर शून्य सिद्धि आसन लगा सकेंगे, फिर शरीर से सुगंध प्रवाहित हो सकेगी और एहसास हो सकेगा, कि आप कुछ है।
प्राण तत्व में जाकर आप में चेतना उत्पन्न हो सकेगी, अन्दर एक क्रियमाण पैदा हो सकेगा, सारे वेद सारे उपनिषद् कंठस्थ हो पायेंगे।

आप कितनी साधना करेंगे? कितना मंत्र जपेंगे? कब तक जपेंगे? ज्यादा से ज्यादा साठ साल की उम्र तक। सत्तर साल तक, लेकिन आपके जीवन का आधिकांश समय तो व्यतीत हो चुका है, जो बचा है, वह भी सामाजिक दायित्वों के बोझ से दबा हुआ है फिर वह जीवन अद्वितीय कैसे बन सकेगा? और अद्वितीय नहीं बना, तो फिर जीवन का अर्थ भी क्या रहा?

कृष्ण को कृष्ण के रूप में याद नहीं किया, कृष्ण तो जगत गुरु के रूप में याद किया जाता है। उनको गुरु क्यों कहा जाता है? इसलिए, की उन्होनें उन साधनाओं को, उस चेतना को प्राप्त किया, जिसके माध्यम से उनके शरीर से अष्टगंध प्रवाहित हुई, उनका
प्राण तत्व जाग्रत हुआ।

मैं आपको एक द्वितीय साधना दे रहा हूं (गुरु हृदयस्थ स्थापन), हजार साल बाद भी आप इस साधना को अन्यत्र नहीं कर पायेंगे, पुस्तकों से आपको प्राप्त नहीं हो पायेगा, गंगा किनारे बैठ करके भी नहीं हो पायेगा, रोज-रोज गंगा में स्नान करने से भी नहीं प्राप्त हो पायेगा। यदि गंगा में स्नान करने से ही कोई उच्चता प्राप्त होती है, तो मछलियां तो उस जल में रहती है, वे अपने आप में बहूत उच्च बन जाती।

जीवन में अद्वितीयता हो, यह जीवन का धर्म है। हमारे जैसा कोई दूसरा हो ही नहीं। ऐसा हो, तब जीवन का अर्थ है। ऐसा जीवन प्राप्त करने के लिए बस एक ही उपाय है, की हम ऐसे गुरु की शरण में जायें, जो अपने आप में पूर्ण प्राणवान हों, तेजस्विता युक्त हों, वाणी में गंभीरता हो, आँख में तेज हो, वे जिस को देख लें, वह सम्मोहित हो, अपने आप में, सक्षम हो, और पूर्ण रूप से ज्ञाता हो।

लेकिन आपके पास कोई कसौटी नहीं है, कोई मापदण्ड नहीं है। आप उनके पास बैठ कर उनके ज्ञान से, चेतना से, प्रवचन से एहसास कर सकते हैं। यदि आपको जीवन में सदगुरू की प्राप्ति हो गई, तो आपको जीवन का अर्थ समझ में आयेगा, तब आपको गर्व होगा, की आप एक सदगुरू के शिष्य है, जिनके पास हजारों हजारों पोथियों ज्ञान है।

यदि व्यक्ति में ज़रा भी समझदारी है, यदि उसमें समझदारी का एक कण भी है, तो पहले तो उसे यह चिंतन करना चाहिए, की उसे ऐसा जीवन जीना ही नहीं, जो मल-मूत्र युक्त है, क्योंकि ऐसे जीवन की कोई सार्थकता ही नहीं है और फिर उसे सदगुरू को प्राप्त करने का प्रयत्न करना चाहिए, जो उसे तेजस्विता युक्त बना सके, जो उसे प्राण तत्व में ले जा सकें, जो उसके शरीर को सुगंध युक्त बना सके।

यदि ऐसा नहीं किया, तो भी यह शरीर रोग ग्रस्तता और वृद्धावस्था को ग्रहण करता हुआ मृत्यु को प्राप्त हो जायेगा। फिर वह क्षण कब आयेगा, जब आप दैदीप्यमान बन सकेंगे? कब आपमें भावना आएगी, कि मुझ को दैदीप्यमान बनना ही है, अद्वितीय बनाना ही हैं, सर्वश्रेष्ठ बनना है?

ऐसा तब सम्भव हो सकेगा, जब आपके प्राण, गुरु के प्राण से जुडेंगे, जब आपका चिंतन गुरुमय होगा, जब आपके क्रिया-कलाप गुरुमय होंगे और इसके लिए एक ही क्रिया है - अपने शरीर में पूर्णता के साथ गुरु को स्थापित कर देना है, जीवन में उतार देना।

शरीर में उनका स्थापन होते ही, उनकी चेतना के माध्यम से यह शरीर अपने आप में सुगन्ध युक्त, अत्यन्त दैदीप्यमान और तेजस्वी बन सकेगा, जीवन में अद्वितीयता और श्रेष्ठता प्राप्त हो सकेगी, जीवन में पवित्रता आ सकेगी, प्राण तत्व की यात्रा सम्भव हो सकेगी और उनका ज्ञान आपके अन्दर उतर कर सकेगा।


जो भी इसमें अच्छा लगे वो मेरे गुरू का प्रसाद है,
और जो भी बुरा लगे वो मेरी न्यूनता है......MMK

Tuesday, April 16, 2013

Yoga (योग)



योग क्या है ?
भारत के वैदिक, बौद्ध और जैन मुख्य दर्शन हैं। ये तीनों आत्मा, पुण्य-पाप, परलोक और मोक्ष इन तत्वों को मानते है, इसलिये ये आस्तिक-दर्शन हैं। योग शब्द युज् धातु से बना है। संस्कृत में युज् धातु दो हैं। एक का अर्थ है जोड़ना और दुसरे का है समाधि । इनमें से जोड़ने के अर्थ वाले युज् धातु को योगार्थ में स्वीकार किया है।

अर्थात् जिन-जिन साधनों से आत्मा की शुद्धि और मोक्ष का योग होता है, उन सब साधनों को योग कह सकते हैं। पातंजलि-योगदर्शन में योग का लक्षण योगश्चित्तवृत्ति-निरोधः कहा है। मन, वचन, शरीर आदि को संयत करने वाला धर्म-व्यापार ही योग है, क्योंकि यही आत्मा को उसके साध्य मोक्ष के साथ जोड़ता है।

जिस समय मनुष्य सब चिन्ताओं का परित्याग कर देता है, उस समय, उसके मन की उस लय-अवस्था को लय-योग कहते हैं। अर्थात् चित्त की सभी वृत्तियों को रोकने का नाम योग है। वासना और कामना से लिप्त चित को वृत्ति कहा है। इस वृत्ति का प्रवाह जाग्रत , स्वप्न, सुषुप्ति- इन तीनों अवस्थाओं में मनुष्य के हृदय पर प्रवाहित होता रहता है। चित्त सदा-सर्वदा ही अपनी स्वाभाविक अवस्था को पुनः प्राप्त करने के लिये प्रयत्न करता रहता है, किन्तु इन्द्रियाँ उसे बाहर आकर्षित कर लेती हैं। उसको रोकना एवं उसकी बाहर निकलने की प्रवृत्ति को निवृत करके उसे पीछे घुमाकर चिद्-घन पुरूष के पास पहुँचने के पथ में ले जाने का नाम ही योग है। हम अपने हृदयस्थ चैतन्य-घन पुरूष को क्यों नहीं देख पाते? कारण यही है कि हमारा चित्त हिंसा आदि पापों से मैला और आशादि वृत्तियों से आन्दोलित हो रहा है। यम-नियम आदि की साधना से चित्त का मैल छुड़ाकर चित्त वृत्ति को रोकने का नाम योग है।

अष्टांग योग
आत्मा और परमात्मा का मिलन या जोड़ ही योग का लक्ष्य है। यह जोड़ एक और एक दो वाला जोड़ नहीं है। यह एक और एक पर एक होने वाला ही जोड़ है। आप हैरान होंगे यह क्या है। लेकिन योग में ऐसा ही है। शरीर और आत्मा जुड़ती है, होते दो हैं पर योग उन्हें एक कर देता है। और फिर एक ही रह जाता है वह परमात्मा का भाव है। परमात्मा से जुडऩे की पहली इबारत है :अष्टांग योग।

आजकल योग को व्यायाम के संदर्भ में भी लिया जा रहा है लेकिन ऐसा नहीं है। व्यायाम का संबंध सिर्फ शरीर है लेकिन योग शरीर के माध्यम से आत्मा और फिर परमात्मा की यात्रा कराता है। पहली इबारत अष्टांग योग में ही वे सारे सूत्र समाए हुए हैं, जिनको अपनाकर हम सारे दु:ख और संतापों से मुक्ति पा सकते हैं। आइए, पहले अष्टांग योग को जानें।आचार्य पातंजलि- पातंजलि योग सूत्र के अनुसार योग के आठ अंग हैं- यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि।

1. यम- योग जीवन यात्रा है। यह यात्रा बाहर से अंदर, स्थूल से सूक्ष्म की ओर है। यह हमारे जीवन को नियमित करती है। बाहर से अंदर की ओर की इस यात्रा का पहला चरण पांच भागों में होता है जिन्हें यम कहते है:
अ. अहिंसा- इसका अर्थ है हिंसा नहीं करना। हिंसा सिर्फ अस्त्र-शस्त्र से किसी को नुकसान पहुंचाना ही नहीं है। मन, कार्य, व्यवहार एवं वाणी द्वारा भी हिंसा होती है। इनसे बचें।
ब. सत्य- जो जैसा है, उसे वैसा ही देखना, समझना और कहना सत्य है। सत्य पालन के लिए कम और तथ्यपरक बोलना चाहिए। अपनी भावनाओं को अपने शब्दों के साथ व्यक्त न करें। ये भावनाएं सत्य को दूषित करती हैं।
स. अस्तेय- इसका अर्थ है चोरी न करना। इससे बचें। किसी के अधिकार या अमानत को हड़प लेना या इच्छा करना भी चोरी है।
द. ब्रह्मचर्य- अर्थ है ब्रह्म जैसा व्यवहार। आखिर क्या है ब्रह्म का व्यवहार। उत्तर होगा- हर काम संतुलित तरीके से होना। यानी सैक्स में डूबो तो संतान उत्पत्ति के लिए, शरीर सुख के लिए नहीं। यदि ऐसे ही हर काम होगा तो फिर दु:ख गायब हो जाएगा।
ई. अपरिग्रह- यानी वस्तुओं का संग्रह न करना। जब सभी कुछ इसी संसार में छूट जाना है तो फिर संग्रह क्यों।

2 नियम- नियम बताते हैं हमारा खुद के प्रति व्यवहार कैसा है। ये पांच हैं:-
अ. शौच- यानी पवित्रता। हमारा अंदर और बाह्य जीवन पवित्र हो, हमारा घर, परिवेश, वस्त्र, भोजन आदि स्वच्छ व सुंदर हो। मन और विचारों की पवित्रता भी परम आवश्यक है।
ब. संतोष- जो पाया उस पर संतोष होना ही सुख है। कर्म पूरी लगन से किया जाए किन्तु फल की चिन्ता न रहे। 
स. तप- इसका अर्थ है जीवन के उतार-चढ़ावों में विचलित नहीं होना तथा जीवन में संघर्र्ष शील रहते हुए प्रगति के मार्ग पर बढऩा।
द. स्वाध्याय- शास्त्रों का अध्ययन, जीवन के अनुभव व स्वयं का आत्म विश्लेषण करना स्वाध्याय है।
ई. ईश्वर प्रणिधान- मन, कर्र्म, वचन से ईश्वर के प्रति पूर्ण समर्पण ही ईश्वर प्रणिधान है।

३. आसन- योग का तीसरा अंग है आसन। जिस स्थिति में शरीर व मन स्थिर और सुखी हो, वही आसन है। आसनों की संख्या अनेक है। योग के क्षेत्र में ८४ आसन प्रसिद्ध हैं।

४. प्राणायाम- स्थिर आसन में श्वास की गति का नियमन प्राणायाम है। प्राणायाम में श्वास पर ध्यान किया जाता है, जो मन को विशेष स्थिरता देता है। यह श्वास छोडऩे और भरने की कला भी है। शरीर को स्वस्थ रखने में इसका उपयोग हो सकता है।

5. प्रत्याहार-बाहर की ओर जाती इंद्रियों को अंदर की ओर मोडऩा । इसमें ध्यान द्वारा मन को इंद्रियों के भोग विलाश से हटाकर ईश्वर की ओर केन्द्रित किया जाता है।

6. धारणा-अर्थ है एकाग्रता। चित्त को किसी एक स्थान पर एकाग्र करना धारणा कहलाता है।

7. ध्यान-एकाग्रता को किसी एक जगह स्थिर करना ध्यान है। लंबे समय तक ध्यान करने से मन का बाहर की ओर भटकाव रुक जाता है और वह एक जगह स्थिर हो जाता है।

8. समाधि-लंबे समय तक ध्यान में स्थित रहने से समाधि पद प्राप्त होता है। समाधिस्थ होने पर सारा उतार-चढ़ाव खत्म हो जाता है। बस बचती है तो एक चेतना जो परमात्मा की ओर ले जाती है।

सच तो यह है कि योग केवल शरीर की क्रिया नहीं है। न ही योग का मतलब व्यायाम है। यह तो स्टेप बाय स्टेप एक आंतरिक प्रक्रिया है। जो शरीर के माध्यम से परमात्मा तक ले जाती है। अष्टांग योग की शुरुआती छह स्टेप के बाद सातवें पर ध्यान घटता है। जो छह स्टेप पार करने में सफल होता है वही सातवें तक पहुंचता है और जो ध्यान को भी पा लेता है, वह समाधि लगाने का पात्र बनता है। योग दुनिया को भारत की देन है। अफसोस यह है कि आज भारत में आम लोग इससे दूर हो गए हैं। यदि हर व्यक्ति निजी रूप से इसे अपने ऊपर लागू करे तो समाज, देश और दुनिया का भला होगा।

पतंजलि ऋषि कौन- ईसा पूर्व चौथी शताब्दी के ऋषि। उनके जमाने में योग आम लोगों में प्रचलित तो था, लेकिन सूत्रबद्ध नहीं। पांतजलि ने योग के प्रयोग किए और उन्हें सूत्रबद्ध किया। यही पांतजलि योग सूत्र कहलाता है।

यम
अष्टांग योग की आठ अवस्थाएं हैं- यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि। पहली अवस्था है- यम। ईश्वर को प्राप्त करने का एक रास्ता योग है। इस मार्ग से ईश्वर तक पहुंचने वाले महर्षि पतंजलि के अष्टांग योग सिद्धांत का पालन करते हैं। यह सिद्धांत बताता है कि हम योग की आठ अवस्थाओं से गुजर कर ही ईश्वर तक पहुंच सकते हैं। इसकी पहली अवस्था है- यम।

यम का मतलब शांति
यम का अर्थ है शांति। योग करने वाले के चारों तरफ अर्थात अंदर और बाहर शांति का वातावरण होना चाहिए। हमारे जीवन में शांति कैसे आए इसके लिए यम का पालन जरूरी है। यम के पालन में पांच बातों का ध्यान रखा जाता है। पंतजलि ने कहा है-

अहिंसासत्यास्तेय ब्रम्हचर्यापरिग्रहा यमा:। - योगसूत्र २/३क्

अर्थात-अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रम्हचर्य , अपरिग्रह ही यम है। इन पांच बातों को जीवन में उतार कर ही हम योग की पहली सीढ़ी चढ़ते हैं।

यम के पांच नियम
अहिंसा- इसका अर्थ है हमारे मन, वचन या कर्म से किसी भी प्राणी को कोई कष्ट न हो। मन में किसी को दु:ख पहुंचाने का विचार तक नहीं आए। अपने आप पर भी कोई ज्यादती न करें। जो व्यक्ति अहिंसा का इस तरह पालन करता है, उसके विरोधी लोग भी विरोध नहीं कर पाते। अहिंसा का व्रत हमारे जीवन में बदलाव लाता है। समाज में हमें विशेष सम्मान दिलाता है।

सत्य का साथ दें
इसका अर्थ है हम कपट से और धोखा देने की नीयत से कोई बात न कहें। जो बात जैसी है उसे उसी तरह कहना सत्य है। हम आत्मा को सत्य मानें और ईश्वर की खोज करें। जब यह सत्य हमारे जीवन में उतरता है तो उसके लाभ मिलते ही हैं।

अस्तेय : भ्रष्टाचार से दूर रहें
अर्थात चोरी नहीं करना। हमें दूसरे का धन हड़पने का विचार भी नहीं करना चाहिए। चोरी, ठगी, धोखाधड़ी और अन्य किसी गलत तरीके से दूसरे के धन, वस्तु या अन्य किसी चीज को हथियाना अपराध है। हमें इस बुराई से बचना चाहिए। अस्तेय का पालन हमें सद्चरित्र बनाता है।

ब्रम्हचर्य : संयम से रहें
इसका मतलब है इंद्रियों का संयम। हमारा भोजन, विचार, व्यवहार सभी कुछ युक्तियुक्त होना चाहिए। जो संयम से नहीं रहता वह बलहीन हो जाता है, उसमें आत्मविश्वास नहीं रहता। जो ब्रम्हचर्य का पालन करते हैं उन्हें अक्षुण्ण बल की प्राप्ति होती है। स्वस्थ, निरोग और प्रसन्न व्यक्ति ही किसी भी कार्य को सफल करने के लिए योग्य होता है।

अपरिग्रह: 
संग्रह की प्रवृत्ति छोड़ें इसका अर्थ है हम बिना आवश्यकता के वस्तुओं का संग्रह न करें। जब हम वस्तुएं इकट्ठा करते हैं तो उनकी वृद्धि, रक्षा और दिखावे में हमारा मन लग जाता है। तब हम मन को एकाग्र नहीं कर पाते। मन की शांति के लिए वस्तुओं से अनावश्यक मोह न रखना, आलस्य, संशय, प्रमाद का त्याग जरूरी है। मन यदि इस बाहरी दिखावे से हट जाए तो फिर हम मनुष्य जन्म की सफलता के बारे में सोच सकते हैं।

शांति से सफलता
यम के पांच तत्वों के संकल्प से हमारे जीवन में शांति का अनुभव होता है। शांति का मतलब खामोशी नहीं है। शांति का मतलब है सुख-संतुष्टि, मन में किसी प्रकार का कोई दु:ख, क्षोभ या तनाव नहीं रहना। जब हम अंदर से इस तरह शांत होते हैं तो हमारा वातावरण भी इसी में ढलने लगता है। यदि हम इस तरह शांत चित्त होकर कोई कार्य करते हैं तो उसकी सफलता की संभावना बहुत अधिक बढ़ जाती है। जब मन में और आस-पास के वातावरण में शांति हो तभी हम योग की साधना की पहली मंजिल यम पर पहुंचते हैं।

नियम
महर्षि पतंजलि के योग सूत्र का दूसरा चरण नियम है। पहला चरण यम जहां मन को शांति देता है, वहीं दूसरा चरण नियम हमें पवित्र बताता है। योग मार्ग पर चलने के लिए आत्मशांति के साथ मन, कर्म, वचन की पवित्रता भी आवश्यक है। नियम के पालन से हमारे आचरण, विचार और व्यवहार पवित्र होते हैं।

नियम के पांच अंग महर्षि पातंजलि के योग सूत्र में नियम के पांच अंग बताए गए हैं-शौचसन्तोषतप: स्वाध्यायेश्वर प्रमिधानानि नियमा:। (योगदर्शन- 2/३२)अर्थात- पवित्रता, संतोष, तप, स्वाध्याय और ईश्वर की भक्ति यही नियम है।

योग मार्ग की सिद्धि के लिए हमारे आचार-विचार पवित्र होना चाहिए। शरीर और विचारों की शुद्धि से संतोष का गुण आता है। तभी हम शास्त्रों के ज्ञान से ईश्वर की भक्ति की साधना में सफल हो सकते हैं। योग मार्ग से ईश्वर को प्राप्त करने की दिशा में नियम की यह अवस्था भी आवश्यक योग्यता है।

पवित्रता- धर्म क्षेत्र में पवित्रता का मतलब सभी तरह की शुद्धता से है। जैसे शरीर की शुद्धता स्नान से, व्यवहार और आचरण की शुद्धता त्याग से, सही तरीके से कमाए धन से प्राप्त सात्विक भोजन से आहार की शुद्धता रहती है। इसी तरह दुर्गुणों से बचकर हम मन को शुद्ध रखते हैं। घमंड, ममता, राग-द्वेष, ईष्र्या, भय, काम-क्रोध आदि दुर्गुण हैं।

संतोष- संतोष का अर्थ है हर स्थिति में प्रसन्न रहना। दु:ख हो या सुख, लाभ हो या हानि, मान हो या अपमान, कैसी भी परिस्थिति हो, हमें समान रूप से प्रसन्न रहना चाहिए।

तप- तप का मतलब है लगन। अपने लक्ष्य को पाने के लिए संयमपूïर्वक जीना। व्रत-उपवास करना तप कहलाता है, जिनसे हमारे अंदर लगन पैदा होती है।

स्वाध्याय- स्वाध्याय का अर्थ है हम शास्त्रों के अध्ययन से ज्ञान प्राप्त करें तथा जप, स्त्रोतपाठ आदि से ईश्वर का स्मरण करें।

ईश्वर प्रणिधान- ईश्वर-प्रणिधान का मतलब है हम ईश्वर के अनुकूल ही कर्म करें। अर्थात हमारा प्रत्येक कार्य ईश्वर के लिए और ईश्वर के अनुकूल ही हो। ऊपर बताए गए नियम की इन पांच बातों को जीवन में उतारने से योग मार्ग की दूसरी अवस्था प्राप्त हो जाती है।

नियम से लाभ
नियम सिखाते हैं हम पवित्र रहें। यह पवित्रता सिर्फ तन की न हो, मन की भी हो। हम संतोष रखें अर्थात सुख-दु:ख में समान रहें। तप हमें संयम सिखाता है तो स्वाध्याय हमें अध्ययन की ओर प्रेरित करता है। जब हम अध्ययन करेंगे तो हमें ज्ञान होगा और अंत में ईश्वर के अनुकूल कार्य करने की प्रेरणा मिलेगी।

आसन
पहले दो चरण यम और नियम से हम शांति व पवित्रता हासिल कर आसन के रूप में तीसरे चरण में प्रवेश करते हैं। आसन का अर्थ शरीर संतुलन से है। अर्थात् योग के लिए हमें किस तरह बैठना चाहिए यह जानना जरूरी है। महर्षि पातंजलि के योगसूत्र में आसन के बारे में जानकारी दी गई है। लंबे समय तक निश्चल होकर एक ही स्थिति में बैठना आसन है। आसन सिद्धि कम से कम तीन घंटे ३६ मिनट और अधिकतम चार घंटे ४८ मिनट बैठने से होती है।

योगदर्शन में कहा गया है शरीर की स्वाभाविक क्रियाएं शांत कर परमात्मा में मन को तन्मय करने से आसन की सिद्धि होती है। योग के लिए आसन की सिद्धि मतलब एक ही स्थान पर सुविधापूर्वक तन्मय होकर बहुत समय तक बैठने का अभ्यास जरूरी है। बैठने की यह प्रक्रिया और स्थिति ही आसन है।

प्राणायाम
अष्टांग योग के पहले तीन चरणों यम, नियम, आसन के बाद चौथा चरण है प्राणायाम। प्राणायाम के माध्यम से चित्त की शुद्धि की जाती है। चित्त की शुद्धि का अर्थ है हमारे मन-मस्तिष्क में कोई बुरे विचार नहीं हों। आइए जानें प्राणायाम की क्रिया क्या है-

अष्टांग योग में प्राणायाम चौथा चरण है। प्राण मतलब श्वास और आयाम का मतलब है उसका नियंत्रण। अर्थात जिस क्रिया से हम श्वास लेने की प्रक्रिया को नियंत्रित करते हैं उसे प्राणायाम कहते हैं। प्राणायाम से मन-मस्तिष्क की सफाई की जाती है। हमारी इंद्रियों द्वारा उत्पन्न दोष प्राणायाम से दूर हो जाते हैं। कहने का मतलब यह है कि प्राणायाम करने से हमारे मन और मस्तिष्क में आने वाले बुरे विचार समाप्त हो जाते हैं और मन में शांति का अनुभव होता है। प्राणायाम से जब चित्त शुद्ध होता है तो योग की क्रियाएं आसान हो जाती हैं।

इस तरह करें प्राणायाम
तस्मिन् सति श्वासप्रश्वासयोर्गतिविच्छेद: प्राणायाम:। योगदर्शन 2/४९
अर्थात् आसन के सिद्ध हो जाने पर श्वास और प्रश्वास की गति के नियंत्रित और संतुलित हो जाने का नाम प्राणायाम है। बाहरी वायु का भीतर प्रवेश करना श्वास कहलाता है और भीतर की वायु का बाहर निकालना प्रश्वास कहलाता है। इन दोनों के नियंत्रण का नाम प्राणायाम है।

प्राणायाम में हम पहले श्वास को अंदर खींचते हैं, जिसे पूरक कहते हैं। पूरक मतलब फेफड़ों में श्वास की पूर्ति करना। श्वास लेने के बाद कुछ देर के लिए श्वास को फेफड़ों में ही रोका जाता है, जिसे कुंभक कहते हैं। इसके बाद जब श्वास को बाहर छोड़ा जाता है तो उसे रेचक कहते हैं। इस तरह प्राणायाम की सामान्य विधि पूर्ण होती है।

ये हैं प्राणायाम के अंग
योगदर्शन में प्राणायाम के तीन अंग बताए गए हैं-
१. भीतर की श्वास को बाहर निकालकर बाहर ही रोके रखना बाह्यकुंभक कहलाता है।
२. श्वास को भीतर खींचकर भीतर रोकने रखने को आभ्यंतरकुंभक कहते हैं।
३. बाहर या भीतर कहीं भी सुखपूर्वक श्वासों को रोकने का नाम स्तंभवृत्ति प्राणायाम कहलाता है।

प्राणायाम को किसी जानकार योगी की देखरेख में ही सीखना चाहिए।
प्राणायाम का एक और प्रकार केवल कुंभक है। बाहरी और भीतर के विषयों के त्याग से केवल कुंभक होता है। शब्द, स्पर्श आदि इंद्रियों के बाहरी विषय हैं तथा संकल्प, विकल्प आदि आंतरिक विषय हैं। उनका त्याग करना चतुर्थ प्राणायाम कहलाता है।

कई तरह से होते हैं प्राणायाम के लाभ
-योग में प्राणायाम क्रिया सिद्ध होने पर पाप और अज्ञानता का नाश होता है।
-प्राणायाम की सिद्धि से मन स्थिर होकर योग के लिए समर्थ और सुपात्र हो जाता है।
-प्राणायाम के माध्यम से ही हम अष्टांग योग की प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और अंत में समाधि की अवस्था तक पहुंचते हैं।
-प्राणायाम से हमारे शरीर का संपूर्ण विकास होता है। फेफड़ों में अधिक मात्रा में शुद्ध हवा जाने से शरीर स्वस्थ रहता है।
-प्राणायाम से हमारा मानसिक विकास भी होता है। प्राणायाम करते हुए हम मन को एकाग्र करते हैं। इससे मन हमारे नियंत्रण में आ जाता है।
-प्राणायाम से श्वास संबंधी रोग तथा अन्य बीमारियां दूर हो जाती हैं।

प्रत्याहार
प्रत्याहार योग का पांचवां चरण है। पहले चार चरण यम, नियम, आसन और प्राणायाम हैं । योग मार्ग का साधक जब यम (मन के संयम), नियम (शारीरिक संयम) रखकर एक आसन में स्थिर बैठकर अपने वायु रूप प्राण पर नियंत्रण सीखता है, तब उसके विवेक को ढंकने वाले अज्ञान का अंत होता है। तब जाकर मन प्रत्याहार और धारणा के लिए तैयार होता है।

सूक्ष्म साधना का सोपान- प्रत्याहार चेतना, शरीर और मन से ऊपर उठकर अपने स्वरूप में रुक जाने की स्थिति है प्रत्याहार। प्राणायाम तक योग साधना आंखों से दृष्टिïगोचर होती है। प्रत्याहार से साधना का रूपांतरण होता है और साधना सूक्ष्मतर होकर मानसिक हो जाती है। प्रत्याहार का अर्थ है- एक और आहरण यानि खींचना। प्रश्न उठता है किसका खींचा जाना? मन का। योग दर्शन के अनुसार मन इंद्रियों के माध्यम से जगत के भोगों के पीछे दौड़ता है। बहिर्गति को रोक उसे इंद्रियों के अधीन से मुक्त करना, भीतर की ओर खींचना प्रत्याहार है।

मन का प्रशिक्षण मन क्या है? यह विचारों, कल्पनाओ, अनुभवों और इच्छाओं का समूह है। सामान्यत: हम अपना जीवन इसी स्तर पर जीते हैं। विचारों के परे अस्तित्व की हमें खबर भी नहीं होती। प्राणायाम से जब हम स्थिर होते हैं, तब स्थिर हुए चंचल मन को उसके रूप में स्थित करने का कार्य प्रत्याहार में होता है। अपने मूल स्वरूप को प्राप्त होने से मन का बाह्यï ज्ञान नहीं रह जाता। योग दर्शन में उल्लेख है-तत: परमा वश्यतेन्द्रियाणाम्। -2/55अर्थात् उस प्रत्याहार से इंद्रियां पूरी तरह से वश में हो जाती हैं।

स्वामी विवेकानंद ने प्रत्याहार की साधना का सरल मार्ग बताया है। वे कहते हैं मन को संयत करने के लिए-
-कुछ समय चुपचाप बैठें और मन को उसके अनुसार चलने दें।
-मन में विचारों की हलचल होगी, बुरी भावनाएं प्रकट होंगी। सोए संस्कार जाग्रत होंगे। उनसे विचलित न होकर उन्हें देखते रहें।
-धैर्यपूर्वक अपना अभ्यास करते रहें।
-धीरे-धीरे मन के विकार कम होंगे और एक दिन मन स्थिर हो जाएगा तथा उसका इंद्रियों से संबंध टूट जाएगा।

धारणा
धारणा अष्टांग योग का छठा चरण है। इससे पहले पांच चरण यम, नियम, आसन, प्राणायाम और प्रत्याहार हैं जो योग में बाहरी साधन माने गए हैं। इसके बाद सातवें चरण में ध्यान और आठवें में समाधि की अवस्था प्राप्त होती है। धारणा का अर्थधारणा शब्द 'धृ' धातु से बना है। इसका अर्थ होता है संभालना, थामना या सहारा देना। योग दर्शन के अनुसार-देशबन्धश्चित्तस्य धारणा। -3/1अर्थात- किसी स्थान (मन के भीतर या बाहर) विशेष पर चित्त को स्थिर करने का नाम धारणा है।आशय यह है कि यम, नियम, आसन, प्राणायाम और प्रत्याहार द्वारा इंद्रियों को उनके विषयों से हटाकर चित्त में स्थिर किया जाता है। स्थिर हुए चित्त को एक 'स्थान पर रोक लेना ही धारणा है।

कहां की जाती है धारणा
धारणा में चित्त को स्थिर होने के लिए एक स्थान दिया जाता है। योगी मुख्यत: हृदय के बीच में, मस्तिष्क में और सुषुम्ना नाड़ी के विभिन्न चक्रों पर मन की धारणा करता है।

हृदय में धारणा:- योगी अपने हृदय में एक उज्‍जवल आलोक की भावना कर चित्त को वहां स्थित करते हैं।

मस्तिष्क में धारणा:- कुछ योगी मस्तिष्क में सहस्र (हजार) दल के कमल पर धारणा करते हैं।

सुषुम्ना नाड़ी के विभिन्न चक्रों पर धारणा:- योग शास्त्र के अनुसार मेरुदंड के मूल में मूलाधार से मस्तिष्क के बीच में सहस्रार तक सुषुम्ना नाड़ी होती है। इसके भीतर स्वाधिष्ठान, मणिपुर, अनाहत, विशुद्ध और आज्ञा जैसे ऐसे चक्र होते हैं। योगी सुषुम्ना नाड़ी पर चक्र के देखते हुए चित्त को लगाता है।

अपने भीतर उतरने की क्रिया धारणा
धारणा अष्टांग योग का छठा चरण है। इससे पहले पांच चरण यम, नियम, आसन, प्राणायाम और प्रत्याहार हैं जो योग में बाहरी साधन माने गए हैं। इसके बाद सातवें चरण में ध्यान और आठवें में समाधि की अवस्था प्राप्त होती है।

धारणा का अर्थ :धारणा शब्द धृधातु से बना है। इसका अर्थ होता है संभालना, थामना या सहारा देना। योग दर्शन के अनुसार- देशबन्धश्चित्तस्य धारणा। -3/1

अर्थात- किसी स्थान (मन के भीतर या बाहर) विशेष पर चित्त को स्थिर करने का नाम धारणा है।
आशय यह है कि यम, नियम, आसन, प्राणायाम और प्रत्याहार द्वारा इंद्रियों को उनके विषयों से हटाकर चित्त में स्थिर किया जाता है। स्थिर हुए चित्त को एक स्थानपर रोक लेना ही धारणा है।

ध्यान
ध्यानयोग साधना का सातवां चरण है ध्यान। योगी प्रत्याहार से इंद्रियों को चित्त में स्थिर करता है और धारणा द्वारा उसे एक स्थान पर बांध लेता है। इसके बाद ध्यान की स्थिति आती है। धारणा की निरंतरता ही ध्यान है।
क्या है ध्यानध्यान की उपमा तेल की धारा से की गई है। जब वृत्ति समान रूप से अविच्छिन्न प्रवाहित हो यानि बीच में कोई दूसरी वृत्ति ना आए उस स्थिति को ध्यान कहते हैं। पांतजलि योग सूत्र द्वारा इसे स्पष्ट करते हुए कहते हैं-तत्र प्रत्ययैकतानसा ध्यानम्। - विभूति पाद-2अर्थात- चित्त (वस्तु विषयक ज्ञान) निरंतर रूप से प्रवाहित होते रहने पर उसे ध्यान कहते हैं।

समाधि की पूर्व स्थिति है ध्यान अष्टांग योग में ध्यान एक खास जीवन शैली का अंग है। आज के प्रचलित तरीकों से अलग यह ध्यान एक लंबी साधना पद्धति की चरम अनुभूति का अंग है। यह मन की सूक्ष्म स्थिति है, जहां जाग्रतिपूर्वक एक वृत्ति को प्रवाह में रहना होता है। धारण और ध्यान से प्राप्त एकाग्रता चेतना को अहंकार से मुक्त करती है। सर्वत्र चेतनता का पूर्ण बोध समाधि बन जाती है।

खुद के भीतर झांकने की क्रिया है ध्यान
एक विषय विशेष पर चित्त स्थिर करना ध्यान कहलाता है। पूजा पद्धति का यह एक अंग है। ध्यान में हम एक आसन पर बैठकर किसी स्वरूप का चिंतन करते है। पूजन के बाद या सवेरे जल्दी उठकर ध्यान करने का बड़ा महत्व है। मंदिर में दर्शन के बाद थोड़ी देर बैठने का जो नियम है वह ध्यान के लिए ही होता है।ध्यान अपनी-अपनी रुचि के अनुसार किसी का भी किया जा सकता है। जैसे दीपक की लौ, कोई बिंदू, ईश्वर के रूप आदि।
महत्व - सभी धर्मों की पूजा पद्धतियों और धर्म ग्रंथों में ध्यान को बहुत महत्व दिया गया है। ध्यान से मन, बुद्धि, चित्त, स्थिर होता है, तथा शरीर में ऊर्जा का निर्माण होता है। दिमाग की सारी शक्ति एक लक्ष्य पर केंद्रित हो जाती है, तथा दिनभर ध्यान करने वाला व्यक्ति अपने लक्ष्य से नहीं भटकता। योग साधना में भी ध्यान का सातवां स्थान है।

ध्यान का वैज्ञानिक महत्व - विचार शक्ति मनुष्य के पास एक अत्यंत महत्वपूर्ण शक्ति है। यदि मनुष्य अपने विचारों पर नियंत्रण कर सके तो वह असंभव को भी संभव में बदल सकता है। मनुष्य अपनी विचार शक्ति का अधिकांश भाग व्यर्थ की अनावश्यक कल्पनाओं में खर्च करता रहता है। यदि मनुष्य ध्यान के माध्यम से विचारों पर नियंत्रण कर उसे अपने सार्थक और निश्चित लक्ष्य पर लगाए तो उसका हर कार्य सुगमता पूर्वक संपन्न हो जाता है। अत: ध्यान एक ऐसी अद्भूत वैज्ञानिक विधा है। जो मनुष्य को विचार शक्ति का सदुपयोग करना एवं एकाग्रता सिखाता है।

खुद में शांति की तलाश का मार्ग : ध्यान
योग साधना का सातवां चरण है ध्यान। योगी प्रत्याहार से इंद्रियों को चित्त में स्थिर करता है और धारणा द्वारा उसे एक स्थान पर बांध लेता है। इसके बाद ध्यान की स्थिति आती है। धारणा की निरंतरता ही ध्यान है।
ध्यान की उपमा तेल की धारा से की गई है। जब वृत्ति समान रूप से अविच्छिन्न प्रवाहित हो यानि बीच में कोई दूसरी वृत्ति ना आए उस स्थिति को ध्यान कहते हैं। पांतजलि योग सूत्र द्वारा इसे स्पष्ट करते हुए कहते हैं-
तत्र प्रत्ययैकतानसा ध्यानम्। - विभूति पाद-2
अर्थात- चित्त (वस्तु विषयक ज्ञान) निरंतर रूप से प्रवाहित होते रहने पर उसे ध्यान कहते हैं |

कैसे करें ध्यान?
मन की शांति के लिए उन चीजों को मन से बाहर निकालना होगा जो दु:ख बन गई हैं। यह आसान नहीं है। उन चीजों को बाहर निकालें कैसे? दु:ख का कारण बनने वाली चीजों को बाहर निकालने की विधा ही ध्यान है। ध्यान कोई साधारण प्रक्रिया नहीं है किंतु यह इतनी साधारण भी है कि आम आदमी भी इसे सहज संकल्प के साथ अपने जीवन में उतार सकता है। सुख के लिए मन में शांति चाहिए। इसके लिए मन को एकाग्र करने की जरूरत होती है। मन की एकाग्रता से आने वाली शांति को पाने का मार्ग ही ध्यान है। यही ध्यान अष्टांग योग के अंतिम चरण में समाधि की अवस्था पा लेता है।

पहले अपने दु:ख के कारणों की सूची बना लें। फिर मन को एकाग्र कर उन्हें बाहर निकालने का प्रयत्न करें। इसके लिए जरूरी है कि यह प्रक्रिया निश्चित समय पर और नियमित हो। कुश या ऊन के आसन पर शुद्ध वातावरण में बैठकर अभ्यास करना चाहिए। प्रात:काल का समय इसके लिए सवरेत्तम है।

आसन पर बैठकर पहले कुछ देर प्राणायाम करें। इससे श्वास स्थिर होगी। फिर अपने इष्टदेव का ध्यान करें। इस दौरान मन स्थिर नहीं होगा। इधर-उधर की तमाम बातें मन में आएंगी किंतु प्रयास करें कि मन अपने इष्टदेव पर स्थिर हो। दूसरी बातें आएं तो उन्हें मन से बाहर निकालें। धीरे-धीरे अभ्यास करें। पहले कुछ क्षण मन एकाग्र होगा फिर कुछ अवधि बढ़ेगी। जिस दिन मन एक मिनट तक एकाग्र हो गया, समझ लो ध्यान का रास्ता खुल गया। आज के युग में दस मिनट का ध्यान लगा लेने वाला योगी कहलाने योग्य है। यदि पाप वासनाएं और कामनाएं सदा के लिए चली जाएं तो समझो आप परमयोगी हैं।

ध्यान साधना है। यह जीवनभर शिविरों में अभ्यास के बाद भी नहीं आ सकता और एक योग्य गुरु के मार्गदर्शन से क्षणभर में आ सकता है। ध्यान का जीवन में घटना हमारी इच्छाशक्ति पर निर्भर है। इसके लिए ऐसे योग्य गुरु का मार्गदर्शन जरूरी है, जो ध्यान का आनंद ले रहे हों। शिविरों और ऐसे ही दिखावटी आयोजनों में ध्यान का नाटक हो सकता है। ध्यान लगाया नहीं जा सकता। ध्यान लगाने वाले बार-बार समय देखते हैं। अपने मार्गदर्शक से समय सीमा पूछते हैं। सच तो यह है, जब जीवन में ध्यान घटता है तो समय की सीमा रह ही नहीं जाती। बीता समय क्षण मात्र लगता है। ध्यान असीम आनंद है।

समाधि 
अष्टांग योग अंतिम चरणसमाधिअष्टांग योग की उच्चतम सोपान समाधि है। यह चेतना का वह स्तर है, जहां मनुष्य पूर्ण मुक्ति का अनुभव करता है। क्या है समाधियोग शास्त्र के अनुसार ध्यान की सिद्धि होना ही समाधि है। पातंजलि योगसूत्र में कहा गया है-तदेवार्थमात्र निर्भासं स्वरूपशून्यमिव समाधि:। 3-3अर्थ- वह ध्यान ही समाधि है जब उसमें ध्येय अर्थमात्र से भासित होता है और ध्यान का स्वरूप शून्य जैसा हो जाता है।यानि ध्याता (योगी), ध्यान (प्रक्रिया) तथा ध्येय (ध्यान का लक्ष्य) इन तीनों में एकता-सी होती है। समाधि अनुभूति की अवस्था है वह शब्द, विचार व दर्शन सबसे परे है।

कैसी होती है समाधिसमाधि युक्ति-तर्क से परे एक अतिचेतन का अनुभव है। इस स्थिति में मन उन गूढ़ विषयों का भी ज्ञान प्राप्त कर लेता है, जो साधारण अवस्था में बुद्धि द्वारा प्राप्त नहीं होते। समाधि और नींद में हमें एक जैसी अवस्था प्रतीत होती है, दोनों में हमारा (बाह्य) स्वरूप सुप्त हो जाता है लेकिन स्वामी विवेकानंद स्पष्ट करते हैं 'जब कोई गहरी नींद में सोया रहता है, तब वह ज्ञान या चेतन की निम्न भूमि में चला जाता है। नींद से उठने पर वह पहले जैसे ही रहता है। उसमें कोई परिवर्तन नहीं होता। किंतु जब मनुष्य समाधिस्थ होता है तो समाधि प्राप्त करने के पहले यदि वह महामूर्ख रहा हो, अज्ञानी रहा हो तो समाधि से वह महाज्ञानी होकर व्युत्थित होता है।

परमसुख की प्राप्ति यानी समाधि
अष्टांग योग की उच्चतम सोपान समाधि है। यह चेतना का वह स्तर है, जहां मनुष्य पूर्ण मुक्ति का अनुभव करता है।योग शास्त्र के अनुसार ध्यान की सिद्धि होना ही समाधि है। पातंजलि योगसूत्र में कहा गया है-
तदेवार्थमात्र निर्भासं स्वरूपशून्यमिव समाधि:। 3-3

अर्थ- वह ध्यान ही समाधि है जब उसमें ध्येय अर्थमात्र से भासित होता है और ध्यान का स्वरूप शून्य जैसा हो जाता है। यानि ध्याता (योगी), ध्यान (प्रक्रिया) तथा ध्येय (ध्यान का लक्ष्य) इन तीनों में एकता-सी होती है। समाधि अनुभूति की अवस्था है वह शब्द, विचार व दर्शन सबसे परे है।

कैसी होती है समाधि
समाधि युक्ति-तर्क से परे एक अतिचेतन का अनुभव है। इस स्थिति में मन उन गूढ़ विषयों का भी ज्ञान प्राप्त कर लेता है, जो साधारण अवस्था में बुद्धि द्वारा प्राप्त नहीं होते। समाधि और नींद में हमें एक जैसी अवस्था प्रतीत होती है, दोनों में हमारा (बाह्य) स्वरूप सुप्त हो जाता है लेकिन स्वामी विवेकानंद स्पष्ट करते हैं जब कोई गहरी नींद में सोया रहता है, तब वह ज्ञान या चेतन की निम्न भूमि में चला जाता है। नींद से उठने पर वह पहले जैसे ही रहता है। उसमें कोई परिवर्तन नहीं होता। किंतु जब मनुष्य समाधिस्थ होता है तो समाधि प्राप्त करने के पहले यदि वह महामूर्ख रहा हो, अज्ञानी रहा हो तो समाधि से वह महाज्ञानी होकर व्युत्थित होता है।

जो भी इसमें अच्छा लगे वो मेरे गुरू का प्रसाद है,
और जो भी बुरा लगे वो मेरी न्यूनता है..MMK

Maharisi Ramana (महर्षि रमण )


महर्षि रमण का जन्म 30 दिसंबर सन् 1879 में तमिलनाडु के मदुरै से 30 मील दूर एक छोटे से गांव तिरूचल्ली में हुआ था। उनके बचपन का नाम वेंकटरमण था। उनके पिता का नाम सुंदरम अय्यर व मां का नाम अलगम्माल था। दोनों एक आदर्श दम्पति और भगवान के बड़े भक्त थे।

बचपन में आलसी थे रमण
वेंकटरमण अपने तीन भाइयों में दूसरे नंबर पर थे। उनका जन्म  गांव में लगनेवाला प्रसिद्ध मेला जत्रा के दिन हुआ था। वेंकटरमण के प्रारंभिक जीवन की कोई घटना उल्लेखनीय नहीं है। वह अन्य बच्चों के समान ही थे। उनकी प्रारंभिक शिक्षा-दीक्षा गांव में ही हुई थी। जब वे 12 वर्ष के थे, तब उनके पिता का देहांत हो गया। पति की मृत्यु के बाद उनकी मां अलगम्माल गांव छोड़ने को विवश हो गई और बच्चों को लेकर वे मदुरै चली गईं, जहां उनके देवर सुब्बाराव अक्षयर रहते थे। उन्होंने वेंकटरमण को मदुरै के मिशन उच्च विद्यालय में नामांकन करवा दिया, जहां वह पढ़ाई करने जाने लगे, पंरतु उनका मन पढ़ने-लिखने में नहीं लगता था।

बचपन में वे बड़े आलसी थे। बालक वेंकटरमण का शरीर तगड़ा तथा चमकता हुआ ओजस्वी चेहरा और पूर्णरूपेण स्वस्थ थे। उनके सहपाठी रमण के डील-डौल शरीर से डरे रहते थे। वेंकटरमण की गहरी नींद सब लोगों के लिए कौतुहल और आश्चर्य की बात थी। उसकी नींद इतनी गहरी होती थी कि उन्हें जगाने की सारी कोशिशें बेकार जाती थी, चाहे कोई उसे पीटे, एक स्थान से उठाकर दूसरे स्थान पर ले जाय या फिर कहीं जमीन में लिटा दे, पर उनकी नींद नहीं खुलती। इसलिए उनके सहपाठी उन्हे 'कुंभकर्ण" कहकर चिढ़ाते थे।

लेकिन, तब शायद किसी को यह नहीं मालूम था कि यही आलसी बालक आगे चलकर एक दिन संन्यासी बन जाएगा। हालांकि, उनके जीवन में कई महत्त्वपूर्ण घटनाएं घटी जो संयोग ही था। यह संयोग उनके जीवन में कैसे आए, उसकी भी चर्चाएं रोचक है।

बालमन में अरुणाचल को देखने की प्रबल इच्छा
16 वर्ष की अवस्था में वेंकटरमण के घर पर एक अतिथि आये थे और वह अरुणाचल के रहने वाले थे। 'अरुणाचल" शब्द ने बालक मन को बहुत प्रभावित किया, रमण के ऊपर जादुई असर डाला। उनके मन में अरुणाचल के विषय में अधिक जिज्ञासाएं पैदा हो गईं। बालक वेंकटरमण अपनी जिज्ञासा को रोक न सका। उसने अतिथि से पूछा  क्या आप अरुणाचल से आए हैं? अतिथि बालक के इस सवाल  से बहुत प्रभावित हुआ। उन्होंने बताया ''हां! मैं अरुणाचल से आ रहा हूं। तुमने तिरूवन्न्मलाई का नाम सुना है? तिरूवन्न्मलाई ही अरुणाचल है। बालक वेंकटरमण के मन को अतिथि ने आकृष्ट किया।

उसने मन में ठान लिया है कि वह एक बार अरुणाचय अवश्य जाएगा। वेंकटरमण ने कुलोत्‍तुंग के पेरिय पुराण की तमिल कविताओं में उसने एक कविता पढ़ी थी, जिसमें शैव संतों का वर्णन किया गया है। शैव संतों की कथाओं ने बालक के दिल और दिमाग पर गहरी जादुई प्रभाव डाला। बालक के हृदय में तीव्र लालसा पैदा हुई और वह मन ही मन सोचने लगा क्या मेरा सपना कभी सच होगा, मैं उन संतों के सामान बन सकूंगा।  उसी दिन बालक ने एकांत में, ईश्वर की मौन साध्ना आरंभ कर दी।

ज्ञान का बोध
सन् 1896, जब वेंकटरमण केवल 17 वर्ष के थे और एक दिन अपने चाचा के घर की पहली मंजिल के एक कमरे में गहरे विचारों में डूबे हुए थे, तभी एकाएक उनके हृदय में मृत्यु भय का विचार आया और वे बेसुध हो गए, उन्हें लगा कि वे मर गए। मृत्यु के विचार उन्हें दुर्बल न कर दे यह सोचकर इन विचारों को रोकने के लिए उन्होने आत्मचिंतन प्रारंभ किया। उन्होंने मन ही मन कहा ''मुझे क्या करना चाहिए। अब मृत्यु समीप आ रही है । मैं मर रहा हूं। मृत्यु क्या है ? क्या यह शरीर नष्ट हो जाएगा?" ऐसा सोच कर तब उन्होंने पूर्णरूप से अपनी आंखों को बंद कर लिया। मुर्दे के समान जमीन पर लेट गए और चिंतन-मनन आरंभ कर दिया।

अब मेरा शरीर मर चुका है, शरीर निर्जीव हो गया है। मेरे सगे-संबंधी इस निर्जीव शरीर को श्मशान में ले जाएंगे। और चिता में रखकर जला देंगे। परंतु, क्या इसी शरीर के साथ 'मैं' मर गया? क्या मैं अपना नाम जानता हूं। मैं अपने माता-पिता, चाचा, भाई, मित्रों तथा अन्य परिचितों को स्मरण कर सकता हूं। इसका तात्पर्य यह हुआ कि मुझे अपनी वैयक्तिकता का ज्ञान अब भी है। इस प्रकार मेरे शरीर के अंदर, जो 'मैं" है, वह शरीर से परे हैं। 'मैं" ही आत्मा है तथा आत्मा चिरस्थायी व अनश्वर है। इस प्रकार बिजली की तरह यह अनुभूति वेंकटरमण के दिमाग में कौंध गई।

वेंकटरमण के ये विचार बचकानी कल्पनाएं लगती है। पर, यह याद रखना चाहिए कि ईश्वर की अनुभूति वर्षों की तपस्या से ही प्राप्‍त होती है। तपस्या काल में भूख और नींद का परित्याग करना पड़ता है। शरीर को यातना देनी पड़ती है। परंतु, वेंकटरमण को बिना कष्ट सहे ही ऊंचा ज्ञान प्राप्‍त हो गया। वे मृत्यु भय से मुक्त हो गए और वेंकटरमण से 'महर्षि रमण' हो गए।

घर छोड़ने का निर्णय
विलक्षण अनुभूति प्राप्‍त होने के छ: सप्‍ताह बाद 29 अगस्त 1896 का वह दिन जब अंग्रेजी अध्यापक के कहने पर कि व्याकरण की किताब से तीन बार गद्यांश लिख कर लाओ, तब वेंकटरण ने शिक्षक के आदेशानुसार दो बार लिखे और तीसरी बार लिखने के लिए सोच ही रहे थे कि एकाएक हाथ रुक गए। वह सोचने लगे कि वह क्या कर रहे हैं? गद्यांश का नकल करने से क्या लाभ? यह कार्य तो उद्देश्यहीन और निरर्थक है। इन विचारों के साथ ही उन्होंने पुस्तक और कलम फेंक दी और ईश्वर के ध्यान में डूब गये।

बालक के इस विलक्षण व्यवहार को देखकर अध्यापक ने अपना सिर पीट लिया। इस विचित्र छात्र को कैसे सुधरे? तब तक  वेंकटरमण अपने किंकर्त्तव्य-विमूढ़ हो चिंतन -मनन में खो गए। वेंकटरमण का तो सारा ध्यान अब अरुणाचल में लगा था। वे उधेड़बुन में पड़े  थे कि यदि वह अपना विचार घरवालों को बताते हैं तो घरवाले उन्हें घर से जाने नहीं देंगे, इसलिए चुपचाप भाग जाने में ही फायदा है।

घर छोड़ते वक्त, उन्होंने एक पत्र लिखकर छोड़ दिया था। जिसमें लिखा था मैं परमपिता ईश्वर की खोज में जा रहा हूं। आप मेरे संबंध् में किसी प्रकार की चिंता न करें। मुझे ढूंढ़ने का प्रयत्न भी नहीं करें। मैंने  कालेज की फीस नहीं भरी है और उन रुपयों में से मैंने तीन रुपए इस पत्र के साथ रख दिए हैं। वेंकटरमण दोपहर के बाद घर से सीधे रेलवे स्टेशन गए। स्टेशन पहुंचने में काफी समय लगा। उस दिन गाड़ी देर से आई, इसलिए उस दिन वे गाड़ी पकड़ सके, अन्यथा उस दिन की यात्रा स्थगित करनी पड़ती।

दूसरे दिन, बहुत तड़के वे विलुपुरम स्टेशन पहुंचे। पैसे न होने के कारण वहां से उन्होंने तिरूवन्न्मलाई तक पैदल जाने का संकल्प किया। उनके पास इतने कम पैसे थे कि रेल द्वारा केवल मांम्बलपट्टु तक ही जा सकते थे इसलिए विवश होकर उन्होंने मांम्बलपट्टु तक का टिकट खरीदा और वहां तक रेल यात्रा की। मांम्बलपट्टु पहुंचकर वे रेल से उतर गए।

अब उनके पास फूटी कौड़ी भी नहीं बची थी। भूखे-प्‍यासे पैदल चलते रहे और शाम तक दस मील की यात्रा तय कर ली। लम्बी यात्रा के कारण वेंकटरमण थककर चूर हो गए। शाम तक किसी तरह वे अरायिणीनल्लूर नामक गांव तक पहुंचे। उस गांव में एक शिव मंदिर था। वे उस शिव मंदिर में गए और वहां ध्यान में डूब गए। वहां उन्हें एक अलौकिक ज्ञान प्रभा के दर्शन हुए।

समाधि में लीन 
मंदिर के पुजारी ने देखा कि एक बालक ध्यानमग्न है। वह मंदिर के द्वार कैसे बंद करे यह सोच कर वह धर्म संकट में पड़ गया। उसने कुछ सोचा और बालक की समाधिक भंग की, उसने बालक को झकझोर कर समाधि से जगाया। बालक की समाधि भंग हो गई और उसने पुजारी को कौतूहल भरी नजरों से देखा।

पुजारी ने बताया कि उसे यहां से तीन मील दूर दूसरे मंदिर में जाना है, इसलिए दरवाजे बंद करने हैं वेंकटरमण भी पुजारी के साथ हो लिए और उसके साथ किलूर के एक मंदिर में पहुंच गये और वह उस मदिर में भी ध्यानस्थ हो गये। पूजा पाठ समाप्‍त करने के बाद, पुजारी ने फिर उनकी समाधि भंग की। पुजारी ने  उन्हें गांव के शास्‍त्री जी के घर पहुंचा दिया ताकि बालक को मंदिर में रात न बितानी पड़े।

वेंकटरमण जैसे ही शास्‍त्री जी के घर पहुंचे, बेहोश होकर गिर पड़े। कुछ मिनटों के बाद उन्हें होश आया। आस-पास के लोग उन्हें कौतुहल और विस्मय से देख रहे थे। उन्होंने एक-दो घूंट पानी पीया। पानी पीने से उन्हें कुछ शक्ति मिली। शास्‍त्री जी ने बड़े प्‍यार से उन्हें भोजन कराया। भोजन करने के पश्चात वेंकटरमण सो गये।

वेंकटरमण को अपनी यात्रा आगे जारी रखनी थी। सो, अपने कान की सोने की बालियों को उतारकर उन्होंने शास्‍त्री भागवतरण को दे दिया और उनसे चार रुपये देने के लिए निवेदन किया। भागवतरण ने उन बालियों का ध्यान से परीक्षण किया और अनुमान लगाया कि उनका मूल्य बीस रुपये से कम न होगा। उसने वेंकटरमण को चार रुपये दे दिए तथा एक कागज पर अपना पता भी लिखकर दिया। उसने वेंकटरमण से कहा तुम किसी भी समय आकर अपनी बालियां ले जा सकते हो।

वेंकटरमण चार रुपये पाकर बहुत प्रसन्न् हुए और आगे की यात्रा के लिए चल पड़े। चलते समय भागवतरण की पत्नी ने कुछ मिठाई बांध दी। उनसे विदा लेकर वे अपनी यात्रा पर रवाना हो गए। जिस कागज पर भागवतरण ने अपना पता लिख कर दिया था, उस कागज को पफाड़कर उन्होंने हवा में उड़ा दिया। बालियों को फिर से लेने का उनका कोई इरादा नहीं था।

रमण का संन्यास
दूसरे दिन, वेंकटरमण तिरूवन्न्मलाई पहुंच गए। जहां, उनकी प्रसन्न्ता का कोई ठिकाना न रहा। वे आनंद से अरुणाचलेश्वर मंदिर की ओर दौड़े। उस समय मंदिर के द्वार खुले हुए थे, मंदिर में कोई न था। वेंकटरमण का  हृदय प्रसन्न्ता के मारे तेजी से धड़क रहा था। अब, वेंकटरमण भगवान अरुणाचलेश्वर के सम्मुख थे।

इस तरह वेंकटरमण की लम्बी यात्रा समा'त हुई । अब जहाज बंदरगाह पर सुरक्षित पहुंच चुका था। अपनी यात्रा को विराम देते हुए वेंकटरमण ने संन्यास ले लिया। अब वे एक गहरे विचार में डूब गए 'यह शरीर नश्वर है, फिर शरीर के लिए इतना आडम्बर क्यों? इतनी भाग-दौड़ क्यों? इसलिए उन्होंने स्नान तक करना बंद कर दिया। दिन-रात साधना में लगे रहते मंदिर ही अब उनकी दुनिया बन गई थी। यहां तक की मंदिर से वह कभी बाहर नहीं निकलते थे।

तरुण संन्यासी वेंकटरमण की कठोर साध्ना ने शीघ्र ही लोगों का ध्यान अपनी ओर आकृष्ट कर लिया। अब श्रद्धालु लोगों ने उनकी देखभाल का उत्तदायित्व अपने ऊपर ले लिया। परंतु, वेंकटरमण सबसे निर्लिप्‍त रहते थे। वह किसी से बातचीत तक नहीं करते थे। जितना आवश्यक होता था, वह उतना ही बोलते थे। अधिक बातचीत करना उन्हें पसंद नहीं था।

ईश्वर साधना में लीन
धीरे-धीरे समय बीतता गया।  अभी छ: महीने बीते होंगे कि थंबीरंगास्वामी नामक एक श्रद्धालु ने उन्हें अपने यहां ठहरने का निमंत्रण दिया। वेंकटरमण ने उनके निमंत्रण को सहर्ष स्वीकार किया। रंगास्वामी के पास एक बहुत सुंदर सा बाग था । रंगास्वामी ने इसका नाम वृंदावन रखा था। उसने वृंदावन में ही वेंकटरमण के रहने और साधना करने की सारी व्यवस्था कर दी। उस रमणीय तथा एकांत स्थान में वेंकटरमण की साधना निर्विघ्न रूप से चलने लगी। वहां उन्हें किसी प्रकार की परेशानी नहीं थी। वहां वे ईश्वर के गंभीर चिंतन में डूब गए और अपना पूरा ध्यान ईश्वर में केन्द्रित कर लिया।

कठोर साधना के पफलस्वरूप उन्हें नए ज्ञान का प्रकाश मिला। इस नए ज्ञान ने उन्हें और भी जिज्ञासु बना दिया। अब अनेक प्रश्न उनके मस्तिष्क को अशांत करने लगा, जैसे ईश्वर क्या है? आत्मा क्या है? आत्मा तथा परमात्मा का क्या संबंध् है? देहांत के बाद आत्मा का क्या होता है? क्या शरीर की तरह आत्मा भी नश्वर है? या आत्मा अमर है। समाधि अवस्था में उन्हें इन सारे प्रश्नों के उत्तर मिल गए।

वेंकटरमण से बने महर्षि रमण
वेंकटरमण ने अपनी समाधि भंग की । उन्हें ज्ञान का साक्षात्कार हो गया और ज्ञान के प्रकाश के कारण उनका संदेह नष्ट हो गया। वह साक्षात ज्ञानस्वरूप हो गए। अब उन्होंने संकल्प किया कि वे अपनी एकांत साधना छोड़कर जन-कल्याण का कार्य करेंगे । जनता के दुख दूर करने का प्रयत्न करेंगे और उनकी समस्याओं का समाधन करेंगे। उनका नाम चारों ओर दूर-दूर तक फैल गया, दर्शनार्थियों की भीड़ दिनोंदिन बढ़ने लगी। अरुणाचल मंदिर में आने वाले तीर्थयात्री अवश्य उनका दर्शन करने आते और अपनी श्रद्धा व्यक्त करते। थंबी रंगास्वामी के घर के समीप एक आम्र-कुंज था। अब रमण महर्षि ने उसमें निवास करने का निश्चय किया।

वेंकटरमण के चाचा का नाम नेल्लिअप्‍पा अय्यर था। उन्हें किसी तरह यह खबर मिल गई कि वेंकटरमण ने तपस्या की है, और वह सिद्ध संन्यासी हो गया है। वेंकटरमण की मां ने नेल्लिअप्‍पा को अरुणाचल भेजा कि वे वेंकटरमण को घर ले आएं । नेल्लिअप्‍पा  वेंकटरमण को लेने अरुणाचल पहुंच गए। पर वेंकटरमण अपने निश्चय से टस से मस नहीं हुए। वे निराश होकर भारी मन से घर लौट गए और सारी बातें अलगम्माल को बताई।

मां का पुत्र से घर लौटने का अनुरोध
अलगम्माल अपने पुत्र से मिलने स्वयं तिरूवन्न्मलाई गई, उनके साथ उनका बड़ा पुत्र भी वहां गया। मां को देखते ही वेंकटरमण उन्हें पहचान गए, पर मां से उन्होंने कुशलक्षेम तक भी नहीं पूछे । वे एकशब्द भी नहीं बोले । मां बहुत रोयी, पर वे अविचलित रहे। एक तीर्थयात्री मां का करुणा-क्रंदन तथा पुत्र की दृढ़ता व ध्येयनिद्गा ध्यान से देख रहा था, उसे मां पर बहुत दया आई। उसने वेंकटरमण से निवेदन किया कि मां जी से भले ही बात न करें, पर कागज में लिखकर आप कुछ बता तो सकते हैं। वेंकटरमण ने उस तीर्थयात्री की बात मान ली।

उन्होंने कागज में निम्नलिखित वाक्य लिखे, ''प्रत्येक व्यक्ति को उसके प्रारब्ध कर्मों के अनुसार ही कार्य करने पड़ते हैं। कोई कितना ही प्रयत्न करे, जो प्रारब्ध में है, वह होकर रहेगा। असंभव बात कभी संभव नहीं हो सकती । जो होना है, वह होकर रहेगा, आप कितना ही सर पटकें, कई बातें आपकी शक्ति से बाहर है। इसलिए सबके लिए श्रेयस्कर मार्ग यही है कि वह अपने कर्तव्य का पालन करें। पुत्र की दार्शनिक बातों को सुनकर अलगम्माल निराश हो गई और भारी हृदय से घर लौट गई।

बीमार मां की सेवा
कुछ समय के बाद अलगम्माल के बड़े पुत्र की मृत्यु हो गई अब उनके मां के पास कोई दूसरा आसरा नहीं रह गया था। इसलिए वह अपने पुत्र नागसुंदरम को लेकर तिरूवम्मलाई आ गई। वहां पहुंचते ही वे टाइफाइड से बीमार पड़ गर्इं और कई सप्‍ताह तक पीड़ित रही। महर्षि रमण ने अपनी मां की खूब सेवा सुश्रूषा की। अब वे अपनी मां के शैय्या के पास ही समाधिक लगाते थे और अधिक से अधिक समय अपनी मां के सेवा में देते थे। उन्होंने भगवान अरुणाचलेश्वर की स्तुति में स्तोत्र लिखे और उनसे विनय की कि वे उनकी मां को शीघ्र स्वस्थ कर दे।

कुछ दिनों के बाद अलगम्माल स्वस्थ हो गई। स्थायी रूप से वह वहीं रहने लगीं । अलगम्माल ने भोजनादि बनाने का दायित्व अपने ऊपर ले लिया और नागसुंदरम को संन्यास आश्रम की दीक्षा दिला दी तथा उनका नाम निरंजनानंद रखा गया। आश्रम के अन्य आश्रमवासी उन्हें चिन्न्स्वामी नाम से पुकारते थे। सन् 1922 के मई महीने में आश्रम में निवास करते हुए महर्षि रमण की मां ने इहलीला सामा'त की।

पशु-पक्षियों से प्रेम
महर्षि रमण साक्षात करुणा के अवतार थे। दूसरों के कष्टों को देखकर उन्हें उन पर तरस आता था। दुखी व्यक्तियों के दुखों को देखकर वे दुख के सागर में डूब जाते थे। वे मनुष्य मात्र के ही नहीं अपितु पशु पक्षियों के भी हितैषी थे। उनका आश्रम प्राचीन मुनियों के आश्रम की याद दिलाता था। गाय, चिड़िया, बंदर तथा गिलहरी उनके आश्रमवासी थे, उनके संगी साथी थे। वे सदैव उन्हें सम्मानित ढ़ंग से आप कहकर संबोधित करते थे। जब उनकी लक्ष्मी नामक गाय मर गई तब वे फूट-फूट कर रोए थे।

सेवाश्रम
महर्षि रमण अपने देहावसान तक अरुणाचल में रहे, उन्होंने अरुणाचल कभी नहीं छोड़ा। उनका आश्रम का जीवन सुखी तथा शांतिपूर्ण था। कई दर्शनार्थी कुछ दिन उनके पास रहते थे तथा कुछ स्थायी रूप से निवास करने आ जाते थे। इस प्रकार आश्रम-परिवार सा हो गया था।

आश्रम में कई विभाग खोले गए जिनमें गौशाला, वेदपाठशाला, प्रकाशन विभाग तथा श्रीदेवी का मंदिर प्रमुख था। महर्षि रमण कभी भी निष्क्रिय नहीं रहे, वे सदैव सक्रिय रहते थे। वे आश्रम के प्रत्येक विभाग के कार्य में हाथ बंटाया करते थे। छपाई की अशुद्धियां ठीक करने से लेकर आश्रम से संबंधित पत्र व्यवहार स्वयं करते थे।

आत्‍मचिंतन का मार्ग
महर्षि रमण बहुत ही सादगी पंसद संतों में से थे, उनकी कभी भी यह लालसा नही रही कि वह अपना प्रचार, प्रसार एवं विस्तार करें, तभी तो उन्होंने भाषाओं एवं पुस्तक लेखन द्वारा अपनी शिक्षाओं एवं उपदेशों का प्रचार एवं प्रसार नहीं किया।

उनका शिष्यों को दिए जाने वाले उत्तर काफी संक्षिप्‍त, सटीक एवं सरल होता था, जिससे जिज्ञासु शिष्य संतृप्‍त हो जाते थे। महर्षि रमण के मतानुसार मन के कुविचारों को शुद्ध करने का एकमात्रा मार्ग है आत्मचिंतन। वे हमेशा अपने शिष्यों को आत्मचिंतन के जरिये अपने कुविचारों को शुद्ध करने की सलाह दिया करते थे।

जीवन की अंतिम यात्रा
समय के साथ महर्षि का स्वास्थ्य अब उनका साथ नहीं दे पा रहा था, दिनोंदिन उनका स्वास्थ्य बिगड़ता ही जा रहा था। डाक्टरों ने उन्हें पौष्टिक आहार लेने का सलाह दी, लेकिन उन्होंने ने डॉक्टरों की सलाह को अनदेखा कर दिया। जिसके वजह से उनके बांये हाथ पर गांठ बन आई थी। डॉक्टरों के मुताबिक, उन्हे 'सरकोमा" की बीमारी हो गई थी। हालांकि, ऑपरेशन के बाद उस गांठ को निकाल दिया गया। परंतु वह गांठ फिर से निकल आई।

इस रोग ने उन्हें इस प्रकार घेर रखा था कि डॉक्टरों के पास अब उनका हाथ काटने के सिवाय और कोई चारा नहीं था, लेकिन महर्षि रमण अपना हाथ कटवाने को तैयार नही हुए, उनका कहना था कि मनुष्य का शरीर ही बीमारी का घर है। इसलिए बेचारा हाथ को क्यों दंड दिया जाए? इस तरह वह अपने जिद्द पर अड़े रहे, जिससे रोग दिनोंदिन बढ़ता ही गया। लेकिन मौत को लेकर उनके चेहरे पर कभी भी वेदना का भाव नहीं आया।

अपने गुरु को इस रुग्णावस्था में देखकर शोकाकुल और वेदना में डूबे शिक्ष्‍यों को वह सांत्वना देते और कहते कि संसार में जो पैदा हुआ है, उसे मरना ही है। यह शरीर नश्वर है और आत्मा स्वाश्वत अमर है। इसलिए इस नश्वर शरीर के लिए दुखी नहीं होना चाहिए। और इस प्रकार महर्षि रमण अपनी जीवन लीला को समेटते हुए 14 अप्रैल 1950 अंतिम सांस लेकर महासमाधिक को उपलब्ध हो गये।


जो भी इसमें अच्छा लगे वो मेरे गुरू का प्रसाद है,
और जो भी बुरा लगे वो मेरी न्यूनता है......MMK

Friday, April 5, 2013

Jeene Ki Rah (जीने की राह )



मन पर जमी धूल साफ करनी होगी
जब  हम तन की धुलाई कर रहे होते हैं, तब परोक्ष रूप से गंदगी के स्रोतों पर ध्यान रख रहे होते हैं। यह जानना समझदारी भी है कि वे कौन-कौन सी स्थितियां होती हैं, जहां से शरीर मलिन होता है। गंदगी कितनी और कैसी है इससे भी धुलाई के साधनों, प्रयासों की मात्रा तय होती है।

शरीर का गंदलापन दर्शनीय है, इसलिए निराकरण भी आसान है। लेकिन इसी समय गंदगी का एक रूप भीतर भी चलता रहता है। शरीर जितना चलता-फिरता है, उससे ज्यादा तो मन भागता फिरता है। मन की क्रियाशीलता में पूरे अस्तित्व का ईंधन जलता है। यहां जो ऊर्जा दहन होती है, उसके धुएं से भीतर कालिख जमती ही है। भीतर का धुआं बाहर नजर नहीं आता है। लेकिन प्रदूषण का प्रभाव काम करता रहता है।

हमारा मन सबसे अधिक गतिमान होता है अपनी प्रशंसा सुनने के लिए। और आलोचना से विचलित भी जल्दी ही हो जाता है। पूरे समय दूसरों से संचालित होने में इसे आनंद आता है। मनुष्य भूल ही जाता है कि दूसरे आपके मन को हथियार बनाकर आपको ही आहत कर रहे होते हैं। अत: जरूरी है कि अपनी अत्यधिक प्रशंसा सुनने से बचें और आलोचना से विचलित न हों।

ध्यान रखें कि लोग हमारे ही मन से उनकी ईष्र्या की तलवार रगड़कर धार तेज कर रहे होते हैं। मन की भाग-दौड़ से उठी धूल को साफ करने के लिए तन की नित्य सफाई जैसे ही क्रियाशील रहना होगा। परमात्मा के यशगान को भी जल माना गया है, इससे सबसे अच्छी धुलाई मन की हो सकती है।

प्रयास कभी व्यर्थ नहीं जाता
अस्तित्व का प्रतिनिधि आत्मा है। जब भी आत्मा के बारे में जानने का प्रयास करेंगे, जीवन और रहस्यमयी हो जाता है। हमारे जीवन में कई ऐसे प्रश्न होते हैं, जिनके उत्तर किससे प्राप्त करें यह प्रश्न भी खड़ा हो जाता है। गुरु मिल जाने पर थोड़ा-बहुत समाधान हो भी जाता है।

फिर भी परमात्मा क्या है, कैसे बात करेगा, इसकी निकटता कैसे मिले, ये सवाल बने ही रहते हैं। इसलिए कुछ धर्मो ने अवतार की बड़ी गजब ही पद्धति अपनाई हैं। कहीं परमशक्ति स्वयं अवतार लेकर आई, तो कहीं अपना बेटा, बंदा बनाकर भेज दिया। राम-कृष्ण के अवतार इसका बड़ा प्यारा उदाहरण हैं। इनसे गुजरकर हमारी सामान्य जिंदगी के सारे सवालों के जवाब मिल जाएंगे।

ये उन्हीं हालात से गुजरे हैं, जिनसे हमारा पाला रोज पड़ता है। इन्होंने वो सारी कठिनाइयां देखी हैं, जिनका सामना होने पर हम थक जाते हैं, निराश हो जाते हैं। बड़ी खूबसूरती से इन्होंने एक बात समझा दी कि सफलता परिश्रम, परिस्थिति और किस्मत तीनों का मेल है। लेकिन फिर भी परिश्रम हमें ही करना होगा। हमें अपना दायित्व परिणाम की चिंता किए बगैर निभाना होगा।

कभी-कभी जब पूरे प्रयास के बाद भी असफलता हाथ लगती है तो निराश न हों। प्रयास व्यर्थ कभी नहीं जाता। प्रयास के परिणाम में मिली असफलता का दृश्य अधूरा है। जीवन के किसी दूसरे हिस्से में किए हुए का परिणाम जन्म ले चुका होगा। अवतारों की व्यवस्था प्रयासों को पवित्रता और प्रोत्साहन देने में बड़ा सहारा है।

अज्ञात भय के अश्रुकण
अतीत से कटना वर्तमान जीवनशैली के आनंद के लिए इलाज की तरह है। मनुष्य की जैसे जैसे उम्र बढ़ती है वह या तो पूरी ताकत से अतीत से चिपक जाता है या भविष्य के अज्ञात भय से डरने लगता है। अतीत के अनुभव उसे सुखद प्रतीत होते हैं।

वर्तमान उनसे दूरी का कारण लगता है और भविष्य में खो देने का अज्ञात भय बना रहता है। लेकिन वृद्धावस्था में वर्तमान संवारना समझदारी होगी। बुढ़ापे में रिश्ते राहत देना बंद कर देते हैं। शारीरिक असमर्थता अपेक्षाओं को और बढ़ाने लगती है। जब रिश्ते पल-पल बदल रहे हों, तब जीवन के उत्तरार्ध में सारी निकटताएं परछाइयों की तरह हो जाती हैं।

इसलिए बुढ़ापे में मन बहुत डराता है। जीवनभर दृढ़ निष्ठावान, विद्वान और धार्मिक रहे लोग वृद्धावस्था में आंसू बहाते नजर आते हैं, क्योंकि उन्होंने जीवनभर बाहर-बाहर की तैयारी की है, अन्तर्यात्रा की सच्चाई को नहीं समझा। जैसे बचपन के पास आंसू गिराने के कोई ठोस कारण नहीं होते, वैसे ही अनेक बूढ़े लोग ऐसे हैं, जिनसे पूछो कि आजकल आप क्यों रो पड़ते हैं? तो उनके पास इस बात का कोई ठोस जवाब नहीं होगा। ये अज्ञात भय के अश्रुकण हैं। अतीत की स्मृतियों का तूफान आंसुओं के माध्यम से बहता है।

मेडिटेशन का अभ्यास बुढ़ापे को वर्तमान पर टिकाता है। जर्जर शरीर में निष्ठुर मन सुदृढ़ आत्मा से मिलने में बाधा खड़ी करता है। आत्मा को नया सफर करना है, शरीर की धर्मशाला से मुसाफिर को चलना ही है तो फिर उकताहट और उदासी कैसी।

संबंधों को समझदारीपूर्वक निभाएं
संसार के सारे रिश्ते या तो संयोग से बनते हैं या स्वार्थ से। जीवनभर मनुष्य इन्हें जानकर अनजाने में निभाता और ढोता भी है। लेकिन एक तीसरा तरीका मन द्वारा रिश्ता बनाने का भी होता है। मन को दूसरे से जुड़ने में बड़ी रुचि होती है।

भीड़ उसके लिए भोजन जैसी है। हमेशा दूसरे से भीतर ही भीतर चिपका रहता है। अप्राप्त स्थिति में सुख की कामना करना और उसकी खोज करते रहना ही उसका अविवेकपूर्ण स्वभाव होता है। और प्राप्त होते ही उसकी मांग और खोज के केंद्र बदल जाते हैं। अकेले रहने में उसे डर लगता है।

यही आदत बाहर भी काम करने लगती है। जरा मनुष्य बाहर अकेला हुआ तो डरेगा या फिर कई लोगों से घिरे रहने के बावजूद अकेला महसूस करेगा। हमें अपने रिश्तों को चार खानों में बांटकर जीने की कला अपनानी चाहिए। संबंधों का हमारा पहला स्तर बुद्धि का होगा, जिससे हमारी व्यावसायिक जिंदगी संचालित होगी। दूसरा स्तर संबंधों का हृदय से रखा जाए, इसका परिणाम प्रेम होगा।

निजी और पारिवारिक जीवन इसी से प्रभावित रहेगा। शरीर से तीसरे स्तर के संबंधों में भोग की जगह सेवा को प्राथमिकता दें। और मन से निर्मित संबंधों को योग से नियंत्रित करें। संबंधों को निभाने में या तो हम चतुराई रखते हैं या चालाकी से काम लेते हैं। इन चारों खानों में संबंधों को रखकर, समझकर निभाएं तो चालाकी और चतुराई का भी सही उपयोग कर सकेंगे। वरना आज के समय में संबंध भी सिर्फ सौदे बनकर रह जाएंगे।

मानव सेवा ही परमात्मा की सेवा है
जिसमें  अधिकार की लोलुपता नहीं होती, बल्कि कर्तव्य-परायणता होती है, उसे घर और बाहर दोनों जगह काम करने में कोई कठिनाई नहीं होती। यह मानकर काम कीजिए कि मैं जो कर रहा हूं, वह समाज का काम है और समाज का मालिक परमात्मा है।

यदि इस भाव से आप काम करेंगे तो कार्य के अंत में प्रियता का उदय होगा। संसार की वस्तु से संसार की सेवा करना ही परमात्मा को प्यार करना है। उसके बदले में न तो संसार से कुछ मांगिए और न ही परमात्मा से। संसार हमारी सभी चाह पूरी नहीं कर सकता और परमात्मा हमारी सभी चाह पूरी नहीं करते हैं क्योंकि वे हमारे परम हितैषी हैं।

हर हाल में खुश रहने की यह व्याख्या स्वामी अवधेशानंद गिरि जी करते हैं। जब आप पैदा हुए, तब कुछ करने के योग्य नहीं थे। जब आपको खुराक और शिक्षण मिला, तब आप कुछ करने लायक हुए। अब जब आप कुछ करने के लायक हुए तो परिवार और समाज के अधिकारों की रक्षा करने से अपने को बचाते हैं या उसका अभिमान करते हैं।

होना तो यह चाहिए कि आपको जो कुछ मिला है, उसे वापस करते रहो और प्रभु के होकर रहो। सुख का भोग मत करो और दुख का सदुपयोग करो, अभाव नहीं होगा। सुख और दुख दो अवस्थाएं हैं। दोनों ही साधन-सामग्री हैं। सुख आता है उदार बनने के लिए और दुख आता है विरक्त बनाने के लिए। लेकिन कठिनाई यह है कि आप वस्तु को अपना मानकर परिवार और समाज को देते हैं और उस पर अभिमान करते हैं। मिली हुई वस्तु, योग्यता एवं सामथ्र्य को अपना मत मानिए और उसका दुरुपयोग मत कीजिए। किसी को हानि न पहुंचाइए वरन दूसरे के काम आइए।

मानव को अंधकार में डालता है अहंकार
अहंकार योग्य से योग्य मनुष्य की मति को भ्रम में डाल देता है। जब मनुष्य हर बात में स्वयं को सही मानने लगता है, तब सही भी गलत रूप ले लेता है। अपने आप को समझदार समझने का हक सभी को है, लेकिन दूसरों को मूर्ख मान लेना बहुत बड़ी गलती है। रावण जैसे लोग इसी तरह की भूल कर जाते हैं। सोचिए, अहंकार मनुष्य को कितने अंधकार मे डाल देता है कि हनुमानजी जैसे समझाने वाले व्यक्तियों के सामने भी रावण कुतर्को की बौछार लगा देता है।

हनुमानजी जानते थे कि एक दिन विभीषण रावण को समझाएंगे, इसीलिए उन्होंने विभीषण को ठीक से समझाया था। वही बात विभीषण ने रावण के सामने दोहरा दी। बुध पुरान श्रुति संमत बानी। कही बिभीषन नीति बखानी।। सुनत दसानन  उठा रिसाई। खल तोहि निकट मृत्यु अब आई।। विभीषण ने पंडितों, पुराणों और वेदों द्वारा सम्मत, अनुमोदित वाणी से नीति बखान कर अपनी बात कही।

उसे सुनते ही रावण क्रोधित होकर बोला कि रे दुष्ट! अब मृत्यु तेरे निकट आ गई है! जिस तरह की अभद्र भाषा रावण विभीषण के सामने बोल रहा था वैसी ही भाषा वह हनुमानजी के सामने बोल चुका था। सुनि कपि बचन बहुत खिसिआना। बेगि न हरहु मूढ़ कर प्राना।। हनुमानजी के वचन सुनकर वह बहुत ही कुपित हो गया और बोला- अरे! इस मूर्ख के प्राण शीघ्र ही क्यों नहीं हर लेते? जबकि हनुमानजी पूरी विनम्रता बरत रहे थे। अहंकार मनुष्य को वाणी से भी गिरा देता है। इसकी कीमत लंका वासियों को चुकानी पड़ी। अत: परिवार में यदि कोई अहम पाले तो उसे तत्काल दूर करें। वरना एक की गलती की कीमत अनेक को चुकानी पड़ेगी।

अनुभव से व्यापारी ने पाई सफलता
उसके पड़ोसी व्यापारी ने भी ऐसा करना तय किया। तब पहले व्यापारी ने उससे कहा- 'भाई! हम दोनों के साथ जाने से कठिनाई होगी। इसलिए तुम पहले जाओ या मैं जाऊं। दूसरे व्यापारी ने सोचा कि पहले जाने में लाभ है। बिना बिगाड़े रास्तों से जाऊंगा। मेरे बैलों को चारा मिलेगा। पानी मिलेगा। मनमाने दामों पर मैं सामान बेचूंगा।

उसने पहले व्यापारी को अपना निर्णय बता दिया, जिसे उसने यह सोचकर स्वीकार किया कि इस व्यापारी के काफिले से रास्ते समतल हो जाएंगे। इसके बैल कड़ी घास खा लेंगे, तो मेरे बैलों को कोमल घास मिलेगी। उनके द्वारा खोदे गए कुओं से हम पानी पीयेंगे और इसके द्वारा तय ऊंचे दामों पर मैं भी सौदा बेच सकूंगा। दूसरा व्यापारी पहले चल दिया। उसके आदमियों ने पानी भरे मटके बैलगाड़ियों पर लाद दिए।

मरूभूमि से गुजरते समय कुछ लोग रास्ते में काफी भीगे हुए मिले। उन्होंने बताया कि आगे तेज वर्षा हो रही है और मटके वहीं खाली कर लेने की सलाह दी, जिसे व्यापारी ने मान लिया। रात में उन्हीं लोगों ने काफिले को लूट लिया। व्यापारी भी मारा गया। एक माह बाद पहला व्यापारी उधर आया। उसे भी डाकुओं ने बरगलाने की कोशिश की, किंतु उसने पानी नहीं बहाया।

जब उसके आदमियों ने कारण पूछा, तो उसने कहा- किसी ने कभी यहां वर्षा होने की बात सुनी है?ञ्ज सभी ने स्वीकारा कि उसकी बात सही है। आगे चलकर जब दूसरे काफिले के लोगों की लाशें देखीं तो वे सारा माजरा समझ गए और डाकुओं से बचकर दूसरे प्रांत में पहुंच गए। वहां से काफी लाभ कमाकर लौट आए। वस्तुत: कुछ नया करने से पहले पूर्ववर्तियों के अनुभव से सीख ले लेनी चाहिए। 

तो जीवन दिव्य-पुष्प बन जाएगा 
विश्वास और अभ्यास के ऊपर सब कुछ आधारित है। कुएं में पानी निकालने की क्रिया में रस्सी पत्थर से लगातार रगड़ खाती है। रसरी आवत जात ते सिल पर पड़त निशान। रस्सी से जब पत्थर पर निशान बन सकते हैं, तो पत्थर से अधिक तो हम लोग जड़मति नहीं हैं। तय कर लें कि, बार-बार चिंतन करूंगा, अभ्यास करूंगा और निश्चित सब समझ में आ जाएगा। साधना का फल एक दिन में नहीं मिल सकेगा। नियमित रूप से दस मिनट भी साधना में बैठते रहें, तो निश्चित रूप से दस मिनट का महत्व मालूम हो जाएगा।

यह आश्वासन स्वामी सत्यमित्रानंद गिरि देते हैं। वे समझाते हैं- अभ्यास से संतुलन हमारे भीतर आएगा। घटनाएं प्रभावित नहीं कर सकेंगी। व्यक्तियों से बातचीत करते समय आपको नारायण स्वरूप लगेगा और अमर्यादित व्यवहार नहीं होगा। जब हम इतने उदार होंगे, तो आपके आसपास रहने वाले परस्पर आत्मीयता के सूत्र में बंधेंगे। सिद्धांत है, महावाक्य है- सिया राम मय सब जग जानीसम्पूर्ण जगत सीता और राममय हो जाएगा। थोड़ा समय नियमित रूप से साधना के लिए अवश्य निकालें।

सब कुछ भगवान का है, परंतु हम एकाधिकारवादी हैं। जब नहीं था, तब परमात्मा से प्रार्थना करते थे और जब उन्होंने कृपा कर मानव तन दे दिया तो कहते हैं- मेरा है। परमात्मा को देने से वह लेता नहीं है, वैसे ही प्रसन्न हो जाता है। संसार के लोग तो देने के लिए छोड़ते नहीं। इसलिए भावात्मक समर्पण, क्रियात्मक भगवान का स्मरण और कुछ क्षणों तक उनसे ऐक्य स्थापित किया जाए,तो हमारा जीवन परमात्मा की बगिया का सौरभ प्रदान करने वाला दिव्य-पुष्प बन जाएगा। 

परिणाम जो भी हो आरंभ पवित्र हो 
भगवान  की इच्छा का क्या मतलब है? सीधा उत्तर है इच्छा भी भगवान ही है, इसे भगवान से अलग कैसे कर सकते हैं? ‘जिस-जिस भाव में जिस-जिस रूप में तुम मुझको भजोगे, मैं उसी रूप में तुम्हारे सामने मौजूद हो जाता हूं।परमात्मा ने यही कहा है, परमपिता से हमारे संबंधों की बड़ी सुंदर व्याख्या श्रीश्रीरविशंकर जी करते हैं- तुम बीज बोओगे तो मैं वृक्ष के रूप में आ जाता हूं। 

तुम घृणा करोगे, तो तुम्हारे सामने घृणा के रूप में उपस्थित हो जाता हूं। तुम ज्यादा खाओगे, तो पेट की बीमारी के रूप में मैं ही तो आता हूं। ज्यादा सोओगे तो आलस्य के रूप में फिर मैं ही आता हूं, भारीपन में मैं ही प्रकट हो रहा हूं।तो हर रूप में परमशक्ति ही प्रकट होती है। इच्छा करोगे, इच्छा के रूप में भी, इच्छा की पूर्ति के रूप में भी। इच्छा के प्रति जो ज्ञान है, वह भी तुम ही हो।

ज्ञान से ही तो इच्छा उठती है, बिना ज्ञान के कहां इच्छा उठेगी? जब आपने कभी किसी चीज को देखा ही नहीं तो उसके प्रति आपकी इच्छा कैसे हो सकती है? किसी सुंदर जगह को आपने देखा है, यदि देखा नहीं, केवल कल्पना ही की है, तो कल्पना भी एक तरह का ज्ञान है। चाहे कल्पित ज्ञान हो, मिथ्या ज्ञान हो, फिर भी ज्ञान के आधार से ही इच्छा उठती है। तो ज्ञान भी उसका ही स्वरूप है। ज्ञान भी भगवान है और इच्छा भी भगवान है तथा क्रिया भी। आप किसको अच्छा और किसको बुरा कहोगे? कर्म, कर्म है। एक समय में जो अच्छा है, वही किसी और समय बुरा सिद्ध हो सकता है। इसलिए कर्म की मूल विचारधारा पर ध्यान दें। उसका हेतु क्या है, यह सही होना चाहिए। परिणाम जो भी हो आरंभ पवित्र रहना चाहिए। 

मां, बहन और बेटी है ये धरती 
अहंकार   में वजन होता है। इतना भारीपन कि पृथ्वी भी सहन नहीं कर पाती। ताकतवर, आततायी लोग इस पृथ्वी पर चलते थे तो पृथ्वी उनके भय व भार से कांपती थी। लेकिन जैन संत तरुणसागरजी और गहरा वर्णन करते हैं- वे कहते हैं कि पृथ्वी कांपती नहीं, अपितु हंसती थी। पृथ्वी कहती है- ठीक है! मेरी ही मिट्टी के अंग होकर मुझ पर ही अकड़कर चलते हो, ठीक है। उछल लो, थोड़ी देर और उछल लो, थोड़ा और अकड़ लो, फिर तो कब्र में सो जाना है। 

मिट्टी को तो मिट्टी में खो जाना है। इसलिए पृथ्वी हंसती है। जब भी कोई पृथ्वी की छाती पर खड़े होकर उस पर अपना दावा करता है, तब धरती को बरबस हंसी आ जाती है। जिस जमीन पर आज आपका मकान है, वह आज आपके कब्जे में है, किंतु सौ-पचास साल पहले क्या वह आपके कब्जे में था? नहीं, वह किसी और के कब्जे में था।

क्या सौ साल बाद भी आपका कब्जा होगा? नहीं, उस पर किसी और का कब्जा हो जाएगा। जमीन तो वहीं की वहीं रहती है। लेकिन आप कहते हैं, धरती हमारी है। धरती हंसती है, क्योंकि आपके दादा-परदादा भी यही कहते चले गए। धरती को अपना कहने वाले कितने ही इसे छोड़कर चले गए, फिर क्यों न इस भ्रम को तोड़ा जाए।

धरती कभी किसी की नहीं हुई है। धरती का कोई स्वामी और पति नहीं है। वह तो सदा कुंवारी है। इसीलिए तो इस देश के एक छोर का नाम कन्याकुमारी कहलाता है। कन्याकुमारी बड़ा सार्थक नाम है। यह अहंकार का परिणाम है कि हम पृथ्वी के प्रति भी दुव्र्यवहार कर जाते हैं। धरती को मां, बहन और बेटी जैसा सम्मान देंगे तो प्रदूषण की समस्या भी सुलझ जाएगी।

हृदय को खटकने वाली कुछ बातें
सही बात गलत जगह स्थापित हो जाए और गलत चीज सही जगह स्थान ले ले, तो खटकने लगती है। संसार में कई बार ऐसा होता है। अयोग्य श्रेष्ठ स्थानों पर चले जाएं, योग्य संघर्ष करते रहें, जिसे मिलना चाहिए, उसे मिले नहीं, जिसके पास खूब हो उसे और मिलता रहे।

ऐसे अनेक उदाहरण दिल को कचोटते हैं। अवंतिका के विख्यात महाराज भर्तृहरि ने अपने नीति शतकग्रंथ में हृदय में खटकने वाली कुछ स्थितियों का बड़ा ही सुंदर वर्णन किया है। वे कहते हैं - कुछ कांटे दिल में चुभते, खटकते रहते हैं, जैसे- दिन के समय चंद्रमा प्रभावहीन हो जाता है। सौंदर्य प्रिय व्यक्तियों के हृदय में चंद्रमा का प्रभावहीन हो जाना बहुत खटकता है।

स्त्री का रूपवती न होना खटकता रहता है। जैसे तालाब की शोभा कमल के फूल से है, इसी प्रकार रूपवान मनुष्य का रूप भी हृदय में खटकता है, यदि वह निरक्षर व मूर्ख हो। दो चार बात करते ही उसकी मूर्खता प्रकट हो जाती है। धन-दौलत से संपन्न व्यक्ति की शोभा उसकी उदारता से होती है। धनी व्यक्ति का कंजूस होना सदैव कांटे की तरह चुभता है। धनवान कंजूस की अपेक्षा निर्धन उदार का मान अधिक होता है।

दुनिया में कांटे की तरह चुभने वाली बातों में एक यह भी है कि सज्जन व्यक्ति जीवन में बहुत कष्ट उठाते हैं। अपनी सज्जनता के कारण संसार के मायावी लोग उन्हें ठग लेते हैं। इसी तरह राजकीय संस्थाओं एवं शासन पदों पर स्वभाव से दुर्जन व्यक्तियों का होना भी बहुत खटकता है। किसी भी देश का यह सबसे बड़ा दुर्भाग्य होता है कि राज्य के पदाधिकारी स्वभाव से दुर्जन और स्वार्थपरायण हों। आज तो यही दृश्य सब ओर है।

हर स्थिति में धैर्य धारण करें
विनम्रता  के लिए धैर्य होना आवश्यक है, अन्यथा विनम्रता एक आवरण बन जाएगी। चूंकि आजकल विनम्रता भी शस्त्र के रूप में उपयोग की जाती है। लोग विनम्र होने का ढोंग करके अपने अहंकार को पोषित करते हैं। बलवान यदि विनम्र हो तो बात समझ में आती है। हनुमानजी से पहली मुलाकात में विभीषण को लग गया था कि हनुमानजी विनम्रता की मूर्ति हैं।

होना भी चाहिए, राम के दूत यदि विनम्र न हों, तो दूतकर्म दूषित हो जाएगा। हनुमानजी से धैर्य सीखकर विभीषण भरी सभा में अपने बड़े भाई रावण को समझा रहे थे। रावण लगातार उनका अपमान कर रहा था। अब तो वह हिंसा पर उतर आया था। अहंकारी रावण द्वारा किए गए तिरस्कार और दुव्र्यवहार से अप्रभावित रहकर विभीषण बड़े भाई रावण के प्रति विनम्रता का ही परिचय देते हैं।

अस कहि कीन्हेसि चरन प्रहारा। अनुज गहे पद बारहिं बारा।। ऐसा कहकर रावण ने उन्हें लात मारी। परंतु छोटे भाई विभीषण ने मारने पर भी बार-बार उसके चरण ही पकड़े।।

उमा संत कइ इहइ बड़ाई। मंद करत जो करइ भलाई।। तुम्ह पितु सरिस भलेहिं मोहि मारा। रामु भजें हित नाथ तुम्हारा।।

शिवजी कहते हैं- हे उमा, संत की यही महिमा है कि वे बुराई करने वाले की भलाई ही करते हैं। विभीषण ने कहा- आप मेरे पिता के समान हैं, मुझे मारा सो तो अच्छा ही किया, परंतु हे नाथ आपका भला श्रीरामजी को भजने में ही है।

हमारे परिवारों में यदि कोई सदस्य रावण की तरह अहंकारी हो जाए, तो हमें विभीषण की तरह अपना धैर्य नहीं छोडऩा चाहिए। विभीषण का श्रीराम की ओर जाना रावण के हित में उठाया हुआ कदम ही था।

बच्चों को दें सात्विक संस्कार
छोटी उम्र से ही बच्चों को मिल रही संगति के प्रति सावधान रहा जाए। हर शब्द, दृश्य, स्पर्श या दूसरी कोई घटना जिसका सामना बच्चों से होता है, उनके जीवन में संस्कार बनकर स्थायी छाप छोड़ जाते हैं। बच्चों को अपने घर-परिवार में मिल रहा वातावरण उनके व्यक्तित्व को गहराई से प्रभावित करता है।

पति-पत्नी या माता-पिता आपस में जितना प्रेममय, सौहार्दयुक्त और आपसी समझ के साथ रहेंगे, बच्चों के स्वभाव में उतनी ही शालीनता और समझदारी की झलक दिखेगी। गायत्री परिवार के संस्थापक आचार्य श्रीराम शर्मा बच्चों के प्रारंभिक विकास और व्यवहार पर बड़ा ही सुंदर निष्कर्ष देते हैं- जिन स्त्री-पुरुषों में पारस्परिक स्नेह, प्रेम और मैत्री की भावना नहीं, उनके बच्चे स्वभावतया उद्दंड और स्वेच्छाचारी ही बनते हैं।

अत: यह हमेशा ध्यान रहे कि हम कोई ऐसी चेष्टा तो नहीं कर रहे, जो बालक के कोमल मस्तिष्क पर बुरा असर डाले। पांच वर्ष की अवस्था आ जाने पर बालक की जिज्ञासाएं बढ़ने लगती हैं। वह अभी तक जिन वस्तुओं को मात्र खेल और तोड़-फोड़ की जरूरत समझता था, अब उनके प्रति उसका उत्सुकता का भाव बढ़ने लगता है। इस उम्र में बच्चों को चित्र, कथा, कहानियां बहुत पसंद आती हैं।

लोरियां व मधुर संगीत में भी उनकी रुचि जाग्रत होती है। इनके लिए वे कभी-कभी हठ भी करते हैं। इस समय बालकों को सुंदर-सुंदर चित्र जिसमें महापुरुषों के चित्र, प्राकृतिक दृश्य आदि हों, दिखाने चाहिए। करुणादायी, शांत और मनोरंजक लोरियों से बालकों का मन बहलाव भी होता है और उनके मनोजगत में सात्विक संस्कारों का आगमन होने लगता है।

श्रेष्ठता जहां से भी मिले उठा लें
आयु बढ़ने के साथ जीवन भले ही कम हो, लेकिन मूल्य आधारित जिसे कहें वेल्यू बेस्ड बातों की बढ़ोतरी होते रहनी चाहिए। वृद्धि केवल धन की न हो, सद्भाव और सद्संस्कारों की भी वृद्धि होते रहनी चाहिए। अच्छाइयां बढ़ाने के लिए कोई बाहरी धंधा नहीं करना पड़ता।

यह स्वयं से स्वयं का किया हुआ व्यापार है। श्रेष्ठता जहां से मिले, अपने लिए उठा लेनी चाहिए और दूसरों में बांटते रहना चाहिए। चौबीसवें जैन र्तीथकर भगवान महावीर का एक नाम वर्धमान बहुत लोकप्रिय हुआ। वर्धमान शब्द का गहरा अर्थ विनोबाजी ने विष्णु सहस्रनाम में बताया है। वे कहते हैं- वर्धमान यानी नित्य बढ़ने वाला, आज का कल नहीं, रोज का रोज विकसित होने वाला।

जिसके चित्त का विकास, गुणों का विकास रोज होता है, वह वर्धमान है। वैदिक परंपरा में आशीर्वाद दिया जाता है- शतं जीव शरदो वर्धमान:। चित्तवृत्तियां विकसित हो रही हैं, चिंतन-शक्ति बढ़ रही है, ऐसी हालत में सौ साल जीएं। वर्धमान शब्द जैनों ने उठाया। महावीर को वर्धमान नाम दिया। महावीर की ऐसी स्थिति थी। काल के साथ लड़कर वे वीरबने, फिर वीर से महावीर बने। इसलिए वर्धमान नाम उनको शोभा देता है।

शारीरिक आयु तो सबकी बढ़ती है, लेकिन उतने मात्र से सबको वर्धमान नहीं कह सकते। आत्मा का आयुष्य बढ़ानेवाला वर्धमान है। वर्धमान पुरुषों का क्षीण होना ही उनकी वृद्धि है और मृत्यु नवजीवन। वर्धमान पुरुष की मृत्यु होती है, तब वह एकदम ऊपर चढ़ता है। ऐसे पुरुष देह के बाहर रहकर भी ज्ञान दे सकते हैं और हम पाते हैं कि सभी महापुरुषों के भीतर का वर्धमान थोड़े से समर्पण से हमसे भी जुड़ सकता है।

ब्रह्मचर्य से बढ़ेगी दांपत्य की पवित्रता
ब्रह्मचर्य शब्द सामान्य रूप से अविवाहित अवस्था से जोड़कर देखा जाता है। लेकिन यदि यह समझ लिया जाए कि ब्रह्मचर्य अवस्था से अधिक जीवनशैली है, तो इसका उपयोग विवाहित जीवन में भी किया जा सकता है।

शादी के बाद अधिकांश संबंध शरीर से जोड़कर देखे जाते हैं। इसीलिए जब दंपती कुछ समय के लिए अलग-अलग रहते हैं तो पति-पत्नी के रूप में स्त्री-पुरुष में काम वेग बढ़ जाना स्वाभाविक होता है। दूरी का आकर्षण पास आने पर खत्म भी होता है।

इसीलिए भारतीय परंपरा में ऐसे कुछ अवसर निकाले गए थे, जिनमें पति-पत्नी थोड़ा दूर भी रहें। लेकिन वैवाहिक जीवन में ब्रह्मचर्य की उपस्थिति दांपत्य की पवित्रता को बढ़ाएगी। इसके लिए स्वामी जी ने एक प्रयोग बताया है। वे कहते हैं कि दांपत्य के चार केंद्र बनाए जा सकते हैं, बुद्धि, हृदय, नाभि और काम केंद्र। बुद्धि से वैवाहिक जीवन की शुरुआत की जानी चाहिए।

जीवनसाथी का चयन व्यावहारिक दृष्टि से करना ठीक है, लेकिन इसके बाद थोड़ा-सा आगे बढ़कर हृदय पर टिकना होगा, क्योंकि घर-गृहस्थी विचार से ही नहीं चलती, इसमें संवेदनाएं भी काम करती हैं। इसके बाद जब दांपत्य जीवन को और गहराई प्रदान की जाए, तब पति-पत्नी अपने नाभि के केंद्र पर टिकें। यह हमारे जीवन का केंद्र है। जब हम इस केंद्र पर टिकते हैं तो हमारे काम केंद्र अपनी गति और भाव बदल देते हैं । उनकी क्रियाएं तो वही रहेंगी, लेकिन उनकी उर्जा एक दिव्य रूप ले लेगी, इसी को कहेंगे, पति-पत्नी के बीच ब्रह्मचर्य घटना। ब्रह्मचर्य में काम केंद्र को निरस्त नहीं करना है, बल्कि वहां की ऊर्जा का सही उपयोग करना है।

विवेक पर लोभ की हावी होती वृत्ति
लोभ की वृत्ति ने मनुष्य को उचित-अनुचित के विवेक से दूर कर दिया है। कम परिश्रम में ज्यादा से ज्यादा पाने की इच्छा इंसान पर बुरी तरह से हावी हो गई है। लोभ की इसी ललक ने मनुष्य को हिंसा के कार्यों में भी अव्वल स्थान पर ला दिया है।

लोभ से पैदा हुई मनुष्य की इस हिंसावृत्ति का सूक्ष्म, वैज्ञानिक विश्लेषण स्वामी रामसुखदासजी ने किया था। वे कहते थे - विभिन्न क्षेत्रों में हिंसा बढ़ रही है। मनुष्यों की हत्याओं में भी वृद्धि हो रही है। खेतों में कीटनाशक के रूप में जहरीली दवाएं छिड़की जाती हैं, जिससे अनुपयोगी समझे जाने वाले जीवों के साथ-साथ उपयोगी जीव भी मर जाते हैं।

वास्तव में परमात्मा की सृष्टि में कोई जीव अनुपयोगी है ही नहीं। परंतु लोभ से अंधे हुए मनुष्य को दूसरे जीव की उपयोगिता दिखाई नहीं देती। जिस गति से हिंसा बढ़ रही है, ऐसे ही बढ़ती रही तो एक समय पशुधन नष्ट हो जाएगा और मांसाहारी मनुष्य मनुष्यों का ही भक्षण करने लगेंगे।

ऐसे मनुष्य ही राक्षस होते हैं। रामावतार के समय भी ऐसी दशा हुई थी कि राक्षसों ने मुनियों को खा-खाकर उनकी हड्डियों के ढेर लगा दिए थे। राक्षसों ने गृहस्थों को न खाकर मुनियों को ही क्यों खाया? ऐसा अनुमान होता है कि घास खाने वाले के मांस की अपेक्षा अन्न खाने वाले का मांस बढिय़ा होना चाहिए।

सिंह के मुख में भी मनुष्य का मांस लग जाए तो वह नरभक्षी बन जाता है। हिंसा की यह वृत्ति केवल खान-पान तक सीमित नहीं रहती, फिर व्यवहार में भी उतर आती है। लोग नेत्रों व वाणी से भी हिंसा करने लगते हैं। चारों ओर अशांति का एक कारण यह भी बन जाता है।

थोड़े समय ध्यान अवश्य किया जाए
चीजों को याद रखना सामान्य रूप से मस्तिष्क का काम है। लेकिन जब याद रखी जा रही बातें सुख और दुख से जुड़ जाएं, तब यह खोज करनी चाहिए कि इसका केंद्र मस्तिष्क की जगह मन भी हो सकता है। मन का स्वभाव है बातों को याद रखना। वह हर स्मरण को सुख और दुख से जोड़ देता है।

उदाहरण के तौर पर हम बचपन में किसी स्थान पर मौज-मस्ती के लिए जाते थे, अब हम बड़े हो गए। मस्तिष्क स्मरण के साथ इस पुरानी बात को याद करता है। मस्तिष्क के इस काम में कोई बुराई नहीं है। लेकिन जैसे ही मन का प्रवेश होता है, वह दुख और सुख साथ में लेकर आता है। और अब हमें वह पुरानी बात दुख के साथ याद आती है कि क्या दिन थे वो। फिर मन बीते हुए की तुलना वर्तमान से करने लगता है।

घटना बीत जाती है और उसकी यादों को मन सुख-दुख की सुरंगों में फेंक देता है। जैसे कुछ लोगों को दादागिरी करने की आदत होती है, वैसे ही मन को यादगिरी करने की आदत पड़ जाती है। फिर मन मालिक बनकर आदमी को उसी में उलझाता है। कभी-कभी तो लगता है निकलना मुश्किल है। जैसे ही हम स्मरण के मामले में मन से संचालित होते हैं, वैसे ही हमारा जीवन उधार का हो जाता है।

हमारी स्मृतियों में दूसरे लोग स्थान बनाने लगते हैं। यदि बारीकी से मुआयना करें तो पाएंगे कि अब जीवन की सारी गतिविधियां भीतर ही भीतर दूसरे लोग कर रहे होते हैं और यहीं से हमारा अपने ऊपर नियंत्रण समाप्त हो जाता है, मनुष्य अशांत रहने लगता है। इसीलिए मस्तिष्क के चिंतन को मन के स्मरण से दूर रखा जाए। ध्यान की क्रिया में इससे मुक्ति मिलती है। इसलिए थोड़े समय ध्यान अवश्य किया जाए।

गलत बातों को तुरंत छोड़ दें
मनुष्य को अपनी उम्र के बढ़ने के साथ जीवन के घटने का अंदाज होना चाहिएक्योंकि हर जन्मदिन उम्र का आंकड़ा लेकर आता है तो जीवन का हिस्सा लेकर जाता भी है।

यह बात मृत्यु तक लोग समझ नहीं पाते। रामकथा में विभीषण का उदाहरण देखें - वे अपनी अच्छाई से रावण और राक्षसों की बुराइयों को प्रश्रय दे रहे थे। हम भी ऐसा ही करते हैं। हमारी कुछ अच्छाइयां हमारे भीतर की बुराइयों की मदद करने लगती हैं। विभीषण रावण को भरी सभा में समझा रहे थे। वे निर्णय ले चुके थे कि अब राम के पक्ष में चलना ही है।

उन्होंने अपनी अंतिम घोषणा की- राम सत्यसंकल्प प्रभु सभा कालबस तोरि। मैं रघुबीर सरन अब जाऊं देहु जनि खोरि।। श्रीरामजी सत्यसंकल्प हैं और हे रावण तुम्हारी सभा काल के वश में है। अत: मैं अब श्रीरघुबीर की शरण में जाता हूंमुझे दोष न देना। इसमें दो बातें विभीषण ने कही हैं- एक तो यह कि तुम लोग काल के वश में हो गए हो और दूसरामेरे इस प्रस्थान पर मुझे दोष मत देना।

विभीषण से हमें यह सीख लेनी चाहिए कि जीवन में जब जागृति आए तो गलत बातों को तुरंत छोड़ दें। अगली चौपाई में लिखा है-अस कहि चला विभीषनु जबहीं। आयुहीन भए सब तबहीं।। साधु अवग्या तुरत भवानी। कर कल्यान अखिल कै हानी।। ऐसा कहकर विभीषण ज्यों ही चलेसब राक्षस आयुहीन हो गए।

उनकी मृत्यु निश्चित हो गई। हे भवानी! साधु का अपमान संपूर्ण कल्याण की हानि कर देता है। मतलब यह कि जब तक विभीषण वहां थे राक्षसों को उम्र मिल रही थी। अच्छाई बुराई को मदद कर रही थी। थोड़ा हम सावधान हो जाएं।

आंखें खुली रखो और चीजों को देखो
जब भी किसी साहित्य को पढ़ें तो केवल शब्द न उठाएं। उन शब्दों के पीछे की समझ को भी उठाएं। शब्द आपको कुछ बातों का जवाब तो दे देंगे, लेकिन समझ यदि आ गई तो हमारी चेतना जाग्रत होगी। शब्द हमें जानकारियों के मामले में समर्थ बना देंगे। लेकिन समझ हमें प्रज्ञा दे जाएगी।

प्रज्ञा का अर्थ है बुद्धि का परिष्कृत रूप। उदाहरण के तौर पर समझें कि केवल शब्दों से प्राप्त की हुई जानकारी यदि शरीर के मामले में हो तो हमें यह तो पता लग जाएगा कि यह शरीर २क्६ हड्डियों से बना है, लेकिन यह समझ नहीं आ पाएगा कि किसी भी स्थिति में हड्डियों को कठोर नहीं होने देना है। हड्डी का लचीलापन ही उसका स्वास्थ्य है। जैसे ही यह कड़क हुई स्वास्थ्य गड़बड़ा जाएगा।

शब्द हमें जानकारी देते हैं कि मनुष्य के फेफड़ों को फैला लिया जाए तो एक टेनिस के मैदान जितना एरिया तैयार हो सकता है। तीन सौ अरब छोटी-छोटी रक्त वाहिनियों से बना फेफड़ा आश्चर्यचकित तो कर सकता है, लेकिन जीवन के स्तर पर कुछ नहीं दे पाएगा। फेफड़ों को जीवन से जोड़ना है तो ध्यान की समझ लानी पड़ेगी। शब्द कहते हैं जुड़े हुए हैं। पर समझ कहती है सांस और फेफड़े इस प्रकार जुड़े हैं कि भीतर एक आंख का जन्म हो जाए। शब्दों ने हमें समझाया है कि दो आंखें होती हैं और इनसे दुनिया देखी जाती है। यह सुगम रास्ता है। आंखें खुली रखो और चीजों को देखो। लेकिन जब सांस फेफड़ों से समझ के साथ जुड़ती है तो भीतर की आंख खुल जाती है। और कुछ ऐसा दिखता है, जो न बाहर की आंखों से नजर आता है और न ही शब्दों से समझा जा सकता है।

विचारों की धुलाई होती रहनी चाहिए
इस समय जिंदगी बहुत तेजी से बदल रही है। सामान्य रूप से कहा जाता है कि आज के मनुष्य ने सोचना कम कर दिया है और करने पर टिक गया है। लेकिन ऐसा है नहीं। आज आदमी के भीतर सबसे अधिक उथल-पुथल किसी चीज ने की है तो वह है विचार।

आचार्य महाप्रज्ञ ने विचारों को तीन श्रेणियों में बांटा है- अविचार, विचार और निर्विचार। जो विचार का संसार है, वहां विरोधाभास पलते हैं, वहां विसंगतियां पलती हैं और वहां समझदारी की ओट में मूर्खता पलती है। यह विचार का क्षेत्र है। अविचार में ऐसा नहीं होता। अविचार की स्थिति वह है, जिसमें व्यक्ति चिंतन करना जानता ही नहीं। छोटे प्राणी हैं, वे चिंतन करना नहीं जानते। यह विचार की अक्षमता ही अविचार है। दूसरी अवस्था है- विचार।

इस अवस्था में प्राणी चिंतन करता है, सोचता है। तीसरी अवस्था है-निर्विचार। यह है ध्यान की अवस्था। इस अवस्था में चले जाने पर विचार समाप्त हो जाते हैं। इस स्थिति में उस चेतना का जागरण होता है, जो चेतना इंद्रियों से, मन से, बुद्धि से और विवेक से परे है। सबसे परे की चेतना अतीन्द्रिय चेतना की अवस्था बन जाती है।

वहां केवल आत्मा का अनुभव शेष रहता है। इसलिए जैसे शरीर को धोते हैं, वैसे ही विचारों की भी धुलाई होती रहनी चाहिए। विचार, विचार से नहीं धुलते, विचार धुलते हैं निर्विचार होने से। निर्विचारिता की आग में विचारों को डाल दें तो उनकी सही सफाई होगी। और ऐसे विचार मनुष्य को सच्च पुरुषार्थी बनाते हैं। उसका अपने ऊपर नियंत्रण हो जाता है। पुरुषार्थी होने का अर्थ यही है कि सारे पुरुषार्थ स्वयं के नियंत्रण से किए जाएं।


जो भी इसमें अच्छा लगे वो मेरे गुरू का प्रसाद है,
और जो भी बुरा लगे वो मेरी न्यूनता है......MMK