Monday, November 21, 2011

Aisha-Kyun (ऐसा क्यूँ) Part (4)

अगहन मास को मार्गशीर्ष भी क्यों कहते हैं?
हिंदू वर्ष का नवा महीना अगहन के नाम से जाना जाता है। इसे मार्गशीर्ष भी कहते हैं। अगहन मास को मार्गशीर्ष कहने के पीछे भी कई तर्क हैं। भगवान श्रीकृष्ण की अनेक स्वरूपों में व अनेक नामों से पूजा की जाती है। इन्हीं स्वरूपों में से एक मार्गशीर्ष भी श्रीकृष्ण का ही एक रूप है।

मार्गशीर्ष मास को मार्गशीर्ष ही क्यों कहा जाता है? इस संबंध में शास्त्रों में कहा गया है कि इस माह का संबंध मृगशिरा नक्षत्र से है। ज्योतिष शास्त्र के अनुसार 27 नक्षत्र बताए गए हैं। इन्हीं 27 नक्षत्रों में से एक है मृगशिरा नक्षत्र। इस माह की पूर्णिमा मृगशिरा नक्षत्र से युक्त होती है। इसी वजह से इस मास को मार्गशीर्ष मास कहा गया है।

इस माह को मगसर, अगहन या अग्रहायण मास भी कहा जाता है। भागवत के अनुसार श्रीकृष्ण ने कहा है मासानां मार्गशीर्षोहम् अर्थात् सभी महिनों में मार्गशीर्ष श्रीकृष्ण का ही स्वरूप है। मार्गशीर्ष मास में श्रद्धा और भक्ति से प्राप्त पुण्य के बल पर हमें सभी सुखों की प्राप्ति होती है। इस माह में नदी स्नान और दान-पुण्य का विशेष महत्व है।

श्रीकृष्ण के बाल्यकाल में जब गोपियां उन्हें प्राप्त करना ध्यान लगा रही थी तब श्रीकृष्ण ने मार्गशीर्ष मास की महत्ता बताई थी। उन्होंने कहा था कि मार्गशीर्ष माह में यमुना स्नान से मैं सहज ही सभी को प्राप्त हो जाऊंगा। तभी से इस माह में नदी स्नान का खास महत्व माना गया है।

जानिए गीता को भगवद्गीता क्यों कहते हैं
मार्गशीर्ष (अगहन) मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी को गीता जयंती का पर्व मनाया जाता है। इस बार यह पर्व 6 दिसंबर, मंगलवार को है। जानिए, गीता को भगवद्गीता क्यों कहते हैं-

एक-दूसरे के प्राणों के प्यासे कौरवों और पांडवों के बीच महाभारत शुरू होने से पहले योगिराज भगवान श्रीकृष्ण ने अठारह अक्षौहिणी सेना के बीच मोह में फंसे और कर्म से विमुख अर्जुन को गीता का उपदेश दिया था। श्रीकृष्ण ने अर्जुन को छंद रूप में यानी गाकर उपदेश दिया, इसलिए इसे गीता कहते हैं।

चूंकि उपदेश देने वाले स्वयं भगवान थे, अत: इस ग्रंथ का नाम भगवद्गीता पड़ा। भगवद्गीता में कई विद्याओं का उल्लेख आया है, जिनमें चार प्रमुख हैं - अभय विद्या, साम्य विद्या, ईश्वर विद्या और ब्रह्मा विद्या। माना गया है कि अभय विद्या मृत्यु के भय को दूर करती है। साम्य विद्या राग-द्वेष से छुटकारा दिलाकर जीव में समत्व भाव पैदा करती है।

ईश्वर विद्या के प्रभाव से साधक अहंकार और गर्व के विकार से बचता है। ब्रह्मा विद्या से अंतरात्मा में ब्रह्मा भाव को जागता है। गीता माहात्म्य पर श्रीकृष्ण ने पद्म पुराण में कहा है कि भवबंधन से मुक्ति के लिए गीता अकेले ही पर्याप्त ग्रंथ है। गीता का उद्देश्य ईश्वर का ज्ञान होना माना गया है।

इसे घर में रख दो फिर न आएगा सांप, न आएगा उसका डर क्योंकि...
सांप एक ऐसा जीव है जिसे सामने देखते ही साहसी इंसानों के भी पसीना आ जाता है। सांप का विष पलभर में ही किसी की भी जीवन लीला समाप्त कर देता है। इनके आने-जाने पर प्रतिबंध लगा पाना किसी के लिए भी काफी मुश्किल है। सांप आसानी से किसी के घर में प्रवेश कर सकते हैं। इनसे बचने के लिए शास्त्रों में ही सटीक उपाय बताया गया है।

सांपों के डर को समाप्त करने के लिए सबसे अच्छा और सरल उपाय है घर में मोर पंख रखा जाए। मोर पंख घर में ऐसे स्थान पर रखें जहां से आसानी से दिखाई दे। मोर पंख की सुंदरता आपके घर की सजावट बढ़ाने का काम भी करेगी। इससे आपके घर में सांप नहीं आएंगे। मोर पंख सांपों को हमारे घर से दूर रखता है। इसके अतिरिक्त शास्त्रों में इसके कई अन्य महत्व भी बताए गए हैं। मोर पंख का संबंध भगवान श्रीकृष्ण से भी है।

श्रीकृष्ण के चित्रों में देखा जा सकता है कि उनके मस्तष्क पर मोर पंख लगा रहता है। मोर पंख की उपयोगिता और पवित्रता इसी बात से बढ़ जाती है कि वह भगवान के मस्तष्क पर भी स्थान पाता है। घर में मोर पंख लगाने के बहुत सारे अन्य लाभ भी है। इसे घर में रखने से वातावरण में मौजूद नकारात्मक शक्तियां नष्ट हो जाती हैं और सकारात्मक ऊर्जा अधिक सक्रिय हो जाती है। इससे हमारी सोच पर भी सकारात्मक प्रभाव पड़ते हैं।

सांप मोर पंख से डरते हैं क्योंकि मोर ही इसे मार कर खा जाता है। अत: सांप उस क्षेत्र में जाता है ही नहीं है जहां मोर या मोर पंख दिखाई देता है।

घर में पैसा कहां और क्यों रखना चाहिए?
सभी के घरों में पैसा या अन्य कीमती सामान रखने के लिए विशेष रहता है। इस प्रकार की बहुमूल्य वस्तुएं किसी सुरक्षित स्थान पर ही रखी जाती है। घर में पैसा या सोना-चांदी आदि बहुमूल्य धातुएं कहां और क्यों रखनी चाहिए, इस संबंध में लाल किताब में बताया गया है कि सभी मूल्यवान वस्तुएं घर के किसी अंधेरे कमरे में ही रखनी चाहिए।

ऐसा माना जाता है कि घर के अंधेरे कमरे में पैसा, सोना-चांदी रखने से परिवार की सुख-समृद्धि बनी रहती है। पैसों की तंगी कभी भी घर में प्रवेश नहीं कर पाती। परिवार के सभी सदस्यों को पर्याप्त धन कमाने के सुअवसर प्राप्त होते हैं और बरकत बनी रहती है। खर्चों में कमी आती है। लाल किताब के अनुसार इस उपाय से शनि के दोषों का भी निवारण हो जाता है।

इसका एक अन्य फायदा भी है कि इस प्रकार किसी अंधेरे कमरे में धन आदि रखने से उसके चोरी होने की संभावनाएं भी लगभग समाप्त हो जाती है। जिससे हमारी सभी मूल्यवान वस्तुएं सुरक्षित रहती हैं। इसके साथ इस प्रकार धन रखने से धन देव महालक्ष्मी की कृपा भी प्राप्त होती हैं। जिस स्थान पर भी पैसा आदि रखा जाता है वह स्थान कभी पैसों से खाली नहीं होता। इन्हीं सब लाभों को देखते हुए पुराने समय भी सभी राजा-महाराजाओं द्वारा अपनी अमूल्य धन संपदा को किसी तहखाने में ही छिपाकर रखा जाता था। जिससे उनके परिवार और राज्य में सदैव धन की वर्षा होती थी।

रात के समय ऐसा दीपक लगाने से पैसा खुद आएगा आपके घर, क्योंकि...
वेद-पुराणों के अनुसार इस सृष्टि का निर्माण भगवान शिव की इच्छा मात्र से ही हुआ है। अत: इनकी भक्ति करने वाले व्यक्ति को संसार की सभी वस्तुएं आसानी से प्राप्त हो जाती हैं। शिवजी अपने भक्तों की समस्त मनोकामनाएं पलभर में ही पूरी कर देते हैं। नियमित रूप से शिवलिंग का पूजन करने वाले व्यक्ति के जीवन में दुख कम ही महसूस होते हैं।

शिवजी के पूजन से श्रद्धालुओं की धन संबंधी समस्याएं भी दूर हो जाती हैं। शास्त्रों में एक सटीक उपाय बताया गया है जिसे नियमित रूप से अपनाने वाले व्यक्ति अपार धन-संपत्ति प्राप्त हो सकती है। इस उपाय के संबंध में शिवपुराण में एक कथा दी गई है। कथा के अनुसार अतिप्राचीन काल काल में गुणनिधि नामक व्यक्ति बहुत गरीब था और वह भोजन की खोज में लगा हुआ था। इस रात हो गई और वह एक शिव मंदिर में पहुंच गया। गुणनिधि ने सोचा कि उसे रात्रि विश्राम इसी मंदिर में कर लेना चाहिए। रात के समय अत्यधिक अंधेरा वहां हो गया। इस अंधकार को दूर करने के लिए उसने शिव मंदिर में अपनी कमीज जलायी थी। रात्रि के समय भगवान शिव के समक्ष प्रकाश करने के फलस्वरूप से उस व्यक्ति को अगले जन्म में देवताओं के कोषाध्यक्ष कुबेर देव का पद प्राप्त हुआ।

इस कथा के अनुसार ही शाम के समय शिव मंदिर में दीपक लगाने वाले व्यक्ति को अपार धन-संपत्ति एवं ऐश्वर्य की प्राप्ति होती हैं। अत: नियमित रूप से रात्रि के समय किसी भी शिवलिंग के समक्ष दीपक लगाना चाहिए।

श्रीराम सपनों में बताएंगे आपका भविष्य क्योंकि...
शास्त्रों के अनुसार भगवान विष्णु इस सृष्टि के पालनहार हैं और जब-जब धरती पर धर्म की हानि होती है, पाप अत्यधिक बढऩे लगता है तब भगवान श्रीहरि धरती पर अवतार लेते हैं। भगवान का अवतार ही धरा से समस्त पापियों का नाश करता है। अभी भगवान विष्णु के नौ मुख्य अवतार हो चुके हैं, ऐसी मान्यता है। इन्हीं नौ प्रमुख अवतारों में से एक है भगवान श्रीराम।

श्रीराम अपने भक्तों को सभी सुख प्रदान करने वाले देवता हैं। इनकी भक्ती मात्र से ही किसी भी व्यक्ति के समस्त दुख और कष्ट स्वत: ही शांत हो जाते हैं। प्राचीन काल से ही भगवान श्रीराम के दर्शन प्राप्त करने के लिए कई भक्तों द्वारा कठिन तप किया जाता रहा है। भगवान के दर्शन प्राप्त करने का शास्त्रों में एक सबसे सरल मार्ग बताया गया है।

ऐसा माना जाता है कि जो व्यक्ति रामायाण या श्रीरामचरित मानस का पाठ 108 बार कर लेता है उसे भगवान श्रीराम दिखाई देने लग जाते हैं। इस दौरान का भक्त का मन पूरी तरह भगवान श्रीराम में ही लगा होना चाहिए। अन्य बातों से हटकर जब किसी व्यक्ति का मन केवल भगवान श्रीराम में लग जाता है तो निश्चित ही वह प्रभु के दर्शन अवश्य प्राप्त कर सकता है। संभव है कि भगवान श्रीराम भक्तों को सपनों में दर्शन दें। यदि ऐसा होता है तो समझ लें कि आपकी किस्मत के सितारे चमक गए हैं। फिर हर कदम भाग्य आपका साथ देगा। इस प्रकार जब कोई व्यक्ति 108 बार श्रीरामचरित मानस या रामायण का पाठ कर लेता है तो श्रीराम स्वयं ही भक्त का भूत, भविष्य और वर्तमान बता सकते हैं।

कपड़े पहनते समय सिक्के गिरे तो होगा कुछ अच्छा, क्योंकि...
काफी लोगों के साथ ऐसा होता है कि कहीं जाते वक्त या कपड़े पहनते समय पैसे गिर जाते हैं। ज्योतिष के अनुसार इसे शकुन माना जाता है और निकट भविष्य में इसके शुभ फल प्राप्त होते हैं।

शकुन और अपशकुन को ज्योतिष में काफी महत्वपूर्ण माना जाता है। किसी भी महत्वपूर्ण कार्य को करने से पहले कुछ ना कुछ शकुन या अपशकुन अवश्य होते हैं उन्हें समझना पड़ता है। इन्हीं छोटी-छोटी घटनाओं में कार्य की सफलता या असफलता के संकेत छुपे होते हैं। आजकल ऐसी बातों को अंधविश्वास भी माना जाता है लेकिन ज्योतिष एक विज्ञान ही है और इसके अनुसार ऐसी घटनाओं का संबंध हमारे भविष्य से जुड़ा होता है।

अगर आप कहीं जा रहे हैं या आप कपड़े पहन रहे हैं और जेब से पैसे गिरें तो इसे शुभ संकेत मानना चाहिए। ऐसा होने पर निकट भविष्य में आपको धन प्राप्ति के योग बनते हैं। इसी प्रकार यदि किसी लेन-देन के समय आपके हाथ से पैसा छूट जाए तो भी इसे शुभ माना जाता है। साथ ही यदि कपड़े बदलते वक्त भी ऐसा हो तो शुभ होता है। इन घटनाओं का फल कितने समय में मिलेगा इसका कोई निश्चित दिन नहीं है लेकिन शुभ फल अवश्य ही प्राप्त होता है।

जब शनि का साया होगा तो झेलना पड़ेगा ऐसा दर्द, क्योंकि...
कई बार छोटी-छोटी लापरवाहियों या किसी और की गलती के कारण हमें चोट लग जाती है। वैसे तो यह एक सामान्य सी बात है लेकिन इस प्रकार की चोट यदि लौहे से लगती है तो ये बात गंभीर हो जाती है। ज्योतिष के अनुसार लौहे से चोट लगने के पीछे शनि का प्रभाव होता है।

शनिदेव सभी नौ ग्रहों में विशेष स्थान रखते हैं क्योंकि इन्हें न्यायाधिश का पद प्राप्त है। शनि महाराज ही व्यक्ति के सभी अच्छे-बुरे कर्मों का फल प्रदान करते हैं। साढ़ेसाती और ढैय्या के काल में शनि राशि विशेष के लोगों को उनके कर्मों का फल देते हैं। यदि किसी व्यक्ति ने जाने-अनजाने कोई गलत कार्य किया है तो शनि उसे वैसी ही सजा देते हैं। इसी वजह से इन्हें क्रूर ग्रह भी माना जाता है।

यदि आपको बार-बार लौहे की वस्तुओं से चोट लगती रहती है तो ध्यान रखें ज्योतिष के अनुसार यह गंभीर बात है। इसका सीधा इशारा यही है आपसे जाने-अनजाने कोई गलती हो गई है। ऐसे में लौहे से चोट लगाने के पीछे शनि का ही प्रभाव बताया जाता है। चूंकि लौहा शनि की प्रिय धातु है अत: इससे हमें किसी प्रकार का नुकसान होना शनि के नाराज होने की सूचना मात्र समझना चाहिए। यदि किसी व्यक्ति के साथ ऐसा बार-बार होता है तो उसे शनि के निमित्त विशेष पूजन आदि कार्य किया जाना चाहिए। प्रति शनिवार तेल का दान करें और भगवान शनि के दर्शन करें। कार्यों में पूरी तरह सावधानी रखें।

ये घर में होगी तो शनि, वास्तु और सब रहेगा पॉजिटिव, क्योंकि...
शास्त्रों में गाय को माता कहा है। गाय एक बहुपयोगी पशु है जो कि कई रूपों में फायदेमंद भी है। पुराने समय में सभी के घरों में गाय अनिवार्य रूप से होती थी। आज भी गांव में रहने वाले या ग्रामीण परिवेश से संबंधित लोगों के यहां गाय रहती है।

प्राचीन काल से गाय को माता का दर्जा प्राप्त है। गाय बहुत ही पवित्र और पूजनीय मानी गई है। ऐसा माना जाता है कि गाय की पूजा करने से सभी देवी-देवताओं की कृपा प्राप्त हो जाती है। इसी वजह से आज भी गाय को पूजा जाता है। पहले गाय को घर में रखना अनिवार्य था इसके पीछे कई कारण हैं।

- गाय जहां रहती है वहां किसी भी प्रकार की नकारात्मक ऊर्जा सक्रिय नहीं हो पाती और सकारात्मक ऊर्जा बढ़ती रहती है।

- गाय से निकलने वाली गंध से वातावरण में मौजूद कई हानिकारक कीटाणु नष्ट हो जाते हैं।

- गाय का दूध भी कई बीमारियों में औषधि का ही काम करता है।

- गाय को घर में रखने से सभी प्रकार के ज्योतिष दोष और वास्तु दोष भी नष्ट हो जाते हैं।

- गाय का मूत्र कई बीमारियों में औषधि के रूप काम लिया जाता है।

- गौमूत्र से कैंसर का इलाज हो जाता है। गाय के प्रभाव में रहने वाले व्यक्ति को कभी ऐसी कोई भी बीमारी नहीं होती।

- गाय का गोबर भी कई कामों में उपयोग किया जाता है।

इनके अतिरिक्त कई फायदे हैं गाय को घर पर रखने के। इन्हीं सब की वजह से गाय को अपने घरों पर रखा जाता था।

पैसों की किल्लत दूर करने के लिए रोज सुबह क्या और क्यों करें?
पैसा या धन की चाहत प्राचीन काल से ही बनी हुई है। आज भी जैसे-जैसे आधुनिक सुविधाओं का विकास हो रहा है ठीक वैसी पैसों की आवश्यकता भी बढ़ती जा रही है। अधिकांश लोग परेशानियों के साथ जीवन यापन कर रहे हैं और पैसों की तंगी से जुझ रहे हैं। दिन-रात कड़ी मेहनत के बाद भी पर्याप्त धन अर्जित नहीं कर पाते। यदि आप भी पैसों की तंगी से त्रस्त हैं तो प्रतिदिन एक छोटा सा उपाय अपनाएं।

शास्त्रों के अनुसार गाय को बहुत पवित्र और पूजनीय माना गया है। इसी वजह से गौमाता से प्राप्त होने वाली सभी चीजों का वैद-पुराणों में काफी महत्व बताया गया है। अत: गाय का गोबर भी कई समस्याओं को समाप्त करने में सक्षम है। प्रतिदिन घर के बाहर किसी साफ और स्वस्थ स्थान पर गोबर से छोटा सा चौकर (लिपें) बनाएं। इस चौकार स्थान पर धन की देवी महालक्ष्मी के पैरों का निशान बनाएं। महालक्ष्मी के पैरा पर कंकू, चावल चढ़ाएं। इस प्रकार प्रतिदिन करें। ऐसा करने से आपके घर से पैसों की तंगी भाग जाएगी और महालक्ष्मी का वास हो जाएगा।

ध्यान रखें कि यह उपाय ऐसे स्थान पर करें जहां किसी के पैर न लगे। अन्यथा उपाय का प्रभाव कम हो जाएगा। इसके साथ अपनी मेहनत पूरी ईमानदारी और निष्ठा के साथ करें। किसी भी प्रकार के अधार्मिक कर्मों से खूद को दूर रखें।

ये सुखा पौधा घर में न रखें वरना हो सकती है गड़बड़, क्योंकि...
अधिकांश हिंदू घरों में तुलसी का पौधा अवश्य ही होता है। तुलसी घर के आंगन में लगाने की प्रथा हजारों साल पुरानी है। तुलसी को दैवी का रूप माना जाता है। साथ ही मान्यता है कि तुलसी का पौधा घर में होने से घर वालों को बुरी नजर प्रभावित नहीं कर पाती और अन्य बुराइयां भी घर और घरवालों से दूर ही रहती है।

तुलसी का पौधा होने से घर का वातावरण पूरी तरह पवित्र और कीटाणुओं से मुक्त रहता है। कभी-कभी किसी कारण से यह पौध सूख भी जाता है ऐसे में इसे घर में नहीं रखना चाहिए बल्कि इसे किसी पवित्र नदी में प्रवाहित करके दूसरा तुलसी का पौधा लगा लेना चाहिए। सुखा हुआ तुलसी का पौधा घर में रखना कई परिस्थितियों में अशुभ माना जाता है। इससे विपरित परिणाम भी प्राप्त हो सकते हैं। घर की बरकत पर बुरा असर पड़ सकता है। इसी वजह से घर में हमेशा पूरी तरह स्वस्थ तुलसी का पौधा ही लगाया जाना चाहिए।

तुलसी का धार्मिक महत्व तो है ही लेकिन विज्ञान के दृष्टिकोण से तुलसी एक औषधि है। आयुर्वेद में तुलसी को संजीवनी बुटि के समान माना जाता है। तुलसी में कई ऐसे गुण होते हैं जो बड़ी-बड़ी जटिल बीमारियों को दूर करने और उनकी रोकथाम करने में सहायक है। तुलसी का पौधा घर में रहने से उसकी सुगंध वातावरण को पवित्र बनाती है और हवा में मौजूद बीमारी के बैक्टेरिया आदि को नष्ट कर देती है। तुलसी की सुंगध हमें श्वास संबंधी कई रोगों से बचाती है। साथ ही तुलसी की एक पत्ती रोज सेवन करने से हमें कभी बुखार नहीं आएगा और इस तरह के सभी रोग हमसे सदा दूर रहते हैं। तुलसी की पत्ती खाने से हमारे शरीर की रोगप्रतिरोधक क्षमता काफी बढ़ जाती है।

किसी को नींद से जगाने से पहले ध्यान रखें ये खास बात, क्योंकि...
सभी माता-पिता चाहते हैं कि उनके बच्चे सभ्य और सुसंस्कारी हों। इसलिए उन्हें सभी बुरी आदतों और बातों से दूर रखने के प्रयास किए जाते हैं। फिर भी लाख कोशिशों के बाद भी कुछ माता-पिता की संतान गलत आदतों का शिकार हो जाती है। ऐसे में उन्हें पुन: सही मार्ग पर लाने के लिए कई प्रकार की परेशानियों का सामना करना पड़ता है।

बच्चों की बुरी आदतें कैसी सुधारी जाएं इस संबंध में शास्त्रों में कई उपाय बताए गए हैं, जो कि परंपरागत रूप से चले आ रहे हैं। आज भी विद्वान और बुजूर्ग लोग इन परंपराओं का निर्वहन करते हैं। शास्त्रों के अनुसार सुबह उठते समय भगवान का नाम लेने या सुनने से व्यक्ति के सभी बुरे विचार नष्ट हो जाते हैं। इसी वजह से सुबह-सुबह भगवान की आरती के स्वर सुनाए जाने चाहिए।

बच्चों को नींद से जगाने से पहले दो मिनट हल्की आवाज से हरे रामा हरे कृष्णा रामा रामा हरे... इस मंत्र का गायन करें। इससे बच्चों में सदाचार का विकास होता है। नाम से या चिखकर बच्चों को न उठाएं। यदि ऐसा संभव न हो तो आजकल मार्केट में भगवान के मंत्रों की इलेक्ट्रानिक बेल मिलती है उसे हर सुबह चलाया जा सकता है। मोबाइल में भगवान के भजन आदि का आलार्म सेट किया जा सकता है। इस प्रकार नींद से जागते ही भगवान का नाम लिया जाए या सुना जाए तो गलत आदतें छुट जाती हैं।

आपने सांप मारा या मारते हुए देखा तो होगी अनहोनी, क्योंकि...
सांप एक ऐसा जीव है जिससे लगभग हर व्यक्ति डरता है। इसकी वजह से सांप का विष या जहर। अगर सांप किसी को डंस ले तो उस व्यक्ति के प्राणों का संकट खड़ा सकता है। सामन्यत: ये जीव किसी भी स्थान पर कब और कैसे आ जाए कोई नहीं जानता। यदि भूलवश आपने कभी सांप को मारा है या किसी अन्य व्यक्ति के द्वारा मारते हुए देखा है तो इसके कई बुरे परिणाम आपको झेलना पड़ सकते हैं।

शास्त्रों के अनुसार सांप को नाग देवता माना जाता है। नाग का संबंध भगवान शिव से है, भोलेनाथ इस जीव को आभूषण की तरह धारण किए हुए हैं। इसी वजह से नाग को पूजनीय और पवित्र देवता माना गया है। भगवान शंकर के अतिरिक्त सृष्टि के पालनहार भगवान श्रीहरि विष्णु भी शेषनाग की शय्या पर विश्राम करते हैं।

ध्यान रहें सांप कभी भी अनावश्यक रूप से किसी को नहीं डंसता है। जब तक सांप को छेड़ा नहीं जाता वह कुछ नहीं करता लेकिन भूलवश ही यदि उसे छेड़ दिया जाए तो वह खुद के प्राण बचाने के लिए हम पर हमला कर सकता है। कई बार जाने-अनजाने कुछ लोगों से सांप की हत्या हो जाती है। वहीं कुछ लोग अन्य लोगों द्वारा अनावश्यक रूप से सांप को मारते हुए देखते रहते हैं तो यह शास्त्रों के अनुसार पाप की श्रेणी में ही आता है।

वेद-पुराण के अनुसार किसी भी जीव की हत्या करना या देखना पाप ही है। सांप की हत्या करने वाले या सांप को मारते हुए देखने वाले को भी कई प्रकार के कष्ट उठाने पड़ सकते हैं। यदि किसी व्यक्ति के साथ ऐसी घटनाएं हुई हैं तो संभव है कि उसके जीवन में कुछ परेशानियां सामने आती हैं। ज्योतिष में कालसर्प योग बताया गया है, इस योग के बुरे प्रभाव से व्यक्ति को मृत्यु के समान कष्ट भोगने पड़ सकते हैं। ठीक ऐसी ही परेशानियों सांप को अनावश्यक रूप से मारने या उसकी हत्या होते हुए देखने से भी झेलना पड़ सकती है।

यदि भूलवश किसी व्यक्ति के द्वारा ऐसा हो जाता है तो उसे भगवान शिव से क्षमा याचना करते हुए प्रति सोमवार शिवलिंग पर दूध चढ़ाना चाहिए और नाग की मृत्यु से लगे दोष का उचित उपचार करवाना चाहिए।

समझो तब मौत आ गई जब माथे पर चंदन जल्दी ना सूखे, क्योंकि...
शास्त्रों में जीवन का अंतिम और अटल सत्य मृत्यु को ही बताया गया है। किसी भी व्यक्ति के लिए मृत्यु ही अंतिम चरण है। इसके बाद व्यक्ति की आत्मा देह त्याग देती है, आजाद हो जाती है। सभी ये बात जानते है लेकिन फिर भी मौत का डर सदैव बना ही रहता है।

मृत्यु कब और कैसे होगी? यह बता पाना किसी भी इंसान के अधिकार में नहीं है। ज्योतिष के माध्यम से भी केवल संभावनाएं व्यक्त की जा सकती हैं। कई विद्वानों ने ऐसी बातें बताई गई हैं जो मृत्यु के आने सूचना दे देती हैं। इन्हीं बातों में से एक है यदि कोई व्यक्ति मरणासन में है तो उसके माथे पर यदि चंदन लगाया जाए तो वह जल्दी नहीं सूखेगा।

चंदन को बहुत ही पवित्र माना जाता है इसी वजह से सभी प्रकार के पूजन में इसका विशेष स्थान है। जब भी भगवान की आराधना की जाती है तो श्रद्धालु के मस्तक पर इसका तिलक लगाया जाता है। प्राय: चंदन का तिलक लगाने के बाद तुरंत ही सूख जाता है।

कई बार लोगों के साथ ऐसा होता है कि डॉक्टर्स द्वारा किसी व्यक्ति के लिए बोल दिया जाता है कि अब उसका जीवन कुछ ही समय का शेष है। ऐसे में कुछ विद्वानों के अनुसार जब किसी व्यक्ति का मृत्यु का समय निकट आ जाता है तो उसके माथे पर चंदन का तिलक लगाना चाहिए। यदि यह तिलक जल्दी सूख जाता है तब तो समझना चाहिए कि उस व्यक्ति का जीवन अभी शेष है। इसके विपरित यदि वह तिलक जल्दी नहीं सूखता है तो दुर्भाग्यवश विपरित परिणाम प्राप्त हो सकते हैं। यानि व्यक्ति की मृत्यु की संभावनाएं प्रबल हो जाती हैं क्योंकि मृत्यु के समय व्यक्ति के माथे की गर्मी सबसे पहले समाप्त हो जाती है, मस्तक एकदम ठंडा हो जाता है। इस वजह से चंदन जल्दी नहीं सूख पाता। यदि ऐसा होता है तो संबंधित व्यक्ति के स्वास्थ्य के संबंध में पूरी सावधानी बरतनी चाहिए। डॉक्टर्स आदि की सलाह लेकर बीमार व्यक्ति का उचित ध्यान रखें। इसके पश्चात अनहोनी टल सकती है।

बेड को कूड़े का डिब्बा न समझें, ये सामान तुरंत हटा दें क्योंकि...
आजकल काफी लोगों के घरों में यह एक आम बात है कि बेड के अंदर फालतू, खराब सामान रख दिया जाता है। वैसे तो यह एक सामान्य बात है लेकिन शास्त्रों के अनुसार इसके कई बुरे प्रभाव प्राप्त हो सकते हैं।

जो लोग अपने बेड के अंदर पुराने कपड़े, पुराने बिस्तर आदि ऐसे सामान रखते हैं जिनका उपयोग नहीं होता है तो इसके कई अशुभ प्रभाव झेलना पड़ सकते हैं। इसी वजह से बेड के अंदर इस प्रकार के सामान नहीं रखना चाहिए। ऐसा माना जाता है कि फिजूल सामान को बेड में रखने से जो व्यक्ति उस पर सोता है उसे कई प्रकार की बीमारियां होने का खतरा बना रहता है। यदि कोई बीमार व्यक्ति ऐसे बेड पर सोता है तो उसका जल्दी स्वस्थ होना बहुत मुश्किल होता है। इसके अलावा ऐसे लोगों को धन संबंधी परेशानियों का सामना भी करना पड़ता है। वास्तु के अनुसार भी ऐसी स्थिति परेशानियां पैदा करने वाली ही होती हैं। बेड के अंदर फालतू और अनुपयोगी सामान भरने से घर में नकारात्मक ऊर्जा अधिक सक्रिय हो जाती है और सकारात्मक ऊर्जा का प्रभाव कम होता जाता है।

यदि आपने भी अपने बेड के अंदर अनुपयोगी सामान भर रखा है तो उसे तुरंत हटा दें। इन सभी बातों को देखते हुए पुराना बेकार सामान आपके लिए हानिकारक हो सकता है।

घर में बांस से बनी ये चीज रखें, फिर कुछ भी नहीं होगा नेगेटिव क्योंकि...
घर में सुख-समृद्धि बनी रहे इसके लिए सभी कई प्रकार के उपाय करते हैं। कुछ उपाय धर्म से संबंधित होते हैं तो कुछ ज्योतिष के और कुछ वास्तु से संबंधित। इन सभी उपायों को अपनाने से संभवत: घर से नेगेटिव ऊर्जा दूर हो जाती है। यदि आपके घर में कुछ नेगेटिव हो रहा है तो यह परंपरागत उपाय अपनाएं।

पुराने समय से ही घर में सुख-समृद्धि और धन की पूर्ति बनाए रखने के लिए एक सटीक परंपरागत उपाय अपनाया जाता रहा है। यह उपाय है घर में बांसूरी रखना। जिस घर में बांसूरी रखी होती है वहां के लोगों में परस्पर तो बना रहता है साथ ही श्रीकृष्ण की कृपा से सभी दुख और पैसों की तंगी भी दूर हो जाती है।

शास्त्रों के अनुसार बांसूरी भगवान श्रीकृष्ण को अतिप्रिय है। वे सदा ही इसे अपने साथ ही रखते हैं। इसी वजह से इसे बहुत ही पवित्र और पूजनीय माना जाता है। साथ ही ऐसा माना जाता है कि भगवान श्रीकृष्ण जब भी बांसूरी बजाते तो सभी गोपियां प्रेम वश प्रभु के समक्ष जा पहुंचती थीं। बांसूरी से निकलने वाला स्वर प्रेम बरसाने वाला ही है। इसी वजह से जिस घर में बांसूरी रखी होती है वहां प्रेम और धन की कोई कमी नहीं रहती है।

सामान्यत: घर में बांस की हुई बांसूरी ही रखना चाहिए। वास्तु के अनुसार इस बांसूरी से घर के वातावरण में मौजूद समस्त नेगेटिव एनर्जी समाप्त हो जाती है और सकारात्मक ऊर्जा सक्रिय हो जाती है। परिवार के सदस्यों के विचार सकारात्मक होते हैं जिससे उन्हें सभी कार्यों में सफलता प्राप्त होती है।

इससे बंद हो जाते हैं आपकी किस्मत के दरवाजे, क्योंकि...
कई बार हम पूरी मेहनत के बाद भी असफल हो जाते हैं। कुछ लोगों के घर-परिवार में सब कुछ अच्छा होते हुए भी सुख नहीं मिल पाता ऐसे में संभवत: उस घर में कोई दोष हो सकता है। इस दोष की वजह से ही परिवार को खुशियां प्राप्त नहीं हो पाती है।

कुछ सामान्य सी ऐसी बातें हैं जिन पर ध्यान नहीं दिया जाता लेकिन इनके दुष्परिणाम काफी अधिक रहते हैं। घर में रखी हर वस्तु का प्रभाव हमारे जीवन पर पड़ता है। यदि कोई वस्तु नकारात्मक विचार को अधिक बल प्रदान करने वाली होती है तो उसकी वजह से कार्यों में असफलता मिलती है। इसी वजह से ऐसी वस्तुओं को घर से दूर ही रखना चाहिए।

घर में नेगेटिव ऊर्जा को सक्रिय करने वाली चीजों में बंद ताला भी शामिल है। जिस घर में कोई खराब बंद ताला होता है वहां पॉजीटिव विचारों में कमी आती है। परिवार के सदस्यों को नकारात्मकता का सामना करना पड़ता है। किसी भी कार्य में पहले असफलता ही नजर आती है। आत्मविश्वास की कमी हो जाती है। ऐसा माना जाता है कि बंद ताले से व्यक्ति की किस्मत के दरवाजे भी बंद हो जाते हैं। अत: यदि आपके घर में कोई खराब बंद ताला हो तो उसे तुरंत ही हटा दें। अन्यथा बुरे परिणाम झेलने पड़ सकते हैं।

बिल्ली रोते हुए दिखे तो सावधान हो जाएं, हो सकती है अनहोनी
यदि आप किसी जरूरी कार्य के लिए घर से निकल रहे हैं और उसी समय कोई काली बिल्ली रोते हुए दिख जाए तो सावधान हो जाना चाहिए। शास्त्रों के अनुसार कई प्रकार के शकुन और अपशकुन बताए गए हैं। सभी का महत्व भविष्य से जुड़ा हुआ है।

प्राचीन काल से ही कई छोटी-छोटी घटनाओं को भविष्य में होने वाली घटनाओं से जोड़ कर देखा जाता रहा है। ये सभी घटनाएं इशारा करती हैं कि आने वाले कल में क्या होने वाला है, कैसा रहेगा हमारा आने वाला कल? इस प्रकार के प्रश्नों के उत्तर शकुन और अपशकुन में छिपे हुए रहते हैं। जिन्हें समझने की आवश्यकता होती है।

शास्त्रों में बिल्ली से जुड़े कई अपशुकन बताए गए हैं। सामान्यत: हमारे घर के आसपास काली बिल्ली नहीं दिखाई देती है लेकिन यह बिल्ली आपको रोते हुए दिख जाए तो यह इशारा है कि आपके साथ कुछ गड़बड़ हो सकती है। अत: सावधान हो जाना चाहिए। यदि घर से निकल रहे हों तो कुछ देर घर में रुके, पानी पीएं और फिर कार्य के लिए निकलना चाहिए।

आजकल शकुन-अपशकुन के संबंध में काफी लोगों का मानना है कि ये बातें केवल अंधविश्वास ही है। वहीं पुराने समय में इन सभी बातों का काफी अधिक महत्व माना जाता था। इसी वजह से वे लोग हर कार्य इन बातों का ध्यान रखते हुए करते थे।

क्या आप जानते हैं, छींक से भी क्यों और कैसे जुड़ा है आपका भविष्य?
भविष्य में होने वाली संभावित घटनाओं के संबंध में हमें पहले जानकारी मिल जाए इसलिए कुछ शकुन और अपशकुन बनाए गए हैं। जिससे हमें मालूम हो जाए कि वे घटनाएं शुभ फल देने वाली है या अशुभ।
इन्हीं शकुन-अपशकुन में छींक भी शामिल है। ऐसा माना जाता है कि जब भी किसी शुभ कार्य के लिए जाते समय यदि छींक सुनाई दे तो निकट भविष्य में कुछ बुरा होने वाला है।
घर से निकलते वक्त या कोई नया काम शुरू करते समय छींक सुनाई दे तो इसे शुभ नहीं माना जाता है। इस संबंध में पुराने समय से ही मान्यता है कि ऐसा होने पर हमें कुछ देर रुक जाना चाहिए और पानी पीकर फिर अपने लक्ष्य की ओर आगे बढऩा चाहिए। यह व्यवस्था इसलिए लागू की गई है कि इससे हम कुछ देर रुक जाएं और यदि कुछ बुरा होने वाला हो तो वह समय टल जाए। इसी संभावना के चलते ऐसी परंपरा बनी है कि छींक सुनने के बाद कुछ क्षण रुकें और पानी पीएं। छींक एक संकेत मात्र है किसी अशुभ घटना से बचने के लिए।

कब आती है छींक?
छींक वैसे तो एक सामान्य क्रिया है। इस संबंध विज्ञान यह कहता है कि जब हमारी श्वास लेने की क्रिया में कोई रुकावट आ जाए या नाक में कोई कीटाणु, जीवाणु या कचरा फंस जाए तो हमें छींक आ जाती है। छींक कब आएगी? यह बता पाना संभव नहीं है, यह ऐसी क्रिया है जो कि अचानक घट जाती है। जब छींक आती है तो कुछ क्षण से हमारे शरीर का पूरा सिस्टम प्रभावित हो जाता है। छींक का इतना प्रभाव होता है कि हम छींकते समय आंख खोलकर नहीं रख सकते, आंखें भी बंद हो जाती है।

झूठे हाथों से ऐसा काम करो तो गायब हो जाता है पर्स से पैसा, क्योंकि...

शास्त्रों में कई ऐसे कार्य बताए गए हैं जिन्हें करने पर देवी-देवताओं का क्रोध झेलना पड़ता है। यदि किसी व्यक्ति से भगवान क्रोधित हो जाते हैं तो उसे कई प्रकार की परेशानियों का सामना करना पड़ता है। देवी-देवताओं में धन की देवी महालक्ष्मी का महत्वपूर्ण स्थान है। इनकी कृपा के बिना कोई भी व्यक्ति जीवन में सुख की कल्पना भी नहीं कर सकता है।

महालक्ष्मी के रुठ जाने पर व्यक्ति को पैसों की तंगी झेलना पड़ती है। ऐसे में लाख मेहनत करने के बाद भी उचित धन प्राप्त नहीं हो पाता है। यदि व्यक्ति पहले से ही धनी हो और उससे लक्ष्मीजी रुठ जाए तो उसका समस्त धन भी नष्ट हो सकता है। अत: शास्त्रों द्वारा वर्जित कार्य हमें नहीं करना चाहिए।

महालक्ष्मी को क्रोधित करने वाले कार्यों में प्रमुख है झूठे हाथों से देवी-देवताओं की प्रतिमा या चित्रों को छूना। यदि कोई व्यक्ति कुछ खाने के बाद झूठे हाथों से ही भगवान को स्पर्श करता है तो उसे देवी-देवताओं का कोप सहना पड़ता है। घर की बरकत चली जाती है। कड़ी मेहनत के बाद भी व्यक्ति के पास पैसा नहीं आता। इसके अलावा पर्स में रखा पैसा भी अनावश्यक कार्यों में तुरंत ही खर्च होने लगता। अत: इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि किसी भी परिस्थिति में झूठे हाथों से भगवान को स्पर्श न करें। भगवान के सामने जाने से पहले पूरी तरह पवित्र होकर ही जाना चाहिए। प्रसाद ग्रहण करने के बाद तुरंत हाथ धो लेना चाहिए।

घर की छत पर ये चीजें हो तो बढ़ती है गरीबी, क्योंकि...
अक्सर घर के अंदर और बाहर की साफ-सफाई पर तो ध्यान दिया जाता है लेकिन छत पर गंदगी पड़ी रहती है। वास्तु के अनुसार घर की छत पर पड़ी गंदगी का भी पैसों की तंगी को बढ़ा सकती है। परिवार की बरकत पर बुरा प्रभाव पड़ता है।

यह जरूरी है कि घर की साफ-सफाई अंदर और बाहर अच्छी तरह से ही की जाना चाहिए। ऐसा माना जाता है कि यदि घर की छत पर फालतू सामान, गंदगी पड़ी रहती है तो इसके दुष्प्रभाव परिवार की आर्थिक स्थिति पर पड़ते हैं। इसके साथ ही स्वास्थ्य की दृष्टि से भी हानिकारक ही है। किसी भी प्रकार की गंदगी का हमारे जीवन पर काफी गहरा प्रभाव पड़ता है।

जिन लोगों के घरों की छत पर ऐसे अनुपयोगी सामान रखे होते हैं वहां नकारात्मक शक्तियां अधिक सक्रिय रहती हैं। उस घर में रहने वाले लोगों के विचार नेगेटिव अधिक रहते हैं। वे किसी भी कार्य में सकारात्मक रूप से सोच भी नहीं पाते हैं। इसी वजह से कार्यों में सफलता और तनाव मिलता है। परिवार में भी मन-मुटाव की स्थितियां निर्मित होती हैं।

शास्त्रों के अनुसार धन की देवी महालक्ष्मी का वास ऐसे ही घरों में होता है जहां पूरी तरह से साफ-सफाई और स्वच्छता बनी रहती है। जहां गंदगी होती है वहां से लक्ष्मी चली जाती है और दरिद्रता का वास हो जाता है।

ऐसा बल्ब घर में रखने से बढ़ती है पैसों की तंगी, क्योंकि...
अक्सर घर में कई ऐसे सामान होते हैं जिनका कोई उपयोग नहीं होता है या जो खराब हो जाते हैं। ऐसे सामानों को घर में नहीं रखना चाहिए। इस प्रकार की छोटी-छोटी चीजों का हमारे जीवन पर गहरा प्रभाव पड़ता है। यहां तक कि यदि घर में फ्यूज बल्ब या खराब ट्यूब लाइट रखी जाती है तो इससे भी अशुभ प्रभाव प्राप्त होते हैं।

शास्त्रों के अनुसार घर को पूरी तरह स्वच्छ और साफ रखना चाहिए। किसी भी प्रकार से घर में फैली अशुद्धता पैसों से जुड़ी परेशानियों को जन्म दे सकती है। वास्तु के अनुसार घर में रखी हर वस्तु का अपना अलग प्रभाव होता है। यह सकारात्मक और नकारात्मक ऊर्जा के सिद्धांत पर कार्य करता है। अत: घर में रखी खराब चीजों से नकारात्मक ऊर्जा को अधिक बल प्राप्त होता है और सकारात्मकता समाप्त होती है।

यदि घर के वातावरण में नकारात्मक प्रभाव अधिक रहेगा तो परिवार के सदस्यों के विचार भी इसी प्रकार के हो जाते हैं। जिससे अन्य कार्यों में मन नहीं लगता है। मानसिक तनाव बना रहता है। घर में रखा फ्यूज बल्ब भी वातावरण को नकारात्मक बनाता है। अत: इस प्रकार के बल्ब को भी घर में नहीं रखना चाहिए, तुरंत हटा देना चाहिए। नकारात्मक बढऩे से घर की आर्थिक स्थिति पर भी विपरित प्रभाव पड़ते हैं।

जब आपकी हथेली में खुजली चले तो अचानक मिलेगा पैसा, क्योंकि...
पैसा या धन की आवश्यकता सभी को हमेशा से ही रही है। अधिक से अधिक पैसा कमाने के लिए कई प्रकार के जतन करते हैं। कड़ी मेहनत के बाद जब भी आपको उम्मीद से अधिक धन प्राप्त होने वाला होता है तो कुछ शुभ शकुन होते हैं।

शास्त्रों के अनुसार कई प्रकार के शकुन और अपशकुन बताए गए हैं। जिनका हमारे भविष्य से गहरा संबंध होता है। किसी भी शुभ या अशुभ कार्य से पहले कुछ घटनाएं होती हैं। इन छोटी-छोटी घटनाओं को समझने के बाद हम समझ सकते हैं कि निकट भविष्य में कैसा समय आने वाला है। इसी प्रकार के शुभ शकुन में से एक है दाएं हाथ की हथेली में खुजली चलना।

यदि किसी व्यक्ति के हाथ की हथेली में खुजली चलती है तो ऐसा माना जाता है कि व्यक्ति अचानक ही ज्यादा पैसा प्राप्त होने वाला है। इस प्रकार की खुजली अचानक से ही चलती है। यदि किसी व्यक्ति को बिना किसी बीमारी या एलर्जी के ऐसी खुजली चलती है तो इसे शुभ शकुन माना जाता है।

शकुन-अपशकुन को लेकर सभी लोगों के विचार अलग-अलग होते हैं। कुछ लोग इन्हें अंधविश्वास मानते हैं तो कुछ लोग इन्हें भविष्य से जोड़ कर देखते हैं।

घर से निकलते ही ये लोग दिख जाए तो समझ लें, चमक जाएगी आपकी किस्मत
हिंदू धर्म शास्त्रों में कई ऐसे संकेत बनाए गए हैं जिनसे आप अंदाजा लगा सकते हैं कि आपको मनोवांछित कार्य में सफलता मिलेगी या नहीं। इन संकेतों को शकुन-अपशकुन कहा जाता है।

शास्त्रों के अनुसार आप जब भी किसी खास कार्य के लिए जा रहे होते हैं ठीक उसी समय कई प्रकार की घटनाएं घटती हैं। इन पर ध्यान दिया जाना चाहिए। छोटी-छोटी शुभ-अशुभ घटनाएं ही शकुन या अपशकुन होती हैं। हालांकि काफी लोग इन बातों को कोरा अंधविश्वास ही मानते हैं लेकिन कई लोग इन बातों पर विश्वास भी करते हैं।

यदि आप काफी खास कार्य के लिए जा रहे हैं तो घर से निकलते ही आपको कोई ब्राह्मण दिख जाए तो समझना चाहिए कि आप कार्य बिना किसी परेशानी के सफल हो जाएगा। ब्राह्मण परंपरागत वेशभूषा में होना चाहिए।

कहीं जाते समय किसी पतिव्रता सुहागन स्त्री को लाल साड़ी में देखना भी काफी शुभ माना जाता है। इसका भी यही संकेत है आपके कार्य सफल होंगे और दिन अच्छा बितेगा।

घर से निकलते ही कोई सफाईकर्मी दिख जाए तो समझो आपका दिन बहुत अच्छा बितेगा और धन, ऐश्वर्य, मान-सम्मान भी मिलेगा।

पैर पर पैर रखकर नहीं बैठना चाहिए क्योंकि...
हमारे स्वभाव, हाव-भाव और व्यवहार में क्या-क्या होना चाहिए और क्या नहीं होना चाहिए? इस संबंध में शास्त्रों में कई महत्वपूर्ण बातें बताई गई हैं। इन परंपराओं का निर्वहन आज भी बड़ी संख्या में लोगों द्वारा किया जाता है।

जब भी कोई व्यक्ति घर में पैर पर पैर रखकर बैठते हैं तो अक्सर जानकार वृद्धजनों द्वारा ऐसा नहीं करने की सलाह दी जाती है। पुराने समय से ही कई ऐसी बातें चली आ रही हैं जिनका संबंध हमारे जीवन में प्राप्त होने वाले सुख और दुख से जुड़ा हुआ है। ऐसा माना जाता है कि पैर पर पैर रखकर बैठने से स्वास्थ्य को नुकसान होता है साथ ही इसे धर्म की दृष्टि से भी अशुभ समझा जाता है।

यदि किसी पूजन कार्य में या शाम के समय पैर पर पैर रखकर बैठते हैं तो महालक्ष्मी की कृपा प्राप्त नहीं होती है। धन संबंधी कार्यों में विलंब होता है। पैसों की तंगी बढ़ती है। शास्त्रों के अनुसार शाम के समय धन की देवी महालक्ष्मी पृथ्वी भ्रमण पर रहती हैं ऐसे में यदि कोई व्यक्ति पैर पर पैर रखकर बैठा रहता है तो देवी उससे नाराज हो जाती हैं। लक्ष्मी की नाराजगी के बाद धन से जुड़ी परेशानियां झेलना पड़ती हैं। अत: बैठते समय ये बात ध्यान रखें। पैर पर पैर रखकर न बैठें।

पूजा में शिवलिंग पर ये 6 चीजें जरुर चढ़ाएं, क्योंकि...
भगवान शिव को जलधाराप्रिय माना जाता है। इसीलिए शास्त्रों में बताया गया है कि जल व पंचामृतधारा से शिवजी का अभिषेक करने से शिवजी की कृपा प्राप्त होती है। अभिषेक करते समय ऋग्वेद, यजुर्वेद और सामवेद में दिये गए मंत्र बोले जाते हैं। रूद्राष्टाध्यायी मंत्रों का भी उल्लेख मिलता है।

जल में दूध मिला कर अथवा केवल दूध से भी अभिषेक किया जाता है। विशेष पूजा में दूध, दही, घृत, शहद और चीनी से अलग-अलग अथवा सब को मिला कर पंचामृत से भी अभिषेक किया जाता है। लेकिन हर धारा से अभिषेक का विशेष फल प्राप्त होता है। इसीलिए अलग-अलग वस्तुओं की धारा से शिवजी का अभिषेक किया जाता है।

कहते हैं भगवान शिव को दूध की धारा से अभिषेक करने से मूर्ख भी बुद्धिमान हो जाता है, घर की कलह शांत होती है।

जल की धारा: जल की धारा से अभिषेक करने से विभिन्न कामनाओं की पूर्ति होती है।

घृत घी की धारा से अभिषेक करने से वंश का विस्तार, रोगों का नाश तथा नपुंसकता दूर होती है।

इत्र की धारा से भोग की वृद्धि होती है।

शहद से टी बी रोग का नाश होता है।

ईख से आनंद की प्राप्ति होती है।

गंगाजल से भोग एवं मोक्ष की प्राप्ति होती है। इसीलिए माना जाता है कि सावन में सारे सुखों की प्राप्ति के लिए इन छ: चीजों से शिवजी का अभिषेक जरूर करना चाहिए।
इस तिथि पर ऐसे नहाने से पितर देवता देते स्थाई धन, क्योंकि...
सभी प्रकार के सुखों को प्राप्त करने के लिए सभी देवी-देवताओं की कृपा जरूरी है। भगवान की कृपा से पहले हमें हमारे पितरों को भी प्रसन्न चाहिए। शास्त्रों के अनुसार पितर अप्रसन्न हैं तो देवी-देवता भी हमारी पूजा स्वीकार नहीं करते हैं।

ऐसा माना जाता है कि सोमवार 21 नवंबर को पितरों को प्रसन्न करने का श्रेष्ठ दिन है। इस दिन शास्त्रों के अनुसार बताई गई विधि से स्नान करें। इस विधि से नहाने से आपको पितरों की कृपा प्राप्त होगी और पैसों से जुड़ी सभी समस्याएं समाप्त हो जाएंगी।

सोमवार को पितरों के श्राद्ध हेतु श्रेष्ठ दिन है। आप ब्रह्म मुहूर्त में उठें। उठने के बाद नित्य कर्मों से निवृत्त हो जाएं और नहाने के लिए किसी पवित्र नदी, तालाब पर जा सकते हैं। नदी में नाभि तक पानी उतरें। यहां दक्षिण की ओर मुख करके खड़े हो जाएं। अब दोनों हाथों में जल भरकर वापस नदी में छोड़ दें। इसके साथ ही प्रार्थना करें कि यह जल हमारे पितरों को प्राप्त हो। इस प्रकार यह जल पितरों को प्राप्त हो जाएगा और वे तृप्त हो जाएंगे। यदि आपके घर के आसपास कोई नदी या तालाब नहीं है तो यह उपाय घर में भी किया जा जा सकता है। इसके लिए किसी बड़े बर्तन का उपयोग किया जा सकता है। शेष प्रक्रिया पूर्ववत ही रहेगी।
मोटापा कम करने के लिए पहनते हैं ये अंगूठी, क्योंकि...
आज के समय में सर्वाधिक लोगों की समस्या है मोटापा। असंतुलित खान-पान और अनियमित दिनचर्या के चलते अत्यधिक वजन बढऩे की शिकायत आम बात हो गई है। समय पर ध्यान न दिया जाए तो यह बीमारी काफी बढ़ जाती है। तब इससे मुक्ति पाना बहुत मुश्किल हो जाता है।

कई लोग मोटापे से मुक्ति के लिए डॉक्टर्स आदि के क्लिनिक में चक्कर लगाने के बाद भी सकारात्मक परिणाम प्राप्त नहीं कर पाते हैं। इस समस्या से निजात पाने का ज्योतिष में सटीक और कारगर उपाय बताया जाता है। ज्योतिष के अनुसार मोटापे की समस्या ग्रह दोष से भी संबंधित होती है।

जो व्यक्ति मोटापे से मुक्ति चाहता है उसे अनामिका अंगुली (रिंग फिंगर) में रांगे की अंगूठी पहनें। अंगूठी पहनने के लिए सर्वश्रेष्ठ दिन रविवार है। किसी भी रविवार के दिन थोड़ा सा काला धागा अपनी अनामिका अंगुली पर लपेट लें। इसके बाद रांगे की धातु से बनी अंगूठी को पहन लें। अंगूठी इस प्रकार पहनें कि वह काला धागा दिखाई न दें।

यह प्रयोग काफी कारगर है। इस प्रकार रांगे की अंगूठी पहनने के साथ मोटापे की समस्या से जल्दी ही मुक्ति मिलेगी। इसके साथ ही डॉक्टर्स आदि द्वारा बताई गई टिप्स का भी पालन करें। अपनी दिनचर्या नियमित करें और खान-पान में विशेष ध्यान रखें। अत्यधिक वसा वाली खाना ना खाएं। व्यायाम करें। जल्द ही मोटापे निजात मिलेगी।

ऐसे मरने वालों के लिए कोई पूजा नहीं होती, क्योंकि...
जीवन का अंतिल अटल सत्य है मौत। जिस व्यक्ति ने जन्म लिया है उसे एक अवश्य ही मृत्यु को प्राप्त होना है। शास्त्रों में बताया गया है हर व्यक्ति का मृत्यु का समय पूर्व निश्चित है। इसके साथ ही यह पहले से ही निर्धारित है कि कौन व्यक्ति किस प्रकार मृत्यु को प्राप्त होगा।

वेद-पुराण के अनुसार सब कुछ पूर्व निश्चित है लेकिन व्यक्ति के कर्म से ही प्रारब्ध बनता है। कर्म जैसे होंगे वैसा ही भाग्य बनेगा। इसी वजह से यदि कोई व्यक्ति परमात्मा के दिए जीवन दान का गलत उपयोग करता है तो निश्चित ही इसके बुरे फल प्राप्त होते हैं। यदि कोई व्यक्ति किसी भी कारण से आत्महत्या जैसा पाप करता है तो शास्त्रों में ऐसे लोगों के लिए किसी भी प्रकार का श्राद्ध कर्म वर्जित बताया गया है।

विष्णुस्मृति के अनुसार जो व्यक्ति अग्रि, जल, विष से मृत्यु को प्राप्त होता है या किसी भी कारण से आत्महत्या करता है तो उसके लिए अशौच एवं श्राद्ध-तर्पण का विधान नही है। यदि इस प्रकार मृत लोगों के लिए श्राद्ध-तर्पण या अन्य सात्विक पूजन किया जाता है तो इसका पुण्य उनको मिलता नहीं है। इन्हीं कारणों से आत्महत्या जैसे कृत्य को घोर पाप की श्रेणी में रखा गया है। किसी भी परिस्थिति में इस ओर कदम नहीं बढ़ाना चाहिए।

शनिवार को जूते चोरी हो जाना क्यों माना जाता है शुभ?
ऐसे तो चोरी होना आपके धन की हानि दर्शाता है लेकिन कई बार चोरी को शुभ भी माना जाता है। खासतौर पर अगर शनिवार को चमड़े के जूते चोरी हो जाएं तो उसे बहुत शुभ माना जाता है। कई लोग शनि मंदिरों में जूते छोड़ भी देते हैं, इसे शुभ माना जाता है। आखिर शनिवार को जूते चोरी हो जाने से क्या लाभ होता है? क्यों ऐसा माना जाता है कि चमड़े के जूते चोरी हो जाएं तो सारी परेशानी उसके साथ चली जाती हैं?

वास्तव में यह मान्यता ज्योतिषीय आधार पर प्रचलित है। ज्योतिष शास्त्र में शनि को क्रूर और कठोर न्यायप्रिय ग्रह माना गया है। शनि जब किसी के विपरित होता है तो उस व्यक्ति को जी-तोड़ मेहनत के बाद भी फल थोड़ा ही मिलता है। जिसकी कुंडली में साढ़े साती, ढैया हो, या जिसकी राशि में शनि अच्छे स्थान पर न हो, उसे यह खास परेशानी होती है। शनिवार शनि का दिन माना जाता है। हमारे शरीर के अंग भी ग्रहों से प्रभावित होते हैं। त्वचा (चमड़ी) और पैर में शनि का वास माना जाता है, इनसे संबंधित चीजें शनि के लिए दान की जाती हैं और इनकी बीमारियां भी शनि से संबंधित होती हैं।

चमड़ा और पैर दोनों ही शनि से प्रभावित होते हैं, इस कारण चमड़े के जूते अगर शनिवार को चोरी हो जाएं तो मानना चाहिए कि हमारी परेशानी कम होने जा रही हैं। शनि अब ज्यादा परेशान नहीं करेगा। कई लोग इसी कारण से शनिवार को शनि मंदिरों में जूते भी छोड़कर आते हैं ताकि शनि उनके कष्ट कम कर दें।

घर के मंदिर में भगवान की कितनी मूर्तियां रखनी चाहिए?
हमारे जीवन की हर एक समस्या का निवारण मात्र भगवान की प्रार्थना से ही संभव है। कर्मों के साथ ही भगवान की कृपा प्राप्त होने पर मुश्किल कार्य भी आसानी से पूर्ण हो जाता है। सुख-शांति बनी रहे इसके लिए सभी के घरों में भगवान का एक मंदिर अवश्य ही रहता है। घर के मंदिर में कौन से भगवान की कितनी प्रतिमाएं रखनी चाहिए? इस संबंध में शास्त्रों में आवश्यक निर्देश दिए गए हैं।

सभी के घरों में भगवान के लिए भी यथाशक्ति अलग घर या मंदिर अवश्य होता है। मंदिर में अपने इष्ट देव की मूर्ति, तस्वीर, पूजा का अन्य सामान रखा जाता है। भगवान की मूर्तियों की संख्या के संबंध में ये विशेष बातें शास्त्रों में बताई गई हैं-

- घर के मंदिर में श्रीगणेश की 3 प्रतिमाएं नहीं होना चाहिए। गणपति की मूर्ति होना जरूरी है लेकिन इनकी मूर्तियों की संख्या 3 नहीं होना चाहिए। गणेशजी की मूर्तियों की संख्या 3 अशुभ मानी जाती है।

- मंदिर में दो शिवलिंग नहीं होना चाहिए तथा शिवलिंग अंगूठे के आकार का होना चाहिए। घर के मंदिर में एक ही शिवलिंग रखना श्रेष्ठ फल देता है। एक से अधिक शिवलिंग रखना शास्त्रों के अनुसार वर्जित है।

- किसी भी देवी या माताजी की 3 प्रतिमाएं नहीं रखें। इनकी संख्या भी 3 नहीं होना चाहिए।

ठंड के दिनों में ये चार काम नहीं करना चाहिए, क्योंकि...
साल में तीन ऋतुएं प्रमुख मानी गई हैं। वर्षा ऋतु, ग्रीष्म ऋतु और शीत ऋतु। इन तीनों में ऋतुओं में से शीत ऋतु स्वास्थ्य की दृष्टि की काफी महत्वपूर्ण है। ठंड के दिनों स्वास्थ्य संबंधी नियमों का पालन किया जाए तो वर्षभर व्यक्ति स्फूर्तिवान और ऊर्जावान बने रह सकता है।

इसी वजह से इन दिनों कुछ ऐसे कार्य बताए गए हैं जो हमें नहीं करना चाहिए। किसी भी व्यक्ति को पूर्ण रूप से स्वस्थ रहने के लिए ठंड के दिनों में जल्दी सो जाना चाहिए। इस समय में देर रात तक जागने से सेहत पर बुरा प्रभाव पड़ता है। अत: देर रात नहीं जागना चाहिए।

जल्दी सोने के बाद सुबह जल्दी उठ भी जाना चाहिए। सूर्योदय के बाद उठने से दिनभर आलस्य बने रहता है। यदि सुबह जल्दी उठने की आदत रहेगी तो आपके जीवन से आलस्य हट जाएगा। हमेशा तरोताजा दिखाई देंगे। काफी लोगों को आदत होती है कि वे दिन में भी सोते हैं।

शीत ऋतु में दिन के समय सोना वर्जित किया गया है। इससे आलस्य में बढ़ोतरी होती है साथ ही यह स्वास्थ्य के लिए भी अच्छा नहीं है। दिन में सोने से मोटापे की समस्या हो सकती है।

ऐसा माना जाता है कि शीत ऋतु में स्वास्थ्य पर सही ध्यान दिया जाए तो पूरे सालभर पर उसका अच्छा प्रभाव दिखाई देता है। इसी वजह से ठंड के दिनों सेहत बनाने पर अधिक जोर दिया जाता है।

घर का ऐसा दरवाजा बिगाड़ सकता है आपकी किस्मत, क्योंकि...
हमारे घर का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा होते हैं दरवाजे। क्या आप जानते हैं दरवाजे किस्मत चमका भी सकते हैं और बिगाड़ भी सकते हैं। जी हां किसी भी घर के लिए यह जरूरी है कि दरवाजे किसी भी प्रकार से टूटे हुए नहीं होना चाहिए।

घर के दरवाजे सुंदर और आकर्षक होने चाहिए। इसके पीछे धार्मिक और वैज्ञानिक दोनों की कारण मौजूद हैं। दरवाजे ही हमारे घर की वास्तविक स्थिति बता देते हैं। यदि किसी व्यक्ति के घर के दरवाजे टूटे हुए हैं तो अधिकांश परिस्थितियों में ऐसा होता है कि उस घर की आर्थिक स्थिति सही नहीं रहती है। टूटे दरवाजे नकारात्मक ऊर्जा को अधिक सक्रिय कर देते हैं और सकारात्मक ऊर्जा का प्रवाह रोक देते हैं। ऐसे घर में रहने वाले लोगों के विचार भी नेगेटिव ही रहते हैं।

ऐसे दरवाजे की वजह से किसी भी कार्य को करने से पहले उस कार्य में असफलता का ख्याल पहले हमारे दिमाग में आता है। जिससे आत्मविश्वास में कमी आती है और कार्य बिगडऩे की संभावनाएं बढ़ जाती हैं। वास्तु के अनुसार भी टूटे दरवाजे वास्तु दोष उत्पन्न करते हैं। धर्म के अनुसार देखा जाए तो महालक्ष्मी उसी घर में सदैव निवास करती हैं जिस घर में साफ-सफाई, स्वच्छता के साथ ही सुंदरता भी हो। यदि घर में प्रवेश कराने वाला दरवाजा ही टूटा हुआ होगा तो ऐसे घर में महालक्ष्मी की कृपा की कमी रहती है। इन्हीं कारणों के चलते हमें इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि घर के सभी दरवाजे सुंदर और व्यवस्थित रहें।

मंदिर जाने का समय नहीं मिलता है तो क्या करना चाहिए...
किसी भी समस्या का निराकरण मात्र भगवान के दर्शन से हो जाता है। हर पल बढ़ते मानसिक तनाव को दूर करने के लिए मंदिर से अच्छा अन्य कोई स्थान नहीं है। भगवान के सामने पहुंचकर मन को शांति मिलती है और कुछ देर के लिए व्यक्ति भगवान का ध्यान करता है। इन्हीं शुभ कारणों को देखते हुए मंदिर की इच्छा अधिकांश लोगों की रहती है। आजकल लगभग हर इंसान की व्यस्तता इतनी बढ़ गई है कि वह भगवान के दर्शन के लिए किसी मंदिर तक नहीं जा रहा है। जानिए... इस परिस्थिति में क्या करना चाहिए?

शास्त्रों के अनुसार यदि कोई व्यक्ति मंदिर जाने में असमर्थ है तो उसे घर के मंदिर में ही भगवान की विधिवत पूजा करनी चाहिए। इसके अलावा यदि कहीं भी जाते समय रास्ते में मंदिर का शिखर दिखाई दे तो उसे प्रणाम अवश्य करना चाहिए। इन दो उपाय से भी उतना ही पुण्य प्राप्त होता है जितना किसी मंदिर में जाकर भगवान के दर्शन करने से प्राप्त होता है।

आजकल काफी लोग समय अभाव के कारण मंदिर जाने में असमर्थ हैं। उनके लिए यह उपाय सर्वश्रेष्ठ है। इससे उन पर भगवान की कृपा भी बनी रहेगी और जीवन की परेशानियों से निजात भी मिलेगी। प्रतिदिन घर में ही भगवान की विधिवत पूजा करने से घर का वातावरण भी पवित्र होता है। हमारे आसपास की समस्त नकारात्मक शक्तियां नष्ट हो जाती हैं। मन प्रसन्न रहता है और भगवान के दर्शन से जो सुख प्राप्त होता है उससे दिनभर ऊर्जा बनी रहती है।

जब भी कोई आपके पैर छुए तो जरूर करें ये दो काम, क्योंकि...
हिंदू परंपराओं में से एक परंपरा है सभी उम्र में बड़े लोगों के पैर छुए जाते हैं। इसे बड़े लोगों का सम्मान करना समझा जाता है। जिन लोगों के पैर छुए जाते हैं उनके लिए शास्त्रों में कई नियम भी बनाए हैं। यदि कोई आपके पैर छुता है तो आपको क्या करना चाहिए, जानिए...

उम्र में बड़े लोगों के पैर छुने की परंपरा काफी प्राचीन काल से ही चली आ रही है। इससे आदर-सम्मान और प्रेम के भाव उत्पन्न होते हैं। साथ ही रिश्तों में प्रेम और विश्वास भी बढ़ता है। पैर छुने के पीछे धार्मिक और वैज्ञानिक कारण दोनों ही मौजूद हैं। जब भी कोई आपके पैर छुए तो सामान्यत: आशीर्वाद और शुभकामनाएं तो देना ही चाहिए, साथ भगवान का नाम भी लेना चाहिए।

जब भी कोई आपके पैर छुता है तो इससे आपको दोष भी लगता है। इस दोष से मुक्ति के लिए भगवान का नाम लेना चाहिए। भगवान का नाम लेने से पैर छुने वाले व्यक्ति को भी सकारात्मक परिणाम प्राप्त होते हैं और आपके पुण्यों में बढ़ोतरी होती है। आशीर्वाद देने से पैर छुने वाले व्यक्ति की समस्याएं समाप्त होती है, उम्र बढ़ती है।

किसी बड़े के पैर क्यों छुना चाहिए?
पैर छुना या प्रणाम करना, केवल एक परंपरा या बंधन नहीं है। यह एक विज्ञान है जो हमारे शारीरिक, मानसिक और वैचारिक विकास से जुड़ा है। पैर छुने से केवल बड़ों का आशीर्वाद ही नहीं मिलता बल्कि अनजाने ही कई बातें हमारे अंदर उतर जाती है। पैर छुने का सबसे बड़ा फायदा शारीरिक कसरत होती है, तीन तरह से पैर छुए जाते हैं। पहले झुककर पैर छुना, दूसरा घुटने के बल बैठकर तथा तीसरा साष्टांग प्रणाम। झुककर पैर छुने से कमर और रीढ़ की हड्डी को आराम मिलता है। दूसरी विधि में हमारे सारे जोड़ों को मोड़ा जाता है, जिससे उनमें होने वाले स्ट्रेस से राहत मिलती है, तीसरी विधि में सारे जोड़ थोड़ी देर के लिए तन जाते हैं, इससे भी स्ट्रेस दूर होता है। इसके अलावा झुकने से सिर में रक्त प्रवाह बढ़ता है, जो स्वास्थ्य और आंखों के लिए लाभप्रद होता है। प्रणाम करने का तीसरा सबसे बड़ा फायदा यह है कि इससे हमारा अहंकार कम होता है। किसी के पैर छुना यानी उसके प्रति समर्पण भाव जगाना, जब मन में समर्पण का भाव आता है तो अहंकार स्वत: ही खत्म होता है। इसलिए बड़ों को प्रणाम करने की परंपरा को नियम और संस्कार का रूप दे दिया गया।

किसी के मरने के बाद ये पढ़ना चाहिए, क्योंकि...
हिंदू शास्त्रों के अनुसार जन्म-मृत्यु एक ऐसा चक्र है जो अनवरत चलता रहता है। जीवन के मृत्यु तो आएगी ही। जन्म से मृत्यु तक हमें कई कार्य करने होते हैं। प्राचीन ऋषि-मुनियों और विद्वानों ने कई परंपराएं बनाई गई हैं जिनका पालन करना काफी हद तक अनिवार्य बताया गया है। हमारे जीवन के साथ-साथ मृत्यु के बाद की भी हमसे जुड़ी कुछ परंपराएं होती हैं जिनका पालन हमारे परिवार वालों को करना पड़ता है। इन्हीं परंपराओं में से एक है घर के किसी सदस्य की मृत्यु के बाद गरुड़ पुराण सुनी जाती है। किसी पंडित से से गरुड़ पुराण पढ़वाई जाती है और घर के सभी सदस्य इसका श्रवण करते हैं।

परिवार के किसी भी सदस्य की मृत्यु के बाद घर में गरुड़ पुराण सुनने की प्रथा है। इसका सभी के यहां अनिवार्य रूप पालन किया जाता है। गरुड़ पुराण में जन्म-मृत्यु से जुड़े सभी सवालों के जवाब हैं। जिन्हें जानना सभी के लिए आवश्यक है। इसी वजह से मृत्यु के पश्चात सभी को गरुड़ पुराण का ज्ञान दिया जाता है ताकि सभी जीवित लोग जीवन में अच्छा कार्य करें। सभी जानते हैं कि जो जैसा करता है उसे उसका वैसा ही फल मिलता है। यही बात गरुड़ पुराण में बताई गई है।

ऐसी मान्यता है कि गरुड़ पुराण के श्रवण से मरने वाले व्यक्ति की आत्मा को शांति मिलती है क्योंकि गरुड़ पुराण पगड़ी आदि रस्मों के दिन तक पढ़ी जाती है। शास्त्रों के अनुसार पगड़ी रस्म तक मरने वाले की आत्मा उसी के घर में निवास करती है और वह भी यह पुराण सुनती है। गरुड़ पुराण श्रवण का धार्मिक महत्व यही है कि मृत व्यक्ति की आत्मा को शांति मिले और उसे मोक्ष मिल सके।

गरुड़ पुराण के अनुसार हमारे कर्मों का फल हमें हमारे जीवन में तो मिलता ही है परंतु मरने के बाद भी कार्यों का अच्छा-बुरा फल मिलता है। इसी वजह से इस ज्ञान को प्राप्त करने के लिए घर के किसी सदस्य की मृत्यु के बाद का अवसर निर्धारित किया गया ताकि उस समय हम जन्म-मृत्यु से जुड़े सभी सत्य जान सके और मृत्यु वश बिछडऩे वाले सदस्य का दुख कम हो सके।

लोग ताविज क्यों पहनते हैं?
अक्सर देखने में आता है कि कई लोग गले में काले रंग के धागे में किसी धातु या लाल-काले रंग के कपड़े का टुकड़ा पहनते हैं। यही ताविज कहलाता है। सामान्यत: सभी छोटे बच्चों को तो अनिवार्य रूप से ताविज बांधा जाता है। कई लोग ताविज बांधने को अंधविश्वास मानते हैं परंतु ऐसा नहीं है। इसके स्वास्थ्य संबंधी कई फायदे भी होते हैं।

ताविज बांधने की परंपरा हर धर्म में मानी जाती है। यह अति प्राचीनकालीन प्रथा है। जिसे आज भी अधिकांश लोग मानते हैं। ताविज बांधने से बुरी नजर नहीं लगती है। वहीं कई लोग मंत्रों से सिद्ध किए ताविज धारण करते हैं। मंत्रों की शक्ति से सभी भलीभांति परिचत हैं। किसी सिद्ध संत या महात्मा द्वारा अपनी मंत्र शक्ति से ताविज बनाकर दिए जाते हैं। यह ताविज बीमारियों से निजात पाने के लिए बनवाए जाते हैं।

ताविज में एक काला धागा होता है। इस धागे में किसी कपड़े में या धातु की छोटी सी डिबिया होती है। इस कपड़े या डिबिया में कोई मंत्र लिखा भोज पत्र, भभूती, सिंदूर के साथ कई लोग इसमें तांत्रिक वस्तुएं भी रखते हैं।

मान्यता है कि ताविज के प्रभाव से वातावरण में मौजूद नकारात्मक शक्तियां हमें प्रभावित नहीं कर पाती। साथ ही ताविज का धागा हमें दूसरों की बुरी नजर से बचाता है। ताविज का मंत्र लिखा भोज पत्र या भगवान की भभूति या सिंदूर आदि मंत्रों के बल सिद्ध किए होते हैं जो धारण करने वाले व्यक्ति के लिए शुभ रहते हैं।

गुरुवार को सांई बाबा के दर्शन करना चाहिए, क्योंकि...
सांई बाबा एक ऐसे फकीर हैं जिन्हें हर धर्म के लोग बड़ी श्रद्धा से पूजते हैं। सभी जाति और धर्म इनके प्रति पूर्ण विश्वास रखते हैं। गुरुवार के दिन बड़ी संख्या में सांई भक्त उनके दर्शन के लिए सांई बाबा के मंदिर पहुंचते हैं।

सांई की आराधना किसी भी विशेष मुहूर्त या वार को की जा सकती है परंतु गुरुवार को इनकी पूजा का विशेष महत्व माना गया है। गुरुवार को इनकी आराधना का इतना महत्व क्यों हैं? इस संबंध में यही तथ्य है कि गुरुवार गुरु का दिन माना जाता है। सभी धर्मों में गुरु का खास स्थान माना जाता है, गुरु ही हमें आदर्श जीवन जीने के सूत्र बताता है। गुरु ही सही राह पर चलने की प्रेरणा देता है। साईं बाबा ने हमेशा सभी को आदर्श और उच्च जीवन जीने की प्रेरणा दी है। इसी वजह से इन्हें बड़ी संख्या श्रद्धालु अपना गुरु मानते हैं। साथ ही ऐसा माना जाता है कि इनकी आराधना से जल्द ही हमारी मनोकामनाएं पूर्ण हो जाती है। साईं के मंदिर में सभी धर्मों के लोगों के लिए समभाव रखा जाता है। गुरुवार गुरु का दिन होने की वजह से साईं बाबा को गुरु मानने वाले सभी भक्त इस दिन बाबा के मंदिर जाते हैं।

साईं बाबा के मंत्र सबका मालिक एक यही बताता है कि परमात्मा एक है और वही हम सभी का पालन-पोषण करता है। इसी मंत्र की वजह से वे सर्वधर्म के लोगों के लिए भगवान और गुरु के समान ही हैं।

रात में ऐसी झाडिय़ों के पास नहीं जाना चाहिए, क्योंकि...
वैसे तो पेड़-पौधे हमारे स्वास्थ्य के लिए बहुत लाभकारी हैं लेकिन कुछ ऐसे पौधे या झाडिय़ां हैं जिनके पास रात के समय नहीं जाना चाहिए। कई लोगों के घरों के आसपास या रास्ते में या पार्क में मेहंदी की झाडिय़ां होती हैं। रात के समय इनके पास नहीं जाना चाहिए, इसके पीछे कई कारण हैं।

इस संबंध में बुजुर्ग और कई धार्मिक लोगों का मानना है कि मेहंदी की झाडिय़ों के आसपास नकारात्मक शक्तियां अधिक सक्रीय रहती हैं। नकारात्मक शक्तियां यानि अदृश्य बुरी ताकतें। मेहंदी की झाडिय़ों से निकलने वाली गंध ऐसी नेगेटिव एनर्जी को काफी बढ़ा देती हैं। रात के समय ये काफी अधिक शक्तिशाली हो जाती हैं। कमजोर लोगों पर इसका बुरा प्रभाव बहुत जल्दी पड़ जाता है। इसकी वजह से मानसिक संतुलन बिगड़ सकता है और दूसरी बीमारियां भी हो सकती हैं।

पुराने समय में ऐसा माना जाता था कि मेहंदी की झाडिय़ों के आसपास बुरी आत्माएं रहती हैं जो रात के समय बलशाली होकर हमें नुकसान पहुंचा सकती है। अत: इनसे दूर रहने में ही भलाई है। इन्हीं कारणों के चलते इसे घर में नहीं लगाना चाहिए। इसे अशुभ माना जाता है।

सभी जानते हैं कि रात के समय पेड़-पौधों की श्वसन क्रिया मनुष्य के समान हो जाती है। पेड़ पौधे भी रात के समय ऑक्सीजन ग्रहण करते हैं कार्बन डाई ऑक्साइड छोड़ते हैं। ऐसे में यदि रात के समय झाडिय़ों के आसपास जाते हैं तो वहां कार्बनडाई ऑक्साइड गैस काफी अधिक मात्रा में हो सकती है। जिससे वहां जाने वाले व्यक्ति को सांस ग्रहण करने में परेशानी हो सकती है। यदि हमें पर्याप्त मात्रा में ऑक्सीजन नहीं मिलती है तो यह स्वास्थ्य के लिए हानिकारक ही है। अत: इन्हीं कारणों से रात के समय मेहंदी की झाडिय़ों के आसपास नहीं जाना चाहिए।

हमें कब और क्यों नहीं सोना चाहिए?
अच्छे स्वास्थ्य के लिए जरूरी है पर्याप्त नींद लेना। नींद के समय के संबंध में जरा सी गड़बड़ी के कई बुरे परिणाम झेलना पड़ सकते हैं। नींद के समय को लेकर शास्त्रों में भी कई महत्वपूर्ण बातें बताई गई हैं। इन बातों को परंपराओं से जोड़ा गया है ताकि व्यक्ति को स्वास्थ्य संबंधी परेशानियों का सामना न करना पड़े।

शास्त्रों के अनुसार शाम के समय सोना वर्जित किया गया है। स्वास्थ्य संबंधी कारणों के अलावा शास्त्रों के अनुसार कुछ बातें हैं जिनके आधार पर सोने के लिए यह समय वर्जित किया गया है। ऐसा माना जाता है कि शाम के समय धन की देवी महालक्ष्मी पृथ्वी पर भ्रमण करती हैं और जो लोग उन्हें इस सोते दिखते हैं उस पर वे कृपा नहीं रखती है। ऐसे में लक्ष्मी की कृपा के बिना व्यक्ति को आर्थिक परेशानियों का सामना करना पड़ता है। जीवन स्तर बुरी तरह प्रभावित होता है।

स्वास्थ्य की दृष्टि से भी शाम के समय सोना हानिकारक ही है। इस समय सोने से आलस्य बढ़ता है और अपच की समस्या होती है। शरीर में अत्यधिक फेट बढ़ता है जिससे मोटापा बढऩे का खतरा रहता है। रात के समय नींद ठीक से नहीं आती है जिससे पूरे दिन आलस्य बना रहता है। कार्यों में गति नहीं बन पाती है। मानसिक तनाव बढ़ सकता है। इन्हीं कारणों के चलते शाम के समय सोने के लिए मना किया जाता है।

इस बीमारी में मरीज को जूते क्यों सुंघाते हैं?
कुछ बीमारियां ऐसी हैं जिन्हें पुराने समय में ऊपरी बाधा या भूत या हवा का प्रकोप समझा जाता था। जबकि यह अंधविश्वास का ही एक रूप है। ऐसी बीमारियों में से एक है मिर्गी का दौरा आना।

मिर्गी का दौरा एक ऐसी बीमारी है जिसमें रोगी का मस्तिष्क नियंत्रण से लगभग बाहर हो जाता है, उसे कुछ होश नहीं रहता, मुंह से सफेद झाग निकलने लगते हैं। जब यह दौरा आता है तो व्यक्ति का दिमाग संतुलन से बाहर हो जाता है जिससे शरीर लडख़ड़ाने लगता है। हाथ-पैर झटके खाने लगते हैं, रोगी गिर जाता है, बेहोश हो जाता है।

पुराने समय में जब किसी को मिर्गी का दौरा आता था तो उसे जूते सुंघाते थे। तब ऐसा माना जाता था कि यह किसी हवा का प्रकोप है और चमड़े के जूते और पसीने की बदबू से व्यक्ति ऊपरी बाधा के चंगुल से आजाद हो जाता है। इसी सोच की वजह से प्रभावित व्यक्ति को जूते सुंघाए जाते थे। इसे एक टोटके की भांति समझा जाता था। आज भी कई बुजूर्ग ऐसा ही मानते हैं।

आज के युग में मिर्गी के संबंध ऐसा माना जाता है कि यह एक बीमारी है और इसका इलाज दवाइयों से किया जा सकता है। इसके लिए मरीज को जूते नहीं सुंघाना चाहिए। मिर्गी को अपस्मार के नाम से जाना जाता है। स्वास्थ्य संबंधी लापरवाही के चलते यह बीमारी होने की पूरी संभावनाएं रहती हैं।

जब भी किसी को मिर्गी का दौरा आए तो रोगी को जूता नहीं सुंघाएं इससे संक्रमण फैल सकता है। ऐसी परिस्थिति में रोगी को किसी साफ एवं स्वस्थ स्थान पर लेटा देना चाहिए। सिर के नीचे तकिया लगाएं, रोगी के कपड़े ढीले कर दें। यदि मरीज के मुंह से झाग निकल रहे हैं तो उसे साफ करें। सामान्यत: यह दौरा कुछ समय पर स्वत: ठीक हो जाता है लेकिन इसका उचित उपचार किया जाना चाहिए।

लड़कियों की तरह लड़कों को भी छिदवाना चाहिए कान...
शास्त्रों के अनुसार कई संस्कार बताए गए हैं जिनका निर्वहन करना धर्म और स्वास्थ्य के दृष्टिकोण बहुत फायदेमंद रहता है। इन सभी संस्कारों को धर्म से जोड़ा गया है ताकि व्यक्ति धर्म के नाम इनका पालन करता रहे। इन्हीं महत्वपूर्ण संस्कारों में से एक है कर्णछेदन संस्कार।

सामान्यत: केवल लड़कियों के कान छिदवाने की परंपरा है लेकिन प्राचीन काल में लड़कों के भी कान छिदवाए जाते थे। आजकल काफी हद तक लड़कों के कान छिदवाने की परंपरा लगभग बंद ही हो गई है लेकिन कुछ लड़के फैशन के नाम पर जरूर कान छिदवाते हैं। पुराने समय में लड़कियों की तरह लड़कों के भी कान छिदवाते थे और उनके कानों में कुंडल भी पहनाए जाते थे।

इस परंपरा के पीछे स्वास्थ्य संबंधी कारण हैं। कान छिदवाने और कानों में बाली पहनने से मस्तिष्क के दोनों भागों के लिए एक्यूप्रेशर और एक्यूपंचर का काम होता है। दिमाग के कार्य करने की क्षमता बढ़ जाती है। साथ ही कानों में बाली पहनने से कई रोगों से लडऩे की शक्ति भी बढ़ती है।

इन स्वास्थ्य संबंधी कारणों के अतिरिक्त इसके धार्मिक महत्व भी है। मनुष्य जीवन के प्रमुख 16 संस्कारों में कणछेदन संस्कार भी शामिल है। अत: प्राचीन काल में इसका निर्वहन अवश्य किया जाता था।

लड़कियों को बोलते समय ध्यान रखनी चाहिए ये 16 बातें, क्योंकि...
किसी भी परिवार के लिए स्त्री मान-सम्मान और प्रतिष्ठा का प्रतीक होती हैं। इसी वजह से स्त्रियों का विशेष ध्यान रखा जाता है। शास्त्रों के अनुसार प्राचीन काल से ही महिलाओं के लिए कई नियम बनाए गए हैं ताकि घर-परिवार की मान-सम्मान और प्रतिष्ठा सदैव बनी रह सके।

स्त्रियों के संबंध में माना जाता है कि वे बोलती बहुत हैं। अत: शास्त्रों में बताया गया है कि स्त्रियों को बोलते समय इन सोलह बातों का खास ध्यान रखना चाहिए-

1. स्त्रियों को बहुत ज्यादा नहीं बोलना चाहिए।

2. बिल्कुल चुप भी नहीं रहना चाहिए।

3. समय-समय पर बोलना चाहिए।

4. दो लोग यदि बात कर रहे हैं तो उनके बीच में बिना पूछे नहीं बोलना चाहिए।

5. बिना सोचे-विचारे कोई बात नहीं करना चाहिए।

6. बोलने में शीघ्रता नहीं करनी चाहिए।

7. ऊट-पटांग बात नहीं करना चाहिए।

8. उलाहना भरी और मतभेदी बात नहीं करना चाहिए।

9. हमेशा धर्म युक्त और यथार्थ बात करनी चाहिए।

10. दूसरे लोगों को जो बातें बुरी लगती हैं वे बात कभी नहीं बोलना चाहिए।

11. किसी को भी ताना नहीं मारना चाहिए, ना ही व्यंग्य करना चाहिए।

12. अनावश्यक हंसी और दिल्लगी नहीं करना चाहिए।

13. दूसरों की बुराई नहीं करना चाहिए।

14. सच, कोमल, मधुर वाणी रखना चाहिए।

15. अपने मुख से ही स्वयं की प्रशंसा नहीं करना चाहिए।

16. बात करते समय किसी भी प्रकार की जिद नहीं करना चाहिए।

मोक्षदा एकादशी 6 को, पुनर्जन्म से मुक्ति दिलाता है यह व्रत
मार्गशीर्ष (अगहन) मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी को मोक्षदा एकादशी कहते हैं। इस दिन श्रद्धालु व्रत के साथ भगवान दामोदर की पूजा करते हैं। इस बार यह एकादशी 6 दिसंबर, मंगलवार को है।

धर्म ग्रंथों के अनुसार महाभारत के युद्ध के समय जब अर्जुन मोहग्रस्त हो गया था तब भगवान श्रीकृष्ण ने गीता का उपदेश देकर अर्जुन के मोह का निवारण किया था। उस दिन मार्गशीर्ष मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी थी तभी से इस एकादशी को मोक्षदा एकादशी कहा जाता है।

शास्त्रों के अनुसार इस दिन भगवान दामोदर की विधि-विधान से पूजा करने पर मोक्ष की प्राप्ति होती है। मोक्षदा एकादशी पर श्रीकृष्ण द्वारा कहे गए गीता के उपदेश से जिस प्रकार अर्जुन का मोहभंग हुआ था, वैसे ही इस एकादशी के प्रभाव से व्रती को लोभ, मोह, द्वेष और समस्त पापों से छुटकारा मिल जाता है।

पद्म पुराण में ऐसा उल्लेख आया है कि इस एकादशी के व्रत के प्रभाव से जाने-अनजाने में किए गए सभी पाप नष्ट हो जाते हैं, पुनर्जन्म से मुक्ति मिलती है और पितरों को सद्गति मिलती है। माना जाता है कि इस व्रत की केवल कथा सुनने से ही हजारों यज्ञ का फल मिलता है।

रोड पर मिली ऐसी चीजें घर नहीं लाना चाहिए, क्योंकि
अक्सर ऐसा होता है कि कहीं जाते समय रोड पर कोई चीज पड़ी दिखाई देती है। कभी-कभी ये चीजें आपके काम की भी होती हैं। ऐसे में आपका मन होता है कि रोड पर पड़ी उस चीज को उठा लिया जाए। लेकिन ऐसा करने से पहले ध्यान रखें कि यदि वस्तु लौहे की हो तो उस दिन शनिवार नहीं होना चाहिए।

शनिवार के दिन लौहे की वस्तु रोड पर पड़ी दिखाई दे तो उसे घर लेकर नहीं आना चाहिए। शनिवार शनि का दिन है और लौहा शनि से ही संबंधित धातु है। अत: शनिवार के दिन ऐसा लौहा घर लेकर आना अशुभ माना गया है। ऐसा करने पर शनि दोष बढ़ता है।

यदि किसी व्यक्ति की कुंडली में शनि अशुभ फल देने वाला है और वह शनिवार के दिन ऐसे लौहे की वस्तु घर ले आता है तो उसे शनि के कोप का सामना करना पड़ता है। इस दिन शनि से संबंधित वस्तुएं दान करना चाहिए। इससे शनि का दोष शांत होता है। शनि को सबसे क्रूर ग्रह माना जाता है क्योंकि इन्हें न्यायाधीश का पद प्राप्त है। न्यायाशीश होने के कारण ये ही हमें हमारे कर्मों के अनुसार फल प्रदान करते हैं। यदि किसी व्यक्ति ने जाने-अनजाने कोई पाप कर्म किया है तो शनि देव ऐसे कर्मों के लिए दण्ड अवश्य देते हैं।

मुहर्रम सिखाता है उसूलों पर कायम रहना
इस्लाम में रमजान की ही तरह मुहर्रम का महीना भी खुदा की इबादत के लिए बहुत खास माना जाता है। इस्लामी कैलंडर यानी हिजरी संवत में मुहर्रम के महीने से ही साल की शुरुआत होती है। मुस्लिम धर्मावलंबी इस महीने की दस तारीख को हजरत मोहम्मद साहब के नवासे (हजरत फातिमा के बेटे) इमाम हुसैन और उनके साथ शहीद हुए 71 लोगों को कुर्बानी को याद करते हैं।

इमाम हुसैन अपने उसूलों के लिए शहीद हुए थे। मुहर्रम का आयोजन उस शहादत की भावना को जगाए रखने का एक माध्यम है। मुहर्रम नेकी और कुर्बानी का पैगाम देता है। इस्लाम धर्मावलंबी इस महीने में अल्लाह की इबादत में खुद को समर्पित करते हैं। इस महीने में कोई मनोरंजक कार्यक्रम और विवाह आदि भी मुस्लिम समाज में नहीं होते। मोहर्रम इस माह की दस तारीख को मनाया जाता है, क्योंकि यही दिन शहादत का है।

इस्लाम मानने वाले विभिन्न समुदायअलग-अलग तरीकों से इमाम हुसैन की शहादत को याद करते हैं। कुछ समुदायताजियों के माध्यम से उन्हें याद करते हैं और इस दिन एक जुलूस के रूप में इकट्ठे हो कर कर्बला तक जाते हैं। कुछ समुदाय रात भर जाग कर नफ्ली नमाज पढ़ कर अपने दिलों को उनकी याद से रोशन करते हैं।

मुहर्रम: रोजे भी रखते हैं इस पवित्र महीने में
इस्लाम में मुहर्रम का माह खुदा की इबादत व इमाम हुसैन की शहादत की याद करने का है। मुस्लिम धर्मावलंबी इस माह की नौ व दस तारीख को रोजे भी रखते हैं। धार्मिक मान्यता के अनुसार इन दिनों में रोजा रखने से बीते समय के सभी गुनाहों से छुटकारा मिलता है।

इस्लाम के मानने वाले मुहर्रम माह की दस तारीख को शहीदों की याद के रूप में तथा इस्लाम के प्रति अपने समर्पण को दर्शाते हैं और साथ ही यह दुआ भी करते हैं कि रब उन्हें भी नेकी, समर्पण व कुर्बानी के जज्बे से सराबोर रखे। जंग को हराम समझे जाने वाले इस माह को शहरूल्लाह व शहरूल अम्बिया भी कहा जाता है।

फारूक-ए-आजम के दौर से इस माह को हिजरी साल का पहला महीना मुकर्रर किया गया है। इस माह में अल्लाह तआला ने इन्सानियत को वजूद बख्शा है। इस्लामी ग्रंथों के अनुसार चार माह जिलकअदा, जिलहिज्जा, मुहर्रम व रजब को हुरमत वाले महीने कहा जाता है।

जानिए, क्यों निकाले जाते हैं ताजिए
मुहर्रम मुस्लिम कैलेण्डर का पहला महीना है। यह पर्व मूलत: इमाम हुसैन की शहादत की याद में मनाया जाता है। सऊदी अरब में मक्का में कर्बला की घटना की याद में यह पर्व मनाया जाता है जिसमें अल्लाह के देवदूत मोहम्मद साहब की पुत्री फातिमा के दूसरे बेटे इमाम हुसैन का निर्दयतापूर्वक कत्ल कर दिया गया था।

यजीद की सेना के विरुद्ध जंग लड़ते हुए इमाम हुसैन के पिता हजरत अली का संपूर्ण परिवार मौत के घाट उतार दिया गया था और मुहर्रम के दसवे दिन इमाम हुसैन भी इस युद्ध में शहीद हो गए थे। मुहर्रम के दसवें दिन ही मुस्लिम संप्रदाय द्वारा ताजिए निकाले जाते हैं। लकड़ी, बांस व रंग-बिरंगे कागज से सुसज्जित ये ताजिए हजरत इमाम हुसैन के मकबरे के प्रतीक के रूप में माने जाते हैं।

इसी जुलूस में इमाम हुसैन के सैन्य बल के प्रतीकस्वरूप अनेक शस्त्रों के साथ युद्ध की कलाबाजियां दिखाते हुए चलते हैं। मुहर्रम के जुलूस में लोग इमाम हुसैन के प्रति अपनी संवेदना दर्शाने के लिए बाजों पर शोक-धुन बजाते हैं और शोक गीत(मर्शिया) गाते हैं। मुस्लिम संप्रदाय के लोग शोकाकुल होकर विलाप करते हैं और अपनी छाती पीटते हैं। इस प्रकार इमाम हुसैन की शहादत की याद में यह पर्व मनाया जाता है।

क्या आप जानते हैं, कर्बला का पहला शहीद कौन था?
इस्लामी कैलेंडर का पहला महीना मुहर्रम इमाम हुसैन की याद दिलाता है। इमाम हुसैन ने खुदा की राह पर चलते हुए बुराई के खिलाफ कर्बला की लड़ाई लड़ी थी, जिसमें इमाम हुसैन अपने साथियों के साथ शहीद हुए थे। इस लड़ाई की सबसे पहला शहीद था इमाम हुसैन का छ: माह का बेटा अली असगर।

जब याजीदी फौज ने कर्बला की बस्ती के पास बहने वाली फुरात नदी के पानी पर पहरा लगा दिया गया तो इमाम हुसैन के साथियों तथा परिवार का पानी के बिना बुरा हाल हो गया लेकिन नेकी की राह से नहीं हटे। इमाम हुसैन के 6 माह के बेटे अली असगऱ का जब प्यास से बुरा हाल हो गया तब अली असगऱ की मां सय्यदा रबाब ने इमाम से कहा की इसकी तो किसी से कोई दुश्मनी नहीं है शायद इसको पानी मिल जाए। जब इमाम हुसैन बच्चे को लेकर निकले और याजीदी फौज से कहा की कम से कम इसको तो पानी पिला दो।

इसके जवाब में याजीद के फौजी हरमला ने इस 6 माह के बच्चे के गले का निशाना लगा कर ऐसा तीर मारा कि हजऱत अली असगऱ के हलक को चीरता हुआ इमाम हुसैन के बाज़ू में जा लगा। बच्चे ने बाप के हाथ पर तड़प कर अपनी जान दे दी। इमाम हुसैन के काफिले का यह सबसे नन्हा व पहला शहीद था।

10 मुहर्रम को उजड़ गई थी कर्बला की बस्ती
कर्बला का नाम सुनते ही मन खुद-ब-खुद कुर्बानी के ज़ज्बे से भर जाता है। जब से दुनिया का वजूद कायम हुआ है तब से लेकर अब तक न जानें कितनी बस्तियां बनी और उजड़ गई लेकिन कर्बला की बस्ती के बारे में ऐसा कहते हैं कि यह बस्ती सिर्फ 8 दिनों में ही तबाह कर दी गई।

2 मुहर्रम 61 हिजरी में कर्बला में इमाम हुसैन के काफिले को जब याजीदी फौज ने घेर लिया तो हुसैन साहब ने अपने साथियो से यहीं खेमे लगाने को कहा और इस तरह कर्बला की यह बस्ती बसी।

इस बस्ती मे इमाम हुसैन के साथ उनका पूरा परिवार और चाहने वाले थे। बस्ती के पास बहने वाली फुरात नदी के पानी पर भी याजीदी फौज ने पहरा लगा दिया। 7 मुहर्रम को बस्ती में जितना पानी था सब खत्म हो गया। 9 मुहर्रम को याजीदी फौज के कमांडर इब्न साद ने अपनी फौज को हुक्म दिया दुश्मनों पर हमला करने के लिए तैयार हो जाए। उसी रात इमाम हुसैन ने अपने साथियों को इकट्ठा किया। तीन दिन का यह भूखा, प्यासा कुनबा रात भर इबादत करता रहा।

इसी रात (9 मुहर्रम की रात) को इस्लाम में शबे आशूर के नाम से जाना जाता है। दस मुहर्रम की सुबह इमाम हुसैन ने अपने साथियों के साथ नमाज़-ए फज्र अदा किया। इमाम हुसैन की तरफ से सिर्फ 72 ऐसे लोग थे जो मुक़ाबले मे जा सकते थे। यजीद की फौज और इमाम हुसैन के साथियों के बीच युद्ध हुआ जिसमें इमाम हुसैन अपने साथियों के साथ नेकी की राह पर चलते हुए शहीद हो गए। और इस तरह कर्बला की यह बस्ती 10 मुहर्रम को उजड़ गई ।

घर से निकलने से पहले कुछ मीठा जरुर खाना चाहिए, क्योंकि...
कहा जाता है कि किसी भी शुभ कार्य को करने से पहले मुंह मीठा करना चाहिए, कोई मिठाई या दही, शकर खाना चाहिए। यह परंपरा भी पुराने समय से ही चली आ रही है। आज भी कई लोग घर से निकलने के पूर्व कुछ मीठा खाते हैं।

हम जब भी किसी परीक्षा या किसी शुभ कार्य के लिए घर से निकलते हैं तो हमारे बुजुर्ग कुछ मीठा खाकर जाने की बात कहते हैं। आखिर इससे फायदा क्या होता है?

ऐसा माना जाता है मीठा खाकर कुछ भी कार्य करने से हमें सफलता मिलती है। मीठा खाने से हमारा मन शांत रहता है। हमारे विचार भी मिठाई की तरह ही मीठे हो जाते हैं। हमारी वाणी में मिठास आ जाती है। यदि हमारा मन किसी दुखी करने वाली बात में उलझा हुआ है और हम मीठा खा लेते हैं तुरंत ही मन प्रसन्न हो जाता है। मीठा खाने के बाद हम किसी भी कार्य को ज्यादा अच्छे से कर सकते हैं।

साथ ही घर से निकलते समय मीठा खाने से हमारे सभी नकारात्मक विचार समाप्त हो जाते हैं और हमारे अंदर सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है। कुछ लोग दही और शकर खाकर किसी भी शुभ कार्य की शुरूआत करते हैं। दही में खटास होती है और शकर में मिठास। इस खट्टे-मीठे स्वाद से हमारा मन तुरंत ही दूसरे सभी बुरे विचारों से हट जाता है। मीठा खाने से रक्त संचार बढ़ जाता है। एनर्जी मिलती है।

शुभ कार्य के पहले मीठा खाना चाहिए परंतु ज्यादा मीठा स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है।

मंदिर में जब भी बैठे तो ध्यान रखें ये बात, क्योंकि...
वैसे तो हिंदू धर्म के अनुसार ईश्वर कण-कण में विराजमान हैं, हर जीव में परमात्मा निवास करते हैं। ईश्वर की साक्षात् अनुभूति के लिए मंदिर या देवालय बनाए गए हैं। वहीं हमारे घरों में भी भगवान के लिए अलग स्थान रखा जाता है। जहां देवी-देवताओं की प्रतिमाएं या चित्र रखे जाते हैं। जब भी श्रद्धालु कोई मनोकामना लेकर देवालयों में जाते हैं तो वहां कुछ समय बैठते अवश्य है। मंदिर में कैसे बैठना चाहिए इस संबंध में भी विद्वानों द्वारा कुछ बातें बताई गई हैं।

ऐसा माना जाता है कि मंदिरों में ईश्वर साक्षात् रूप में विराजित होते हैं। किसी भी मंदिर में भगवान के होने की अनुभूति प्राप्त की जा सकती है। भगवान की प्रतिमा या उनके चित्र को देखकर हमारा मन शांत हो जाता है और हमें सुख प्राप्त होता है। मंदिर में भगवान का ध्यान लगाने के लिए बैठते समय ध्यान रखना चाहिए कि हमारी पीठ भगवान की ओर न हो। इसे शुभ नहीं माना जाता है। मंदिर में कई दैवीय शक्तियां का वास होता है और वहां सकारात्मक ऊर्जा हमेशा सक्रीय रहती है। यह शक्ति या ऊर्जा देवालय में आने वाले हर व्यक्ति के लिए होती है। यह हम पर ही निर्भर करता है कि हम वह शक्ति कितनी ग्रहण कर पाते हैं। इन सभी शक्तियों का केंद्र भगवान की प्रतिमा ही होती है जहां से यह सभी सकारात्मक ऊर्जा संचारित होती रहती है। ऐसे में यदि हम भगवान की प्रतिमा की ओर पीठ करके बैठ जाते हैं तो यह शक्ति हमें प्राप्त नहीं हो पाती। इस ऊर्जा को ग्रहण करने के लिए हमारा मुख भी भगवान की ओर होना आवश्यक है।

भगवान की ओर पीठ करके नहीं बैठना चाहिए इसका धार्मिक कारण भी है। ईश्वर को पीठ दिखाने का अर्थ है उनका निरादर। भगवान की ओर पीठ करके बैठने से भगवान का अपमान माना जाता है। इसी वजह से ऋषिमुनियों और विद्वानों द्वारा बताया गया है कि हमारा मुख भगवान के सामने होना चाहिए, पीठ नहीं।

इन दो भगवान की पीठ के दर्शन नहीं करना चाहिए, क्योंकि...
हमारे धर्म ग्रंथों में कहा गया है कि देवी-देवताओं के दर्शन मात्र से हमारे सभी पाप अक्षय पुण्य में बदल जाते हैं। फिर भी श्री गणेश और विष्णु की पीठ के दर्शन वर्जित किए गए हैं।

गणेशजी और भगवान विष्णु दोनों ही सभी सुखों को देने वाले माने गए हैं। अपने भक्तों के सभी दुखों को दूर करते हैं और उनकी शत्रुओं से रक्षा करते हैं। इनके नित्य दर्शन से हमारा मन शांत रहता है और सभी कार्य सफल होते हैं।
गणेशजी को रिद्धि-सिद्धि का दाता माना गया है। इनकी पीठ के दर्शन करना वर्जित किया गया है। गणेशजी के शरीर पर जीवन और ब्रह्मांड से जुड़े अंग निवास करते हैं। गणेशजी की सूंड पर धर्म विद्यमान है तो कानों पर ऋचाएं, दाएं हाथ में वर, बाएं हाथ में अन्न, पेट में समृद्धि, नाभी में ब्रह्मांड, आंखों में लक्ष्य, पैरों में सातों लोक और मस्तक में ब्रह्मलोक विद्यमान है। गणेशजी के सामने से दर्शन करने पर उपरोक्त सभी सुख-शांति और समृद्धि प्राप्त हो जाती है। ऐसा माना जाता है इनकी पीठ पर दरिद्रता का निवास होता है। गणेशजी की पीठ के दर्शन करने वाला व्यक्ति यदि बहुत धनवान भी हो तो उसके घर पर दरिद्रता का प्रभाव बढ़ जाता है। इसी वजह से इनकी पीठ नहीं देखना चाहिए। जाने-अनजाने पीठ देख ले तो श्री गणेश से क्षमा याचना कर उनका पूजन करें। तब बुरा प्रभाव नष्ट होगा।

वहीं भगवान विष्णु की पीठ पर अधर्म का वास माना जाता है। शास्त्रों में लिखा है जो व्यक्ति इनकी पीठ के दर्शन करता है उसके पुण्य खत्म होते जाते हैं और धर्म बढ़ता जाता है।
इन्हीं कारणों से श्री गणेश और विष्णु की पीठ के दर्शन नहीं करने चाहिए।

चंद्र ग्रहण के समय खाना नहीं चाहिए, क्योंकि...
हमारे धर्म शास्त्रों में सूर्य व चंद्र ग्रहण के दौरान कई बातों का ध्यान रखने के लिए कहा गया है। ग्रहण के दौरान विशेष तौर पर भोजन करना निषिद्ध माना गया है। 10 दिसंबर 11 को चंद्र ग्रहण होने जा रहा है अत: इस दिन ध्यान रखें ये बात।

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार ग्रहण के दौरान खाद्य वस्तुओं, जल आदि में सुक्ष्म जीवाणु एकत्रित हो जाते हैं जिनसे वह दूषित हो जाते हैं इसीलिए इनमें कुश (एक विशेष प्रकार की घास) डाल दी जाती है ताकि कीटाणु कुश में एकत्रित हो जाएं और उन्हें ग्रहण के बाद फेंका जा सके। कुश के अलावा तुलसी पत्र भी डालने की परंपरा हिंदू धर्म में है। चूंकि ग्रहण से हमारी जीवन शक्ति का ह्रास होता है और तुलसी पत्र में विद्युत शक्ति व प्राण शक्ति सबसे अधिक होती है इसलिए भोजन पर ग्रहण का प्रभाव समाप्त करने के लिए भोजन तथा पेय पदार्थों में तुलसी के पत्र डालते हैं।

शास्त्रों के अनुसार ग्रहण के समय भोजन करने से सुक्ष्म जीव पेट में जाने से रोग होने की संभावना बढ़ जाती है। वैज्ञानिक शोधों से भी यह ज्ञात हुआ है कि ग्रहण काल के दौरान मनुष्य की पाचन शक्ति कमजोर हो जाती है जिसके कारण अपच, अजीर्ण आदि शिकायतें हो सकती हैं। भारतीय धर्म विज्ञानियों का मानना है कि सूर्य व चंद्र ग्रहण लगने के 10 घंटे पूर्व ही उसका कुप्रभाव शुरू हो जाता है, जिसे सूतक काल कहते हैं।

सुंदरकांड का पाठ करना चाहिए, क्योंकि...
अक्सर शुभ अवसरों पर गोस्वामी तुलसीदास द्वारा लिखी गई रामचरितमानस के सुंदरकांड का पाठ करने का महत्व माना गया है। ज्यादा परेशानी हो, कोई काम नहीं बन रहा हो, आत्मविश्वास की कमी हो या कोई और समस्या कई ज्योतिषी और संत भी लोगों को ऐसी स्थिति में सुंदरकांड का पाठ करने की राय देते हैं। आखिर रामचरितमानस के सारे छह कांड छोड़कर केवल सुंदरकांड का ही पाठ क्यों किया जाता है?

वास्तव में रामचरितमानस के सुंदरकांड की कथा सबसे अलग है। संपूर्ण रामचरितमानस भगवान राम के गुणों और उनकी पुरुषार्थ से भरे हैं। सुंदरकांड एकमात्र ऐसा अध्याय है जो भक्त की विजय का कांड है। मनोवैज्ञानिक नजरिए से देखा जाए तो यह आत्मविश्वास और इच्छाशक्ति बढ़ाने वाला कांड है।

हनुमान जो कि जाति से वानर थे, वे समुद्र को लांघकर लंका पहुंच गए और वहां सीता की खोज की। लंका को जलाया और सीता का संदेश लेकर लौट आए। यह एक आम आदमी की जीत का कांड है, जो अपनी इच्छाशक्ति के बल पर इतना बड़ा चमत्कार कर सकता है। इसमें जीवन में सफलता के महत्वपूर्ण सूत्र भी हैं। इसलिए पूरी रामायण में सुंदरकांड को सबसे श्रेष्ठ माना जाता है क्योंकि यह व्यक्ति में आत्मविश्वास बढ़ाता है।

गर्भवती स्त्री को नहीं देखना चाहिए ग्रहण, क्योंकि...
शनिवार, 10 दिसंबर 2011 को साल का आखिरी चंद्र ग्रहण पड़ रहा है। हिंदू धर्म के अनुसार ग्रहण काल के संबंध में कई कार्यों पर पूरी तरह प्रतिबंध लगाया गया है। इन्हीं वर्जित कार्यों में से एक है गर्भवती स्त्रियों द्वारा ग्रहण को देखना।

विद्वानों और विज्ञान के अनुसार किसी भी गर्भवती स्त्री को घर से बाहर न निकलने की सलाह दी जाती है। ग्रहण काल के दौरान चंद्र से निकलने वाली किरणें हम पर बुरा ही प्रभाव भी डालती हैं। इन किरणों से बचना सभी के लिए जरूरी है, खासकर गर्भवती स्त्रियों के लिए। ऐसा माना जाता है यह किरणें गर्भ में पल रहे शिशु के लिए बहुत अधिक खतरनाक हो सकती हैं।

साथ ही तंत्र-मंत्र और टोने-टोटके के जानकारों का ऐसा मानना है कि इस काल में बुरी शक्तियां अत्यधिक बलशाली हो जाती है। यहां बुरी शक्तियां से आशय बुरी आत्माओं से है। यह शक्तियां गर्भ में पल रहे बच्चों के लिए तथा गर्भवती स्त्रियों के लिए भी अशुभ है। स्त्रियों के बाहर निकलने पर यह बुरी आत्माएं उन पर प्रभाव डालने का प्रयास करती हैं। जो कि काफी खतरनाक होता है। इसी वजह से गर्भवती स्त्रियों को ग्रहण काल के दौरान घर के अंदर रहने की सलाह दी जाती है। ग्रहण के समय वातावरण में नकारात्मक ऊर्जा सक्रिय रहती है जो कि कमजोर लोगों पर बुरा प्रभाव डालती है। गर्भवस्था के दौरान स्त्री का शरीर बहुत कमजोर हो जाता है। ऐसे में स्त्रियों इन बुरे प्रभावों से बचने के लिए घर में ही रहना जरूरी है। यदि ग्रहण के दौरान बाहर निकलना भी पड़े तो ध्यान रखें कि किसी भी परिस्थिति में सूर्य को न देखें और पूरी सावधानी रखना चाहिए।

ग्रहण के समय मंदिर क्यों बंद रहते हैं?
ग्रहण काल में मंदिर या सभी देव स्थानों के पट बंद कर दिए जाते हैं। जब तक ग्रहण रहता है मंदिर में किसी भी व्यक्ति को भगवान के दर्शन प्राप्त नहीं होते। ऐसा क्यों होता है कि ग्रहण के पूरे समय तक मंदिर बंद ही रहते हैं?

शास्त्रों के अनुसार ग्रहण को अशुद्ध माना जाता है तथा इस अवधि में पडऩे वाली छाया सभी को अपवित्र कर देती है। हिंदु धर्म में ऐसी मान्यता है कि ग्रहण काल से सूतक लग जाता है और जब तक ग्रहण रहता सूतक समाप्त नहीं होता। इस सूतक में देवी-देवताओं के दर्शन करने पर पाप की बढ़ोतरी होती है और पुण्य घटता है। इसी वजह से इस ग्रहण के समय देवी-देवताओं के दर्शन वर्जित किए गए हैं।

ग्रहण के बाद सभी देवस्थानों का शुद्धिकरण किया जाता है, मंदिरों में अच्छे से साफ-सफाई की जाती है, पूरे मंदिर परिसर को पवित्र किया जाता है, इसके बाद ही मंदिर के पट श्रद्धालुओं के खोले जाते हैं। ग्रहण के बाद मंदिर की ही तरह हमें घर के मंदिर में विराजित भगवान को भी स्नान कराना चाहिए। इसके बाद पूरे घर को गंगा जल से पवित्र करना चाहिए। इससे घर के वातावरण में फैली सभी नकारात्मक ऊर्जा समाप्त हो जाती है। सकारात्मक वातावरण निर्मित होता है।

बेडरुम में भगवान की फोटो नहीं लगाना चाहिए, क्योंकि...
हमारी धार्मिक मान्यताओं में एक यह भी है कि अपने शयनकक्ष यानी बेडरूम में भगवान की कोई प्रतिमा या तस्वीर नहीं लगाई जाती। केवल स्त्री के गर्भवती होने पर बालगोपाल की तस्वीर लगाने की छूट दी गई है। आखिर क्यों भगवान की तस्वीर अपने शयनकक्ष में नहीं लगाई जा सकती है? इन तस्वीरों से ऐसा क्या प्रभाव होता है कि इन्हें लगाने की मनाही की गई है?
वास्तव में यह हमारी मानसिकता को प्रभावित कर सकता है। इस कारण भगवान की तस्वीरों को मंदिर में ही लगाने को कहा गया है, बेडरूम में नहीं। चूंकि बेडरूम हमारी नितांत निजी जिंदगी का हिस्सा है जहां हम हमारे जीवनसाथी के साथ वक्त बिताते हैं। बेडरूम से ही हमारी सेक्स लाइफ भी जुड़ी होती है। अगर यहां भगवान की तस्वीर लगाई जाए तो हमारे मनोभावों में परिवर्तन आने की आशंका रहती है। यह भी संभव है कि हमारे भीतर वैराग्य जैसे भाव जाग जाएं और हम हमारे दाम्पत्य से विमुख हो जाएं। इससे हमारी सेक्स लाइफ भी प्रभावित हो सकती है और गृहस्थी में अशांति उत्पन्न हो सकती है। इस कारण भगवान की तस्वीरों को मंदिर में ही रखने की सलाह दी जाती है।

जब स्त्री गर्भवती होते है तो गर्भ में पल रहे बच्चे में अच्छे संस्कारों के लिए बेडरूम में बाल गोपाल की तस्वीर लगाई जाती है। ताकि उसे देखकर गर्भवती महिला के मन में अच्छे विचार आएं और वह किसी भी दुर्भावना, चिंता या परेशानी से दूर रहे। मां की अच्छी मानसिकता का असर बच्चे के विकास पर पड़ता है।

क्या महिलाओं के लिए जरूरी है घूंघट?
वैसे तो आज के आधुनिक युग में अधिकांश महिलाओं को घूंघट या पर्दा करना पसंद नहीं होता है। लेकिन प्राचीन काल में इस प्रथा का सख्ती से पालन कराया जाता था। आज भी कई गांवों और घरानों में महिलाओं के लिए पर्दा प्रथा लागू है। आखिर महिलाओं को पर्दा में क्यों रखा जाता था? इसके पीछे कई कारण मौजूद हैं।

पर्दा प्रथा को भारतीय परंपरा में अनुशासन और सम्मान की दृष्टि से लिया जाता है। घर की बहुओं को परिवार के बड़ों के आगे घूंघट निकालना होता है, ग्रामीण क्षेत्रों में तो यह अनिवार्य है साथ ही कई महानगरीय परिवारों में भी ऐसा चलन है।

सवाल यह है कि भारतीय परंपरा में घूंघट कब और कैसे आया? क्या सनातन समय से यह परंपरा चली आ रही है या फिर कालांतर में यह प्रचलन बढ़ा है? वास्तव में घूंघट हिंदुस्तान पर आक्रमण करने वाले आक्रमणकारियों की ही देन है। पहले राज्यों में आपसी लड़ाइयां और फिर मुगलों का हमला। इन दो कारणों ने भारत में पूजनीय दर्जा पाने वाले महिला वर्ग को पर्दे के पीछे कर दिया। भारतीय महिलाओं की सुंदरता से प्रभावित आक्रमणकारी अत्याचारी होते जा रहे थे। महिलाओं के साथ बलात्कार और अपहरण की घटनाएं बढऩे लगीं तो महिलाओं की सुंदरता को छिपाने के लिए घूंघट का इजाद हो गया।

पहले यह आक्रमणकारियों से बचने के लिए था, फिर परिवार में बड़ों के सम्मान के लिए और धीरे से इसने अनिवार्यता का रूप धारण कर लिया। आक्रमणकारी चले गए, देश आजाद हो गया लेकिन महिलाओं के चेहरों पर घूंघट रह गया। आज समय के साथ यह प्रथा विलुप्त होती जा रही है। बड़े शहरों में यह प्रथा लगभग बंद ही हो गई है जबकि गांवों में आज भी इसका पालन किया जाता है।

हमें हनुमान चालीसा का पाठ करना चाहिए, क्योंकि...

कलयुग में हनुमानजी की भक्ति सबसे सरल और जल्द ही फल प्रदान करने वाली मानी गई है। श्रीराम के अनन्य भक्त श्री हनुमान अपने भक्तों और धर्म के मार्ग पर चलने वाले लोगों की हर कदम मदद करते हैं। सीता माता के दिए वरदान के प्रभाव से वे अमर हैं और किसी ना किसी रूप में अपने भक्तों के साथ रहते हैं।

हनुमानजी को मनाने के लिए सबसे सरल उपाय है हनुमान चालीसा का नित्य पाठ। हनुमानजी की यह स्तुति का सबसे सरल और सुरीली है। इसके पाठ से भक्त को असीम आनंद की प्राप्ति होती है। तुलसीदास द्वारा रचित हनुमान चालीसा बहुत प्रभावकारी है। इसकी सभी चौपाइयां मंत्र ही हैं। जिनके निरंतर जप से ये सिद्ध हो जाती है और पवनपुत्र हनुमानजी की कृपा प्राप्त हो जाती है।

यदि आप मानसिक अशांति झेल रहे हैं, कार्य की अधिकता से मन अस्थिर बना हुआ है, घर-परिवार की कोई समस्यां सता रही है तो ऐसे में सभी ज्ञानी विद्वानों द्वारा हनुमान चालीसा के पाठ की सलाह दी जाती है। इसके पाठ से चमत्कारिक फल प्राप्त होता है, इसमें को शंका या संदेह नहीं है। यह बात लोगों ने साक्षात् अनुभव की होगी की हनुमान चालीसा के पाठ से मन को शांति और कई समस्याओं के हल स्वत: ही प्राप्त हो जाते हैं। साथ ही हनुमान चालीसा का पाठ करने के लिए कोई विशेष समय निर्धारित नहीं किया गया है। भक्त कभी भी शुद्ध मन से हनुमान चालीसा का पाठ कर सकता है।

बुरी नजर से बचने के लिए घर के बाहर लगाना चाहिए काली मटकी...
कभी-कभी ऐसा होता है कि सबकुछ अच्छा चल रहा होता है और अचानक ही अच्छा समय बुरे समय में बदल जाता है। घर में क्लेश, अशांति और आर्थिक तंगी पैर पसार लेती है। परिवार में कोई सदस्य अचानक बीमार हो जाता है। ज्योतिष के अनुसार इस प्रकार के बुरे प्रभाव बुरी नजर के कारण हो सकते हैं। बुरी नजर से बचने के लिए घर के बाहर काली मटकी लगाई जा सकती है।

वैसे तो सभी को अपना घर सुंदर और अच्छा लगता हैं और इन सुंदर और आकर्षक घर को दूसरों की बुरी नजर भी लग सकती हैं। ऐसे में अधिकांश घरों पर काली मटकी लगी दिखाई देती है। यह मटकी क्यों लगाई जाती है?

काली मटकी लगाने के संबंध में ऐसी मान्यता है कि इसे लगाने से किसी की बुरी नजर आपके घर पर नहीं लगेगी। घर पर बुरी नजर लगने का मतलब घर में कुछ अमंगल हो सकता है, घर के किसी सदस्य के साथ कुछ अनहोनी हो सकती है। वहीं बुरी संभावनाओं से बचने के लिए घरों के बाहर काली मटकी लगाई जाती है।

बुरी नजर या ईष्र्या की भावना के साथ जब कोई आपके घर की ओर देखता है तो उस वक्त यह मटकी उस नजर को, उसके बुरे प्रभाव को अपनी ओर आकर्षित कर लेती है। जिससे आपके घर पर होने वाला बुरा प्रभाव वहीं समाप्त हो जाता है। इस प्रकार घर की ओर बढ़ रहे बुरे प्रभाव स्वत: नष्ट हो जाती हैं।

क्यों और कैसे बर्तन घर में नहीं रखना चाहिए?
आपके घर में बर्तन बता देते हैं कि आप किस स्तर का जीवन यापन कर रहे हैं। इसी वजह से आजकल डिजाइनर बर्तनों का क्रेज बढ़ रहा है। इसी क्रेज के चलते कई घरों में पुराने या टूटे-फूटे बर्तन में संभालकर अलग रख दिए जाते हैं, जो कि अशुभ माना जाता है। इससे घर में दरिद्रता बढ़ती है और कई तरह की हानि उठाना पड़ती है।

हमेशा से ही इस बात पर जोर दिया जाता है कि घरों में टूटे-फूटे बर्तन नहीं रखने चाहिए, ना ही कभी ऐसे बर्तनों में भोजन करना चाहिए। इस संबंध में धार्मिक तथ्य यह है कि ऐसा करने से ईश्वर की कृपा प्राप्त नहीं होती। जो व्यक्ति टूटे-फूटे बर्तनों में भोजन करता है उससे लक्ष्मी रूठ जाती है और उसके घर में दरिद्रता पैर पसार लेती है। ऐसा होने पर कई प्रकार के आर्थिक संकटों का सामना करना पड़ता है।

टूटे-फूटे बर्तनों को वास्तुशास्त्र द्वारा भी अशुभ माना गया है। जिस घर में ऐसे बर्तन रखे जाते हैं वहां वास्तुदोष रहता है। ऐसे में वास्तुदोष दूर करने के लिए बहुत से अन्य उपाय करने के बाद भी यह दोष दूर नहीं होता है। इससे घर में नकारात्मक ऊर्जा सक्रीय हो जाती है। घर से सभी टूटे-फूटे, बेकार बर्तनों को दूर कर देना चाहिए। इससे वास्तु दोष समाप्त होता है और घर में सब अच्छा होने लगता है।

बेकार बर्तन में भोजन करने से हमारे विचार नकारात्मक बनते हैं। जैसे बर्तनों में हम खाना खाते हैं हमारा स्वभाव भी वैसा ही बन जाता है। इसी वजह से अच्छे और साफ बर्तनों में भोजन करें। इससे आपके विचार भी शुद्ध होंगे और सकारात्मक ऊर्जा का शुभ प्रभाव आप पर पड़ेगा।

घर की महिलाओं को एक साथ लाल रंग की ड्रेस नहीं पहनना चाहिए, क्योंकि...
घर-परिवार में सुख और शांति सदैव बनी रहे, इसके लिए परिवार के सदस्यों द्वारा कई प्रकार के प्रयास किए जाते हैं। फिर भी कई घरों में काफी तनाव और मनमुटाव जैसी स्थितियां निर्मित हो जाती हैं। शास्त्रों के अनुसार सामान्य जीवन में अपनाने हेतु कई छोटे-छोटे उपाय बताए गए हैं जिनसे घर-परिवार में महिलाओं के झगड़े समाप्त हो जाते हैं।

आजकल किसी भी परिवार में महिलाओं के बीच आपसी तनाव होना सामान्य सी बात है। परिवारों में सास-बहु के झगड़े, भाभी-ननद की अनबन और अन्य रिश्तों में महिलाओं के झगड़ों की वजह से पुरुषों को भी परेशानियों का सामना करना पड़ता है। ऐसे में विवाद समाप्ति के लिए महिलाओं को समझना जरूरी है। इसके साथ ही इस बात का भी ध्यान रखना चाहिए कि घर की महिलाएं एक साथ एक ही दिन लाल रंग की ड्रेस न पहनें।

सभी जानते है लाल रंग उग्रता को बढ़ाता है। यदि अधिक गुस्से के स्वभाव वाला इंसान लाल रंग का उपयोग अधिक करता है तो उसका स्वभाव और अधिक क्रोध वाला हो जाता है। ऐसे में यदि सभी महिलाएं एक साथ एक समय में लाल रंग की ड्रेस पहनती है तो ऐसी संभावनाएं बनी रहती है कि उनके बीच और अधिक विवाद की स्थितियां निर्मित हो सकती हैं। इन्हीं कारणों के चलते शास्त्रों के अनुसार महिलाओं को एक साथ लाल रंग कपड़े नहीं धारण करना चाहिए। सभी महिलाओं के कपड़ों का रंग एक-दूसरे से भिन्न होगा तो ज्यादा सकारात्मक प्रभाव रहता है। लाल रंग से मिलते-जुलते रंग पहने जा सकते हैं।

हल्के में न लें भूलने की आदत,ये हो सकती है जानलेवा बीमारी का इशारा!
बहुत अधिक वजन बढऩा घटना या बार-बार भूलना ये कुछ ऐसी समस्याएं हैं। जिन्हें लोग सामान्य तरीके से लेते हैं। वजन बढ़ जाता है तो उसे घटाने की कोशिश करने लगते हैं, घटता है तो बढ़ाने की। लेकिन बहुत कम लोग इस बात पर ध्यान देते हैं कि ये किसी तरह की बीमारी के कारण भी हो सकते हैं। ये लक्षण थाइरॉइड के इशारे हो सकते हैं। वैसे तो थाइरॉइड ज्यादातर खानदानी पाया जाता है।

लेकिन आयोडीन की कमी, खान-पान में अव्यवस्थित व्यवस्था, चिंता जैसी वजह भी इस बीमारी का कारण बनती है। थाइरॉइड भी दो तरह की होती है हाइपो और हाइपर। हाइपो में वजन बढऩे लगता है और भूख कम लगती है। हाथ- पांव में सूजन आ जाती है।
मरीज सुस्ती और सर्दी से परेशान रहता है। उसका किसी काम में मन नहीं लगता। कभी-कभी मासिक स्त्राव और याददाश्त में कमी हो सकती है। हाइपोथाइरोडिज्म ऐसी स्थिति है, जब थाइरॉइड हार्मोन का स्त्राव बहुत ही कम मात्रा में होता है। ऐसी स्थिति में शरीर में भोजन की ऊर्जा को रासायनिक प्रक्रिया में बदलने की गति धीमी हो जाती है। आमतौर पर यह बीमारी पकड़ में नहीं आती। इसके लक्षणों को अन्य रूप में लिया जाता है। इसके उल्टे हाइपर में मरीज का वजन कम हो जाता है और भूख ज्यादा लगती है। मानसिक तनाव की शिकायत होती है। एकाग्रता में कमी, धड़कन और बीपी बढऩे की शिकायत हो जाती है।

थाइरॉइड का कार्य मानव शरीर के अंदर इन दोनो हार्मोन्स को सही मात्रा में पहुंचाना है, जिसके घटने या बढने से महिलाओं के अंदर बांझपन और पीरियड्स के बढऩे जैसी दिक्कतें पैदा हो जाती है। इस तरह से हमें पता चलता है कि थाइरॉइड का काम हर्मोन्स को नियत्रंण रखना होता है। थाइरॉइड द्वारा निकलने वाला हार्मोन्स टी-3 और टी-4 घटने या बढऩे वाली क्रिया को थाइरॉइड डिसआर्डर कहते हैं।

इस चमत्कारी पेड़ का पूजते हैं, क्योंकि...
पीपल के वृक्ष को हिंदुओं में देवताओं का निवास स्थान बताया गया है। ब्रह्मा, विष्णु, महेश तीनों देवता पीपल में निवास करते हैं। मृत हिंदू के लिए एक घट पीपल की शाखाओं में बांधा जाता है। सोमवती अमावस्या को सौभाग्यवती स्त्रियां पीपल का पूजन कर अपने पति की लंबी आयु के लिए करती है। महात्मा बुद्ध ने पीपल के नीचे बैठकर ही ज्ञान प्राप्त किया था। इसलिए उसे 'बोधिवृक्ष भी कहा जाता है।

आयुर्वेद में भी पीपल का कई औषधि के रूप में प्रयोग होता है। श्वास, तपेदिक, रक्त-पित्त,विषदाह,भूख बढ़ाने के लिए यह वरदान है। शास्त्रों में भी पीपल को बहुपयोगी माना गया है तथा उसका धार्मिक महत्व बनाकर काटने का निषेध किया गया है।हिंदू और बौद्ध धर्म में इसको सबसे ज्यादा मान्यता प्राप्त है। केवल भारत ही नहीं बल्कि अन्य देशों में भी इसको पवित्र माना जाता है। तिब्बत में 'लालचंड, नेपाल में 'बंगलसिमा, बर्मा में 'स्याम, श्रीलंका में इसका 'शोलबो नाम से पुकारते हैं। बुद्ध जनता इसे 'बोधिवृक्ष कहती है। भगवान श्रीकृष्ण ने गीता में इसे स्वयं अपने ही समान कहा है।

ध्यान रखें ऐसी मूर्तियों की पूजा नहीं करना चाहिए, क्योंकि...
शास्त्रों के अनुसार कण-कण में परमात्मा विद्यमान है। फिर भी भगवान की आराधना में हमारा ध्यान या मन पूरी तरह से लगा रहे इसके लिए मूर्तियों की पूजा की जाती है। मूर्तियों की पूजा के संबंध में एक बात ध्यान रखने योग्य है कि यदि कोई मूर्ति किसी प्रकार से खंडित हो जाए तो उसकी पूजा नहीं करना चाहिए।

ईश्वर की भक्ति में भगवान की मूर्ति का अत्यधिक महत्व है। प्रभु की मूर्ति देखते ही भक्त के मन में श्रद्धा और भक्ति के भाव स्वत: ही उत्पन्न हो जाते हैं। शास्त्रों के अनुसार भगवान की प्रतिमा पूर्ण होना चाहिए कहीं से खंडित होने पर प्रतिमा पूजा योग्य नहीं मानी जाती है। खंडित मूर्ति की पूजा को अपशकुन माना गया है। प्रतिमा की पूजा करते समय भक्त का पूर्ण ध्यान भगवान और उनके स्वरूप की ओर ही होता है। अत: ऐसे में यदि प्रतिमा खंडित होगी तो भक्त का सारा ध्यान उस मूर्ति के उस खंडित हिस्से पर चले जाएगा और वह पूजा में मन नहीं लगा सकेगा। जब पूजा में मन नहीं लगेगा तो व्यक्ति की भगवान की ठीक से भक्ति नहीं कर सकेगा और वह अपने आराध्य देव से दूर होता जाएगा। इसी बात को समझते हुए प्राचीन काल से ही ऋषि-मुनियों ने खंडित मूर्ति की पूजा को अपशकुन बताते हुए उसकी पूजा निष्फल ठहराई गई है।

लक्ष्मी के साथ गणेश और सरस्वती की पूजा भी करना चाहिए...
धन की देवी महालक्ष्मी की पूजा के साथ-साथ श्री गणेश और देवी सरस्वती की भी पूजा करना चाहिए। महालक्ष्मी के आशीर्वाद से भक्त को धन, यश, मान-सम्मान प्राप्त होता है। धन की प्राप्ति के लिए खासतौर पर लक्ष्मी पूजा का महत्व है। मां लक्ष्मी के साथ गणेशजी और सरस्वतीजी की पूजा करने पीछे धार्मिक कारण है।

लक्ष्मी धन की देवी हैं तो श्री गणेश रिद्धि और सिद्धि के देवता हैं। वहीं मां सरस्वति बुद्धि अथवा विद्या की देवी हैं। लक्ष्मी की कृपा मतलब धन की प्राप्ति तभी हो सकती है जब श्रीगणेश और सरस्वति की कृपा भी प्राप्त हो। क्योंकि धन कमाने के लिए बुद्धि की भी आवश्यकता होती है। प्रखर बुद्धि वाले व्यक्ति ही अधिक धन प्राप्त कर सकते हैं। अच्छी विद्या के लिए मां सरस्वति की आराधना की जाती है। इन्हीं के आशीर्वाद से हमें ज्ञान की प्राप्ति होती है और इस ज्ञान से ही सभी सुख-समृद्धि और मान-सम्मान प्राप्त होता है।

श्री गणेश रिद्धि और सिद्धि के देवता माने जाते हैं। इनकी कृपा से ही हर व्यक्ति के घर में बरकत अर्थात् समृद्धि हमेशा बनी रहती है। हमारे जीवन कभी धन अभाव न हो और सभी सुख प्राप्त होते रहे, इसके लिए श्री गणेश की पूजा की जानी चाहिए। इसी वजह से महालक्ष्मी के साथ-साथ श्री गणेश और सरस्वतिजी की पूजा की जाती है।

किस दिन और क्यों तेल घर लेकर नहीं आना चाहिए?
शनिदेव की आराधना का दिन है शनिवार। इस दिन शनिदेव के अशुभ फल को शांत करने एवं शुभ फल को बनाए रखने के लिए विभिन्न पूजन आदि कर्म किए जाते हैं। साथ ही इस दिन के लिए कई नियम भी बनाए गए हैं जिससे शनिदेव का बुरा प्रभाव हम पर न पड़े। इन्हीं नियमों में से एक है कि शनिवार के दिन घर में तेल खरीदकर नहीं लाना चाहिए।

शनि को न्यायधिश माना गया है। इसी वजह से यह काफी कठोर ग्रह है। इसकी क्रूरता से सभी भलीभांति परिचित हैं। इसी वजह से सभी का प्रयत्न रहता है कि शनि देव किसी भी प्रकार से रुष्ट ना हो। शनि गलत कार्य करने वालों को मॉफ नहीं करता। जिसका जैसा कार्य होगा उसे शनि वैसा ही फल प्रदान करता है। ज्योतिष के अनुसार शनि के कोप से बचने के लिए ऐसे कई कार्य मना किए गए हैं जो शनिवार के दिन हमें नहीं करने चाहिए। इन्हीं कार्यों में से एक कार्य यह वर्जित है कि शनिवार को घर में तेल लेकर नहीं आना चाहिए। क्योंकि तेल शनि को अतिप्रिय है और शनिवार को तेल का दान किया जाना चाहिए। इस दिन तेल घर लेकर आने से शनि का बुरा प्रभाव हम पर पड़ता है। यदि घर के किसी सदस्य पर शनि की अशुभ दृष्टि हो तो उसके लिए यह और भी अधिक बुरा फल देने वाला सिद्ध होगा। इन बुरे प्रभावों से बचने के लिए शनिवार के दिन घर में तेल लेकर न आए बल्कि तेल का दान करें और शनि देव को तेल अर्पित करें।

भगवान की आरती ऐसे ही करना चाहिए...
हमारी प्राचीन परंपरा के अनुसार भगवान को प्रसन्न करने के लिए आरती की जाती है और ये आरतियां राग में गाई जाती हैं। आरतियां राग में ही क्यों गाई जाती है? इसके पीछे धार्मिक कारण तो है साथ ही इसका वैज्ञानिक कारण भी है।

आरतियां राग में करने के पीछे धार्मिक कारण यही है कि संगीतमय आरती भगवान को भी प्रसन्न कर देती है। सही संगीत हर स्थिति में मन को सुकून देने वाला ही होता है। हमारे धर्म ग्रंथों में कई प्रसंग ऐसे आते हैं जहां भगवान की प्रार्थना में विभिन्न वाद्ययंत्रों के साथ-साथ उनकी स्तुति को सही सुर में गाया जाता है। ऐसे स्तुति गान से देवी-देवता तुरंत ही प्रसन्न हो जाते हैं। ऐसा माना जाता है।

प्रतिदिन प्रात: काल सही सुर-ताल के साथ आरती करना हमारे स्वास्थ्य के लिए भी लाभदायक है। सही सुर में गायन करने से हमारे शरीर का पूरा सिस्टम प्रभावित होता है। हमें ऊर्जा मिलती है, रक्त संचार बढ़ जाता है। आरती गान को योगा की तरह ही देखा जा सकता है। इससे हमारी आवाज साफ और सुरीली हो जाती है। नियमित आरती करने वाले लोगों की आवाज में अलग ही आकर्षण पैदा हो जाता है। साथ ही गले से संबंधित कई रोग हमेशा दूर ही रहते हैं। इनके अलावा भी कई अन्य स्वास्थ्य संबंधी लाभ हैं। लाभों को देखते हुए ही आरतियां राग में गाने की परंपरा शुरू की गई है।

शाम के समय भी करना चाहिए भगवान की पूजा...
सभी दुखों के निवारण के लिए स्वयं की मेहनत के अतिरिक्त भगवान की भक्ति सर्वश्रेष्ठ मार्ग है। भगवान की पूजा से सभी प्रकार की परेशानियों का निराकरण सहज ही हो जाता है। सामान्यत: काफी लोगों द्वारा सुबह के समय भगवान का विधिवत पूजन किया जाता है लेकिन शास्त्रों के अनुसार शाम के समय भी भगवान की पूजा, आरती की जानी चाहिए।

शाम के समय भगवान की पूजा करना को संध्या पूजन कहते हैं। ग्रंथों में संध्या पूजन का विशेष महत्व बताया गया है। संध्या का शाब्दिक अर्थ संधि का समय है यानि जहां दिन का समापन और रात शुरू होती है, उसे संधिकाल कहा जाता है।

ज्योतिष के अनुसार दिनमान को तीन भागों में बांटा गया है- प्रात:काल, मध्याह्न और सायंकाल। संध्या पूजन के लिए प्रात:काल का समय सूर्योदय से छह घटी तक, मध्याह्न 12 घटी तक तथा सायंकाल 20 घटी तक जाना जाता है। एक घटी में 24 मिनट होते हैं। प्रात:काल में तारों के रहते हुए, मध्याह्न में जब सूर्य मध्य में हो तथा सायं सूर्यास्त के पहले संध्या करना चाहिए।

संध्या पूजन क्यों जरूरी है?
नियमपूर्वक संध्या करने से पापरहित होकर ब्रह्मलोक की प्राप्ति होती है। रात या दिन में जो विकर्म हो जाते हैं, वे त्रिकाल संध्या से नष्ट हो जाते हैं। संध्या नहीं करने वाला मृत्यु के बाद कुत्ते की योनि में जाता है। संध्या नहीं करने से पुण्यकर्म का फल नहीं मिलता। समय पर की गई संध्या इच्छानुसार फल देती है। घर में संध्या वंदन से एक, गो-स्थान में सौ, नदी किनारे लाख तथा शिव के समीप अनंत गुना फल मिलता है।

मृत्यु के बाद यह क्रिया होना बहुत जरूरी है, क्योंकि...
हिंदू धर्म में मृत्यु के बाद मृतक का दाह संस्कार किया जाता है अर्थात मृत देह अग्नि को समर्पित की जाती है। दाह संस्कार के समय की जाने वाली एक अनिवार्य प्रथा है कपाल क्रिया। दाह संस्कार के समय कपाल क्रिया क्यों की जाती है? इसका वर्णन गरुड़ पुराण में मिलता है।

गरुड़ पुराण के अनुसार अनुसार जब शवदाह के समय मृतक के सिर पर घी की आहुति दी जाती है। इसी क्रिया को कपाल क्रिया कहते हैं। इस क्रिया के पीछे अलग-अलग मान्यताए हैं। धार्मिक मान्यता के अनुसार कपाल क्रिया के बाद ही मृत व्यक्ति के प्राण शरीर से पूरी तरह स्वतंत्र होते हैं और नए जन्म की क्रिया आगे बढ़ती है।

एक अन्य मान्यता है कि सिर पर घी डालकर इसलिए जलाया जाता है ताकि वह अधजला न रह जाए अन्यथा अगले जन्म में वह अविकसित रह जाता है। हमारे शरीर के प्रत्येक अंग में विभिन्न देवताओं का वास होने की मान्यता का विवरण श्राद्ध चंद्रिका में मिलता है। चूंकि सिर में ब्रह्मा का वास माना गया है इसलिए शरीर को पूर्ण रूप से मुक्ति प्रदान करने के लिए कपाल की जाती है।

वहीं इस क्रिया के पीछे यह भी एक कारण है कि सिर की हड्डी काफी मजबूत होती है और वह आसानी से जलती नहीं है। सिर को अग्नि में भस्म होने में भी समय लगता है। अत: दाह संस्कार के समय घी डालने से वह आसानी से जल जाती है।

भोलेनाथ ने सिर पर चंद्र क्यों धारण किया है?
शिव, शंकर, भोलेनाथ, महादेव, महाकाल आदि असंख्य नामों से पूजे जाते हैं भोलेभंडारी। इनका एक नाम शशिधर भी है। शिवजी अपने मस्तक पर चंद्र को धारण किया है इसी वजह से इन्हें शशिधर के नाम से भी जाना जाता है। भोलेनाथ ने मस्तक पर चंद्र को क्यों धारण कर रखा है?
इस संबंध में शिव पुराण में उल्लेख है कि जब देवताओं और असुरों द्वारा समुद्र मंथन किया गया, तब 14 रत्नों के मंथन से प्रकट हुए। इस मंथन में सबसे विष निकला। विष इतना भयंकर था कि इसका प्रभाव पूरी सृष्टि पर फैलता जा रहा था परंतु इसे रोक पाना किसी भी देवी-देवता या असुर के बस में नहीं था। इस समय सृष्टि को बचाने के उद्देश्य से शिव ने वह अति जहरीला विष पी लिया। इसके बाद शिवजी का शरीर विष प्रभाव से अत्यधिक गर्म होने लगा। शिवजी के शरीर को शीतलता मिले इस वजह से उन्होंने चंद्र को धारण किया।

चंद्र को धारण कर क्या संदेश देते हैं शिव?
शिवजी को अति क्रोधित स्वभाव का बताया गया है। कहते हैं कि जब शिवजी अति क्रोधित होते हैं तो उनका तीसरा नेत्र खुल जाता हैं तो पूरी सृष्टि पर इसका बुरा प्रभाव पड़ता है। साथ ही विषपान के बाद शिवजी का शरीर और अधिक गर्म हो गया जिसे शीतल करने के लिए उन्होंने चंद्र आदि को धारण किया। चंद्र को धारण करके शिवजी यही संदेश देते हैं कि आपका मन हमेशा शांत रहना चाहिए। आपका स्वभाव चाहे जितना क्रोधित हो परंतु आपका मन हमेशा ही चंद्र की तरह ठंडक देने वाला रहना चाहिए। जिस तरह चांद सूर्य से उष्मा लेकर भी हमें शीतलता ही प्रदान करता है उसी तरह हमें भी हमारा स्वभाव बनाना चाहिए।

भूत के सपने आते हैं तो पलंग के नीचे रखें उल्टा तवा, क्योंकि...
अच्छे स्वास्थ्य के लिए जरूरी है पर्याप्त नींद। स्वस्थ जीवन के कम से कम 6 घंटे की प्रतिदिन लेना आवश्यक है। अन्यथा आलस्य बना रहता है और बीमारियां होने की संभावनाएं बनती हैं। नींद पूरी न होने के पीछे कारण हो सकते हैं। इन कारणों में से एक है बुरे या डरावने सपने आना।

यदि किसी व्यक्ति को बुरे या भयानक सपने दिखाई देते हैं जिनकी वजह से नींद खुल जाती है तो निश्चित ही यह स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव डालता है। इस अवस्था से बचने के लिए ज्योतिष के अनुसार एक टोटका या उपाय बताया गया है। इसके अनुसार रात को सोते समय या नींद में सपने देखकर यदि भय लगता हो तो पंलग के नीचे रोटी बनाने के तवा को उल्टा करके रख दें। इस उपाय से निश्चित ही बुरे सपने आना बंद हो जाएंगे। पलंग के नीचे तवा रखने से हमारे आसपास के वातावरण में मौजूद नकारात्मक ऊर्जा निष्क्रिय हो जाती है। इसी नकारात्मक ऊर्जा की वजह से बुरे सपने दिखाई देते हैं। इन बुरी शक्तियां के प्रभाव में होने से हमारा दिमाग इस प्रकार की बातों को ही सोचता है। पलंग के नीचे तवा रखने पर इन विचारों पर विराम लगता है और नींद अच्छी आती है।

इसके साथ ही रात को सोते समय भगवान या इष्ट देवता का नाम लेकर सोना चाहिए। इस उपाय से भी बुरे सपने आना बंद हो जाते हैं और नींद अच्छी आती है।

मंगलवार को क्यों और किसे चढ़ाना चाहिए लाल फूल...
मंगल की पूजा में कुछ चीजें आवश्यक मानी गई हैं। भात यानी चावल, लाल गुलाल, कुंकुं, लाल गुलाब ये चीजें ऐसी हैं जो मंगल की पूजा में अनिवार्य मानी गई हैं। कहा जाता है मंगल को यह वस्तुएं चढ़ाने से वे व्यक्ति के अनुकुल असर करते हैं। आखिर फूलों में लाल गुलाब ही मंगल को क्यों प्रिय है?लाल गुलाब न हो तो लाल रंग का कोई दूसरा फूल भी उन्हें चढ़ाया जा सकता है। आखिर लाल फूल खासतौर पर गुलाब ही मंगल को क्यों चढ़ाया जाता है?

मंगल अग्नि का कारक ग्रह है। उसका स्वरूप लाल है। मंगल लाल कपड़े, लाल फूल आदि से प्रसन्न होते हैं। मंगल किसी राशि में खराब स्थान पर बैठा हो, विपरित राशि में बैठा हो तो व्यक्ति को उनके क्रोध का शिकार होना पड़ता है। मंगल जब ठीक नहीं हो तो उन्हें शीतल यानी ठंडी प्रकृति की चीजें चढ़ाई जाती हैं। जैसे भात, गुलाब, दही, दूध आदि। गुलाब मंगल ग्रह के लिए सबसे श्रेष्ठ फूल है।

यह लाल रंग का होता है जो मंगल के रंग को दर्शाता है और दूसरा इसकी प्रकृति शीतल मानी गई है। गुलाब का रंस और गंध दोनों ही मानव शरीर को ठंडक देने वाले माने गए हैं। गर्मियों में गुलाब का शरबत भी बनाया जाता है जो मानव शरीर में शीतलता प्रदान करता है। मंगल ग्रह को लाल गुलाब चढ़ाने से उसके रंग का लाभ तो मिलता ही है, मंगल के क्रूर स्वभाव में शीतलता आती है और फूल चढ़ाने वाले से वह क्रूर दृष्टि हटाने लगते हैं।

जानिए, श्री गणेश के इन 8 रूपों से जुड़ी अनूठी बातें
श्री गणेश मंगलकारी देवता माने गए हैं। पुराणों में श्री गणेश को ही परब्रह्म कहा गया है। पंचतत्वों से बने चल-अचल संसार में वह प्राणों के लिये जरूरी जल तत्व के देवता भी माने गए हैं। इस दृष्टि से प्राणों के विघ्रों को दूर करने के कारण भी श्री गणेश विघ्रहर्ता भी कहलाती हैं। विघ्रेश्वर गणेश की महिमा इस बात से भी प्रकट होती है कि हिन्दू धर्म के पंचदेवों में कल्याणकर्ता शिव, दुर्गतिनाशिनी दुर्गा, आनंददाता श्री विष्णु और साक्षात् देवता सूर्य की पूजा से भी पहले श्री गणेश की पूजा की जाती है।

पुराणों के मुताबिक भगवान गणेश अलग-अलग 8 रूपों में भक्तों की विघ्रनाश व मंगल की कामना पूरी करते हैं, जो गणेश के 8 अवतारों के रूप में भी प्रसिद्ध हैं। जानिए, श्री गणेश के ऐसे ही अद्भुत 8 अवतारों से जुड़ी अनूठी बातें और उनकी उपासना से सांसारिक जीवन की कौन-सी इच्छा पूरी होती है-

1.वक्रतुण्ड - श्री गणेश के इस रूप में मुड़ी हुई सूंड होती है। यह तमाम बाधाओं और कलह का नाश करते हैं।

2.एकदंत - इस रूप में श्री गणेश का एक ही दांत होता है। यह लालच, अहंकार, आसक्ति और दंभ को चूर करते हैं। यह बुद्धिदाता होते हैं।

3. महोदरा - श्री गणेश के इस रूप में बडे उदर यानी पेट वाले होते हैं, जो सुख-समृद्धि और आनंद देते हैं। भूमि-संपत्ति संबंधी बाधा को दूर करते हैं।

4. गजानन - श्री गणेश इस रूप का अर्थ होता है हाथी जैसे मुख वाले धन, दौलत, ऐश्वर्य और कार्य दक्षता और सिद्धि देते हैं। यह शांत और पुरूषार्थी बनाते हैं।

5. लम्बोदर - श्री गणेश के इस रूप का अर्थ होता है- लम्बे पेट वाले। क्रोध व अधर्म को अंत करते हैं।

6. विकट - विपदाओं व संकट के साथ शत्रुभय दूर करते हैं। यह संकटनाशक रूप माना जाता है।

7. विघ्रराज - इस रूप में गणेश कमल के फूल पर विराजित होते हैं। सभी विघ्रों का नाश करते हैं और शुभ कार्यों में आने वाली बाधाओं को दूर रखते हैं।

8. धूम्रवर्ण - श्री गणेश इस रूप में धुएं की तरह रंगवाले होते हैं। हर काम में सफलता देते हैं। दुष्प्रवृत्तियों का नाश करते हैं। ग्रहदोष शांति के लिए इनकी पूजा का महत्व है।

ये आसान उपाय रखते हैं ईर्ष्या, क्रोध और भय से दूर
आज के भागदौड़ भरे दौर में असंतुलित जीवनशैली से मानवीय स्वभाव व व्यवहार में एक दोष छोटे या बड़े रूप में सबसे ज्यादा उजागर होता है। यह दोष है - क्रोध। क्रोध और भय ही ईर्ष्या का बड़ा कारण भी बनते हैं।

धर्म की नजर से क्रोध षट्विकारों यानी छ: विकार या दोषों में एक है, जो किसी भी व्यक्ति के पतन का कारण बन सकता है। धर्मशास्त्रों में क्रोध से होने वाले पापों को नरक में जाने का कारण बताना भी दरअसल, व्यावहारिक जीवन में गुस्से से मिलने वाले गहरे दु:खों को भोगने की ओर संकेत भी है।

खासतौर पर आज के युवाओं में सहनशीलता की कमी व क्रोध की बात करें तो इसके पीछे कम समय में बहुत ज्यादा पाने की लालसा या व्यग्रता भी है। जिससे मकसद को पाने के लिए अपनाए छोटे रास्ते जब कारगर नहीं होते तो उससे मिली नाकामी, कुण्ठा और निराशा क्रोध के रूप में प्रकट होती है।

ऐसी व्यग्रता या क्रोध पर काबू करने के लिए शास्त्रों के यहां बताए जा रहे उपाय बेहद फायदेमंद साबित हो सकते हैं। जानिए कुछ ऐसे ही उपाय जिनसे ईर्ष्या, क्रोध व भय काबू में रहते हैं -

धर्मग्रंथ महाभारत में क्रोध से बचने का बेहतर सूत्र बताते हुए लिखा गया है कि -

अक्रोधेन जयते क्रोधम् यानी क्रोध न कर ही क्रोध पर विजय पाना श्रेष्ठ उपाय है।

इसी तरह क्रोध से बचने का एक अच्छा उपाय है - मौन। शास्त्र कहते हैं मौनिन: कलह नास्ति यानी मौन को अपनाने और महत्व समझने वाले व्यक्ति कलह से दूर रहता है। दरअसल, भय से मौन होना कमजोरी होता है। किंतु जब मौन द्वारा बुरे विचार, कटु वाणी और बुरे भावों पर काबू कर किसी बात का सही पहलू जानने, समझने, विचारने और हल निकालने पर ध्यान लगाएं तो यह न केवल क्रोध, ईर्ष्या और भय से दूर रखता है, बल्कि अच्छे नतीजों का कारण भी बन सकता है।

इस तरह सरल शब्दों में कहें तो व्यक्तित्व, चरित्र, ऊर्जा, विचार और कर्म को क्रोध के बुरे असर से बचाने के लिये शास्त्रों के इन सूत्रों से क्रोध को काबू करने के साथ ही समय के साथ संतुलन बनाना भी सीखें और समझें।

हर युवा इस बात पर दे ध्यान..वरना जवानी में हो जाएंगे बूढ़े
शास्त्रों में संयम व मर्यादाओं में रहकर कर्तव्यों को पूरा करने व जीवन के लक्ष्य पाने के लिए इंसानी उम्र को चार भागों में बांटा गया है। जिसे आश्रम व्यवस्था के रूप में भी जाना जाता है। जिनमें ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ और संन्यास आश्रम के जरिए जीवन के चार पुरुषार्थ धर्म, अर्थ, काम व मोक्ष को पाने का सही तरीका नियत किया गया है।

जीवन के लिए जरूरी 4 पुरुषार्थ असल में एक-दूसरे को साधने वाले होते हैं। किंतु सांसारिक जीवन के नजरिए से अर्थ यानी भोगे जाने वाले सुख, धन, दौलत व संपत्ति की खास अहमियत है। धन को धर्म और काम के रास्ते मोक्ष पाने का अहम जरिया भी माना गया है।

यही कारण है कि ब्रह्मचर्य व गृहस्थाश्रम के दौरान, जबकि हर इंसान उम्र और शारीरिक तौर पर ज्यादा बलवान व ऊर्जावान होता है, धन अर्जित करने की नजरिए से बेहद अहम माना है। उम्र की यह अवस्था युवाकाल भी कहलाती है।

युवाकाल में धन कमाना वर्तमान और भविष्य के लिए कितना जरूरी है, शास्त्रों में बताई नीचे लिखी बात उजागर करती है। लिखा गया है कि -

गतवयसामपि पुंसांयेषामर्था: भवन्ति ते तरुणा:।

अर्थेन तु ये हीनां वृद्धास्ते यौवनेपिस्यु:।।

यह श्लोक इंसानी जीवन में धन का महत्व उजागर करते हुए संदेश देता है कि जो बुढ़ापे में भी धनवान है, वे बूढ़े होकर भी युवा के समान है। वहीं जो युवाकाल में निर्धन रहते है, उन युवाओं पर बुढ़ापा हावी हो जाता है।

इस तरह यहां खासतौर पर युवाओं को इस बात को हमेशा ध्यान रखने की सीख है कि युवावस्था में धन कमाने की हर संभव कोशिश करें। ऐसे धन को अर्जित करने के तरीके भी सही व न्यायपूर्ण हो। जिससे धन के साथ सुख, शांति और यशस्वी जीवन की चाहत पूरी हो। धर्म के नजरिए से ऐसा धन कमाने का संकल्प ही हर पुरुषार्थ को एक के बाद एक आसानी से पाना संभव बना देगा। अन्यथा धन का अभाव कुण्ठा, निराशा, हताशा व असफलता से पैदा चिंता और व्याकुलता से सौंदर्य के साथ उम्र को घटाता चला जाएगा।

खबरदार! अगर घर-गृहस्थी में घट रही हों ये 6 बातें
शास्त्रों में गृहस्थ जीवन को धर्म पालन का अहम पड़ाव माना गया है। क्योंकि गृहस्थी में भी हर मुखिया कार्य, व्यवहार व आचरण में धर्म भावों जैसे सत्य, अहिंसा, प्रेम, क्षमा या परोपकार को अपनाकर ही परिजनों में भी स्नेह, संवेदना, मेलजोल, सहयोग और एकजुटता की भावना को कायम रख सकता है।

सुख-शांति के ऐसे वातावरण के लिए जरूरी है कि हर मुखिया हर वक्त किसी भी विषय, बात या मसले को लेकर ऐसे निष्पक्ष फैसले लेता रहे, जिससे कोई भी पक्ष आहत न हो और हल भी निकलता रहे। किंतु कार्य, जिम्मेदारियों और वक्त के साथ तालमेल के अभाव में अनेक अवसरों पर गृहस्थी में तनाव, विवाद, अशांति और कटुता के हालात परिवारिक दशा को बिगाडऩे लगते हैं।

शास्त्रों में घर-परिवार की दुर्दशा का कारण बनने वाली वाली 6 ऐसी ही बातों से हर इंसान को सावधान रहने की सीख दी गई है, जो घर में घटते दिखाई दे तो परिवार के हित व रक्षा के लिए हर गृहस्थ को चौकन्ना होकर वक्त रहते जरूरी कदम उठाना चाहिए। जानिए ऐसी ही 6 बातें, लिखा गया है कि -

कुले कलङ्क: कवले कदन्नता सुत: कुबुद्धि: र्भवने दरिद्रता।

रुज: शरीरे कलहप्रिया प्रिया गृहागमे दुर्गतय: षडेते।।

इस श्लोक में सरल शब्दों में घर-गृहस्थी को बदहाल करने वाली 6 बातों की ओर संकेत हैं -

- अगर परिवार या कुल पर कलंक लगाने वाली कोई बात पैदा हो,

- घर में अशुद्ध या अपवित्र भोजन हो,

- घर में दरिद्रता यानी तंगहाली, आलस्य या पैसों का अभाव हो,

- बुद्धिदोष से पुत्र गलत संगत और आचरण करने लगे,

- स्वयं या परिजन बीमारियों से घिरने लगे,

- पत्नी स्वाभाविक कारणों या मनमुटाव से कलह करने लगे।

जानिए, कितनी तरह के तिलक लगाने की है परंपरा...
भारतीय संस्कृति में तिलक लगाने की परंपरा अति प्राचीन है। प्रारंभ से ही माना जाता है कि मस्तस्क पर तिलक लगाने से व्यक्ति का गौरव बढ़ता है। हिंदू संस्कृति में एक पहचान चिन्ह का काम करता है तिलक।

तिलक केवल धार्मिक मान्यता नहीं है बल्कि इसके पीछे कई वैज्ञानिक कारण भी हैं। तिलक केवल एक तरह से नहीं लगाया जाता। हिंदू धर्म में जितने संतों के मत हैं, जितने पंथ है, संप्रदाय हैं उन सबके अपने अलग-अलग तिलक होते हैं। आइए जानते हैं कितनी तरह के होते हैं तिलक। सनातन धर्म में शैव, शाक्त, वैष्णव और अन्य मतों के अलग-अलग तिलक होते हैं।

शैव- शैव परंपरा में ललाट पर चंदन की आड़ी रेखा या त्रिपुंड लगाया जाता है।

शाक्त- शाक्त सिंदूर का तिलक लगाते हैं। सिंदूर उग्रता का प्रतीक है। यह साधक की शक्ति या तेज बढ़ाने में सहायक माना जाता है।

वैष्णव- वैष्णव परंपरा में चौंसठ प्रकार के तिलक बताए गए हैं। इनमें प्रमुख हैं- लालश्री तिलक-इसमें आसपास चंदन की व बीच में कुंकुम या हल्दी की खड़ी रेखा बनी होती है।

विष्णुस्वामी तिलक- यह तिलक माथे पर दो चौड़ी खड़ी रेखाओं से बनता है। यह तिलक संकरा होते हुए भोहों के बीच तक आता है।

रामानंद तिलक- विष्णुस्वामी तिलक के बीच में कुंकुम से खड़ी रेखा देने से रामानंदी तिलक बनता है।

श्यामश्री तिलक- इसे कृष्ण उपासक वैष्णव लगाते हैं। इसमें आसपास गोपीचंदन की तथा बीच में काले रंग की मोटी खड़ी रेखा होती है।

अन्य तिलक- गाणपत्य, तांत्रिक, कापालिक आदि के भिन्न तिलक होते हैं। कई साधु व संन्यासी भस्म का तिलक लगाते हैं।

जानिए, पुत्रदा एकादशी व्रत का महत्व व कथा
पुत्रदा एकादशी व्रत है। धर्म शास्त्रों के अनुसार यह व्रत उत्तम पुत्र की प्राप्ति के लिए किया जाता है। इसकी कथा इस प्रकार है-
पूर्वकाल में भद्रावतीपुरी में राजा सुकेतुमान राज्य करते थे। उनकी रानी का नाम चम्पा था। उनके यहां कोई संतान नहीं थी इसलिए दोनों पति-पत्नी सदा चिन्ता और शोक में रहते थे। शोकमग्न होकर एक दिन राजा सुकेतुमान घोड़े पर सवार होकर वन में चले गये। वहां घुमते-घुमते राजा को दोपहर हो गई। तब राजा को भूख और प्यास सताने लगी। वे पानी की खोज में इधर-उधर भटकने लगे।

तभी उन्हें वन में एक सरोवर दिखाई दिया। सरोवर के तट पर बहुत से मुनि वेदपाठ कर रहे थे। राजा ने घोड़े से उतरकर सभी मुनियों को वंदना की। राजा की स्तुति सुनकर मुनि अति प्रसन्न हुए और बोले- राजन। हम लोग तुम पर प्रसन्न हैं। तुम अपने मन की बात हमें बताओ। राजा बोले- मुनिजन आप लोग कौन हैं, तथा यहाँ किस कार्य के लिए एकत्रित हुए हैं? मुनि बोले- राजन। हम लोग विश्वेदेव हैं। यहाँ स्नान के लिए आए हैं।

माघ मास निकट आया है। आज से पाँचवें दिन माघ का स्नान आरम्भ हो जायेगा।

आज ही पुत्रदा नाम की एकादशी है, जो व्रत करने वाले मनुष्यों को पुत्र देती है। राजा ने कहा- विश्वेदेवगण। यदि आप लोग मुझ पर प्रसन्न हैं तो मुझे पुत्र दीजिये। मुनि बोले- राजन। आज पुत्रदा नाम की एकादशी है। इसका व्रत बहुत विख्यात है। तुम आज इस उत्तम व्रत का पालन करो। भगवान की कृपा से तुम्हें पुत्र अवश्य प्राप्त होगा।

इस प्रकार उन मुनियों के कहने से राजा ने पुत्रदा एकादशी व्रत का पालन किया। फिर द्वादशी को पारण करके मुनियों के चरणों में बारंबार मस्तक झुकाकर राजा अपने घर आये। कुछ ही दिनों बाद रानी चम्पा ने गर्भधारण किया। उचित समय आने पर रानी ने एक तेजस्वी पुत्र को जन्म दिया, जिसने अपने गुणों से पिता को संतुष्ट किया तथा वह प्रजा का पालक हुआ।

पुत्रदा एकादशी 5 को, योग्य पुत्र के लिए करें यह व्रत
पौष मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी को पुत्रदा एकादशी कहते हैं। इस एकादशी का महत्व पुराणों में वर्णित है। इस बार यह एकादशी 5 जनवरी, गुरुवार को है। इस व्रत को करने से योग्य पुत्र की प्राप्ति होती है। पुत्रदा एकादशी का महत्व स्वयं भगवान श्रीकृष्ण ने धर्मराज युधिष्ठिर को बताया था। उसके अनुसार-

इस चर और अचर संसार में पुत्रदा एकादशी के व्रत के समान दूसरा कोई व्रत नहीं है। इस एकादशी पर भगवान नारायण की पूजा की जाती है। पुत्रदा एकादशी के दिन नाम-मंत्रों का उच्चारण करके फलों के द्वारा भगवान नारायण का पूजन करें। नारियल के फल, सुपारी, नींबू, अनार, आँवला, लौंग, बेर तथा विशेषत: आम के फलों से भगवान नारायण की पूजा करें। इसी प्रकार धूप दीप से भी भगवान की अर्चना करें।

पुत्रदा एकादशी की रात्रि को वैष्णव पुरुषों के साथ जागरण करना चाहिए। जागरण करने वाले को जिस फल की प्राप्ति होति है, वह हजारों वर्ष तक तपस्या करने से भी नहीं मिलता। जो पुत्रदा एकादशी का व्रत करते हैं, वे इस लोक में पुत्र पाकर मृत्यु के पश्चात् स्वर्गगामी होते हैं। इस माहात्म्य को पढऩे और सुनने से अग्निष्टोम यज्ञ का फल मिलता है।

घर में हमेशा रहना चाहिए खुश्बू, क्योंकि...
आज के समय में ज्यादा से पैसा या धन कमाने की इच्छा सामान्यत: सभी की है। इसी वजह से लोग कड़ी मेहनत करते हैं। ज्यादा पैसा कमाने के लिए जहां मेहनत और भाग्य महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं वहीं आपके घर का वास्तु भी कार्य करता है। यदि घर में कोई वास्तु दोष है तो अधिक पैसा कमाने बनाने में कई परेशानियों का सामना करना पड़ता है।

वास्तु शास्त्र के अनुसार यदि घर में नकारात्मक ऊर्जा अधिक सक्रिय रहेगी तो वहां रहने वाले लोगों को मानसिक तनाव के साथ ही धन संबंधी परेशानियां झेलना पड़ती है। नेगेटिव एनर्जी से हमारे विचार और सोच भी नकारात्मक हो जाती है। जिससे कार्यों में सफलता प्राप्त होने की संभावनाएं काफी कम हो जाती है। ऐसे में जरूरी है कि हमारे आसपास फैली नकारात्मक ऊर्जा को समाप्त कर सकारात्मक ऊर्जा को सक्रिय किया जाए। घर में पॉजिटिव माहौल बनाने के लिए सबसे अच्छा ऊपाय है घर को सुगंधित बनाया जाए। घर में ऐसी व्यवस्था की जाए जिससे कमरे, कीचन, हॉल आदि का वातावरण महकने लगे। इसके लिए आप अगरबत्ती, इत्र, परफ्यूम आदि का इस्तेमाल कर सकते हैं।

यदि आपके घर में शीत की वजह से अथवा अन्य किसी कारण से बदबू आती है तो इस संबंध तुरंत कोई उपाय करना चाहिए। शास्त्रों के अनुसार जिस स्थान पर गंदगी या दुर्गंध रहती है उस स्थान धन की देवी महालक्ष्मी, सहित सभी देवी-देवता छोड़ देते हैं। वहां दरिद्रता और बुरी शक्तियां सक्रिय हो जाती है। इसी वजह से घर में सफाई रखनी चाहिए और वातावरण सुगंधित होना चाहिए। जहां सुगंध होती है वहां सकारात्मक ऊर्जा रहती है और वहीं महालक्ष्मी का वास होता है।

तिजोरी में रखना चाहिए एक सुपारी क्योंकि ये बढ़ाती है पैसा
तिजोरी जहां पैसा, ज्वेलरी और अन्य बेशकीमती वस्तुएं रखी जाती है। अत: यह जगह बहुत ही पवित्र और सकारात्मक ऊर्जा से भरपूर होनी चाहिए। जिससे कि घर में बरकत बनी रह सके और पैसों की कभी कमी न आए। यदि तिजोरी के आसपास कोई नकारात्मक शक्तियां सक्रिय हैं तो उस घर में कभी भी पैसों कमी कभी पूरी नहीं हो सकेगी। ऐसे में शास्त्रों के अनुसार कुछ उपाय बताए गए हैं।

तिजोरी में हमेशा पैसा ही पैसा भरा रहे, धन की देवी महालक्ष्मी की कृपा सदैव आप पर बनी रहे, इसके लिए एक छोटा सा उपाय अपनाएं। शास्त्रों के अनुसार श्रीगणेश रिद्धि और सिद्ध के दाता है। कोई भी भक्त नित्य श्रीगणेश का ध्यान करता है तो उसे कभी भी धन-धान्य की कमी नहीं सताती। श्रीगणेश को प्रसन्न करने के लिए कई उपाय हैं। प्रतिदिन गणेशजी की विधिवत पूजा करें और किसी भी शुभ मुहूर्त में विशेष पूजा करें। पूजन में गणेशजी के प्रतीक स्वरूप सुपारी रखी जाती है। बस यही सुपारी पूजा पूर्ण होने के बाद अपनी तिजोरी में रख दें।

पूजा में उपयोग की गई सुपारी में श्रीगणेश का वास होता है। अत: यह तिजोरी में रखने से तिजोरी के आसपास के क्षेत्र में सकारात्मक और पवित्र ऊर्जा सक्रिय रहेगी जो नकारात्मक शक्तियों को दूर रखेगी। पूजा में उपयोग की जाने वाली सुपारी बाजार में मात्र 1 रुपए में ही प्राप्त हो जाती है लेकिन विधिविधान से इसकी पूजा कर दी जाए तो यह चमत्कारी हो जाती है। जिस व्यक्ति के पास सिद्ध सुपारी होती है वह कभी भी पैसों की तंगी नहीं देखता, उसके पास हमेशा पर्याप्त पैसा रहता है।

पूजा में जरुरी है कलाई पर ऐसा धागा बांधना, क्योंकि...
हिंदू धर्म में पूजन कर्म के दौरान पंडित हाथ में लाल धागा जरूर बांधते हैं। इस रक्षासूत्र या मौली कहा जाता है। इसके क्रिया के बिना पूजा-अर्चना संपन्न नहीं मानी जाती है।हिंदू धर्म में कई रीति-रिवाज तथा मान्यताएं हैं। इन रीति-रिवाजों तथा मान्यताओं का सिर्फ धार्मिक ही नहीं वैज्ञानिक पक्ष भी है। जो वर्तमान समय में भी एकदम सटीक बैठता है।

हिंदू धर्म में प्रत्येक धार्मिक पूजा-पाठ, यज्ञ, हवन में पंडित हमारे दाएं हाथ में मौली (एक धार्मिक धागा) बांधी जाती है। शास्त्रों का ऐसा मत है कि मौलि बांधने से त्रिदेव- ब्रह्मा, विष्णु व महेश तथा तीनों देवियों- लक्ष्मी, पार्वती व सरस्वती की कृपा प्राप्त होती है। ब्रह्मा की कृपा से कीर्ति, विष्णु से बल मिलता है और शिव दुर्गुणों का विनाश करते हैं। इसी प्रकार लक्ष्मी से धन, दुर्गा से शक्ति एवं सरस्वती की कृपा से बुद्धि प्राप्त होती है।

शरीर विज्ञान की दृष्टि से अगर देखा जाए तो मौलि बांधना उत्तम स्वास्थ्य भी प्रदान करती है। चूंकि मौलि बांधने से त्रिदोष- वात, पित्त तथा कफ को नियंत्रित करता है। मौलि का शाब्दिक अर्थ है सबसे ऊपर, जिसका तात्पर्य सिर से भी है। शंकर भगवान के सिर पर चंद्रमा विराजमान है इसीलिए उन्हें चंद्रमौलि भी कहा जाता है। मौलि बांधने की प्रथा तब से चली आ रही है जब दानवीर राजा बलि की अमरता के लिए वामन भगवान ने उनकी कलाई पर रक्षा सूत्र बांधा था।

क्रमश:...

जो भी इसमें अच्छा लगे वो मेरे गुरू का प्रसाद है,
और जो भी बुरा लगे वो मेरी न्यूनता है......MMK

1 comment:

  1. Kya bat hai kaushalji dhanyavaad it na accha bahumulya gyaan share karne k liye.

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