Tuesday, January 17, 2012

Bhagya(भाग्य)

हार-जीत किस्मत नहीं, हमारा प्रयास तय करता है
कर्मक्षेत्र में भाग्यवाद की दस्तक ही असफलता की पहली निशानी है। हम अपने कार्यस्थल पर किस्मत की बातों को प्रवेश अनुमति देंगे तो वे अपने साथ विफलता का बहाना भी ले आएंगी। जब भी कोई काम करें, खुले दिमाग से करें। पूरे मन से करें, निष्ठा को साथ करें।

सफलता या असफलता सिर्फ हमारे प्रयास पर टिकी है। इसका किस्मत से कोई लेना-देना नहीं है। अगर है भी तो बहुत थोड़ा। हम यह मानकर बैठ जाएं किस्मत ही ऐसी है तो हार निश्चित है। महाभारत के युद्ध के एक प्रसंग में चलते हैं। कुरूक्षेत्र में कौरव और पांडवों की सेनाएं आमने-सामने खड़ी है।

कौरवों के पास 11 अक्षौणी सेना और पांडवों के पास मात्र 7 अक्षौणी। बहुत बड़ा अंतर था। कोई भाग्यवादी होता तो यहीं हार मान लेता, लगभग आधी सेना के साथ युद्ध कैसे किया जा सकता है। खुद युधिष्ठिर ने भी युद्ध के पहले स्वीकार कर लिया कि हमारी हार तय है क्योंकि सेना बहुत कम है। भाग्य के नजरिए से देखें तो हार सामने ही दिख रही थी।

अर्जुन ने समझाया कि सेना कम है तो क्या हुआ, हम अपना पूरा प्रयास करेंगे। हमारे साथ धर्म है, खुद कृष्ण है फिर तो पराजय के बारे में सोचना भी नहीं चाहिए। हम पूरे मनोयोग से युद्ध करेंगे। हमारे हाथ में युद्ध करना है, परिणाम परमात्मा के हाथ में है। बस यहीं से पांडव सेना में उत्साह आ गया और कृष्ण के मार्गदर्शन में पूरे युद्ध का नजारा बदल गया।

हमारा जीवन भी एक कुरूक्षेत्र की तरह है, जहां परेशानियां और मुश्किलें ज्यादा है, आसान रास्ते कम है। अगर भाग्य के भरोसे रहे तो इन आसान रास्तों का भी ठीक से उपयोग नहीं कर पाएंगे।

सिर्फ किस्मत के भरोसे रहना बना देगा आलसी और अशांत
अगर हम घर के मुखिया हैं तो हमारे विचारों की गहरी छाप परिवार पर भी दिखेगी। किस्मत पर यकीन करें लेकिन हमेशा भाग्यवादी बने रहना, हमारी भावी पीढिय़ों को आलसी और अशांत बना देगा।

भाग्य के भरोसे तब बैठें जब हम अपनी ओर से हर ईमानदार प्रयास कर चुके हों। बिना प्रयास किए भाग्य के भरोसे रहना ना सिर्फ खुद के प्रति बेइमानी होगा, बल्कि सृष्टि के नियमों की भी अवहेलना होगी। हमारे शास्त्र कर्म पर जोर देते हैं, आदमी को कर्मवादी बनाते हैं। राम से लेकर कृष्ण तक हर अवतार ने कर्म को ही महत्व दिया है।

भागवत हमें जीवन हर पहलू का व्यवहारिक ज्ञान देता है। इस ग्रंथ में खुद भगवान कृष्ण जो संपूर्ण 16 कलाओं के अवतार थे, जिनके लिए कोई भी काम सिर्फ सोचने मात्र से हो सकता था, उन्होंने भी वो सारे कर्म किए जो एक आम आदमी को करने चाहिए। उनके जन्म के साथ ही उनके सर्वशक्तिमान होने की घोषणा कर दी गई थी। लेकिन भगवान ये जानते थे कि उन्हें संदेश क्या देना है।

खुद उनके परिवार में उन्होंने कभी ये जाहिर नहीं होने दिया कि सारी सृष्टि उनके अधीन है। वे हमेशा कर्म पर ही टिके, कर्म की ही शिक्षा दी। वे सर्व ज्ञानी थे फिर भी सांदीपनि ऋषि से 64 कलाओं का ज्ञान लिया, वे अकेले महाभारत युद्ध को एक दिन में जीत सकते थे लेकिन उन्होंने सिर्फ पांडवों का मार्गदर्शन किया और ये संदेश दिया कि परमात्मा सिर्फ राह दिखा सकता है, हर आदमी को अपना संघर्ष खुद ही करना पड़ेगा।

हम परिवार में रहते हैं, हमारे किसी भी काम से ये संदेश ना जाए, इसका ध्यान रखें। आपकी पीढिय़ां, परिवार आपके बताए मार्ग पर चलेगा। भाग्य को उतना ही महत्व दें, जितना जरूरी है। परिवार अगर भाग्यवादी हो गया तो फिर अशांति, संघर्ष और बिखराव भी आना तय है। अपने परिवार को कर्म के प्रति जागरुक करें, भाग्य सिर्फ एक रास्ता है, इसे आसान या मुश्किल बनाना हमारे कर्म पर निर्भर करता है। इसी शिक्षा से परिवार की भावी पीढिय़ां सफलता के मार्ग पर आगे बढ़ेंगी।

सुख-दुख भाग्य का नहीं, नजरिए का खेल है...
इंसान को जो कुछ भी मिलता है, उसके लिए वह खुद जिम्मेदार होता है। जीवन में प्राप्त हर चीज उसकी खुद की ही कमाई है। जन्म के साथ ही भाग्य का खेल शुरू हो जाता है। हम अक्सर अपने व्यक्तिगत जीवन की असफलताओं को भाग्य के माथे मढ़ देते हैं। कुछ भी हो तो सीधा सा जवाब होता है, मेरी तो किस्मत ही ऐसी है।

हम अपने कर्मों से ही भाग्य बनाते हैं या बिगाड़ते हैं। कर्म से भाग्य और भाग्य से कर्म आपस में जुड़े हुए हैं। किस्मत के नाम से सब परिचित है लेकिन उसके गर्भ में क्या छिपा है कोई नहीं जानता। भाग्य कभी एक सा नहीं होता। वो भी बदला जा सकता है लेकिन उसके लिए तीन चीजें जरूरी हैं। आस्था, विश्वास और इच्छाशक्ति। आस्था परमात्मा में, विश्वास खुद में और इच्छाशक्ति हमारे कर्म में। जब इन तीन को मिलाया जाए तो फिर किस्मत को भी बदलना पड़ता है। वास्तव में किस्मत को बदलना सिर्फ हमारी सोच को बदलने जैसा है।

राम को 14 वर्षों का वनवास मिला, एक दिन पहले ही राजा बनाने की घोषणा की गई थी। जाना पड़ा जंगल में। अभी तक किसी की भी किस्मत ने इतनी भयानक करवट नहीं ली होगी। राम के पास दो विकल्प थे, या तो वनवास का सुनकर निराश हो जाते, अपने भाग्य को कोसते या फिर उसे सहर्ष स्वीकार करते। राम ने दूसरा विकल्प चुना। उन्होंने सिर्फ अपनी सकारात्मक सोच के साथ वनवास में भी अपने लिए फायदे की बातें खोज निकाली और घोषित कर दिया कि वनवास उनके लिए ज्यादा अच्छा है, बजाय अयोध्या के राजसिंहासन के।

अपनी वर्तमान दशा को यदि स्वीकार कर लिया जाए तो बदलाव के सारे रास्ते ही बंद हो जाएगे। भाग्य या किस्मत वो है जिसने तुम्हारे ही पिछले कर्मो के आधार पर तुम्हारे हाथों में कुछ रख दिया है। अब आगे यह तुम पर निर्भर है कि तुम उस पिछली कमाई को घटाओ, बढ़ाओ, अपने कर्र्मों से बदलो या हाथ पर हाथ धर कर बेठे रहो और रोते-गाते रहो कि मेरे हिस्से में दूसरों से कम या खराब आया है।

भाग्यवाद और कुछ नहीं सिर्फ पुरुषार्थ से बचने का एक बहाना या आलस्य है जो खुद अपने ही मन द्वारा गढ़ा जाता है। यदि हालात ठीक नहीं या दु:खदायक हैं तो उनके प्रति स्वीकार का भाव होना ही नहीं चाहिये। यदि इन दुखद हालातों के साथ आप आसानी से गुजर कर सकते हैं तो इनके बदलने की संभावना उतनी ही कम रहेगी।

जब तक परिणाम सामने ना आए, उसे अपनी सफलता मत मानिए
लाभ और हानि, ये निजी जीवन का हिस्सा भी है और व्यवसायिक जीवन का अंग भी। कर्म का परिणाम नफा-नुकसान हो सकता है। काम धंधे में भाग्यवाद की दीमक हमें खोखला कर सकती है। कभी भी, किसी भी परिस्थितियों में कर्म का दामन ना छोड़ें।

अगर कर्म का हाथ छूट जाए तो सारा लाभ, हानि में बदल सकता है। जब तक कि हमारा कोई काम पूरा ना हो जाए, परिणाम हाथ में ना आ जाए, प्रयास नहीं छोडऩे चाहिए।

कई बार ऐसा होता है कि परिणाम सामने नजर आ रहा होता है, हम अपनी तरह आ रही सफलता को देखकर प्रयास रोक देते हैं। नतीजा कई बार सफलता मिलते-मिलते रह जाती है। कई बार करारी हार का सामना करना पड़ता है।

दूर से सफलता का अनुमान लगाना भाग्यवाद को बढ़ावा देता है। हम पहले ही सोच लेते हैं कि यह फायदा तो हमारी झोली में ही आया समझो। अनुमानित सफलता को हम तय मान लेते हैं।

महाभारत का युद्ध चल रहा था, कौरवों के योद्धाओं ने मिलकर अर्जुन के बेटे अभिमन्यु की हत्याकर दी। अभिमन्यु की रक्षा के लिए उसके पीछे गए पांडवों को जयद्रथ ने रोक लिया था। अर्जुन को जब पता चला, उसने अगले दिन सूर्यास्त होने के पहले ही जयद्रथ को मारने की प्रतिज्ञा कर ली। अगला पूरा दिन कौरव सेना ने जयद्रथ को छुपाए रखा। दिन ढलता जा रहा था। पांडवों की बेचैनी भी बढ़ रही थी।

तभी भगवान कृष्ण ने अपनी योग विद्या से सूर्य को बादलों से ढंक दिया। ऐसा लगने लगा रात हो गई। अर्जुन ने अपने लिए चिता सजा ली। इस खुशी में जयद्रथ भी नाचता हुआ अर्जुन के सामने आ पहुंचा। उसे अपने भाग्य पर भरोसा था। उसने यह अनुमान लगा लिया था कि अब अर्जुन आत्मदाह कर लेगा। लेकिन तभी कृष्ण ने अपनी माया हटाई। सूर्य को ढंके बादल छंट गए, उजाला हो गया। अर्जुन ने जयद्रथ को मार दिया।

परिणाम आने के पहले ली जयद्रथ ने अपने प्रयास छोड़ दिए। इंतजार ही नहीं किया। नतीजा जो युद्ध कौरवों के पक्ष में जाता दिख रहा था। वह हार में बदल गया।

भाग्यवाद हमारे कर्म को ही नहीं बिगाड़ता है, व्यक्तित्व भी धुंधला करता है
कोई कितना भी आधुनिक हो जाए, कभी ना कभी भगवान, भाग्य जैसी बातों में विश्वास करता ही है। बड़े-बड़े आधुनिक लोगों को किस्मत के भरोसे देखा गया है। किस्मत को मानना अलग बात है और भाग्य के भरोसे बैठना दूसरी बात है। हमारे निजी विचार ही हमारे व्यक्तित्व का निर्माण करते हैं। आप जैसा सोचते हैं, जैसा मानते हैं व्यक्तित्व वैसा ही बनता जाता है। हमारे विचारों की साफ झलक व्यक्तित्व में दिखाई देती है।

अगर आप भाग्यवादी हैं। किस्मत में अत्यधिक भरोसा करते हैं तो वैसा ही परिणाम आपको अपने कामों का मिलता है। अपने व्यक्तित्व को ऐसे निखारें कि उस पर कर्म का प्रभाव दिखे। इस बात को समझें कि व्यक्तित्व पर कर्म का प्रभाव प्रकाश देता है, भाग्यवाद इसे धुंधला बनाता है। कर्मवादियों के कामों के परिणाम का अनुमान आसानी से लगाया सकता है लेकिन भाग्यवाद में कर्मों के परिणाम का अनुमान नहीं लगाया जा सकता है।

ये सदैव याद रखें कि भाग्य कर्म से ही बनता है। हम जैसे काम करते हैं वैसा ही हमारे भाग्य का निर्माण होता है। हम अपने कर्म पर टिकें। कभी-कभी ऐसा भी होता है कि हम कर्म तो बहुत करते हैं, लेकिन फिर भी परिणाम विपरीत आते हैं। तो लोगों को कहने का मौका मिल जाता है कि हमारी किस्मत में ऐसा ही लिखा था। दरअसल जब भी काम का परिणाम हमारे विपरीत आए तो अपने भीतर झांकिए। अतीत में देखिए कि आपने कहां चूक की थी।

हर असफलता हमारी किसी पुरानी चूक का परिणाम होती है। अगर हम गलतियों से बचते जाएं या उन्हें समय रहते सुधार लें तो फिर कभी असफलता हमारे सामने नहीं आएगी।

फिर एक बार राम के वनवास प्रसंग में चलते हैं। राम को वनवास हो चुका है। राम, सीता और लक्ष्मण तीनों वन के लिए रवाना हो चुके हैं। अभी तक राजा दशरथ इस पूरी घटना को नियति का खेल बता रहे थे। भाग्य का लिखा मान रहे थे। राम के जाने के बाद जब वे अकेले कौशल्या के कक्ष में थे तो उन्हें अपनी गलतियां नजर आने लगी। युवावस्था में श्रवण कुमार की हत्या की थी, दशरथ को याद आ गया। बूढ़े मां-बाप से उनका एकलौता सहारा छिन लिया था। उसी का परिणाम है सब।

हर परिणाम के पीछे कोई कर्म जरूर होता है। बिना कर्म हमारे जीवन में कोई परिणाम आ ही नहीं सकता। अपने कर्मों पर नजर रखें। तभी आप भाग्य को समझ सकेंगे।

आपके हर निर्णय में परिवार का हित सबसे ऊपर हो
घर का मुखिया सिर्फ परिवार ही नहीं चलाता है, उसके कर्मों पर ही परिवार का भविष्य टिका होता है। अगर नेतृत्वकर्ता एक चूक कर दे, तो पूरे परिवार की किस्मत बदल सकती है। एक गलत निर्णय परिस्थितियों को पूरी तरह विपरीत कर सकता है।

पंक्ति में सबसे आगे खड़े रहना भी एक जिम्मेदारी है।

परिवार का मुखिया पंक्ति में खड़े पहले व्यक्ति की तरह होता है। जो जैसा खड़ा होता है, कतार में शेष लोग भी वैसे ही खड़े होते हैं। अगर आप पंक्ति में पहले खड़े हैं तो सावधान हो जाइए। परिवार चलाना भी ऐसा ही काम है। सारी पीढिय़ां एक ही पैरों के निशान देखकर ही चलते हैं।

एक गलत काम हमारे पूरे परिवार को मुसीबत में डाल सकता है। जरा महाभारत के उस प्रसंग को देखिए, जहां जुआ खेलने की लत सिर्फ युधिष्ठिर को है। दुर्योधन से जुआ भी उन्होंने अकेले ही खेला। लेकिन परिणाम सबने भुगता। द्रौपदी का चीरहरण हो गया। पांचों भाइयों को वन में जाना पड़ा। राजपाठ हाथ से चला गया। सुंदर नगर इंद्रप्रस्थ भी दुर्योधन ने जीत लिया।

कर्म सिर्फ एक ही गलत था जुआ। युधिष्ठिर अगर जुआ नहीं खेलते तो शायद इतना अपमानित नहीं होना पड़ता। हम परिवार के मुखिया हैं तो हमारी जिम्मेदारी भी ज्यादा होती है। निजी आनंद, निजी स्वार्थ के लिए कोई ऐसा काम ना करें, जिसका परिणाम पूरे परिवार को भुगतना पड़े।

जब भी कोई निर्णय लें तो यह सोच कर लें कि उसका परिणाम आपके पूरे परिवार को भुगतना पड़ सकता है। कभी भी सिर्फ निजी शौक या हित के लिए ही कोई काम ना करें। हमेशा दूरदृष्टि का उपयोग करें।

भाग्य बदलता हैए बस बदलने वाला चाहिए
अगर यह मान कर बैठ जाएं कि जो भाग्य में लिखा है वही मिलेगा तो जीवन ज्यादा संघर्षमय हो जाएगा। हमारा स्वभाव स्वयं का भाग्य बनाने का होना चाहिए ना कि यह मान लेने का कि जो किस्मत में होगा वह तो मिलेगा ही। कई बार लोग इस विश्वास में कर्म में मुंह मोड़ लेते हैं। फिर हाथ में आती है सिर्फ असफलता।

भाग्य को मानने वालों को कर्म में विश्वास होना चाहिए। भाग्य के दरवाजे का रास्ता कर्म से ही होकर गुजरता है। कोई कितना भी किस्मतवाला क्यों ना हो, कर्म के सहारे की आवश्यकता उसे पड़ती ही है। बिना कर्म के यह संभव ही नहीं है कि हम किस्मत से ही सबकुछ पा जाएं। हां, यह तय है कि अगर कर्म बहुत अच्छे हों तो भाग्य को बदला जा सकता है।

आजकल कई युवा ज्योतिषियों की बात मानकर बैठ जाते हैं। हम यह नहीं कह रहे हैं कि ज्योतिष गलत है। बिना कर्म कोई ज्योतिष काम नहीं करेगा। हम अक्सर सड़कों से गुजरते हुए ट्राफिक सिग्रल देखते हैं। वे हमें रुकने और चलने का सही समय बताते हैं। ज्योतिष या भाग्य भी बस इसी ट्राफिक सिग्रल की तरह होता है। कर्म तो आपको हर हाल में करना ही पड़ेगा। भाग्य यह संकेत कर सकता है कि हमें कब कर्म की गति बढ़ानी है, कब, कैसे और क्या करना है।

सावित्री की कथा देखिए, सावित्री राजकुमारी थी, पिता ने कहा अपनी पसंद का वर चुन लो। पूरे भारत में घूमने के बाद उसने जंगल में रहने वाले निर्वासित राजकुमार सत्यवान को जीवनसाथी के रूप में पसंद किया। राजा ने समझाया, नारद भी आए और बताया कि सत्यवान की आयु एक वर्ष ही शेष बची है। उससे विवाह करना, यानी शेष जीवन वैधव्य भोगना तय है। लेकिन सावित्री नहीं मानी। सत्यवान से विवाह किया। उसने एक वर्ष पहले ही तप, पूजा, उपवास शुरू कर दिए।

जिस दिन सत्यवान की मौत होनी थी, वो पूरे दिन उसके साथ रही। यमराज उसके प्राण हरने आए। उसने यमराज से अपने पति के प्राणों के बदले में ससुर का स्वास्थ्य, उनका खोया राज और अपने लिए पुत्र मांग लिए। बिना सत्यवान के पुत्र होना संभव नहीं था। भाग्य का लिखा बदल गया। नारद की भविष्यवाणी को सावित्री ने भाग्य का निर्णय ना मानकर उसे संकेत के रूप में समझा। अपना कर्म किया और पति के प्राण बचा लिए।

सुख-दुख भाग्य का नहीं, नजरिए का खेल है...
इंसान को जो कुछ भी मिलता है, उसके लिए वह खुद जिम्मेदार होता है। जीवन में प्राप्त हर चीज उसकी खुद की ही कमाई है। जन्म के साथ ही भाग्य का खेल शुरू हो जाता है। हम अक्सर अपने व्यक्तिगत जीवन की असफलताओं को भाग्य के माथे मढ़ देते हैं। कुछ भी हो तो सीधा सा जवाब होता है, मेरी तो किस्मत ही ऐसी है।

हम अपने कर्मों से ही भाग्य बनाते हैं या बिगाड़ते हैं। कर्म से भाग्य और भाग्य से कर्म आपस में जुड़े हुए हैं। किस्मत के नाम से सब परिचित है लेकिन उसके गर्भ में क्या छिपा है कोई नहीं जानता। भाग्य कभी एक सा नहीं होता। वो भी बदला जा सकता है लेकिन उसके लिए तीन चीजें जरूरी हैं। आस्था, विश्वास और इच्छाशक्ति। आस्था परमात्मा में, विश्वास खुद में और इच्छाशक्ति हमारे कर्म में। जब इन तीन को मिलाया जाए तो फिर किस्मत को भी बदलना पड़ता है। वास्तव में किस्मत को बदलना सिर्फ हमारी सोच को बदलने जैसा है।

राम को 14 वर्षों का वनवास मिला, एक दिन पहले ही राजा बनाने की घोषणा की गई थी। जाना पड़ा जंगल में। अभी तक किसी की भी किस्मत ने इतनी भयानक करवट नहीं ली होगी। राम के पास दो विकल्प थे, या तो वनवास का सुनकर निराश हो जाते, अपने भाग्य को कोसते या फिर उसे सहर्ष स्वीकार करते। राम ने दूसरा विकल्प चुना। उन्होंने सिर्फ अपनी सकारात्मक सोच के साथ वनवास में भी अपने लिए फायदे की बातें खोज निकाली और घोषित कर दिया कि वनवास उनके लिए ज्यादा अच्छा है, बजाय अयोध्या के राजसिंहासन के।

अपनी वर्तमान दशा को यदि स्वीकार कर लिया जाए तो बदलाव के सारे रास्ते ही बंद हो जाएगे। भाग्य या किस्मत वो है जिसने तुम्हारे ही पिछले कर्मो के आधार पर तुम्हारे हाथों में कुछ रख दिया है। अब आगे यह तुम पर निर्भर है कि तुम उस पिछली कमाई को घटाओ, बढ़ाओ, अपने कर्र्मों से बदलो या हाथ पर हाथ धर कर बेठे रहो और रोते-गाते रहो कि मेरे हिस्से में दूसरों से कम या खराब आया है।

भाग्यवाद और कुछ नहीं सिर्फ पुरुषार्थ से बचने का एक बहाना या आलस्य है जो खुद अपने ही मन द्वारा गढ़ा जाता है। यदि हालात ठीक नहीं या दु:खदायक हैं तो उनके प्रति स्वीकार का भाव होना ही नहीं चाहिये। यदि इन दुखद हालातों के साथ आप आसानी से गुजर कर सकते हैं तो इनके बदलने की संभावना उतनी ही कम रहेगी।

क्रमश:...

जो भी इसमें अच्छा लगे वो मेरे गुरू का प्रसाद है,
और जो भी बुरा लगे वो मेरी न्यूनता है......MMK

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