Tuesday, January 1, 2013

Jigyasa (जिज्ञासा)


मौन ही है शांति का सबसे आसान रास्ता
शांति चाहते हैं तो मौन सीखिएकेवल मुंह से चुप रहना ही मौन नहीं है। यह अभ्यास से आता हैहम मौन रहते नहींमौन हमारे भीतर घटता है। जब हम इसके सही तरीके और इसकी गंभीरता को समझ लेंगेहमें मौन रहने की कोशिश नहीं करना पड़ेगीयह खुद हमारे भीतर घटने लगेगा। जीवन में शांति उतरेगी।

मौन के वृक्ष पर शान्ति के फल लगते हैं। आज भी कई गुरु दीक्षा देते समय अपने शिष्यों से कहते हैं हमारे और तुम्हारे बीच मौन घटना चाहिए। इसका सीधा सा अर्थ है अपने गुरु से कम से कम बात करें। मौन तभी सम्पन्न होगा। गुरु शिष्य के बीच जितना मौन होगा शान्ति की उपलब्धि शिष्य को उतनी अधिक होगी। 

गौतम बुद्ध मौन पर बहुत जोर देते थे। एक दिन अपने शिष्यों के बीच एक फूल लेकर बैठ गए थे और एक भी शब्द बोलते नहीं थे। सारे शिष्य बेचैन हो गए। शिष्यों की मांग रहती है गुरु बोलें फिर हम बोलें। कई बार तो शिष्य लोग गुरु के नहीं बोलने पर गुरु का अहंकार बता देते हैं। यह मान लेते हैं कि हमारे सद्गुरु हमसे दूर हो गए। दरअसल गुरु बोलकर शब्द खर्च नहीं करते बल्कि मौन रहकर अपने शिष्य का मन पढ़ते हैं। बुद्ध का एक शिष्य महाकश्यप जब हंसने लगा तो बुद्ध ने वह फूल उसको दे दिया और अन्य शिष्यों से कहने लगे मुझे जो कहना था मैंने इस महाकश्यप को कह दियाअब आप लोग इसी से पूछ लो। 

सब महाकश्यप की ओर मुड़े तो उनका जवाब था जब उन्होंने नहीं कहा तो मैं कैसे बोलूं। सारी बात आपसी समझ की है। मौन की वाणी इसी को कहते हैं। इसे मौन का हस्तांतरण भी माना गया है। इसका यह मतलब नहीं है कि गुरु से जो ज्ञान प्राप्त हो वह मौन के नाम पर पचा लिया जाए। गुरु के मौन से शिष्य को जो बोध होता है उसे समय आने पर वाणी दी जा सकती है। पर वह वाणी तभी प्रभावशाली होगी जब गुरु और शिष्य के बीच गहरा मौन घटा हो। मौन का हस्तांतरण पति-पत्नी के बीचबाप-बेटेभाई-भाई के बीच बिल्कुल ऐसे ही घट सकता है और सम्बन्धों में शान्तिगरिमाप्रेम प्रकट होगा।

यादें यानी स्मृतियांहर किसी के साथ जुड़ी होती हैं। कुछ अच्छी तो कुछ दु:खद। आदमी की ये आदत होती है वह या तो भूतकाल की यादों में जीता है या भविष्य की कल्पना में। स्मृतियां आवश्यक भी हैलेकिन इनका सही उपयोग हो। हम यादों में खोकर समय न गवाएं बल्कि स्मृतियों से प्रेरणा का काम लें।

स्मृतियों को सहेजेंसही उपयोग करें
स्मृतियां आदमी को बना भी देती हैं और बिगाड़ भी देती हैं। कई लोग खयालों में खो कर बरबाद हो गए और अनेक लोग खयालों को सपने बनाकर उन्हें पूरे कर आबाद हो गए। बहुत सारी बातों को याद रखना स्मृति नहीं होता। जो भूलने लायक है उसे भूला दिया जाए और जो याद रखने लायक हो उसे याद रखा जाए। इस विवेक शक्ति का नाम स्मृति है। बेकार की बातों को याद रखने का अर्थ है बुद्धि पर अकारण बोझ डालना।

गीता में श्रीकृष्ण ने अर्जुन को इस दार्शनिक तथ्य से समझाया था कि ऐसे स्मृतियों के बोझ से दबी बुद्धि को फिर उन विषयों में आसक्ति हो जाती है। यहीं से बुद्धि की सामथ्यर्ता नष्ट होने लगती है। संत फकीर इस कला को जानते हैं कि साधना पथ में स्मृतियों का कैसे उपयोग किया जाए। 

निरंकारी संप्रदाय के संस्थापक संत बूटासिंह नहीं भूलते थे कि वे कभी अपनी आजीविका चलाने के लिए अंग्रेज सैनिकों के शरीर पर विभिन्न जानवरों और कभी-कभी स्त्रियों के चित्र-आकृति गोदा करते थे। पेशावर से लेकर कई ब्रिटिश राजधानियों में वे यही काम करते थेलेकिन शरीर पर गोदने का काम करते-करते वे लोगों की आत्मा को भी स्पर्श कर लेते थे। हाथों से काम शरीर पर गोदना था पर वाणी से चर्चा आध्यात्मिक किया करते थे। देखते ही देखते पश्चिमी भारत में उन्हें गुरु का दर्जा प्राप्त हो गया। १९४३ में देह छोडऩे वाले ये संत स्मृतियों के सद्पयोग का उदाहरण हैं।

अब दुरुपयोग भी देख लें। आज के समय में ऐसे अनेक संतगुरुओं के आंतरिक अनुभवों को उनके शिष्य उपभोक्ता सामग्री बनाकर पेश कर रहे हैं। आज के दौर में गुरुओं के विचारों को शिष्य-भक्तगण अध्यात्म धर्म की मंडी में बेच दें यहां तक तो ठीक हैपर अब तो गुरु स्वयं ही प्रोडक्ट बनकर अपनी ही बोलियां लगवा रहे हैं। यह स्मृतियों का दुरुपयोग है।

कदम तो बढ़ाएंमंजिल सामने है
सबके जीवन में एक समस्या समान होती है। जीएं कैसेहम कभी किसी को आदर्श बनाकरउसके तरीकों को देखकर जीते हैंफिर कुछ समय बाद हमारा आदर्श बदल जाता है। हम नया तरीका ढूंढऩे में लग जाते हैं। इसी ऊहापोह में हम वह खोते जा रहे हैं जो सबसे कीमती हैहमारा समय। सबसे अच्छी जीवनशैली कौनसीदुनिया में रहते हुए जब हम जीने के एक ढंग से ऊब जाते हैं तो दूसरी जीवनचर्या में प्रवेश कर जाते हैं। चेंज के चक्कर में मनुष्य चकरघिन्नी हो जाता है बस। 

आइए जीने का एक तरीका यह भी अपनाया जा सकता है। उसे देखकर जीएं जो सबको देख रहा है। इसे सीधी भाषा में कह सकते हैं भक्त बन जाएं और अपने पुरुषार्थआत्म विश्वास को भगवान के भरोसे छोड़ दें। परिश्रम अपना हो परिणाम उसका रहे। इसका सीधा सा अर्थ है श्रम हम करें और फल परमात्मा पर छोड़ दें। अध्यात्म में इसे ही निष्कामता कहा गया है।

ऐसा सुनकर लोगों को लगता है कि यह तो बड़ी अकर्मण्यता हो जाएगी। भारतीय संस्कृति और हिंदू धर्म को लेकर वैसे भी लोग कहते हैं कि सब भगवान भरोसेभाग्य भरोसे चलता है। लोग कुछ करते-धरते नहींपरंतु धर्म ने ऐसा कभी नहीं कहाअध्यात्म यह नहीं कहताभगवान् ने भी यह नहीं कहा कि मेरा पूजन करने वाला अकर्मण्य बैठ जाए। भक्त का अपना कर्मयोग होता है। भक्ति जीवन में उतरते ही प्रत्येक कृत्यहर बात के अर्थ ही बदल जाते हैं।

जैन साहित्य में महावीर स्वामी के दो वाक्य बहुत ही अद्भुत व्यक्त हुए हैं। एक बार उन्होंने कहा कि यदि आपने बिछाने के लिए दरी खोलीखोलना शुरू ही की तो समझ लो दरी खुल गई। यदि शुरु ही किया तो समझें काम पूरा हो गया। दूसरी बात कही थी यदि चल दिए तो समझ लो पहुंच गए। 

भगवान की यात्रा में कदम उठाना ही काफी है। उसकी ओर चरण चले कि मार्ग और मंजिल का फर्क खत्म हो जाएगा। यह है भक्त का भरोसाइस जीवनशैली को भी अपना कर देखें। जीवन में जब भी किसी काम के लिए अपने कदम बढ़ाएं तो मन में विश्वास रखें कि मंजिल बस सामने ही है। यही विश्वास आपको दोनों दुनियाभौतिक और आध्यात्मिक जगत में एक जैसी सफलता दिलाएगा।

होश में रहेंजीवन खिल उठेगा
केवल खुमारी में न होना ही होश में होना नहीं है। हम होश में हैं या नहीं यह पता चलता है हमारे नजरिए से। हम अपने भीतर की संभावनाओं को सकारात्मक नजरिए से देखेंविपरित परिस्थितियों में भी आंतरिक विकास के प्रति जागरूक रहें। अगर हम होश में रहेंगे तो जीवन में संभावनाएं बरकरार रहेंगी। खुद को पूरे समय होश में रखने का एक तरीका है ध्यान।

कीचड़ में कमल खिलता है यह एक सामान्य सी कहावत है और प्रकृति का सच्चा अनूठा दृश्य है। कमल तो बेजोड़ और सर्वमान्य है हीहिन्दू देवताओं का अलंकरण और पूजा की सामग्री है। पर आज बात कीचड़ की कर लें। पहली बात तो यह कि कीचड़ को सिर्फ कीचड़ ही न समझा जाए इसमें कमल होने की संभावना छिपी हुई है। यदि नजर में परमात्मा है तो कीचड़ के भीतर छिपा कमल हम प्राप्त कर सकेंगेअन्यथा सतही दृष्टि से तो कमल को भी हम कीचड़ बनाकर छोड़ देंगे। कीचड़ और कमल के परमात्मा के नियम को और थोड़ा खुलकर समझ लें। 

आप दुनियादारी में जितने गहरे उतरते जाएंगे आपको कीचड़ के मायने समझ में आने लगेंगे। अब यदि बाहर कमल खिल सकता हो तो हमारे भीतर क्यों नहीं। हमारे शरीर के श्रेष्ठतम और सातवें चक्र सहस्त्रार का स्वरूप खिले कमल जैसा है। आपके भीतर कीचड़ में कमल खिलने का अर्थ है अब आप जो भी काम करेंगे पूरी तरह होश में करेंगे। कमल के रूप में आपका जागरण खिला है। होश का अर्थ है आप अपने ही कृत्य के दृष्टा हो गए। इस कमल खिलाने की क्रिया का नाम है ध्यान। पर ध्यान के लिए समय की झंझट है लोगों के पास।

कब करें ध्यान। इस वक्त समय के मामले में दो तरह के लोग हैं। एक वे हैं जिन्हें चौबीस घंटे भी कम पड़ रहे हैं दूसरे वे हैं जिन्हें भारी पड़ रहे हैं कि चौबीस घंटे बिताएं तो कैसे बिताएं। एक मध्य मार्ग निकाला जा सकता है। २४ घंटे होश की चिंता छोड़ें। सिर्फ पांच या दस मिनटपूरी तरह से ध्यान में बिताएं। थोड़ी देर का मेडिटेशन पूरे चौबीस घंटे पर प्रभाव रखेगा। करके देखिए पता लग जाएगाकीचड़ में कमल कैसे खिलता है।

शांति बाहर नहींभीतर खोजें
कई लोग जीवनभर खूब मेहनत करते हैंफिर जब मन भारी होता है वे तीर्थोंपहाड़ों या हील स्टेशनों का रास्ता पकड़ते हैं। शांति की तलाश में दुनिया घूम लेते हैं लेकिन एक जगह जाना भूल जाते हैं। खुद के भीतर। जिस शांति की तलाश में दुनिया भटक रही हैवह हमारे अपने भीतर ही है। बस जरूरत है उसे पहचानने कीउसकी ओर आगे बढऩे कीखुद के भीतर झांकने की। हम अपनी सारी ऊर्जा खत्म कर देते हैंशांति की खोज मेंजबकि शांति का सबसे सीधा और आसान तरीका है भीतर की ऊर्जा का रूप बदलना। जिन्हें शान्ति की खोज करना है उन्हें अपने भीतर की ऊर्जा को जानना होगा। 

हम ज्यादातर अपनी जीवन ऊर्जा का उपयोग कर ही नहीं पाते हैं। इसका सबसे अच्छा उपयोग है इसका रूपान्तरण करना। यह ऊर्जा अधिकांशत: मूलाधार चक्र पर पड़ी रहती है। इसे कल्पना के साथ सांस का प्रयोग करते हुए नीचे से ऊपर के चक्रों पर लाकर सहस्त्रार चक्र पर छोडऩा है। बिना किसी तनाव के इसको अपनी दिनचर्या में जोड़ लें और धैर्य के साथ करें। ऊर्जा जितने ऊपर के चक्रों पर है हम उतने ही पवित्र रहेंगे और हम जितने पवित्र हैं उतने ही शान्त होंगे। 

इसीलिए शान्ति की खोज बाहर न करके भीतर ही की जाए।पहले तो ऊर्जा को ऊपर उठाइए तथा दूसरा इसके अपव्यय को रोकें। ऊर्जा को बेकार के खर्च होने से रोकने के लिए अच्छा तरीका है मंत्रजप करें। व्यर्थ होती ऊर्जा सार्थक हो जाएगी। जब आप ऊर्जा के रूपान्तरण में लगेंगे तो पहली बाधा बाहर से नहीं भीतर से ही आएगी और यह कार्य करेगा हमारा मन। इसलिए अपने मन पर हमेशा संदेह रखें। हम एक भूल और कर जाते हैं इस मन को हम अपना समझ लेते हैंजबकि इसका निर्माण हमारे लिए दूसरों ने किया है। माता-पितामित्ररिश्तेदारशिक्षक आदि ने। 

जो हमारा बीता समय हैउसने हमारे मन को बनाया है। ये अतीत की स्मृतियां हमारे वर्तमान को आहत करती हैंइसी कारण हमारा मन या तो अतीत से बंधा है या भविष्य से जुड़ा रहेगा। मन वर्तमान से सम्बन्ध बनाने में परहेज रखता है। मन जितना वर्तमान से जुड़ेगाउतने ही हम शान्त रहेंगे। इसी को जागरण कहा गया है। तो जाग्रत रहें और ऊर्जा को ऊपर उठाएंफिर संसार की कोई परिस्थिति आपको अशान्त नहीं कर सकती। इन दोनों काम में जिससे आपको मदद मिल सकती है।

सावधानकहीं हम वस्तु तो नहीं बन रहे
भौतिकता के दौर में जो सबसे बड़ा नुकसान हुआ हैवह है मूल्यों का खोना। विलासिता के दौर में मनुष्य का स्तर भी एक वस्तु के बराबर होता जा रहा है। हमने बड़े-बड़े बाजार खड़े कर लिए लेकिन दुर्घटना यह घट गई कि इस बाजार में हमारी औकात सामान जितनी ही रह गई है। हम जीवन का आनंद तलाशने के लिए बाजार में निकले और परेशानियां खरीद लाए। अक्सर जीवन में यह कमी रह जाती हैहमें चाहिए क्या और हम क्या खरीद रहे हैं।

जरूरत की चादर और मोह की दुशाला इन दोनों में जो फर्क है उस अंतर को समझने का अब समय आ रहा है। यह पूरा सप्ताह दीपावली के पूर्व खूब खरीददारी का समय होगा। धनवैभवसम्पत्ति और साधन सभी अपने आकर्षक रूप में साधकों को घेरेंगे। वस्तुएं खरीदते-खरीदते कहीं हम स्वयं भी वस्तु न बन जाएं। अध्यात्म मार्ग के लोगों को ध्यान रखना होगा कि आवश्यक वस्तुएं तो बसाई जाएं लेकिन उससे मोह न पालेंक्योंकि मोह धीरे से लोभ में बदल जाएगा और लोभ भक्ति में बाधक होता है। आने वाले सात दिनों में माया अपने पूरे दबाव के साथ साधकों के जीवन में प्रवेश हेतु तैयार रहेगी। 

परमहंस रामकृष्ण कहा करते थे माया को सरलता से समझना हो तो श्रीरामकथा के एक दृश्य में प्रवेश किया जाए। वनवास के समय श्रीराम आगे चलते थे मध्य में सीताजी होती थीं और उनके पीछे लक्ष्मण रहते थे। इस दृश्य पर तुलसीदासजी ने लिखा है आगे राम अनुज पुनि पाछें मुनि बर बेष बने अति काछेंउभय बीच सिय सोहति कैसे। ब्रह्म जीव बिच माया जैसे इसका अर्थ है भगवान श्रीराम परमात्मा का रूप हैंलक्ष्मणजी आत्मा या कहें जीवात्मा हैं और इन दोनों के बीच में माया स्वरूप में सीताजी हैं। सीताजी रामजी के चरणों की अनुगामी थीं। 

जहां-जहां श्रीराम पैर रखते थे वहीं-वहीं सीताजी चलती थीं और इसी कारण लक्ष्मणजी श्रीरामजी को ठीक से देख नहीं पाते थे। संयोग से कोई मोड़ आ जाए तो लक्ष्मणजी को श्रीराम दिख जाते थे। संदेश यह है कि परमात्मा और जीवात्मा के बीच जब तक माया है परमात्मा दिखेंगे नहीं। किसी मोड़ पर माया जरा सी हटी और परमात्मा के दर्शन हुए। भक्ति में ऐसे मोड़ आते ही रहते हैं। इसलिए आने वाले सात दिनों में माया तो रहेगी पर हमें मोड़ बनाए रखना है। यहीं हमारी भक्ति की परीक्षा होगी।

यह माया ही हमें परमात्मा से दूर रखती है। परमात्मा कभी अपनी माया हमारे बीच से नहीं हटाएगा। यह प्रयास तो खुद हमें करना होगा कि माया से ऊपर उठकर या दाएं-बाएं होकर हम परमात्मा को देख लें। यह एक बार का काम नहींइसके लिए लगातार प्रयासरत होना पड़ेगा।

अगर पाने की चाह है तो खोने से न डरें
हम दुनिया का हर सुख चाहते हैं लेकिन अगर एक भी चीज खोनी हो तो हम सहम जाते हैंडर जाते हैं। परमात्मा ने इस संसार को रचातो नियम ही कुछ ऐसा बनाया कि हमें बिना मूल्य चुकाए कोई चीज मिल ही नहीं सकती है। और अगर बात खुद परमात्मा को पाने की है तो उसके लिए ऐसा मूल्य भी चुकाना पड़ेगा। परमात्मा को पाना है तो खुद की पहचान खोनी होगी। हर इंसान को अपनी पहचान से बड़ा मोह होता हैलेकिन जब परमात्मा से मिलना हो तो फिर उसी का होकर मिलना पड़ता है।हर उपलब्ध वस्तु का अपना एक मूल्य होता है। जो लोग परमात्मा को पाना चाहते हैं उन्हें अच्छा खासा मोल चुकाने की तैयारी रखना होगी। 

सच तो यह है कि ईश्वर जैसी महान हस्ती को पाने के लिए एक बड़ा मूल्य चुकाना होगा और वह है खुद ही को खो देना। कोई यह सोचे कि यह सत्ता थोड़े से धन सेसम्पत्ति से या मान देने से मिल जाएगी तो यह भ्रम होगा। खुद ही को खर्च किए बिना परमात्मा नहीं मिलेगा। अपने निज का दांव लगाना पड़ेगाअपनी ही आहूति देना पड़ेगी। 

हनुमानजी का उदाहरण लें। जब तक उनके जीवन में श्रीराम नहीं आए थे वे केसरी के बेटे के रूप में तथा सुग्रीव के सचिव के रूप में जाने जाते थे। जैसे ही श्रीराम उनके जीवन में आए हनुमानजी ने अपनी सारी पहचान समाप्त कर दी और पूरी तरह राममय हो गए। श्रीराम जितने हनुमान को मिले उतने शायद ही किसी को मिले होंगे। कारण वही था हनुमानजी ने स्वयं को पूरा खो दिया था और खुद को खोने के बाद जो मिला वह अनमोल है। हनुमानजी इसीलिए सभी धर्मों में प्रिय हैं। हर संप्रदाय का व्यक्ति वायु का उपयोग करता है और हनुमानजी वायु के देवता हैं। कोई सा भी धर्म हो उस परमसत्ता तक पहुंचने के लिए सिद्धांत सबके एक ही होंगे। 

समझदार भक्त किसी भी धर्म के हों अपने सम्प्रदाय को मार्ग की तरह उपयोग करते हैं और मंजिल पर पहुंचने पर मार्ग को छोड़ देते हैं। जो नासमझ हैं वह मार्ग पर ही टिक जाते हैं। संप्रदाय एक मार्ग है। अब मार्ग या संप्रदाय का क्या दोषवह तो लोग गलत उपयोग करते हैं इसलिए संप्रदाय शब्द बदनाम हो गया। यह तो वाहन की तरह है। हम वाहन का उपयोग करने के बाद उसको छोड़ देते हैं अपने ऊपर ढोते नहीं। यदि कोई वाहन को ढोए तो इसमें वाहन की क्या गलती। संप्रदाय भी इसी तरह है। हनुमानजी अपने चरित्र से यही बताते हैं कि उस परम सत्ता को पाने के लिए विलीन हो जाओ और ऐसी अवस्था में धर्म और संप्रदाय आड़े नहीं आएंगे। आपको वह परम सत्ता उपलब्ध हो जाएगी जिसके लिए आप संसार में आए हैं।

प्रकृति से जुड़ेंपरमात्मा मिल जाएंगे
परमात्मा को अनुभव करने का सबसे बेहतर रास्ता है प्रकृति। कहते हैं प्रकृति परमात्मा की प्रतिनिधि है। नदियांपहाड़जंगलवनस्पति और जीवसभी परमात्मा के प्रतिनिधि है। भारतीय मनीषियों ने इंसान को परमात्मा से जोडऩे के लिए प्रकृति के जरिए ही प्रयास करने के तरीके इजाद किए। ये तरीके ही हमारी संस्कृति में व्रत-त्योहार और उत्सव बनकर आए हैं। इन उत्सवों के मर्म को समझेंइसके आनंद को अनुभव करेंगे तो परमात्मा खुद आपको महसूस होने लगेगा।

परमात्मा ने मनुष्य को ही यह संभावना दी है कि वह अपनी चेतना को ऊपर उठा सकता है तब देव तुल्य बन जाएगा। चेतना का स्वभाव है यदि इसे ऊपर नहीं उठाया गया तो यह नीचे प्रवाहित होगी ही और तब पतन निश्चित है। अत: मनुष्य के पास यह मौका है कि वह दोनों ओर जा सकता है श्रेष्ठ पर भीनिकृष्ट पर भी। चेतना को यदि श्रेष्ठ पर ले जाना है तो एक तरीका यह भी है कि उसे प्रकृति से जोड़ें। प्रकृति परमात्मा की प्रतिनिधि है। ये तो हमारे पर्यावरण दोष ने हमें प्रकृति से दूर किया है और इसी कारण हम परमात्मा से भी बिछड़ गए हैं। भारतीय शास्त्रों ने कुछ त्यौहारों को अद्भुत रूप दिया है। ऐसा ही एक त्यौहार है गोवत्स द्वादशी। इस दिन गोपूजन का महत्व है। 

भारत जैसे कृषि प्रधान देश में गाय उसकी सच्ची प्रतिनिधि है। माना तो यहां तक गया है धरती को जो अमृत मिलता है वह गाय के दूध के रूप में मिलता है। हम जितना अधिक गाय को पूजेंगे समझ लीजिए उतना ही प्रकृति के प्रति सम्मान दर्शा रहे होंगे। यह कैसे संभव है कि कोई प्रकृति से प्रेम करे और गाय पर अत्याचार। गाय से जुडऩे का अर्थ है अपने अस्तित्व से अहंकार को मुक्त करना। 

हम बुद्धि और अहंकार से इतने अधिक भर गए हैं कि परमात्मा के लिए कोई स्थान रिक्त ही नहीं रहा। हिंदुओं के दो प्रमुख अवतार श्रीराम और श्रीकृष्ण ने प्रकृति के दो प्रतिनिधियों को अपनी लीला में विशेष स्थान दिया है। श्रीराम ने वानरों को तथा श्रीकृष्ण ने गायों को। मनुष्य का शरीर यदि बंदरों के शरीर का विकास है तो मनुष्य की आत्मा गाय की आत्मा का विकास है। यदि गाय की आंख में आंख डालकर आप ५ मिनट रुक जाएं तो आपका ध्यान लग जाएगा। परमात्मा की कृपा चाहिए तो प्रकृति का सम्मान करें।

बाहरी आवरणभीतरी गुणों सा ही हो
यह दिखावे का दौर हैव्यक्ति का महत्व उसके गुणों से नहीं बल्कि उसके बाहरी आवरण से आंका जा रहा है। हम व्यक्तित्व परखते समय केवल बाहरी आवरण यानी कपड़ों और आभूषणों पर टिक जाते हैं। अच्छे कपड़ेआभूषण और सुंदर बनाव-शृंगार हो तो व्यक्तित्व आकर्षित करता लेकिन हम उसके भीतर झांकना भूल जाते हैं। आध्यात्मिक शांति की यात्रा में पहनावा भी एक बड़ा कारण हो सकता है। हम स्वभाव से क्या हैं और हमारे ऊपर का आवरण क्या हैअगर आध्यात्मिक शांति की तलाश है तो हमें बाहर और भीतरी आवरण में समानता लानी होगी। 

हमारा पहनावा भी हमें भीतर तक प्रभावित और परिवर्तित कर सकता है। क्या पहना जाए इसे लेकर कई लोग दिनभर परेशान रहते हैं। यदि आध्यात्मिक दृष्टि से देखें तो बात केवल कपड़ों की नहीं की जा रही है। हम एक ऐसा आवरण पहन लेते हैं जिसमें पता नहीं लग पाता कि हम भीतर से कुछ और हैं बाहर से कुछ और हैं। सबसे अच्छा ड्रेस कोड यह है कि हम जैसे भीतर हों वैसे ही बाहर रहें। छल के वस्त्र परमात्मा को पसंद नहीं आते। वस्त्रों की योग्यता उसकी उपयोगिता में होती है। किस वस्त्र का किस समय कितना उपयोग किया जाए यह समझदारी कहलाती है। यह समय उपभोक्ता युग है। कपड़े बनाने वाले सावधान हैं कि उपभोक्ता को कैसे कपड़े चाहिएकिन्तु पहनने वाले लापरवाह हैं। 

वस्त्रों के उपयोग का एक उदाहरण रामायण में अनसूया-सीता भेंट प्रसंग में आता है। श्रीरामलक्ष्मण और सीता के साथ दंडकारण्य में ऋषि-मुनियों की राक्षसों से रक्षा के लिए पहुंचे हैं। वहां वे ऋषि दंपत्ति अत्रि-अनसूया से मिलते हैं। अनसूया वन-जीवन की आवश्यकताओं को समझते हुए सीता को ऐसे वस्त्र और आभूषण भेंट करती हैं जो कभी मैले नहीं होते और जिन्हें साफ करने की आवश्यकता नहीं होती। दिव्य बसन भूषन पहिराए। जो नित नूतन अमल सुहाए॥कह रिषिबधू सरस मृदु बानी। नारिधर्म कछु ब्याज बखानी॥ उन्हें (सीता को) ऐसे दिव्य वस्त्र और आभूषण पहनाएजो नित्य नए निर्मल और सुहावने बने रहते हैं। 

प्राकृत वस्त्राभूषण में तीन दोष होते हैं। वे पुरानेमलिन और शोभाहीन हो जाते हैं। ये दिव्य वस्त्र इन दोषों से रहित थे। अयोध्या से वनगमन से निकलते समय श्रीराम ने सीता को कहा था - अपने हार आदि आभूषण गुरुपत्नी अरुंधती को दे दो। वन में सीता क लिए जो वस्त्र-आभूषण उपयोगी थेवही अनसूया ने उन्हें दे दिए थे।जब हम पहनावे की बात करें तो पहले भीतरी पहनावे यानी हमारे स्वभाव और गुणों को सुधारेंबाहरी आवरण स्वत: ही आकर्षित करने लगेगा।

योग्यता हमेशा रहेगीअपना भोलापन संभाले रखें
आज के दौर में योग्यता तो कई लोगों में मिल जाती है लेकिन सहजता या कह लें भोलापन कम ही लोगों में मिलता है। आजकल भोले इंसान को बेवकूफ या बुद्धू भी कह दिया जाता है। लोग उसे हंसी का पात्र बना देते हैं। दरअसल भोलापन एक दुर्लभ गुण हैइस गुण के होने से आदमी में जो खास बात आ जाती है वह यह कि वह भेदभाव भूल जाता हैअहंकार से दूर हो जाता है। हमारे दो देवताओं में यह गुण समान हैपहले भगवान शिव और दूसरे बाबा हनुमान। दोनों परम शक्तिशालीज्ञानी और पराक्रमी हैं लेकिन दोनों के स्वभाव में भोलापन हैं। हमें इस गुण को साधने का प्रयास करना चाहिएहम सहज हो जाएंगे। शब्द ज्ञान तो बढ़ा देते हैं लेकिन ध्यान को बाधित कर देते हैं। 

श्रीहनुमानचालीसा दुनिया में खूब बोली जा रही ऐसी पंक्तियां है जो आपको मौन में उतार देंगी और यहीं से ध्यानमेडिटेशन घटेगा। इसकी छठवीं चौपाई शंकर सुवन केसरी नंदन तेज प्रताप महाजग बंदन को लेकर पंडितों का अलग-अलग मत है। आईए आज शब्द तथा अनुभूति को समझा जाए। कुछ विद्वान कहते हैं शंकर सुवन का अर्थ है हनुमानजी स्वयं शंकर हैं और अन्य का मत है। वे शंकरजी के बेटे हैं। जो पुत्र मानते हैं उनके पास शिवपुराण में व्यक्त हनुमत जन्म कथा का आधार है और स्वयं शंकर हैं ऐसा मानने वाले विनय पत्रिका में प्रकाशित एक क्षेपक कथा का प्रमाण देते हैं। 

दोहावली तथा आनंद रामायण के प्रसंगों की चर्चा भी की जाती है। सच तो यह है कि हनुमानजी के जन्म की सात-आठ कथाएं हैं। इस कारण भी मान्यता में भेद आना स्वाभाविक है। सुवन शब्द को पकड़कर हम शोध में तो पहुंच सकते हैंपर भक्ति में नहीं उतर पाएंगे। शंकर सुवन पंक्ति में जो अनुभूति है मात्र शब्द शोध से खोखली हो जाएगी। हमें वहां जाना होगा जहां इनका आरंभ हुआ था। शंकर सुवन लिखते समय तुलसीदासजी का भाव था हनुमानजी को शंकरजी के भोलेपन से जोडऩा। 

क्योंकि इसी की अगली पंक्ति में लिखा है तेज प्रताप महा जग बंदन। तेजस्वी और प्रतापवान यदि भोलेपन से भरा हो तो वह हनुमान होता है। आज के दौर में जब भोलापन मूर्खता और सरलता बेवकूफी मान ली गई हो तब तुलसी की यह मांग बड़ी जरूरी है कि हनुमान भक्त भोलापन बचा कर रखें। योग्यता और भोलापन मणिकांचन योग है। आज के योग्य लोगों को देख भगवान से यह सवाल पूछने की इच्छा होती है प्रभुक्या आप वह फर्मा कहीं रख कर भूल गए हो जिसमें भोले और भले लोग तैयार किए जाते थे।

अभाव में जीना सीखेंआनंद अपनेआप मिलेगा
दुनिया सुखों के पीछे दौड़ रही है। हर कोई सबकुछ पाने की होड़ में लगा है। सौ फीसदी सफलता से कम तो किसी को मंजूर ही नहीं है। हम खुद भी ऐसे हैं और बच्चों को भी इसी दौड़ में जुटा दिया है। हर सुखसारी सुविधा और दुनियाभर का वैभव हर एक ही दिली तमन्ना हो गई है। एक चीज का अभाव भी बर्दाश्त नहीं हैथोड़ी सी असफलता हमें तोड़ देती है। लेकिन इसके बाद भी जो नहीं मिल रहा हैवो है आनंद। दरअसल यह आनंद सबकुछ पा लेने में नहीं है। कभी-कभी अभाव में जीना भी आनंद देने लगता है। अगर आपके भीतर कोई अभाव है तो उसे सद्गुणों से भरने का प्रयास करेंमहत्वाकांक्षाओं को हावी न होने दें। मन चाहा मिल जाए इसके लिए तेजी से दौड़ रही है दुनिया। न मिलने का विचार तो लोगों को भीतर तक हिला देता है। 

संतों ने बार-बार कहा है जो है उसका उपयोग करो तथा जो नहीं है उसे सोच-सोच कर तनाव में मत आओ। हम जो नहीं है उसे हानि मानकर जो है उसका भी लाभ नहीं उठा पाते हैं। आज अभाव की बात की जाए। संतों के पास यह कला होती है कि वे अभाव का भी आनंद उठा लेते हैं। हमारे लिए दो उदाहरण काफी है। श्रीराम वनवास में पूरी तरह से अभाव में थे। जिनका कल राजतिलक होने वाला था उन्हें चौदह वर्ष वनवास जाना पड़ा। 

इधर रावण के पास ऐसी सत्ता थी जिसे देख देवता भी नतमस्तक थे। एक के पास सबकुछ था फिर भी वह हार गया और दूसरे ने पूर्ण अभाव में भी दुनिया जीत ली। अभाव हमें संघर्ष के लिए प्रेरित करेकुछ पाने के लिए प्रोत्साहित करे यहां तक तो ठीक है परन्तु हम अभाव में बेचैन हो जाते हैं और परेशानतनाव ग्रस्त मन लेकर कुछ पाने के लिए दौड़ पड़ते हैं तब क्रोधहिंसाभ्रष्ट आचरण हमारे भीतर कब उतार जाते हैं पता ही नहीं चल पाता है।इसे एक और दृष्टि से देख सकते हैं। 

रावण में भक्ति का अभाव था बाकी सब कुछ था उसके पास। कई लोगों के साथ ऐसा होता है। आदमी अपने अन्दर के अभाव को भरने की कोशिश भी करता है। रावण ने भक्ति के अभाव को अपने अहंकार से भरा थाआज भी कई लोग अपने अभाव को अपनी महत्वाकांक्षा विकृतियोंदुर्गुणों से भरने लगते हैं। जिन्हें भक्ति करना हो वे समझ लें पहली बात अभाव का आनंद उठाना सीखें और अभाव को भरने के लिए लक्ष्यउद्देश्य पवित्र रखें।

शब्द संवारते हैं हमारा व्यक्तित्व
कहते हैं सृष्टि की रचना शब्द से हुई है। कोई ब्रह्मनाद इस ब्रह्मांड में गूंजाफिर उसने रूप धरना शुरू किया। शब्दों में बड़ी शक्ति होती हैहम जब भी कुछ कहेंयह समझकर कहें कि वे हमारे बोले गए शब्द क्या प्रभाव पैदा करेंगे। शब्द हमारा व्यक्तित्व और विचार दोनों बनाते हैंहमारे भीतर क्या गूंज रहा हैहमारा व्यक्तित्व इसी पर निर्भर करता है। जो शब्द हमारे अंदर हमेशा नाद करते रहते हैंहम स्वयं भी वैसे ही हो जाते हैं। 

जिस इंसान के मन में परमात्मा के शब्द गूंज रहे होंउसे हर जगह केवल परमात्मा की तलाश ही होती हैकिसी के मन में हमेशा भौतिक इच्छाओं की आवाज उठती रहती हैसो उसे भौतिक और दैहिक सुख की ही तलाश होती है। शरीर सद्कर्मों और मन सद्विचारों से संवरेगा। सद्विचार संवरते हैं सिमरन सेसिमरन के लिए शब्द-नाम की ताकत चाहिए। नाम महिमा के लिए गुरुनानक देव ने कहा है शब्दे धरतीशब्द अकासशब्द-शब्द भया परगास। सगली सृस्ट शब्द के पाछेनानक शब्द घटे घट आछे।। 

इस शब्द ने धरतीसूर्यचंद्रमा सारी दुनिया पैदा की है। यही शब्द सबके भीतर अपनी धुनकारें दे रहा है। इस नाम की खोज की जाए जो सबके भीतर है। सभी संत-फकीरों ने अध्यात्म को समझाने के लिए अपने-अपने शब्द दिए हैं जो बाद में नाम-वंदना बन गए। गुरुनानक साहिब ने इसे गुरुवाणीसच्चीवाणीअकथ-कथहुकमहरि कीर्तन कहा। ऋषि मुनियों ने इसे कभी आकाशवाणी कहा तो कभी रामधुन। चीनी गुरुओं ने ताओमुस्लिम फकीरों ने कलमाबांगें आसमानीकलामे इलाहीबताया। ईसा मसीह इसे लोगास बता गए। 

लेकिन फकीरों ने जो नाम शब्द बताया है इसे हम केवल ऐसे शब्दों से न जोड़ लें जो जुबान से निकलते हैं। यह नाम शब्द एहसास का मामला है। हमारे शरीर के भीतर नाम अपनी अनुभूति रखते हैं।जब हम ध्यान करते हैं तो ये नाम या गुरुमंत्र केवल बोलने के शब्द बनकर नहीं बल्कि सुमिरन ध्यान में अपना नाद देते हैंगूंज ध्वनि देते हैं। यह भीतरी अनुगूंज हमें गहरे ध्यान में उतारती है। 

कई लोगों को तो गुरुनानक साहिब के वाहे गुरु संबोधन ने भी ध्यान में उतार दिया। यह नाम जप एक पुकार बन जाता है। परमात्मा को पाने के लिए हम जब आतुर होते हैं और उस आतुरता में जो शब्द उच्चारित होते हैं वे नाम जप बन जाते हैं। शिक्षा पद्धति में विषय की पुनरावृत्ति एक विधि हैजिसे रिवीजन लर्निंग कहते हैं। ऐसे ही अध्यात्म के अभ्यास में जप लर्निंग है। निरंतरता बनाए रखिए एक दिन परमात्मा आपको उपलब्ध होगा।

मित्रता भावों से होशक्ति या औहदे से नहीं
अधिकतर लोग मित्रता उनसे गांठ लेते हैं जिनके पास कोई पद होवैभव हो या शक्ति हो। यह रिश्ता बहुत महत्वपूर्ण होता है। लोग यह भूल जाते हैं कि जिससे मित्रता कर रहे हैंउसके गुण क्या हैअमीर हो लेकिन अहंकारीशक्तिशाली हो लेकिन आततायीवैभवशाली हो लेकिन भोगप्रवृत्ति का हो तो ऐसे आदमी से दोस्ती करना निरर्थक ही नहीं कभी-कभी अपने लिए भी अपमान का कारण बन सकता है। मित्रता हमेशा भाव और समर्पण देख कर रहेंतभी आपके काम ठीक होंगे। अगर सोद्देश्य मित्रता भी है तो उसमें भी इन बातों का ध्यान रखना जरूरी है। श्रीराम को सुग्रीव व साथियों से इतनी जानकारी मिल गई थी कि सीता का अपहरण हुआ है। 

कोई राक्षस विमान से सीता को दक्षिण दिशा में ले गया है। मुद्दा था सीताजी की खोज। सुग्रीव ने श्रीराम को आश्वस्त किया था कि सब प्रकार करिहउँ सेवकाई। जेहि बिधि मिलिहि जानकी आई॥ ''मैं सब प्रकार आपकी सेवा करूंगाजिस उपाय से जानकीजी आकर आपको मिले।श्रीराम से सुग्रीव की पहली ही मुलाकात में यह वार्तालाप हुआ था। श्रीराम के पास यह विकल्प था कि वे सीता शोध जैसे महत्वपूर्ण कार्य के लिए या तो सुग्रीव से मित्रता करें या बालि से। बालि उस समय बलशाली थे और राजा थे किंतु श्रीराम ने मैत्री सुग्रीव से की क्योंकि बालि अहंकारी थे और अनुचितअन्याय के प्रति विरोध नहीं करते थे। 

एक और महत्वपूर्ण पक्ष यह था कि श्रीराम और सुग्रीव की मैत्री हनुमानजी ने करवाई थी। कीन्ही प्रीति कछु बीच न राखा। दोनों ने हृदय से प्रीति का कुछ भी अंतर नहीं रखा। यह श्रीराम की विशिष्ट शैली थी कि उन्होंने विवेक से सुग्रीव पर विश्वास किया। जिस पर विश्वास किया जाएउसे पूरा अधिकार भी दिया जाए। श्रीराम ने सुग्रीव पर पूरा विश्वास कर अधिकार दिया कि वे सीता की खोज करें। इसी विश्वास की प्रेरणा का आधार था कि सुग्रीव ने अपनी पूरी ताकत सीता शोध में झोंक दी। अपनी सेवा से उन्होंने कहा था - राम काजु अरू मोर निहोरा। बानर जूथ जाहु चहुँ ओरा।। '' हे वानरों के समूह यह श्रीराम का कार्य है और मेरा अनुरोध है तुम चारों ओर जाओ। श्रीराम ने सुग्रीव को निर्णय लेने का अधिकार दिया और सुग्रीव उस पर खरे उतरे। सीता की खोज हुई और लक्ष्य की प्राप्ति।

शिक्षा वो जो शांति दे
शिक्षा प्रणाली में गलाकाट स्पर्धा अब चिंता का राष्ट्रीय मुद्दा हो गई है। नई पीढ़ी नंबरों की दौड़ और रैंक की होड़ में लगा दी गई है। माता-पिता बिना बच्चे की मानसिक स्थिति को समझे उसे नंबरों की अंधी दौड़ में दौड़ा रहे हैं। आधुनिक शिक्षा प्रणाली से ततकलीक प्रतिभाएं तो पैदा हो रही हैं लेकिन इस पीढ़ी का भविष्य क्या होगा अब इस पर चिंतन करना जरूरी है। नई पीढ़ी अब पूरी तरह भौतिकता के पीछे हैजीवन का दर्शन बदल गया है और सबसे बड़ा नुकसान जो हुआ है वह यह कि इस पीढ़ी के भीतर एक अंशाति है। 

सारे सुखविलासिता के साधनों के बावजूद इनके पास शांति नहीं है। शिक्षा के विस्तार को इस युग में खूब लाभ मिला परंतु एक हानि भी हुई कि पढ़े-लिखे लोग अशांत हो गए। आज की शिक्षा सेवा का माध्यम होना थी जो शोषण का कारण बनती गई। ये केवल शिक्षा के खतरे हैं। देवलोकवासी आचार्य श्रीराम शर्मा कहा करते थे केवल शिक्षा ही नहीं विद्या की भी आवश्यकता है। शिक्षा केवल बाहरी जानकारी दे रही है और विद्या भीतरी अनुभूतियां कराती है। 

शिक्षा संस्थानोंपुस्तकों और अन्य तकनीकी माध्यमों से प्राप्त होती है किंतु विद्या का आरंभ होता है मौलिक चिंतन से। शिक्षा केवल विचार देती है और विद्या विचार को आचार से जोड़ती है। शिक्षा के लिए खूब शिक्षक मिल जाएंगे लेकिन विद्या के लिए गुरु ढूंढऩा पड़ेगा। विद्या कहती है थोड़ा संयम साधोआज के युग में निजी आवश्यकताओं और महत्वाकांक्षाओं को संभालना ही संयम है और सद्कार्यसद्भाव का विस्तार करना ही सेवा है। विद्या अपने साथ संयम और सेवा लाती है। किंतु केवल शिक्षा लूट और शोषण करना सिखा रही है। केवल शिक्षा ने लोगों की खोपड़ी और जेब भर दी पर निजी व्यक्तित्व को खोखला कर दिया। 

मात्र शिक्षा लोगों की आदतें बना देती है और विद्या स्वभाव तैयार करती है। आदतें ध्यान में बाधा हैं इसलिए शिक्षित पुरुष मेडिटेशन में मुश्किल से उतर पाता है। उसे विद्या का सहारा मिला और वह अधिक योग्य होकर ध्यान में उतर जाएगा। केवल शिक्षा खतरनाक है और केवल विद्या भी उपयोगी नहीं होगी। दोनों के संतुलन में जीवन का आनंद है। एक काम इसमें उपयोगी है जरा मुस्कुराइए....।

अहंकार से बचाती है विनम्रता
कई बार हम अपने भीतर ही घट रही घटनाओं से अनजान रहते हैं। भक्ति करते हैंपुरुषार्थ दिखाते हैंदान-कर्म करते हैं लेकिन कहीं न कहीं यह समझने से चूक जाते हैं कि हमारे भीतर धीरे-धीरे अहंकार पनप रहा है। अहंकार ही सफलता की राह का सबसे बड़ा रोड़ा है। हम अहंकार के चलते ही कई अवसर गवां देते हैं। अहंकार से बचने के योगियों नेसंतों नेविद्वानों ने कई रास्ते बताए हैं लेकिन सबसे सहज और सरल रास्ता है आप विनम्र हो जाएं। विनम्रता आपको कभी अहंकारी नहीं होने देगीआपको सहज और व्यवहार को लचीला रखेगी। 

विनम्रता ही एक गुण है जो आपको समर्पण सिखाएगा। भक्ति करने वालों को कभी-कभी खुद से ही यह शिकायत होने लगती है कि न चाहते हुए भी उनके भीतर अहंकार का जन्म हो जाता है। सिक्ख सन्त हुजूर स्वामीजी ने एक जगह बड़ी सुन्दर बात कही-कोमल चित्त दयामन धारो परमारथ का खोज लगाना। परमात्मा से मिलना हो तो हृदय कोमल हो तथा दूसरों के दर्द की अनुभूति करने की लालसा हो। सन्त तो यहां तक कहते हैं यदि हमारे शत्रु पर भी दुख आए तो हमारी आंखें नम हो जाएं। नम्रता भक्ति का गहना है। इसीलिए सन्त लोग अपने आश्रमों में साध-संगत की सेवा पर जोर देते हैं। जितनी अधिक सेवा करेंगे नम्रता उतनी अधिक बढ़ती जाएगी और नम्रता का परिणाम है अहंकार का खत्म होना। नम्रता बड़े-छोटेऊंच-नीच का भेद मिटा देती है। 

हनुमानजी के जीवन में नम्रता के दो उदाहरण आते हैं। लंका जाते समय सुरसा ने उनको खाने का प्रयास किया लेकिन वे सुरसा को माता कहकर प्रणाम करके उसके मुंह से बाहर निकल गए च्च्सत्य कहउँ मोहि जान दे माईज्ज् यहां माई का अर्थ है माता। ऐसे ही रावण के दरबार में उन्होंने रावण से बातचीत करते हुए हाथ जोड़ते हुए निवेदन किया था च्च्बिनती करउँ जोरि कर रावनसुनहु मान तजि मोर सिखावन।।ज्ज् हनुमानजी ने कहा था रावण मैं हाथ जोड़कर तुमसे विनती कर रहा हूं तुम अभिमान छोड़कर मेरी सीख सुनो। ये दो घटनाएं बताती हैं कि हनुमानजी सक्षम थे और अपने शत्रु के सामने खड़े थे लेकिन इसके बाद भी बातचीत और क्रिया में अत्यधिक विनम्र थे। वे श्रीराम के दूत हैं और जो भगवान का सेवक है उसे नम्र होना है। हम सब भी परमात्मा के प्रतिनिधि हैं। अत: विनम्रता न छोड़ें। रावण भगवान का शत्रु है इसलिए अहंकार में डूबा है।

खुद में रहेंदूसरों में न उलझें
अक्सर लोग दुनियादारी में इतने उलझ जाते हैं कि खुद को ही भूल जाते हैं। खुद का ख्याल नहीं होना भी परेशानी देता है। लोग खुद का ध्यान नहीं रखतेदूसरे क्या कर रहे हैंवे कहां पहुंच रहे हैंइसी में उनकी जिंदगी गुजर जाती है। यह शरीरआत्मा हमारी हैहम जब भी कोई काम करें तो उसमें खुद को रखें। ये दुनिया ऊपर वाले का ख्वाब हैपरमात्मा की माया है। भगवान जब सपने देखता है तो दुनिया का निर्माण हो जाता है। यह एक सूफी खयाल है। इसी तरह जब हम दुनिया में रहें और यदि हमें यह बात समझ में आ जाए कि है तो परमात्मा का सपना फिर भी सच है और हम इस सच का हिस्सा हैं। 

इसीलिए इस्लाम मेंसूफी परम्परा में एक प्रयोग किया गया है कि जो भी काम हम करें उसमें अच्छी तरह खयाल रखें कि हम हैं। अपना होना न भूल जाएं। चाहे पैदल चल रहे होंकपड़े बदल रहे होंस्नान कर रहे हों या खाना खा रहे हों। अपने होने को न भूलें। होता यह है कि हम भूल जाते हैं। हम हैं इसका खयाल जाते ही हम दूसरे चक्करों में उलझ जाते हैं। जब हम रात को सपना देखते हैं तो सपने में जो घट रहा होता है उससे हम जुड़ जाते हैं। कभी-कभी तो परेशान हो जाते हैंचौंककर नीन्द खुल जाती हैपरन्तु दिनभर जागते हुए हमें हम हैं इस बात का खयाल रहे तो रात को सपने में हम जुड़ेंगे नहीं और सपना सपना ही रहेगा जबकि हम सपने में धोखा खा जाते हैं। सपना यथार्थ लगने लगता है।

शाहशुजा करमानी ऊंचे दर्जे के फकीर थे। वे ४० साल नहीं सोए। उनके बारे में कहते हैं नीन्द जब उन्हें परेशान करती तो आंखों में नमक का सुरमा लगा लेते। एक दिन ४० साल बाद जब सोए तो सपने में अल्लाह के दीदार हो गए। शाहशुजा ने कहा अर्से से आपको ढूंढ रहा था जागते हुए और अब आप मिले हो तो ख्वाब में। अल्लाह ने जवाब दिया यह तेरे जागने का ही नतीजा है। इसके बाद शाहशुजा आमतौर पर इसलिए नीन्द निकाला करते थे कि नीन्द में अल्लाह के दर्शन हो जाएंगे। अपने सपनों के सद्उपयोग का यह उदाहरण है। यदि हमें होश है कि हम हैं तो हम सपने को यथार्थ नहीं मानेंगे। और यह दुनिया का जो यथार्थ है इसे सपना समझ कर जी लेंगे। इसी में जिन्दगी का अमन और खैरियत है।

भक्ति और योग अलग नहींएक ही हैं
भक्ति और योग को लेकर एक गलतफहमी है कि दोनों अलग हैंइन्हें एक साथ साधा नहीं जा सकता। लेकिन सच यह है कि दोनों एक ही हैं। भक्ति आनंद देती है और योग साधक बनाता है। इसी को भक्ति योग कहते हैं। भक्ति आपको परमात्मा से जोड़ती हैयोग इस जुड़ाव को स्थायी करता है। कोई कब योगी बनता है इस द्वन्द में लम्बे समय से दुनिया उलझी है। ऊपर से देखने में भक्त और योगी अलग-अलग नजर आ सकते हैं। जो भक्ति करने में लगे हैं उन्हें योग शुद्ध कर्मकाण्ड लगता है। वे योगियों को अलग श्रेणी में मानते हैं। परन्तु भक्ति-योग एक ही है।

इसके श्रेष्ठ उदाहरण हैं हनुमानजी। योग के आठों अंग हनुमानजी महाराज की हर क्रियाआचरणव्यवहारस्वभाव में दिखते हैं। योगी के भीतर भक्त कैसे बसे आइए इनसे सीखें।सीताजी की खोज में वानर निकल चुके थे। हनुमानजी को चुप बैठा देख जाम्बवन्त ने पूछा था कहइ रीछपति सुनु हनुमानाका चुप साध रहा बलवाना रीछपति जाम्बवन्त ने कहा हे बलवान हनुमान यह क्या चुप्पी साध रखी है। उस समय हनुमान योग की गहरी मुद्रा में थे। जब वे बोले तो उन्होंने समुद्र को लांघने पर टिप्पणी की। च्च्सिंहनाद करि बारहि बारालीलहिं नाघउं जलनिधि खाराज्ज् उन्होंने सिंहनाद करके कहा इस खारे समुद्र को मैं खेल-खेल में लांघ सकता हूं। ऐसा उन्होंने कर भी दिया था।यह समुद्र ही मन है। मन के सागर को लांघना ही योग हैध्यान है। 

सामान्यत: ऐसा माना जाता है योग अभ्यास का विषय है इसीलिए इसे योगाभ्यास कहा गया है। लेकिन कुछ सन्तों का मत है कि बहुत गहराई में जाएं तो योग अभ्यास का नहीं समर्पण का मार्ग है। कई साधनों में से अभ्यास एक साधन हो सकता है लेकिन समर्पण की स्थिति आने पर योग सहज हो जाएगा। इसीलिए योग के आठ अंग में से दूसरे अंग नियम के पांचवे भाग को ईश्वर प्रणिधान कहा गया है। इसका अर्थ है ईश्वर के प्रति समर्पण। यह महत्वपूर्ण साधन है। हनुमानजी भक्ति में समर्पण का प्रतीक हैं। इसलिए भक्ति के योग को हनुमानजी के माध्यम से समझा जाए और अभ्यास तथा समर्पण के साथ योग किया जाए।

सुख को गुजर जाने देंपकड़कर न बैठें
सुख आता है तो हम उसे लपक कर थामने की कोशिश करते हैंउसे पूरी तरह अपना मानकर बैठ जाते हैं। और जब वह सुख जाने लगता है तो फिर शोर मचाते हैं। ये मानव स्वभाव हैहम सुख के आने पर इतना खुश नहीं होते जितना उसके जाने से निराश हो जाते हैं। दरअसल सुख के आने या जाने में कोई समस्या नहीं हैसमस्या तो सुख को हमेशा कसकर पकड़ रखने के हमारे स्वभाव में है। जीवन में जब सुख आए तो दूर से देखकर एक निश्चित फासला बनाकर उसे गुजरने दें। 

आइने के बहुत पास आ जाएं तो छवि अस्पष्ट हो जाती है। एक दूरी जरूरी है। सुख के साथ बहुत खुशी से उछलकूद न करें। मंद शीतल हवा की तरह उसे भी गुजर जाने दें। जिस दिन हम सुख में इस तरह से सफल हो गए फिर आप पाएंगे एक दिन दुख में भी इसी तरह प्रसन्न हो सकेंगे। झंझट शुरू होता है यह मेरा है मानने से। न सुखन दुख दोनों ही मेरे नहीं है ऐसा भाव पैदा करें। दोनों बाहर के मामले हैं भीतर न उतारें इन्हें।

जैन धर्म में महावीर स्वामी ने कहा है आत्मा के शुद्ध स्वरूप परकीय भावों को जानने वाला ऐसा ज्ञानी कौन होगा जो यह कहेगा यह मेरा है। यहां दो बातें आई हैं। एक अपनी आत्मा को जानने और दूसरा यह कहने की कि यह मेरा है। मेरा है यह मानते ही हम आए हुए सुख को पकड़ लेते हैं और भीतर उतार लेते हैं। मैं सुखी हूं इस खयाल में ही दुख का बीज छुपा होता है। सुखदुख सिक्के के दो पहलू हैं। एक के साथ दूसरा लगा ही रहेगा। आत्मा को जानते ही और यह मेरा है ऐसा न कहने पर ही साक्षी भाव आरंभ होने लगता है। जैसे दूसरों के सुख-दुख के प्रति हम साक्षी रहते हैंदर्शक होते हैं वैसे अपने खुद के सुख के प्रति भी ऐसे ही साक्षी हो जाइए।

ज्ञान को बांधें नहींजीवन का साधन बनाएं
अधिकतर लोग ज्ञान के नाम पर केवल मोटी-मोटी किताबें पढ़ लेते हैंउससे मिली जानकारी को अपने दिमाग तक ही सीमित रखते हैं लेकिन इस ज्ञान को जीवन में उतारना भूल जाते हैं। बस चूक यहीं होती है। सच तो यह है कि जानकारियां ज्ञान में तभी तब्दील हो पाती हैं जब उसे जीवन में उतारा जाए। शिक्षा के इस युग में पढऩे लिखने के दौर में जानकारियों का बड़ा महत्व हो जाता हैलेकिन जब आध्यात्मिक यात्रा आरंभ करें तो केवल जानकारियों पर ही न टिक जाएं। 

सभी धर्मों के शास्त्र भरपूर जानकारी समेटे हैं। हमारी कोशिश भी यही रहती है कि आंकड़ों की तरह उनसे जानकारियां हांसिल कर लें। जबकि शास्त्रोक्त जानकारियां सिर्फ मोड़ हैं अंतिम पड़ाव नहीं। इनमें संकेत है सबकुछ नहीं है। ये साधन हैं साध्य नहीं। ये मात्र इशारे हैं ईश्वर नहीं हैं। इसलिए अपने धार्मिक इतिहासों से केवल सूचना ही नहीं समझ लेने की क्रिया जारी रखी जाए।

धर्मशास्त्रों से जानकारियों लेकर केवल शारीरिक ज्ञान बढ़ाया तो हाथ कुछ नहीं लगेगातैयारी जीने की करना होगी। कुरआन मजीद अद्भुत पुस्तक है। इसके पृष्ठों पर केवल अल्लाह की इबारत और तारीफ ही नहींसृष्टि (कायनात) को लेकर कई जानकारियां हैंभटके हुए लोगों के किस्से भी हैंजंग और जिहाद के तौर तरीके हैंसमाज कैसे चले इसके नियम कायदे हैंफैसले कैसे हों और फत्वे क्यों दिए जाएं इस पर भी दबे छुपे या साफ-साफ इशारे हैं। लेकिन कई पंक्तियां कमाल की हैं जो मुहम्मद की ध्यानावस्था में उन पर उतरी हैं। कुरआन में एक जगह पढऩे में आता है जब तुम पढ़ते हो तो रोओ। ये करूणा में जीने के लिए कहे गए अमृत कण हैं। 

कुरआन के शब्दों में केवल जानकारियों पर टिके लोगों ने शब्दों को जहरीले तीर बना लिया इसीलिए ऐसे अमृत बिन्दु कहीं खोते चले गए। केवल जानकारियां जीवन को बुद्धिमान तो बना सकती हैं लेकिन भक्त बनना हैसच्ची इबादत करना है तो उन जानकारियों को जीना पड़ेगा। केवल सूचनाओं पर न टिकें आगे सत्य तक जाएं।

सफलता के लिए सबसे ज्यादा जरूरी है सेहत
भागमभाग भरी दिनचर्या में सबसे ज्यादा परेशानी सेहत की है। प्रतिस्पर्धा के चलते स्वास्थ्य पर ध्यान देना लगभग भूल जाते हैं। अनियमित दिनचर्या और खानपान लगभग हर दूसरे युवा की परेशानी है। हमें सेहतमंद रहने के लिए हनुमानजी से प्रेरणा लेनी चाहिए। उनके जीवन में झांके तो सफलता और सेहत दोनों के महत्वपूर्ण सूत्र मिलते हैं। लगातार सक्रिय रहतेपरिश्रम करते हुए अपनी स्वयं की देह का ध्यान रखना भी एक योग है। सधी हुई सेहत सफलता के लिए जरूरी है। 

श्रीहनुमान सेहत के श्रेष्ठ उदाहरण हैं। हनुमानजी के स्वास्थ्य का राज रामायण के सुंदरकांड में लिखा है। सीताजी से मिलने के बाद जब उन्हें भूख लगी तो माताजी से निवेदन किया और सीताजी ने उनसे कहा देखी बुद्घि बल निपुन कपि कहेउ जानकीं जाहु। रघुपति चरन हृदयॅं धरि तात मधुर फल खाहु।। ''हनुमानजी को बुद्घि और बल में निपुण देखकर जानकीजी ने कहा जाओ हे तात श्री रघुनाथजी को हृदय में बसाते हुए मीठे फल खाओ और हनुमानजी ने फल खाए।

इसमें संदेश यह है कि मनुष्य को फलाहारी या शाकाहारी होना चाहिए। शाकाहार शरीर को स्वस्थ्य रखता है और श्रीराम को हृदय में रखकर फल खाने का अर्थ है शुद्घ स्वच्छता से भोजन करना। शुद्घ भोजनस्वच्छ वातावरण में अच्छे भाव से यदि किया जाए तो शरीर पर अनुकूल असर करता है और इसका परिणाम है हनुमानजी जैसी सेहत। महाभारत के समय जब पांडव अपना वनवास काट रहे थे उस समय भीम द्रौपदी के लिए फूल लाने के उद्देश्य से वन में प्रवेश कर गए। उन्हें केले का बगीचा दिखा। भीम की गर्जना सुनकर जंगल के जानवर पशु-पक्षी डरकर इधर-उधर भाग गए। 

इस वन में हनुमानजी भी रहते थे। वे मार्ग में विश्राम कर रहे थे। भीमसेन ने उन्हें पहचाना नहीं और उनसे उलझ गए तथा जाने के लिए मार्ग मांगने लगे। हनुमानजी ने कहा आप चाहें तो मेरी पूंछ हटाकर जा सकते हैं। भीम को अहंकार थाजैसे ही पूंछ हटाने का प्रयास किया। पूंछ टस से मस नहीं हुई। तब भीम ने पूछा आप कौन हैं और हनुमानजी का परिचय हुआ। भीम का अहंकार जाता रहा। एक युग बीत जाने पर भी हनुमानजी उतने ही स्वस्थ्य और ताकतवर थे।

अपने अहसास में परमात्मा हो तो जीवन में आनंद है
हम पूजनपाठ करते हैंध्यान और योग भी लेकिन फिर भी कभी-कभी ऐसा महसूस होता है जीवन में जिस शांति और आनंद की तलाश है वह कोसों दूर है। दरअसल ऐसा है नहीं परमात्मा कभी दूर है ही नहींवो तो हमारे अंदर ही है। कमी तो हमारे अहसास में है जो हम उसे पहचान नहीं पाते। जिस दिन हम अपनी आत्मा मेंमन में परमात्मा का एहसास जगा लेंगेतलाश खत्म हो जाएगी। न शांति दूर होगीन आनंद और न ही परमात्मा।

ऐसा माना जाता है कि फकीरों के भीतर अपनी एक मौज होती है। वास्तविकता यह है कि ऐसी मौज सभी के भीतर होती है। इसे आनंद की अनुभूति भी कह सकते हैं और जो इसका लाभ उठाना जानते हैं वे फकीर हो जाते हैं। गुरूनानक का ही उदाहरण लेंवे सिपाहियों को राशन बांटने का काम करते थे और इसी में उन्हें परमात्मा की झलक मिल गई थी। सामान गिनते समय एक से बारह तक की गिनती तो ठीक चली लेकिन तेरह बोलने के स्थान पर उनके मुंह से च्च्तेराज्ज् निकल गया। तेरा यानि उस मालिक का जिसे ईश्वर माना गया है। नानक के लिए इसके बाद चौदह के आगे की गिनती का कोई मतलब नहीं रह गया। यूं समझें कि उनकी पूरी जिन्दगी च्च्तेराज्ज् में अटक गई थी। उन्हें समझ में आ गया था कि परमात्मा के बाद भला कोई क्या गिनती होगी।

दरअसल गिनती तो एक उदाहरण मात्र हैमामला अहसास का है। उन्हें भीतर का वह आनंद इस घटना में पकड़ में आ गया और वे निकल पड़े थे प्रभु की राह पर। ऐसी मौज जिसके भी भीतर जाग जाती है वह अपनी राह चल पड़ता हैएक मौलिक राह। फकीरमहात्मा और सद्गुरू भी समूह का नेतृत्व करते हैं। उनके आनंद के पीछे लाखोंकरोड़ों लोग चल पड़ते हैं। भीड़ तो राजनेतासमाज सेवक के पीछे भी चलती है लेकिन फर्क होता है राजनेता का अपना निज स्वार्थ होता है और पीछे चल रही भीड़ की अपनी अपेक्षाएं होती हैं। लेन-देन का धंधाएक तरह से गोरख धंधालेकिन महात्माफकीरगुरू को जो आनंद प्राप्त होता है उसमें वे न तो दूसरों के अहंकार की तृप्ति करते हैं और न ही वे स्वयं की आकांक्षाओं को पूर्ण करते हैं। वे खुद की मौज की लहरों से केवल दूसरों को भिगोना चाहते हैं। उनकी चाह होती है यदि हमें आनंद मिला है तो सभी को मिले।

कल्पनाओं को दबाए नहींउन्हें पंख दें
जब बच्चा कोई अटपटी बात करता है या कोई ऐसी कल्पना करता है जिसे हम सत्य समझने से झिझकते हैं तो बच्चे को टोक देते हैं। लगभग सभी मां-बाप अपने जीवन में एक यह भूल कर देते हैंजिससे बच्चे का विकास और उसमें मौजूद संभावनाओं पर एक तरह का पहरा लग जाता है। बच्चों की कल्पनाओं को दबाए नहींउन्हें सही दिशा दें। जहां जरूरत पड़े उन्हें पूरा प्रोत्साहन दें।

महापुरुषों के बचपन में कुछ घटनाएं ऐसी हो जाती हैं कि पढ़करसुनकर आश्चर्य लगता है। या तो हम भ्रम से मुक्त हो जाते हैं या इन्हें पढ़कर अविश्वसनीय लगने लगता है। जब ऐसी घटना किसी धर्म गुरू से जुड़ी हुई हो तो कई बार लोग धर्म को अंधविश्वास की श्रेणी में रख देते हैं। दरअसल धर्म परिपक्व होकर अध्यात्म बनता है और अध्यात्मिक जगत में अपने लक्ष्य पर पहुंचने के दो मार्ग हैं एक है नियम कायदे का और दूसरा है बिना कायदे का। जो बहुत नियम से चलते हैं वे भी दुविधा में पड़ जाते हैं और जो दुविधा मुक्त होकर चलते हैं वे भी उलझ सकते हैं। असल में दुविधा शून्य होकर चलना पड़ता है। अध्यात्मिक जगत की घटनाओं को अलग दृष्टि से देखना पड़ता है तब जीवन के लिए कुछ ठोस मिलता है।

ईस्लाम में चर्चा आती है जिस रात मोहम्मद का जन्म हुआ था फारस के सम्राट अनुशीरवां का महल हिल गया थामीनारें ढह गई थीं। सबकुछ अनूठा होने लगा था। ई. सन् ५७० में अब्दुल्लाह बिन-अब्दुल मुत्तलिब की पत्नी अमीनाबीबी के गर्भ से मोहम्मद पैदा हुए थे। उनके पूरे नाम का अर्थ था अब्दुल्लाह का बेटा मोहम्मद। ये जब चार साल के थे तो एक दिन बकरी चराते समय फरिश्तों ने इन्हें गोदी में उठा लिया था क्योंकि इनके जन्म के दो महिने पहले इनके पिता की मृत्यु हो गई थी। फरिश्तों ने इनका सीना चीरादिल में एक काला छोटा सा दाग था उसे हटा दिया और मोहम्मद को उम्दा बनाकर छोड़ दिया। घटना अजीब लगेगी लेकिन दुविधा शून्य दृष्टि से इसका आध्यात्मिक अर्थ समझें और वह यह है कि बचपन में ही फरिश्तों से बच्चों का परिचय होते रहना चाहिए। बच्चे जिस कल्पना में जीते हैं वह कल्पना उनको जिन्दगी में आगे बहुत काम आती है। फरिश्तों की ऐसी ही निकटता ने मोहम्मद को जीवन में श्रेष्ठतम ऊंचाईयां दी थीं।

जीवन एक उत्सव हैइस उत्सव में आनंद हो
भारतीय हिंदू जीवनशैली में व्रत-त्योहार-उत्सवों की भरमार है। एक त्योहार जाता हैदूसरा आता है। हम सालभर उत्सवों में डूबे रहेंखुशियों से परिपूर्ण और ऊर्जा से भरे रहें इसलिए मनीषियों ने इन उत्सवों की परंपरा को शुरू किया और इतना पुष्ट रखा है। हमें इन उत्सवों में जीना सीखना चाहिए। देखा जाए तो हम अपने पूरे जीवन को उत्सव की तरह से जी सकते हैंक्योंकि उत्सव में ही आनंद की अनुभूति होती है। यह अनुभूति हमें ऊर्जा देगी। जीवन में जैसे-जैसे परमात्मा की अनुभूति होगीनिकटता प्राप्त होगीहमारे भीतर एक शक्ति का प्रादुर्भाव भी होगा। हमें महसूस होगा एक ऊर्जा का संचार हमारे भीतर हो रहा है। यहीं से सावधानी रखना होगी। उस शक्ति को अपने भीतर रोक न लें। उसे बांटने की तैयारी करें। इस शक्ति को आनंद में परिवर्तित करें। जैसे नाव में यदि पानी भर जाए तो दोनों हाथों से उलीचना पड़ता है वैसे ही इस शक्ति को सब में वितरित कर दें। यदि इसे उत्सव नहीं बनाया तो यह जीवन पर बोझ बन जाएगी।

भारतीय संस्कृति में इसीलिए उत्सव की लंबी परंपरा है। गणेश उत्सव का जाना और नवरात्रि का आना अपने आप में अनूठे उत्सव-क्रम हैं। विश्राम और नृत्य दोनों के अद्भुत संदेश इनमें बसे हैं। गणेश उत्सव का अर्थ है शक्ति के साथ विवेकधैर्य और स्थिरता का आगमन। नवरात्रि के नृत्य शक्ति को आनंद में बदलने की कला है। परमात्मा की अनुभूति से जागी हुई शक्ति जब गरबा रूप लेती है तो उस परम शक्ति से एकाकार होने की तैयारी करती है।गणेश के उत्सव हो या दुर्गा की रात्रि होदोनों ही शक्ति फैलाने का उपक्रम हैं। व्यावहारिक दृष्टि से देखें तो अब भक्तों का मानना है कि गणेश उत्सव पर गरबे भारी पडऩे लगे हैं। गणेश उत्सवों की गरिमा पर गरबों की तड़क-भड़क हावी हो गई है। वैसे यह बहस का नहीं आनंद का विषय है। गणेश स्थापना से जो पुरुष ऊर्जा उत्सव भाव लेती हैंवह नवरात्रि में नारीशक्ति के रूप में जगमग हो जाती है। गणेश विसर्जन और घटस्थापना के बीच का जो मध्यकाल है उसमें अपनी शक्ति को आनंद और प्रेम में बदलने की तैयारी की जाए। इस दौरान इसे आदत और अभ्यास दोनों बना लें। ये दिन आने वाले ३६५ दिन का सहारा बनेंगे और शक्ति को उत्सव बनाने का सरल तरीका यह भी हो सकता है।

जीवन चलते रहने का नाम हैं ये नदियों से सीखें
नदियां बहती हैंबहकर जीवन के प्रवाह की ओर इंगित करती हैं। नदियों का बहाव जीवन से गहरे से जुड़ा है। हम नदियों से प्रेरणा ले सकते हैं हमेशा कैसे चलायमान रहा जा सकता है। जब तक जीवन में हमेशा चलते रहने का भाव नहीं आएगाहम जिंदगी के मिजाज को समझ ही नहीं पाएंगे। सामान्य रूप से यह माना जाता है कि हिन्दू धर्म का नदी से बड़ा गहरा संबंध है। सरिताओं को बड़ा सम्मान दिया गया है भारतीय संस्कृति में। नदी का अर्थ है बहाव। नदियों ने हर धर्म को ताजगी और सुगंध प्रदान की है। नदी के दुरूपयोग और सूखने का अर्थ है मनुष्य की आध्यात्मिक वृति तथा स्थिति पर प्रहार। इतिहासकारों की मानें तो सभी प्रमुख धर्मों और सभ्यताओं की गवाह नदियां रही हैं। 

भारत जो कभी आर्यावर्त थाने अपनी पूरी संस्कृति और धर्म को सिंधु-गंगा-यमुना के तट पर ही प्राणवान किया। मिस्त्र की सभ्यता नील नदी के अंचल में पनपी। चीन में हांग-हो का महत्वपूजनीय स्थिति का है। यूनानियों ने जिसे मेसोपोटामिया के नाम से पुकारा वह क्षेत्र भी जल से घिरा है। संसार के तीन प्रसिद्ध धर्म यहूदी (सियोन)ईसाई और इस्लाम इसी जल क्षेत्र की पैदाईश हैं।

इसीलिए जल और धर्म के रिश्तों को अच्छी तरह समझकर सम्मान देना होगा। नदियों ने भूखंडों को ही नहीं जोड़ा है बल्कि मनुष्यों की धार्मिक भावना को भी एक जैसी शीतलता से भिगोया है। कोई धर्म जब-जब अपने आपको पूर्ण और अलग बताता है तो नदियां कहती हैं हमारे बहाव ने बहुत कुछ एक-दूसरे धर्म में उधार पहुंचाया हैमिलाया है और आदान-प्रदान किया है।हर बदलते वक्त में हर धर्म ने अपना-अपना श्रेष्ठ एक-दूसरे को दिया और लिया है। जो भले लोग हैं उन्होंने इसका सद्पयोग किया और जो बुरे हैं उन्होंने दुरूपयोग किया। नदी और जल से सीखा जाए शुभ को देना। किसी बहती नदी के किनारे बैठ जल पर दृष्टि गड़ा दीजिए वह बहाव आपको गहरे ध्यान में ले जाएगा। जल का प्रवाह मन के बहाव को नियन्त्रित कर देगा। इसे कहते हैं प्रकृति का चमत्कार।

जीवन में हर पल जो घट रहा है उसके भीतर दो बातें हैं एक परिणाम और दूसरा संकेत। हर घटना ये दो चीजें निश्चित होती हैं। हम जीने की उतावली में इन दोनों पर नजर डालना भूल जाते हैं। परिणाम की ओर देखनेसोचने का समय भले ही न निकालें लेकिन घटनाओं के पीछे छिपे संकेतों को पकड़ेंगे तो परिणाम अपने आप पता चल जाएगा। इससे न केवल जीवन आसान होगा बल्कि हमारे और सफलता के बीच का फासला भी स्वत: कम हो जाएगा।

समझिएहर घटना एक संकेत है
जैसे हर घटना का एक परिणाम होता हैवैसे ही जीवन में हर घटना में एक संदेशसंकेतशिक्षा छुपी रहती है। समझदार लोग सीख ले लेते हैं। हनुमानजी महाराज में यह समझदारी कूट-कूटकर भरी थी कि हर परिस्थिति से क्या सीखा जाए। जीवन का हर क्रम और पल कुछ न कुछ सिखा रहा है। देखिए किस समझदारी से हनुमानजी जीवन के दृश्य में से सीख को उठा लेते हैं। यह उनकी मौलिक शैली है। श्रीराम रावण का वध कर चुके थे। लंकाकांड में वे हनुमानजी को कहते हैं यह शुभ समाचार सीताजी को सुना दो। हनुमानजी के मुंह से यह शुभ समाचार सुनकर सीताजी कहती हैं हनुमान बोलों तुम्हें क्या चाहिए। वे शुभ समाचार का पारितोषिक देना चाहती थीं। जो उत्तर हनुमानजी ने दिया उसे गहराई से समझें। च्च्सुनु मातु मैं पायो अखिल जग राजु आजु न संसय। रन जीति रिपुदल बंधु जुत पस्यामि राममनामय।। मां मैंने आज सारे संसार का ही राज्य पा लिया है। मैं आंखों से देख रहा हूंरण में शत्रु को जीतकर अपने छोटे भाई लक्ष्मण के साथ निर्विकार श्रीराम को।

हनुमानजी ने श्रीराम के साथ निर्विकार शब्द जोड़ा है। वे निर्विकार श्रीराम को देखना अपने जीवन की बहुत बड़ी उपलब्धि मानते हैं। जो रावण विश्व विजेता थाउसे मारकर भी श्रीराम आवेशित नहीं थेगर्वित नहीं थेमदमस्त नहीं थे। वे शांत थेनिर्विकार थे। मनुष्य को छोटी-मोटी सफलता मिले तो वह अपना आपा खो बैठता है परंतु श्रीराम का यह शांत-सहज स्वरूप हनुमान को खूब भा गया। हनुमानजी महाराज हमें सिखा रहे हैंजीवन की हर घटना से श्रेष्ठ को उठाना सीखो। विजय के इस दृश्य में उन्होंने श्रीराम की निर्विकार छवि को अपने लिए शिक्षा बनाया और अपनाया भी। इसीलिए तो निरहंकारी हनुमान श्रीराम की पसंद बन गए। जीवन में जब उपलब्धियां आएंसफलता मिले तो अपने मूल स्वभाव यानी सहजतासरलताविनम्रता को न छोड़ें। इन सबसे मिलकर बनती है पवित्रता और पवित्रता को पवित्र लोग बड़े पसंद हैं।

जीवन हमेशा एक सा नहीं रहताकभी अच्छा तो कभी बुरा समय आता रहता है। हमें एक अभ्यास अगर हो जाए तो कोई भी स्थिति हमें प्रभावित नहीं कर सकेगी। ये अभ्यास है

सीखेंपरिस्थितियों में कैसे ढला जाए
परिस्थितियों में ढलने का। जैसा देशकाल होजो परिस्थितियां हों अगर हमने उसमें रहना सीख लियाजीवन खोज लिया तो हमारी हर दौर में जीत निश्चित हो जाएगी। पुराणों में ऐसी कथाए भरी पड़ी हैं जो हमें इसकी सीख देती हैं। कौरवों की राजसभा में युधिष्ठिर और दुर्योधन के बीच जुआ खेला गया था। पासे दुर्योधन की ओर से शकुनी ने फेंके थे। युधिष्ठिर सबकुछ हार चुके थे। जुए में सबकुछ हार जाने के बाद युधिष्ठिर और दुयरेधन के बीच समझौता हुआ। 12 वर्ष के वनवास और एक वर्ष का अज्ञातवास भोगने के बाद राज्य वापस मिलेगा। 

वनवास की अवधि तो कट गई। अब अज्ञातवास का एक वर्ष पांचों पराक्रमी पांडवों और सुंदर द्रौपदी के लिए चुनौती था। युधिष्ठिर ने अपने भाइयों से विचार-विमर्श किया था। द्वादशेमानि वर्षाणि राज्यविप्रोषिता वयम्। त्रयोदशोयं सम्प्राप्त: कृच्रछात परमदुर्वस:॥ आज बारह वर्ष बीत गएहम लोग अपने राज्य से बाहर आकर वन में रहते हैं। अब तेरहवां वर्ष आरंभ हुआ है। इसमें बड़े कष्ट से कठिनाइयों का सामना करते हुए अत्यंत गुप्त रूप से रहना होगा। पांडव परिस्थिति में काफी की तरह घुल गए। विराट नरेश के यहां शरण ली। 

युधिष्ठिर राजा के यहां कंक नाम से ब्राम्हण बने तो भीम वल्लभ रसोइया। अजरुन ने वृहन्नला बन राजकुमारी उत्तरा का गुरुपद संभाला तो नकुल ने ग्रंथिक के रूप में कोचवान की जिम्मेदारी। सहदेव अरिष्ठनेमी के रूप में मवेशियों की देखभाल के लिए नियुक्त हुए तो द्रौपदी सैरंध्री बन रानी की दासी नियुक्त हुई। पांचों पांडवों ने परिस्थिति के अनुरूप स्वयं को ढाला और पूरी तरह से वैसा ही जीवन बिताया। वे सब थे तो राजवंश सेकिंतु समय आने पर देशकाल परिस्थिति में ऐसे घुल मिल गए कि नं चापिकश्विच्चरितं बुबोधतत् - ‘‘उनका यह चरित्र किसी को भी मालूम नहीं हुआ।’’ इसी कारण अपने गुप्तवास के लक्ष्य में सफल रहे। वनवास का अर्थ है तपस्वी जीवन और गुप्त रूप से रहने का अर्थ है अपनी ही भीतर उतर कर स्वयं को जानना।

परमात्मा को दिल से पुकारेंजुबान से नहीं
हम पूजा करते हैंमंत्र पढ़ते हैंध्यान लगाने की कोशिश भी करते हैं लेकिन फिर भी परमात्मा तक पुकार नहीं पहुंचती। हम हमेशा यह सोचते हैं शायद कोई चूक रह गई। हम लाख कोशिश करेंफिर भी उस तक हमारी बात नहीं पहुंचतीऐसा क्यों होता है। शायद हमारे पुकारने में ही कोई कमी है। याद रखें जब भी परमात्मा को पुकारें पूरे दिल से पुकारेंकेवल जुबान से नहीं। देह और आत्मा के प्रयोग में सूफी संत अपना पूरा जीवन बिता देते हैं।

जिनका शरीरसांस और मन पर नियंत्रण है उनका ध्यान घटना है और यह ध्यान की अवस्था उन्हें सिद्ध योगी सा बना देती है। ऐसी दिव्य स्थिति में उनसे जो कृत्य होते हैं फिर वो चमत्कार की श्रेणी में आते हैं।अबुलहसन उच्च दर्जे के मुस्लिम फकीर हुए हैं। इनके मुंह से जो अलफाज निकलते थे वो सच हो जाते थे। जिनके जीवन में ध्यान सही रूप से उतर जाए तो उनकी वाणी सिद्ध हो जाती है। एक बार हज यात्रियों को अपने ऊपर खतरा लगा। उन्होंने अबुल हसन के पास जाकर कहा कोई ऐसी दुआ बता दीजिए जिससे सफर में हमारे ऊपर कोई खतरा न रहे। फकीर ने जवाब दिया जब कोई मुसीबत हो तो अबुल हसन को याद कर लेना। 

कुछ को विश्वास आया कुछ ने बात हंसी में उड़ा दी। रास्ते में डाकू आ गए। एक धनवान को अबुल हसन की बात याद आ गई और उसने फकीर को याद किया। कहते हैं वह ओझल हो गयाडाकुओं को नजर नहीं आया। डाकुओं के जाने के बाद वह फिर नजर आ गया। उसका धन बच गया। जब सबने पूछा तो उसने कहा मैंने फकीर अबुल हसन को याद कर लिया था। लोगों ने बाद में अबुल हसन से पूछा हमने खुदा को याद किया और इस धनवान ने आपको याद किया था। ये बच गया हम लुट गए ऐसा क्योंफकीर ने जवाब दिया आप लोग खुदा को जुबान से याद करते हो और मैं दिल से बस उसी का फर्क था।दिल से इबादत ऐसे ही नहीं हो जाती है। उसके लिए शरीरसांस और मन में एकसाथ शांति लाना पड़ती है। इसका नाम ध्यान होता है।

परमात्मा चाहिए तो माया से ऊपर उठिए
सभी परमात्मा को देखनाउसके समीप रहना और उसे महसूस करना चाहते हैं। लेकिन यह परमात्मा की ही माया है जो ऐसा होने नहीं देती। माया हमारे और परमात्मा के बीच की कड़ी है। संसारसमाज और परिवार में रहने के लिए माया का होना भी अत्यंत आवश्यक है। अगर माया नहीं होगी तो सारे मोहबंधन तत्काल कट जाएंगे। हम अपनों से अलगहमारे कर्तव्यों से अलग हो जाएंगे। लेकिन हमेशा माया में जकड़ा भी नहीं रहा जा सकता। एक उपाय है थोड़ी देर माया से ऊपर उठने का अभ्यास कीजिएपरमात्मा का अहसास होने लगेगा।

जरूरत की चादर और मोह की दुशाला इन दोनों में जो फर्क है उस अंतर को समझने का अब समय आ रहा है। अध्यात्म मार्ग के लोगों को ध्यान रखना होगा कि आवश्यक वस्तुएं तो बसाई जाएं लेकिन उससे मोह न पालेंक्योंकि मोह धीरे से लोभ में बदल जाएगा और लोभ भक्ति में बाधक होता है। परमहंस रामकृष्ण कहा करते थे माया को सरलता से समझना हो तो श्रीरामकथा के एक दृश्य में प्रवेश किया जाए। वनवास के समय श्रीराम आगे चलते थे मध्य में सीताजी होती थीं और उनके पीछे लक्ष्मण रहते थे। 

इस दृश्य पर तुलसीदासजी ने लिखा है च्च्आगे राम अनुज पुनि पाछें मुनि बर बेष बने अति काछेंउभय बीच सिय सोहति कैसे। ब्रा जीव बिच माया जैसे  इसका अर्थ है भगवान श्रीराम परमात्मा का रूप हैंलक्ष्मणजी आत्मा या कहें जीवात्मा हैं और इन दोनों के बीच में माया स्वरूप में सीताजी हैं। सीताजी रामजी के चरणों की अनुगामी थीं। जहां-जहां श्रीराम पैर रखते थे वहीं-वहीं सीताजी चलती थीं और इसी कारण लक्ष्मणजी श्रीरामजी को ठीक से देख नहीं पाते थे। संयोग से कोई मोड़ आ जाए तो लक्ष्मणजी को श्रीराम दिख जाते थे। संदेश यह है कि परमात्मा और जीवात्मा के बीच जब तक माया है परमात्मा दिखेंगे नहीं। किसी मोड़ पर माया जरा सी हटी और परमात्मा के दर्शन हुए। भक्ति में ऐसे मोड़ आते ही रहते हैं। इसलिए आने वाले सात दिनों में माया तो रहेगी पर हमें मोड़ बनाए रखना है। यहीं हमारी भक्ति की परीक्षा होगी।

अनुशासन और अनिवार्यता में फर्क समझें
अनुशासन के नाम पर कई लोग बेमतलब या गैर-जरूरी बातों को भी अनिवार्यता बना लेते हैं। अगर जरूरत से ज्यादा नियमों को पाला जाए तो वे भी शांति को भंग कर देते हैं। जीवन में कुछ समय खुद को अनुशासन या कहिए सांसारिक सिद्धांतों से मुक्त रखिए। आध्यात्मिक शांति के लिए यह बहुत जरूरी है कि आप पर कोई अनावश्यक दबाव न हो। मन प्रसन्न होदिमाग पर बोझ न रहे।

जीवन में अनुशासन हो यह बात तो समझ में आती है लेकिन जीवन में बातों की अनिवार्यता हो जाए तो फिर अशांति का जन्म होता है। अनिवार्यता का अर्थ है ऐसा होना ही चाहिए का आग्रह। आध्यात्मिक जीवनमुक्त जीवन होता है। सारे काम मनुष्य करता है फिर भी उसे यह बोध रहता है कि मैं नहीं कर रहा। बहुत कुछ हो रहा है और उस होने से जितना हम स्वीकृत हैं उतना ही शांत होते जाएंगे। ध्यान रखें इसका अकर्मण्यता से कोई लेना-देना नहीं है। सारा मामला है सहजता का। आप सहज हुए कि मुक्त हुए। अभी हम मुक्त नहीं हैं अभी हम बंधे हुए हैं और वह भी दूसरों से बंधे हुए हैं। जैसे किसी वाहन की चाबी चालक ने लगाई और वाहन चल दिया। वाहन यह नहीं कह सकता कि मैं नहीं चलूंगा।

हमें दूसरे ने गाली दीटक्कर मारीअपमान किया और हम एकदम चार्ज हो गए। बिलकुल ऐसे जैसे दूसरे के चाबी लगाने की प्रतीक्षा ही कर रहे थे। कभी विचार करिए किसी ने अपशब्द कहे और हम क्रोधित या व्यथित हो गएहमने शब्दों को लिया तभी ऐसा हुआ। क्या कभी मन में यह विचार आता है कि हम दूसरों के ऐसे शब्दों को नहीं लेंगे। अपशब्द तीर की तरह चुभते हैं। सामने वाले ने कहा और हम बेहोश हुए। फिर इस बेहोशी में हम हिंसात्मक हो जाते हैंबेचैन हो जाते हैंपरेशान हो जाते हैं। हमारा होश में रहना भी हमारे हाथ में नहीं रहता। सीधी सी बात है हम इतने से भी अपने मालिक नहीं हैं। कोई दूसरा हम से यदि क्रोध करवा सकता है तो कुछ भी करवा सकता है। वह चापलूसी करके हमसे गलत काम करवा सकता है क्योंकि हम बेहोश हैंयंत्रवत हैं और यदि मुक्त हैं तो फिर हम निर्णय जागकर लेंगेहोश में लेंगे और इसी होश का नाम है स्वयं के पास बैठनास्वयं को जानना।

ज्ञान के साथ ही अपनी चैतन्यता को जागृत करें
हम जब कोई ज्ञान हासिल करते हैं तो उसी के बोझ तले दब जाते हैं। वह ज्ञान ही हमें संपूर्ण लगने लगता है। हम अपनी चेतनता पर ध्यान नहीं देते केवल उस ज्ञान के बखान में लग जाते हैं। इससे नुकसान यह होता है कि हम जीने का अपना स्वभाव खो देते हैं। जबकि ज्ञानी जिसका ज्ञान उसकी चेतनता पर हावी नहीं होता वह उस ज्ञान को अपने जीने में लगाता है और जीने के कहीं ज्यादा लुत्फ भी उठाता है।

महापुरुषों की एक विशेषता होती है वे जितना जानते हैं उससे अधिक उसे जी लेते हैं। उनका ज्ञान उनकी चैतन्यता पर हावी नहीं हो पाता। वे ज्ञान के बोझ से दबते नहीं वे चैतन्यता के बोध से हल्के रहते हैं और इसी से उनके जीवन में एक संतुलन आ जाता है। किसी भी धर्म के धर्मगुरु या महान पुरुष हुए हों उन्होंने अपने अभाव और अपनी समृद्धि को अपनी अध्यात्म की यात्रा में साधक बनाया बाधक नहीं। जिनका इस्लाम से कम परिचय है ऐसे लोग शायद ही जानते होंगे कि हजरत मोहम्मद का बचपन बहुत कष्टों में बीता था। पिता की मृत्यु जन्म से दो महिने पहले ही हो चुकी थी। उनकी उम्र जब ६ साल की थी तो उनकी मां अमीना बीबी उन्हें लेकर मदीना गईं लेकिन रास्ते में मां का देहांत हो गया। 

अनाथ बालक मोहम्मद किसी तरह वापस मक्का लौटे। दादा बूढ़े थे और गरीब भी। लेहाजा मोहम्मद पढ़-लिख नहीं सके । लेकिन जाते-जाते दादा ने मोहम्मद को अपने दूसरे बेटे अबू तालीब के हवाले कर दिया। चाचा ने पाला लेकिन अभाव ने मोहम्मद के भीतर गजब की समझदारी भर दी। ऐसा कहते हैं जब उनकी उम्र १३ साल थी तब व्यापार के सिलसिले में उनके चाचा उन्हें सीरिया ले गए थे। जिनसे भी मोहम्मद मिलते लोग प्रभावित हो जाते। बातों की प्रस्तुति वे इतनी प्रभावशाली करते थे कि एक ईसाई पादरी उनके भीतर की आध्यात्मिकता को देखकर दंग रह गए। 

आगे जाकर मोहम्मद क्या हुए ये दुनिया जानती है। इंसान की जिंदगी में सुविधाएं होना जरूरी नहीं है। प्रतिकूलताएं भी प्रगति का करण बन सकती हैं यदि जाने हुए को जीने की कला आ जाए। सोचने से जीवन के सत्य हाथ नहीं आते। उन्हें पकड़ना हो तो जीना पड़ता है। मोहम्मद किसी भी उम्र में रहे हों उनका ज्ञान ही उनका अस्तित्व बन गया था। फूल में यदि सुगंध है तो वह और भी खुबसूरत हो जाता है बस महापुरुष हमें यही सिखाते हैं। कुरआन मोहम्मद की सुगंध का नाम है।

पहले ये समझें कि हम क्या हैं
दुनिया में ऐसे खो जाना कि फिर खुद की भी सुध नहीं रहेऐसा अधिकतर लोगों के साथ होता है। हम दुनिया की भागमभाग में खुद के लिए समय निकालना भूल जाते हैं। कई बार अकेले में बैठकर विचार भी करें कि हम क्या थे और अब क्या हो गए हैं। जब तक खुद को नहीं पहचानेंगे तब तक अपनी मंजिल पर नहीं पहुंच पाएंगे। फिर खोज अगर अध्यात्मिक जीवन की हो तो यह और ज्यादा जरूरी हो जाता है।

मनुष्य के मन की आदत हो जाती है कि वह उठापटक करता रहेदौड़भाग में लगा रहे और आपाधापी में उलझ जाए। मन की सारी रुची भागने में है। इसीलिए जब हम मन के कहने पर चलते हैं तो संसार की वस्तुओं के पीछे भागते हैं। कुछ समय बाद जब संसार से ऊब जाते हैं तो भगवान की ओर भागने लगते हैं। मन के भागने की वृत्ति बनी ही रहती है। मन का काम दौड़ाना है और वह दौड़ाता रहता है भले ही दिशा बदल जाएजबकि अध्यात्म कहता है रुक जाओ। जब तक थोड़ा ठहरेंगे नहीं ईश्वर से मुलाकात नहीं होगी। सुग्रीव ने श्रीराम से वादा किया था कि बाली का वध हो जाने के बाद तथा मेरे राजा बनने के बाद मैं सीताजी की खोज के लिए वानर भेजूंगा लेकिन वह यह काम भूल गया। तब हनुमानजी ने सुग्रीव को समझाया था कि आप थोड़ा भीतर उतर कर चिंतन करें। पहले आप राज्य पाने के लिए दौड़ रहे थे और अब आप उसी वृत्ति के कारण भगवान का काम नहीं करके डर रहे हैं। 

आपका मन कुल मिलाकर आपाधापी में है। दुनिया में यदि पाना है तो दौड़ना पड़ेगा और दुनिया बनाने वाले को यदि पाना है तो हो सकता है दौड़ते हुए उसे खो ही दें। दोनों के समीकरण अलग हैं। दौड़े तो ही संसार मिलेगा और अध्यात्म में दौड़े तो शायद ईश्वर को खो देंगे। इसलिए थोड़ा रुकना सीखें। रुकने का अर्थ है आप जैसे हैं वैसे ही परमात्मा को समर्पित हो जाएं। यह सोचना कि पहले साधु बन जाएं और फिर भगवान के पास जाएं तो हो सकता है हम भटक जाएंगे। सबसे पहले जैसे हो वैसे ही रुक जाओ। सुग्रीव को यह बात समझ में आई और वे दोबारा श्रीराम तक पहुंचे। हम जैसे हैं उसे जानने के लिए ध्यानमेडिटेशन एक सही क्रिया है। सुग्रीव के जीवन में हनुमान की उपस्थिति का अर्थ ही मेडिटेशन था।

जीवन के लिए जरूरी है दु:ख भी
दु:ख को आता देखकर विचलित होना मानव स्वभाव है। सभी जीवन में केवल सुख ही सुख चाहते हैं। कोई भी दु:ख की कल्पना नहीं करना चाहता है। लेकिन सच यह है कि जैसे खाने का स्वाद मीठे और तीखे दोनों को मिलाकर ही पूरा होता है वैसे ही जीवन का मजा सुख और दु:ख दोनों के साथ ही मिलता है।सुख और दुख जीवन में एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। सिक्का उछलेगा भीगिरेगा भी और चित या पट में हमारा सुख-दुख प्रदर्शित होगा।  नानक  दुखिया सब संसार  इसका अर्थ यह नहीं है कि नानक कह रहे हैं कि सारा संसार दुखी है। दरअसल नानक कह रहे हैं दुख सांसारिक जीवन का अनिवार्य पहलू है। यह बहुत बारीक बात है। सभी दुखी हैं ऐसा नहीं कह सकते पर दुख आएगा ही नहीं यह भी नहीं कहा जा सकता। 

महापुरुषों ने इसके भी रास्ते बताए हैं कि दुख से मुक्त कैसे हुआ जा सकता है। महावीर ने कहा है भाव विरक्ति दुख मुक्ति का एक सरल तरीका है। भावे विरत्तो मणुओविसोगोएएण दुक्खोह परम्परेणर इस सूत्र में महावीर स्वामी ने कहा है-भाव विरक्त पुरुष संसार में रहकर भी अनेक दुखों में लिप्त नहीं होता। भाव विरक्त का सीधा सा अर्थ है हर हाल में मस्ती। हमसे ही संबंधित जो घट रहा है उसे हम ही देखने लगें। इस साक्षी भाव में शुरुआत होती है भाव विरक्ति की। इसका सीधा सा अर्थ है काम सारे करनाछोड़ना कुछ भी नहीं है लेकिन संतुलन बनाए रखना है। 

हम क्रिया तो योग की करते हैं लेकिन इरादा भोग का होता है और फिर उलझ जाते हैं। जिसके भीतर भाव विरक्ति आ जाती है वह यह कभी नहीं सोचता कि सारी स्थितियां मेरे कारण बन रही है और मेरे करने से ही सबकुछ हो रहा है। आसक्त व्यक्ति ऐसा मानता है और अशांत हो जाता है। इसलिए जो लोग शांति की खोज में हैं वे साक्षी भाव का अर्थ समझें और उसके माध्यम से अपने व्यक्तित्व में भाव विरक्ति उतारें। चूंकि भाव विरक्त स्थिति को विचार प्रभावित करते हैं इसलिए विचारों का नियंत्रण करते रहना चाहिए। विचार नियंत्रित रहने की स्थिति का नाम ध्यान है।


जो भी इसमें अच्छा लगे वो मेरे गुरू का प्रसाद है,
और जो भी बुरा लगे वो मेरी न्यूनता है....MMK

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