Thursday, August 4, 2011

Aisha-Kyun (ऐसा क्यूँ) Part (3)

जानें क्या है कांवड़ का अर्थ?
कांवड़ का मूल शब्द ''कांवर'' है जिसका सीधा अर्थ कंधे से है। शिव भक्त अपने कंधे पर पवित्र जल का कलश लेकर पैदल यात्रा करते हुए ईष्ट शिवलिंगों तक पहुंचते हैं। धार्मिक मान्यताओं के लिए पूरे विश्व में अलग पहचान रखने वाले भारतवर्ष में कांवड़ यात्रा के दौरान भोले के भक्तों में अद्भुत आस्था, उत्साह और अगाध भक्ति के दर्शन होते हैं । कांवडिय़ों के सैलाब में रंग-बिरंगी कांवड़े देखते ही बनती हैं।

आस्था का पर्व है श्रावण
कांवड़ यात्रा निकालने के पीछे एक तथ्य यह भी है कि भगवान आशुतोष देवी गंगा को ज्येष्ठ दशहरा को इस पृथ्वी पर लेकर आए थे। गंगा उनकी जटाओं में विराजमान हुईं। इसलिए भगवान शंकर को गंगा अत्यंत प्रिय हैं । गंगाजल के अभिषेक से वह अत्यंत प्रसन्न होते हैं । इसी के साथ दुग्ध, बेलपत्र और धतूरा अर्पित करने से भगवान आशुतोष भक्त पर प्रसन्न होते हैं और उस पर कृपा करते हुए मनोकामनाओं की पूर्ति करते हैं । श्रावण मास भगवान शिव की साधना का सर्वश्रेष्ठ समय है इसीलिए श्रद्धालु श्रावण मास में सोमवार के व्रत रखते हैं और भगवान भोलेशंकर की आराधना करते हुए उनके प्रिय पदार्थ उन्हें अर्पित करते हैं। भारत में श्रावण मास में शिवभक्ति का विराट रूप और आस्था का अनंत प्रवाह कांवड़ यात्रा के रूप में दृष्टिगोचर होता है।

कांवड़ यात्रा: इन बातों का रखें ध्यान
हमारे देश में प्राचीन काल से कांवड़ यात्राएं निकाली जा रही है। कुछ लोग कांवड़ यात्रा के सिर्फ धार्मिक पक्ष को ही जानते हैं जबकि कांवड़ यात्रा का मनोवैज्ञानिक पक्ष भी है।कांवड़ यात्रा वास्तव में एक संकल्प होती है, जो श्रद्धालु द्वारा लिया जाता है। कांवड़ यात्रा के दौरान यात्रियों द्वारा नियमों का पालन सख्ती से किया जाता है। कांवड़ यात्रियों के लिए किसी भी प्रकार का नशा वर्जित रहता है। इस दौरान तामसी भोजन यानी मांस, मदिरा आदि का सेवन भी नहीं किया जाता।

बिना स्नान किए कांवड़ यात्री कांवड़ को नहीं छूते। तेल, साबुन, कंघी करने व अन्य श्रृंगार सामग्री का उपयोग भी कावड़ यात्रा के दौरान नहीं किया जाता। कावड़ यात्रियों के लिए चारपाई पर बैठना एवं किसी भी वाहन पर चढऩा भी निषेध है। चमड़े से बनी वस्तु का स्पर्श एवं रास्ते में किसी वृक्ष या पौधे के नीचे कांवर रखने की भी मनाही है।

कांवड़ यात्रा में बोल बम एवं जय शिव-शंकर घोष का उच्चारण करना तथा कांवड़ को सिर के ऊपर से लेने तथा जहां कांवड़ रखी हो उसके आगे बगैर कांवड़ के नहीं जाने के नियम पालनीय होती है। इस तरह कठिन नियमों का पालन कर कांवड़ यात्री अपनी यात्रा पूर्ण करते हैं। इन नियमों का पालन करने से मन में संकल्प शक्ति का जन्म होता है।

ध्यान रखें शिवलिंग की कभी पूरी परिक्रमा न करें
शिवजी एक मात्र ऐसे देवता हैं जिन्हें लिंग रूप में पूजा जाता है।शिव ही वे देवता हैं जिन्होंने कभी कोई अवतार नहीं लिया। शिव कालों के काल है यानी साक्षात महाकाल हैं। वे जीवन और मृत्यु के चक्र से परे हैं इसीलिए समस्त देवताओं में एकमात्र वे परब्रम्ह है इसलिए केवल वे ही निराकार लिंग के रूप में पूजे जाते हैं। इस रूप में समस्त ब्रम्हाण्ड का पूजन हो जाता है क्योंकि वे ही समस्त जगत के मूल कारण है।

शिव का पूजन लिगं रूप में ही ज्यादा फलदायक माना गया है। शिव का मूर्तिपूजन भी श्रेष्ठ है किंतु लिंग पूजन सर्वश्रेष्ठ है।शिव पिंडी की परिक्रमा में जलहरी या जलाधारी (अरघा का आगे निकला भाग) की दूसरी छोर तक जाकर, उसे लांघे बिना मुड़े व विपरीत दिशामें चलकर परिक्रमा पूर्ण करें। शास्त्रों के अनुसार इस तरह ही शिवलिंग की परिक्रमा करना चाहिए। शिवपुराण के अनुसार शिवलिंग जब प्रकट हुआ था तो वह अग्रि के रूप में था।

पृथ्वी पर शिवलिंग किस तरह स्थापित हो यह एक समस्या थी।

इसीलिए तब सारे देवताओं ने मिलकर प्रार्थना कि तो पार्वती जी ने अपने तप के प्रभाव से जलाधारी प्रकट की। इसका आकार स्त्री की योनी के समान है। इसीलिए माना जाता है कि शिवलिंग को जलाधारी से अलग करने पर दोष लगता है। कहा जाता है कि पार्वती शक्ति का रूप है और जलाधारी से शक्ति प्रक्षेपित होती है; इसलिए सामान्य श्रद्धालु यदि उस जलाधारी को लांघे, तो उसे उस शक्तिसे कष्ट हो सकता है। अत: पिंडीकी अर्धपरिक्रमा ही करना चाहिए।

अगर आप चाहते हैं कि आपके बच्चे हो संस्कारी तो...
सभी माता-पिता चाहते हैं कि उनकी संतान कुछ ऐसा काम करे जिससे उनके परिवार का नाम रोशन हो। कहते हैं माता-पिता बालक को जैसे माहौल या पर्यावरण में रखते हैं बच्चे के संस्कार वैसे ही होते हैं। माता-पिता उसे जैसा मार्गदर्शन देते हैं वह उसी रंग में रंग जाता है। इसीलिए किसी मनौवैज्ञानिक ने ठीक ही कहा है अपने बच्चे को जन्म से पहले पांच वर्ष तक अपने पास रखो, फिर वह जन्मभर आपका रहेगा।

इसीलिए जातकर्म संस्कार के अंर्तगत बालक को शहद व घी चटाने का या घी व शहद को मिलाकर सोने की शलाका से जीभ पर ऊं लिखने का वर्णन मिलता है। मान्यता है कि पिता जब बालक की जीभ पर ओम् लिखते हैं तब वह अपने ऊपर यह जिम्मेदारी लेता है कि वह अपनी संतान का ना सिर्फ जीवन के भौतिक मार्ग पर बल्कि आध्यात्मिक मार्ग पर मार्गदर्शन करेगा। सोने की शलाका से ऊं लिखने बच्चे का आध्यात्मिक विकास होता है। कहते हैं कि जिस बच्चे का आध्यात्मिक विकास होता है।

वह न सिर्फ एक अच्छा व्यक्ति होता है बल्कि एक सफल व्यक्ति होता है। इसका एक कारण यह भी है कि एक भाग घी और तीन भाग शहद मिलाकर शिशु को चटाने से उसकी आंतों में जो भी मल जमा होता है।वह बाहर निकल जाता है।अक्सर डॉक्टर्स उसे दूर करने के लिए अरंडी का तेल देते हैं जिससे आंतों को नुकसान पहुंचता है। इससे बच्चे को कभी पेट से संबंधित बीमारियां नहीं होती हैं।

हवन में घी की आहूति क्यों डाली जाती है?
हवन से मन को शांति मिलती है साथ ही चारों ओर का वातावण सकारात्मकता ऊर्जा व सुगंध से भर जाता है। हवन में अग्रि जलाकर उसमें घी की आहूति देने की परंपरा हमारे यहां वैदिक काल से ही चली आ रही है। कहते हैं अग्रि में डाला हुआ पदार्थ कभी नष्ट नहीं होता है। उदाहरण के लिए स्थुल मिर्च को यदि हवन में आहूति के रूप में डालेंगे तो। दूर-दूर तक बैठे लोग इससे परेशान हो जाएंगे। मतलब अग्रि का काम स्थूल वस्तु को तोड़कर सूक्ष्म कर देना है।

यज्ञ करते समय अग्रि में घी डाला जाता है। माना जाता है कि वह घी कभी नष्ट नहीं होता है। स्थुल घी परमाणुओं में बदल जाता है। घी की आहूति देने से एक कटोरी घी परमाणुओं में बदलकर पूरे वातावरण में फैल जाता है।

मनु ने ठीक कहा है आग में डालने से हवि सुक्ष्म होकर सूर्य तक फैल जाती है। हवन में घी के साथ अनेक जड़ी-बूटियां भी डाली जाती है। वैज्ञानिक मान्यता है घी की जड़ी-बूटियों के साथ आहूति देने पर सुक्ष्म परमाणुओं में विभक्त होने पर इनका औषधीय गुण बढ़ जाता है। आयुर्वेद व होम्योपेथी में भी इस सिध्दांत को माना गया है। इसीलिए हवन में घी की आहूति दी जाती है।

आरती क्यों और कैसे करें?
हिन्दू धर्म में हर तरह की पूजा में आरती जरूर की जाती है। आरती के समय भी अनेक नियमों का पालन किया जाता है। दरअसल पूजा के बाद आरती का मुख्य कारण भगवान को मनाना होता है। माना जाता है कि एक साथ समूह में एकत्रित होकर राग में आरती गाने से भगवान प्रसन्न होते हैं। आरती की शुरूआत शंखवादन से करना चाहिए।

आरती का आरंभ करते समय गर्दन उठाकर, ऊध्र्व दिशाकी ओर मन एकाग्र कर शंख बजाएं शंख बजाते समय ऐसा भाव रखना चाहिए कि आरती से घर में सकारात्मक ऊर्जा जाग रही है। शंख को धीमे स्वर में बजाना शुरू करना चाहिए फिर स्वर जाना चाहिए। शंखनाद हो जानेपर आरती गायन आरंभ करना चाहिए।

आरती करते समय हमेशा अर्थ व शब्दो के उच्चारण का ध्यान रखना चाहिए। आरती के समय थाली हमेशा क्लाक वाइज पूरी तरह गोलाकार घुमाना चाहिए। आरती इस तरह पूरे विधान से करने से घर में सकारात्मक तरंगे गतिमान होती है। इन तरंगों से आरती करने वालों की चारों तरफ कवच निर्माण होता है। आरती करने वाला जितनी श्रद्धा से आरती करता है उतना ही यह कवच अधिक समयतक बना रहेगा। इस तरह आरती करने से मन से नकारात्मक विचार पूरी तरह दूर हो जाते हैं।

क्या आप जानते हैं सप्ताह में सात दिन ही क्यों?
हिन्दू कैलेंडर व इंग्लिश कैलेंडर दोनों के अनुसार सप्ताह में सात दिन होते हैं। इंग्लिश कैलेंडर के अनुसार रविवार सप्ताह का आखिरी दिन होता है व हिन्दू कैलेंडर के अनुसार पहला। लेकिन बहुत कम लोग जानते हैं कि हिन्दू धर्म शास्त्रों व ज्योतिष के अनुसार सप्ताह में सात दिन ही क्यों होते हैं। दरअसल ज्योतिष में ग्रहों की संख्या नौ मानी गई है। जो इस प्रकार हैं शनि, बृहस्पति, मंगल, शुक्र, बुध, चंद्र, सूर्य, राहू और केतु।

इनमें से राहू और केतु को छाया ग्रह माना गया है। इसलिए इनका प्रभाव हमारे जीवन पर छाया के समान ही पड़ता है। इसलिए उस समयज्योतिषाचार्यों ने ग्रहों के आधार पर सप्ताह में सात दिन निर्धारित किए। लेकिन उसके बाद समस्या यह थी कि किस ग्रह का दिन कौन सा माना जाए तो ज्योतिषियों ने होरा के उदित होने के अनुसार दिनों को बांटा।

एक दिन में 24 होरा होती है। हर होरा एक घंटे की होती है। दिन उदित होने के साथ जिस ग्रह की पहली होरा होती है। वह दिन उसी ग्रह का माना जाता है। सोमवार के दिन की शुरूआत चंद्र की होरा के साथ होता है।

इसीलिए उसे सोमवार नाम दिया गया। मंगलवार के दिन पहली होरा मंगल की होती है इसीलिए उसे मंगलवार कहते है। इसी तरह बुध, गुरू, शुक्र, शनि, रवि, की शुरू आत इन्ही ग्रहों के अनुसार होती है इस तरह सात ग्रहों की होरा उदित होने के कारण उस दिन को उस ग्रह का प्रधान मानकर उसका नाम दिया गया। इसीलिए सप्ताह में सात दिन होते हैं।

प्रसाद सीधे हाथ में ही क्यों लेना चाहिए?
मंदिर हो या घर हिन्दू धर्म व संस्कृति के अनुसार भगवान को रोज भोग लगाकर प्रसाद बांटना पूजा का एक आवश्यक अंग माना जाता है। प्रसाद लेते समय हमेशा सीधे हाथ ऊपर रखना चाहिए और उसके नीचे उल्टा हाथ रखना चाहिए। ऐसी मान्यता है उल्टे हाथ में प्रसाद लेना शुभ नहीं माना जाता है। लेकिन अधिकतर लोग इस बात पर ध्यान नहीं देते हैं क्योंकि उनकी सोच यही होती है कि यह एक तरह का अंधविश्वास है। लेकिन बहुत कम लोग जानते हैं कि इसका कारण क्या है?

दरअसल हिन्दू धर्म में यह माना जाता है कि हर शुभ काम या अच्छा काम जिससे आप जल्द ही सकारात्मक परिणाम प्राप्त करना चाहते हैं वह काम सीधे हाथ से करना चाहिए। इसीलिए हर धार्मिक कार्य चाहे वह यज्ञ हो या दान-पुण्य सीधे हाथ से ही किया जाना चाहिए । जब हम हवन करते हैं और यज्ञ नारायण भगवान को आहूति दी जाती है तो वो सीधे हाथ से ही दी जाती है। दरअसल सीधे हाथ को सकरात्मक ऊर्जा देने वाला माना जाता है। हमारी परंपरा के अनुसार प्रसाद को भगवान का आर्शीवाद माना जाता है। यही सोचकर हमारे पूर्वजों ने यह मान्यता बनाई कि प्रसाद सीधे हाथ में ही लेना चाहिए।

इसलिए बेडरूम में कभी अंधेरा करके ना सोएं
हर व्यक्ति चाहता है कि उसे गहरी नींद आए। कहते हैं जिन लोगों को गहरी नींद आती है। उनका शरीर सेहतमंद और दिमाग तंदुरूस्त रहता है। बेडरूम घर की वह जगह होती है जहां कोई भी व्यक्ति सबसे अधिक समय व्यतीत करता है। मान्यता है कि गहरी नींद के लिए बेडरूम का वास्तु सही हो यह तो जरूरी है ही।

साथ ही यह भी जरूरी है कि बेडरूम में नाइट लैंप के बल्ब के रंग का भी उचित चुनाव किया जाए। माना जाता है कि उग्र रंग जैसे नीले या लाल का चुनाव करने पर झगड़े अधिक होते हैं व गुस्सा भी बढ़ता है। लेकिन कुछ लोगों की आदत होती है कि वे बेडरूम में पूरी तरह अंधेरा करके सोते है। जबकि बेडरूम में अंधेरा करके सोना शुभ नहीं माना जाता है।

इसका मुख्य कारण तो यह है कि अंधेरे में सोने से नींद अधिक गहरी नहीं आती है। साथ ही कई बार इसी कारण बुरे सपने भी दिखाई देते हैं। इसका सबसे बड़ा कारण यह है कि बेडरूम में अंधेरा करके सोने से नकारात्मक विचार आते हैं। इसका कारण यही है कि कमरे में प्रकाश ना होने के कारण नकारात्मक ऊर्जा का प्रभाव बढ़ता है। जिसके कारण नकारात्मक विचार आते हैं। इसीलिए रात को बेडरूम में पूरी तरह अंधेरा करके नहीं सोना चाहिए।

छोटे बच्चों को सूर्य के दर्शन जरूर करवाना चाहिए क्योंकि...
जन्म के बाद वैदिक संस्कार के अनुसार बालक को निष्क्रमण संस्कार के समय सूर्य व चंद्र दोनों के दर्शन करने का भी रिवाज है। निष्क्रमण का अर्थ है बाहर निकालना। अब तक बच्चा घर की चार दीवारी में बंद था, लेकिन अब उसे घर के वातावरण में ही नहीं रहना। शरीर व मन के विकास के लिए शिशु को सूर्य की रोशनी व ठंडी हवा की जितनी आवश्यकता है। उतना किसी और वस्तु की नहीं। इसीलिए निष्क्रमण संस्कार किया जाता है।

सामान्य भाषा में इसे सूर्य पूजन ही कहा जाता है। हमारे देश के लगभग सभी क्षेत्रों में बच्चों के निष्क्रमण संसार के समय सूर्य व चंद्रमा की पूजा जरूर की जाती है लेकिन इसके पीछे कारण क्या है? यह बात बहुत कम लोग जानते है। दरअसल वैदिक मान्यता है कि संपूर्ण विश्व का नियंत्रण दो ही तत्व उष्णता और शीतलता करते हैं।

शरीर में गर्मी जीवन का चिन्ह है, शरीर का ठंडा पड़ जाना मतलब जीवन शक्ति में कमी आ जाना। संसार की गति व प्रगति सूर्य की ही देन है। इसीलिए नवजात शिशु को सूर्य के दर्शन करवाते हैं जिससे बच्चा सूर्य जैसा गतिशील रहे। चंद्र का काम शीतलता है। चंद्र को मन का स्वामी माना जाता है। इसलिए चंद्र के दर्शन करवाकर मंत्र बोलकर जल को नीचे की तरफ फेंका जाता है। उसे नीचे की तरफ फेंकने का अर्थ है चंद्र जनित मनोविकारों को नीचे धकेल देना।

जल्दी शादी के लिए हनुमानजी की पूजा क्यों करते हैं?
हनुमानजी को बालब्रह्माचारी माना गया है। मान्यता है कि जब किसी कन्याका विवाह न तय हो रहा हो, तो उसे ब्रह्मचारी हनुमानकी उपासना करना चाहिए। मानस शास्त्र के आधार पर कुछ लोगों की यहधारणा होती है कि सुंदर, बलवान पुरुषके साथ विवाह हो, इस कामनासे कन्याएं हनुमान की उपासना करती हैं या हनुमान स्तोत्र बोलने के लिए कहते हैं। हनुमानकी उपासना करनेसे ये कष्ट दूर हो जाते हैं व विवाह संभव हो जाता है। व्यक्तियोंके विवाह, भावी वधू या वरके एक-दूसरेसे अवास्तविक अपेक्षाओंके कारण नहीं हो पाते।

यदि प्रारब्ध मंद या मध्यम हो, तो कुलदेवताकी उपासना द्वारा प्रारब्धजनक अडचनें नष्ट हो जाती हैं व विवाह संभव हो जाता है । यदि प्रारब्ध तीव्र हो, तो केवल किसी संतकी कृपासे ही विवाह हो सकता है ।

हनुमान की उपासना करने ये कष्ट दूर हो जाते हैं व विवाह संभव हो जाता है। अपेक्षाओंको कम करनेपर विवाह संभव हो जाता है। यदि प्रारब्ध मंद या मध्यम हो, तो कुलदेवताकी उपासनाद्वारा प्रारब्धजनक अडचनें नष्ट हो जाती हैं व विवाह संभव हो जाता है । यदि प्रारब्ध तीव्र हो, तो केवल किसी संतकी कृपासे ही विवाह हो सकता है । इसीलिए शादी में विघ्न आने पर या देरी होने पर हनुमानजी की आराधना की जाती है।

पूजा में दही का उपयोग करना शुभ क्यों माना जाता है?
पंचामृत का पहला भाग दूध होता है जो हमें गाय से मिलता है गाय में देवी देवताओं का वास होने से दूध को अमृत माना गया है। इसीलिए कहा जाता है कि दूध व दही से सेवा करने से देवता भी प्रसन्न हो जाते हैं। स्वास्थ्य की दृष्टि से देखा जाए तो प्रसाद के रूप में पंचामृत में दही खाने से सभी प्रकार के रोगों का नाश भी होता है। इसीलिए भगवान के श्रीकृष्ण अवतार में उन्होंने विशेष रूप से दही व मक्खन का सेवन खुद भी किया व अपने मित्रों को भी करवाया क्योंकि इससे शरीर को अनेक तरह के लाभ होते हैं।

ज्योतिष के अनुसार सफेद रंग को चंद्र का कारक माना जाता है और चन्द्र को मन का कारक माना जाता है। ज्योतिषीय मान्यता के अनुसार कोई भी सफेद चीज खाने से मन एकाग्रता से उस कार्य में लगता है। पूजा के समय मंत्रोच्चार किया जाता है। दही भी भगवान को अर्पित किया जाता है। इस तरह दही अर्पित करने के बाद मंत्रोच्चार के साथ उसे भगवान के चरणामृत रूप में ग्रहण करने से विचारों में सकारात्मकता बढऩे लगती है। इसीलिए पूजा में दही अर्पित कर सभी को प्रसाद के रूप में बांटना शुभ माना जाता है।

जब एक नारी ने सिकंदर को दिया अच्छा सबक
सिकंदर विश्व विजय के लिए निकला था। जैसे-जैसे उसका विजय अभियान बढ़ता जा रहा था, उसकी साम्राज्य विस्तार की भूख भी बढ़ती जा रही थी। वह इसी चिंतन में लगा रहता कि कब, कैसे, किधर चढ़ाई की जाए?

उसका संपूर्ण अमला भी इसी दिशा में सक्रिय रहता था। एक दिन सिकंदर ने ऐसे नगर पर आक्रमण किया, जहां निहत्थी स्त्रियों के सिवाय कोई नहीं था। पुरुषविहीन इस नगर में आकर सिकंदर सोच में पड़ गया कि इन निहत्थी महिलाओं से किस प्रकार युद्ध किया जाए?

सोचते-सोचते वह परेशान हो गया और उसे कुछ सुझाई नहीं दिया। उसे बहुत भूख लगने लगी। उसने कहा- मुझे भूख लगी है। मेरे लिए भोजन लाओ। कुछ स्त्रियों ने कपड़े से ढंकी थालियां उसके सामने रख दीं।

सिकंदर ने कपड़ा हटाकर देखा तो थालियों में भोजन के स्थान पर स्वर्ण भरा था। भूख से व्याकुल सिकंदर ने कहा - यह सोना कैसे खाया जा सकता है? मुझे तो रोटियां चाहिए। तब एक महिला ने उत्तर दिया-यदि केवल रोटियां ही खाने के काम में आती होतीं तो क्या तुम्हारे देश में रोटियां नहीं थीं कि तुम दूसरों की रोटियां छीनने के लिए निकल पड़े?

सिकंदर अगले ही दिन वहां से लौट आया। उसने नगर के द्वार पर नगर की महान नारी से लिखवाया- अज्ञानी सिकंदर को इस नगर की महान नारी ने बहुत अच्छा सबक दिया है। राज्य विस्तार की इच्छा धन लिप्सा से प्रेरित होती है और धन लिप्सा विवेक को हर लेती है। इसलिए अपने सद्प्रयासों से जितना मिले, उसी में संतुष्ट रहना चाहिए।

बेडरूम में कभी ना लगाएं आइना क्योंकि...
दर्पण या आइना हमें हमारे व्यक्तित्व की झलक दिखाता है। सजना संवरना हर मनुष्य की सामान्य प्रवृति है। आइने के बिना अच्छे से सजने-संवरने की कल्पना भी नहीं की जा सकती। दिन में कई बार हम खुद को आइने में देखते हैं। इसी वजह आइना ऐसी जगह लगाया जाता है जहां से हम आसानी से खुद को देख सके। आइना कहां लगाना चाहिए और कहां नहीं इस संबंध में विद्वानों और वास्तुशास्त्रियों द्वारा कई महत्वपूर्ण बिंदू बताए गए हैं।

दर्पण के संबंध में एक सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि बेड रूम में आइना लगाना अशुभ है। ऐसा माना जाता है कि इससे पति-पत्नी को कई स्वास्थ्य संबंधी परेशानियां झेलनी पड़ती है। यदि पति-पत्नी रात को सोते समय आइने में देखते हैं तो इसका उनकी सेहत पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। यह वास्तु दोष ही है। इससे आपके आर्थिक पक्ष पर बुरा प्रभाव पड़ता है। साथ ही पति-पत्नी दोनों को दिनभर थकान महसूस होती है, आलस्य बना रहता है। इसी वजह से वास्तु के अनुसार बेड रूम में आइना न लगाने की सलाह दी जाती है या आइना ऐसी जगह लगाएं जहां से पति-पत्नी रात को सोते समय आइने में न देख सके।

नए कपड़े खरीदे शुक्रवार को क्योंकि...
सजने संवरने का शोक हर इंसान को होता है। इसीलिए हर व्यक्ति अपने व्यक्तित्व को और अधिक निखारने के लिए अच्छे से अच्छे कपड़ों का चुनाव करता है। नए कपड़े पहनकर फिलगुड तो सभी करते हैं लेकिन ज्योतिष के अनुसार यदि नए कपड़े शुक्रवार के दिन खरीदें जाएं या नए कपड़े शुक्रवार को पहने जाएं तो उसके अनेक लाभ है।

ज्योतिष के अनुसार हर कार्य के लिए एक विशेष वार बताया गया है। शुक्रवार को कपड़ों की खरीदी के लिए विशेष वार माना गया है। जबकि शनिवार को नए वस्त्र खरीदना व रविवार को नए वस्त्र धारण करना अच्छा नहीं माना जाता है। इसका मुख्य कारण यह है कि ज्योतिष के अनुसार शुक्र को धन, ऐश्वर्य व सुख, वस्त्र का कारक ग्रह माना जाता है।

मान्यता है कि शुक्रवार को नए कपड़े खरीदने पर शुक्र प्रसन्न होते हैं व उनकी विशेष कृपा प्राप्त होती है। इस दिन नए कपड़े खरीदने से वस्त्र पहनने से वो लंबे समय तक साथ निभाते हैं। साथ ही शीघ्र ही वस्त्र लाभ होता है। यानी शुक्रवार को वस्त्र खरीदने से वस्त्र लक्ष्मी प्रसन्न होती है और खरीदने वाले के पास हमेशा वस्त्र समृद्धि बनी रहती है। इसीलिए शुक्रवार के दिन नए कपड़े खरीदने चाहिए।

तो इसलिए उपवास के समय खाली पेट रहना भी ठीक नहीं
उपवास को हिन्दू धर्म में बहुत महत्वपूर्ण माना गया है। मान्यता है कि उपवास से तन व मन दोनों की ही शुद्धि होती है। लेकिन अधिकतर लोग दो तरह के उपवास करते हैं। कुछ लोग उपवास में बिल्कुल निराहार ही रहते हैं। जबकि दूसरी तरह के उपवास में अत्याधिक वसा से युक्त भोजन ग्रहण करते हैं। जबकि हमारे ऋषि-मुनि भी उपवास के समय पूरी तरह बिना आहार के नहीं रहते थे। अनुशासित दिनचर्या के साथ ही वे फलाहार ग्रहण करते थे।

वे उपवास काल में ज्यादा से ज्यादा समय मौन रहते थे। इसीलिए उनकी उपवास पद्धित से मन व तन दोनों की शुद्धि होती थी व उन्हें उपवास के पूर्ण परिणाम प्राप्त होते थे। उपवास के समय पूरी तरह भूखा भी नहीं रहना चाहिए क्योंकि इससे अपच, कब्ज व एसीडिटी जैसी पेट से जुड़ी अनेक परेशानियां हो सकती है। साथ ही बार-बार इसी पद्धति से उपवास करने से पाचन तंत्र कमजोर होने के साथ ही हाइपर एसीडिटी की समस्या हो सकती है। अगर आप भी चाहते हैं कि आपको उपवास का पूरा परिणाम प्राप्त हो तो इन बातों पर जरूर ध्यान दें।

- उपवास के एक या दो दिन पहले से ही भोजन पर विशेष ध्यान दें।

- यदि एक समय भोजन करें तो ज्यादा ना खाएं।

- उपवास के बीच सुबह-शाम प्राणायाम करना ठीक रहता है।

- उपवास काल में शारीरिक और मानसिक आराम को भी पूरी तरजीह देनी चाहिए।

- उपवास काल में मौन व्रत रखना भी अच्छा रहता है।

- स्थिति के अनुसार उपवास काल में स्पंज बाथ, मिट्टी की पट्टी, भ्रमण करना, आसन, कुंजर आदि चिकित्सा का सहारा लेना ठीक रहता है।

- नींबू-पानी, शहद या केवल दो-तीन गिलास पानी पीने से ही पेट की समस्या मिट जाया करती है।

ऐसा क्यों: मंदिर में बैठकर ही करना चाहिए दर्शन?
मंदिर जाने से सभी को मानसिक शांति व सुख महसूस होती है। इसीलिए लोग नियमित रूप से देवालय जाते हैं। किसी भी मंदिर में भगवान के होने की अनुभूति प्राप्त की जा सकती है। भगवान की प्रतिमा या उनके चित्र को देखकर हमारा मन शांत हो जाता है। हर व्यक्ति भगवान के मंदिर अनेक तरह की प्रार्थनाएं और समस्याएं लेकर जाता है। भगवान के सामने सपष्ट रूप से अपने मन के भावों को प्रकट कर देने से भी मन को शांति मिलती है, बेचैनी खत्म होती है।

लेकिन देवालय जाकर बहुत से लोगों की आदत होती है कि वे खड़े-खड़े दर्शन करते है। जबकि शास्त्रों के अनुसार यह गलत है। इसलिए मंदिर जाएं तो यह ध्यान रखें कि मंदिर में भगवान की मूर्ति के दर्शन हमेशा बैठकर करें। साथ ही दर्शन करते समय यह ध्यान रखें सबसे पहले मूर्ति के चरणों को देखें नतमस्तक होकर प्रार्थना करें।

फिर देवता के वक्ष पर, अर्थात् अनाहतचक्रपर मन एकाग्र करें व अंत में देव मूर्ति के नेत्रों की देखें व उनके रूप को अपने नेत्रोंमें बसाएं। मंदिर में कुछ भी मांगने या प्रार्थना करते समय दान लेने की, क्षमा याचना या आशीर्वाद लेने की अवस्था में बैठकर प्रार्थना करें। इससे आपकी हर मुराद तो शीघ्र ही पूरी होगी। साथ ही मंदिर जाने के पूर्ण सकारात्मक परिणाम भी मिलने लगेंगे।

शादी को धार्मिक संस्कार क्यों माना गया है?
वेदों के अनुसार हमारी समाजिक व्यवस्था में विवाह के तीन उद्देश्य माने गए हैं। धर्म,प्रजा और रति,। आजकल शादी का पहला उद्देश्य है विषय भोग, विषय भोग के साथ संतान आ जाती है। दूसरा उद्देश्य है धर्म का पालन व तीसरा है समाज के लिए धर्म पालन। समाज ने जो भी नियम कायदे बनाए हैं उन सभी का पालन शादी के बाद ही संभव है। लेकिन वैदिक व्यवस्था के अनुसार शादी का सबसे मुख्य उद्देश्य धर्म का पालन व सामाजिक व्यवहारों का पालन करना होता है।

यह माना जाता है कि हर व्यक्ति तीन तरह के ऋण से दबा हुआ है। ऋषि ऋण, पितृ ऋण, देव ऋण,। हमारे ऋषियों ने यह ज्ञान हम तक पहुंचाया है। उन ऋषियों के लिए हम ऋणी है। समाज के विद्वान लोग हमारे सामाजिक व्यवहार को बनाए रखते हैं, इसलिए हमें देवों के भी ऋणी है। माता-पिता जिन्हें हमें जन्म दिया, इसलिए हम माता-पिता के ऋणी हैं। वेदों में माना गया है कि जिन्होंने हमें जन्म दिया वैसे हमें भी विवाह करके परिवार और समाज को आगे बढ़ाकर पितृ ऋण चुकाना होता है।

इसीलिए इस तरह वंश को आगे बढ़ाना हमारा धर्म और कर्तव्य दोनों है। इसलिए वेदों के अनुसार विवाह एक धार्मिक संस्कार है। इसीलिए संस्कार के तौर पर अनेक विधि-विधान किए जाते हैं। अग्रि के चारों तरफ फेरे, सप्तपदी, आदि रस्में निभाई जाती है क्योंकि वेदों के अनुसार ये जन्म-जन्मातर का अटूट संबंध है।

तो इसलिए हम प्रार्थना करते हैं
प्राचीन समय से ही मनुष्य मुसीबतों से बचने के लिए प्रार्थना करता आया है। किसी भी किए गए कर्म का फल प्राप्त करने के लिए प्रार्थना की जाती है। विश्व के हर कोने में लोग प्रार्थना करते हैं। सुबह के समय अधिकतर लोग ईश्वर की प्रार्थना इसीलिए करते हैं ताकि पूरा दिन सुखद रहे। स्कुलों में बच्चे सामुहिक रूप से प्रार्थना करके पढ़ाई करते हैं। इसी तरह लोग अपनी -अपनी आजीविका चलाने के कार्य प्रारंभ करने पहले प्रार्थना करते हैं।

दरअसल प्रार्थना से परमेश्वर को प्रसन्न करने का प्रयास किया जाता है। जिससे शक्ति का संचार होता है। आत्मबल बढ़ता है और मानसिक शांति मिलती है। प्रार्थना से आशा व आकांक्षा जुड़ी होती है। शुद्ध मन से एकाग्रता व श्रद्धा के साथ की गई प्रार्थना से मनोवांछित फल मिलता है। इसके पीछे कारण यही है कि मनुष्य का जीवन पूरी तरह उसकी सोच व विश्वास से जुड़ा है। जो जैसा सोचता है जो सोचता है और उसके लिए पूरे आत्मबल के साथ कोशिश करता है। वह उसी ओर बढऩे लगता है। प्रार्थना से मनोबल बढऩे के साथ ही हमारा मन सकारात्मक ऊर्जा से भर जाता है व कार्य करने की और मुसीबतों से जुझने की शक्ति मिलती है। इसीलिए हम प्रार्थना करते हैं।

आम के पत्तों से बढ़ती है सुख-समृद्धि क्योंकि....
भारतीय संस्कृति और समाज में आम के वृक्ष को पूज्यनीय माना गया है। आम के फल मीठे होने के साथ ही बहुत लाभकारी व गुणकारी होते हैं। पूजा-पाठ अनुष्ठान आदि में जब भी मांगलिक कलश की स्थापना की जाती है। तब जल से भरे कलश के ऊपर भी आम की पत्तियां रखी जाती हैं। जब भी कोई मांगलिक कार्य होता है तो आम की पत्तियों को पतले धागों में लटकाकर घर के प्रवेश द्वार पर बांधी जाती है। इसके अलावा मंडप सजाने के लिए भी आम की पत्तियों का उपयोग किया जाता है।

तोरण, बांस के खंबे आदि में भी आम की पत्तियां लगाने की परंपरा है।

दरअसल हमारी भारतीय संस्कृति में आम के पेड़ की लकडिय़ों का उपयोग समिधा के रूप में वैदिक काल से ही किया जा रहा है। माना जाता है कि आम की लकड़ी, घी, हवन सामग्री आदि के हवन में प्रयोग से वतावरण में सकारात्मकता बढ़ती है। घर के मुख्यद्वार पर आम की पत्तियां लटकाने से घर में प्रवेश करने वाले हर व्यक्ति के प्रवेश करने के साथ ही सकारात्मक ऊर्जा घर में आती है।जिससे घर में सुख व समृद्धि बढ़ती है।इन्हें लटकाने से बिना विघ्न सारे मांगलिक कार्य सम्पन्न हो जाते हैं। इसीलिए दरवाजे पर आम के पत्तों को लटकाना हमारे शास्त्रों के अनुसार बहुत शुभ माना गया है।

शिवलिंग पर चढ़ाया गया प्रसाद लेना चाहिए या नहीं?
शिव को शंकर, भोले, महाकाल, निलकंठेश्वर और भी कितने ही नामों से पुकारा जाता है। शिव ही एक मात्र ऐसे देवता हैं जिनका लिंग के रूप में पूजन किया जाता है। माना जाता है कि शिवजी ने कभी कोई अवतार नहीं लिया। मान्यता है कि शिवजी का शिवलिंग के रूप में पूजन करने से जन्मों के पापों का नाश हो जाता है। कई लोग नियमित रूप से शिवलिंग की पूजा व आराधना कर व कुछ लोग नियमित रूप से मंदिर जाकर शिवलिंग को नैवेद्य अर्पित करते हैं। लेकिन बहुत कम लोग उसे प्रसाद रूप में ग्रहण करते हैं।

अधिकांश लोग शिवलिंग पर चढ़ाए गए प्रसाद को ग्रहण नहीं करते हैं क्योंकि उनके मन में यही भावना होती है कि शिवलिंग पर चढ़ा हुआ प्रसाद ग्रहण करना चाहिए या नहीं। शिवपुराण के अनुसार जो बाहर व भीतर से शुद्ध है, उत्तम व्रत का पालन करने वाले हर व्यक्ति को शिव को चढ़ाया गया प्रसाद जरूर ग्रहण करना चाहिए। शिव के नैवेद्य को देख लेने मात्र से ही कई दोष दूर हो जाते हैं। उसको देख लेने से करोड़ो पुण्य भीतर आ जाते हैं। स्फटिक शिवलिंग, रत्नजडि़त शिवलिंग, केसर निर्मित शिवलिंग आदि किसी भी तरह के शिवलिंग पर नैवेद्य चढ़ाने से और उसे ग्रहण करने से ब्रह्म हत्या करने का पाप भी नष्ट हो जाता है। इसीलिए शिवलिंग पर चढ़ाया गया प्रसाद जरूर ग्रहण करना चाहिए।

झाड़ू को ऐसी जगह रखें जहां किसी की नजर ना पड़े क्योंकि...
झाड़ू घर का कचरा बाहर करती है और कचरे को दरिद्रता का प्रतीक माना जाता है। सही समय पर झाड़ू लगाना शगुन व गलत समय पर झाड़ू लगाना अपशगुन माना जाता है।

दरअसल इसका कारण यह है कि हमारे यहां झाड़ू को लक्ष्मी का रूप माना जाता है।जिस घर में पूरी साफ-सफाई रहती है वहां सुख-शांति रहती है। इसके विपरित जहां गंदगी रहती है वहां दरिद्रता का वास होता है। ऐसे घरों में रहने वाले सभी सदस्यों को कई प्रकार की आर्थिक परेशानियों का सामना करना पड़ता है।

इसी कारण घर को पूरी तरह साफ रखने पर जोर दिया जाता है ताकि घर की दरिद्रता दूर हो सके और महालक्ष्मी की कृपा प्राप्त हो सके। घर से दरिद्रता रूपी कचरे को दूर करके झाड़ू यानि महालक्ष्मी हमें धन-धान्य, सुख-संपत्ति प्रदान करती है।

जब घर में झाड़ू का कार्य न हो तब उसे ऐसे स्थान पर रखा जाता है जहां किसी की नजर न पड़े। वास्तु के अनुसार भी ऐसी मान्यता है कि यदि झाड़ू बाहर दिखाई देती है तो घर में कलह होता है। साथ ही माना जाता है कि झाड़ू का पैर लगने से उसका अपमान होता है। इसीलिए झाड़ू को हमेशा छुपाकर रखना चाहिए जहां किसी की नजर एकदम ना पड़े क्योंकि मान्यता है कि इससे घर की बरकत जाती है।

इसलिए दरवाजे पर जरूर लगाएं आम की लकड़ी का स्वस्तिक
हिन्दू धर्म व भारतीय संस्कृति में मांगलिक चिन्हों का विशेष महत्व है। स्वस्तिक, ऊं, गणेशजी आदि कुछ ऐसे चिन्ह है। जिन्हें बहुत शुभ व मंगलमय माना गया है। इसीलिए शादी हो या अन्य कोई कार्यक्रम इन सभी चिन्हों को पूजन में जरूर किया जाता है। सभी मांगलिक चिन्हों में से स्वस्तिक सबसे कल्याणकारी चिन्ह है। इस चिन्ह को सौभाग्य का प्रतीक माना जाता है। जिन्हें शुभ कार्यो में आम की पत्तियों को आपने लोगों को अक्सर घर के दरवाजे पर बांधते हुए देखा होगा क्योंकि आम की पत्ती ,इसकी लकड़ी ,फल को ज्योतिष की दृष्टी से भी बहुत शुभ माना जाता है।

आम की लकड़ी और स्वास्तिक दोनों का संगम आम की लकड़ी का स्वस्तिक उपयोग किया जाए तो इसका बहुत ही शुभ प्रभाव पड़ता है। यदि किसी घर में किसी भी तरह वास्तुदोष हो तो जिस कोण में वास्तु दोष है उसमें आम की लकड़ी से बना स्वास्तिक लगाने से वास्तुदोष में कमी आती है क्योंकि आम की लकड़ी में सकारात्मक ऊर्जा को अवशोषित करती है। यदि इसे घर के प्रवेश द्वार पर लगाया जाए तो घर के सुख समृद्धि में वृद्धि होती है। इसके अलावा पूजा के स्थान पर भी इसे लगाये जाने का अपने आप में विशेष प्रभाव बनता है। इससे घर से कई तरह के वास्तुदोषों का प्रभाव बहुत कम हो जाता है। इसीलिए घर के दरवाजे पर आम की लकड़ी का स्वस्तिक जरूर लगाना चाहिए ताकि घर में हमेशा सुख-समृद्धि बनी रहे।

क्यों चार महीने तक पाताल में रहते हैं भगवान विष्णु?
आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी को देवशयनी एकादशी कहते हैं। सूर्य के मिथुन राशि में आने पर ये एकादशी आती है। धर्म शास्त्रों के अनुसार इस दिन से भगवान श्रीहरि विष्णु क्षीरसागर में शयन करते हैं और फिर लगभग चार माह बाद तुला राशि में सूर्य के जाने पर पुन: सृष्टि का संचालन करते हैं, इसलिए इसे देवशयनी एकादशी कहते हैं। इस दौरान कोई मांगलिक कार्य नहीं किया जाता। इस बार देवशयनी एकादशी 11 जुलाई, सोमवार को है।

धर्म शास्त्रों के अनुसार भगवान हरि ने वामन रूप में दैत्य बलि के यज्ञ में तीन पग दान के रूप में मांगे। भगवान ने पहले पग में संपूर्ण पृथ्वी, आकाश और सभी दिशाओं को ढक लिया। अगले पग में सम्पूर्ण स्वर्ग लोक ले लिया। तीसरे पग में बलि ने अपने आप को समर्पित करते हुए सिर पर पग रखने को कहा। इस प्रकार के दान से भगवान ने प्रसन्न होकर पाताल लोक का अधिपति बना दिया और कहा वर मांगो। बलि ने वर मांगते हुए कहा कि भगवान आप मेरे महल में नित्य रहें। तब भगवान ने बलि की भक्ति को देखते हुए चार मास तक उसके महल में रहने का वरदान दिया। धार्मिक मान्यता के अनुसार भगवान विष्णु देवशयनी एकादशी से देव प्रबोधिनी एकादशी तक पाताल में बलि के महल में निवास करते हैं। इस समय को चातुर्मास कहते हैं।

चमत्कारी फल मिलता है देवशयनी एकादशी व्रत से
एक बार देवर्षि नारद ने ब्रह्माजी से देवशयनी एकादशी का महत्व जानना चाहा। तब ब्रह्माजी ने उन्हें बताया- सतयुग में मांधाता नामक एक चक्रवर्ती राजा था। उनके राज्य में प्रजा बहुत सुखी थी। एक बार उनके राज्य में भयंकर अकाल पड़ा। इस अकाल से चारों ओर त्राहि-त्राहि मच गई। प्रजा ने राजा के पास जाकर अपनी व्यथा सुनाई। राजा मांधाता यह देखकर बहुत दु:खी हुए। फिर इस कष्ट से मुक्ति पाने का कोई साधन करने के उद्देश्य से राजा सेना को लेकर जंगल की ओर चल दिए।

वहाँ वे एक दिन ब्रह्माजी के पुत्र अंगिरा ऋषि के आश्रम में पहुँचे। अंगिरा ऋषि ने उनके जंगल में घुमने का कारण पूछा तो राजा ने अपनी समस्या बताई। तब महर्षि अंगिरा ने कहा कि सब युगों से उत्तम यह सतयुग है। इसमें छोटे से पाप का भी बड़ा भयंकर दंड मिलता है। ब्राह्मण के अतिरिक्त किसी अन्य जाति को तप करने का अधिकार नहीं है जबकि आपके राज्य में एक अन्य जाति का व्यक्ति तप कर रहा है इसीलिए आपके राज्य में वर्षा नहीं हो रही है। जब तक उसका अंत नहीं होगा तब तक यह अकाल समाप्त नहीं होगा।

किंतु राजा का हृदय एक निरपराध तपस्वी को मारने को तैयार नहीं हुआ। तब महर्षि अंगिरा ने राजा को आषाढ़ मास के शुक्लपक्ष की एकादशी का व्रत करने के लिए कहा। राजा के साथ ही सभी नागरिकों ने भी देवशयनी एकादशी का व्रत विधिपूर्वक किया। व्रत के प्रभाव से उनके राज्य में मूसलधार वर्षा हुई और पूरा राज्य धन-धान्य से परिपूर्ण हो गया।

क्यों बनाने चाहिए घर के बाहर पैरों के निशान?

हिन्दू धर्म व संस्कृति में घर के बाहर रंगोली बनाना। घर के मुख्यद्वार पर विनायकजी बैठाना और घर के बाहर पैरों के छोटे-छोटे कुमकुम के निशान बनाने को हमारे यहां शुभ शगुन माना जाता है। इसीलिए लोग सिर्फ दीपावली के समय विशेष रूप से हल्दी-कुमकुम के पैर बनाते हैं। लेकिन यदि घर के बाहर कुमकुम के छोटे-छोटे पैर बारह महीने बने रहें तो इसके भी अनेक लाभ है। शास्त्रों में माता लक्ष्मी को प्रसन्न करने के कई उपाय बताए गए हैं इन्हीं में से एक है देवी के पैरों के निशान मुख्य द्वार के यहां जमीन पर लगाना।

मुख्य के नीचे बाहर की ओर देवी लक्ष्मी के लाल रंग चरणों के चिन्ह बनाए जाते हैं। इससे सभी देवी-देवताओं की शुभ दृष्टि हमारे घर और सदस्यों पर सदैव बनी रहती है। ज्योतिष के अनुसार अशुभ ग्रहों का बुरा प्रभाव भी कम होता है। इसके अलावा हमारे घर पर किसी की बुरी नजर नहीं लगती है और नकारात्मक ऊर्जा का नाश होता है। सभी सदस्यों में पॉजीटिव एनर्जी का संचार होता है। इसीलिए घर के बाहर कुमकुम के पैर जरूर बनाना चाहिए।



ऐसे दान से मिलेगी सुविधापूर्वक यमलोक की यात्रा क्योंकि...
विज्ञान का एक सिद्धांत हैं कि ऊर्जा को न तो उत्पन्न किया जा सकता है। न नष्ट किया जा सकता है सिर्फ एक रूप से दूसरे रूप में परिवर्तित किया जा सकता है। सही भी है क्योंकि न सिर्फ विज्ञान के अनुसार बल्कि हमारे धर्मग्रंथ में यह कहा गया है कि हर मनुष्य को क्रिया की प्रतिक्रिया जरूर मिलती है। यानी अपना किया काम शुभाशुभ कर्म बिना विचारे किये गए हर काम का परिणाम मनुष्य को भुगतना ही पड़ता है।

लेकिन शिवपुराण में कुछ ऐसी वस्तुओं के दान बताएं गए है। जिनसे यमलोक मार्ग के कष्ट नहीं उठाने पड़ते है। ब्राह्मणों को खड़ाऊ दान करता है वह घोड़े पर सवार होकर यमलोक जाता है। शिविका का दान करने से मनुष्य रथयात्रा कर यमलोक पहुंचता है। शय्या और आसन का दान देने वाला यमलोक तक सुखपूर्वक जाता है। दीपदान करने वाले सभी दिशाओं को प्रकाशित करते हुए जाते हैं। जो जल दान करने से दान देने वाला ऐसे रास्ते से यमपुरी जाता है जहां जल की सुविधा हो।

कुल मिलाकर अन्न, घोड़ा,गाय, शय्या, वस्त्र, छत्र आदि का दान यमलोक के लिए उत्तम माना गया है। शिवपुराण के अनुसार इस प्रकार इन सभी वस्तुओं को दान करने वाला मनुष्य विमान पर बैठकर स्वर्ग जाता है। कुल मिलाकर शिवपुराण के इस वर्णन से यह सपष्ट होता है कि कोई व्यक्ति यदि जरूरतमंद को उसकी आवश्यकता के अनुसार दान करता है तो वह यमराज के नहीं धर्मराज के नगर जाता है।

घर में क्यों और किस दिशा में लगाना चाहिए भगवान की तस्वीर?
वास्तु के अनुसार हमारा पूरा घर वास्तु पुरूष के अनुरूप होना चाहिए। अगर घर वास्तुपुरूष के अनुरूप नहीं होता है तो घर वालों को कई तरह की समस्याओं का सामना करना पड़ता है। वास्तु के अनुसार घर में ईशान्य कोण को पूजन करने के लिए, भगवान की मूर्ति स्थापना के लिए या भगवान की तस्वीर लगाने के लिए सबसे उत्तम कोना माना गया है।

दरअसल इसका मुख्य कारण यह है कि ईशान्यकोण यानी उत्तर पूर्वी कोने को वास्तु पुरूष का सिर माना गया है। इसीलिए घर के उत्तर पूर्वी कोने को वास्तु के अनुसार सात्विक ऊर्जाओं का प्रमुख स्त्रोत माना गया है। ईशान्य कोण का अधिपति शिव को माना गया है। ईशान्य कोण घर के सभी अन्य क्षेत्रों से नीचा होना चाहिए। ऐसे घर में सकारात्मक ऊर्जा का निवास होता है बाद में ये ऊर्जाएं पूरे घर में फैल जाती है। साथ उत्तर -पूर्व बृहस्पति की दिशा है। बृहस्पति ग्रह जीवन का कारक है। बृहस्पति को ज्योतिष के अनुसार धर्म व आध्यात्म का कारक ग्रह माना गया है। इसीलिए भगवान की तस्वीर ईशान्य कोण में लगाना वास्तु के अनुसार बहुत शुभ माना गया है।

चातुर्मास में क्या करें, क्या नहीं?
हिंदू धर्म में चातुर्मास का विशेष महत्व है। चातुर्मास में मांगलिक कार्य नहीं किए जाते तथा धार्मिक क्रिया-कलापों पर अधिक ध्यान दिया जाता है। चातुर्मास के अंतर्गत सावन, भादौ, अश्विन व कार्तिक मास आता है। ऐसा माना जाता है कि इस दौरान भगवान विष्णु विश्राम करते हैं। चातुर्मास का प्रारंभ 11 जुलाई (देवशयनी एकादशी) से हो चुका है जिसका समापन 6 नवंबर(देव प्रबोधिनी एकादशी पर होगा। हमारे धर्म ग्रंथों में चातुर्मास के दौरान कई नियमों का पालन करना अनिवार्य बताया गया है तथा उन नियमों का पालन करने से मिलने वाले फलों का भी वर्णन किया गया है। चातुर्मास में क्या करें और क्या नहीं, इसकी संक्षिप्त जानकारी नीचे दी गई है-

यह ग्रहण करें
- शारीरिक शुद्धि या सुंदरता के लिए परिमित प्रमाण(संतुलित मात्रा) के पंचगव्य( दूध, दही, घी गोमय, गोबर) का।

- वंश वृद्धि के लिए नियमित दूध का।

- पापों के नाश व पुण्य प्राप्ति के लिए एकभुक्त, नक्तव्रत, अयाचित(बिना मांगा) भोजन या सर्वथा उपवास करने का व्रत ग्रहण करें।

इनका त्याग करें

- मधुर स्वर के लिए गुड़ का त्या करें।

- दीर्घायु अथवा पुत्र-पौत्रादि की प्राप्ति के लिए तेल का।

- शत्रु नाश के लिए कड़वे तेल का।

- सौभाग्य के लिए मीठे तेल का।

- स्वर्ग प्राप्ति के लिए पुष्पादि भोगों का।

- प्रभु शयन(चातुर्मास) के दिनों में सभी प्रकार के मांगलिक कार्य जहाँ तक हो सके न करें। पलंग पर सोना, भार्या का संग करना, झूठ बोलना, मांस, शहद और दूसरे का दिया दही-भात आदि का भोजन करना, हरी सब्जी, मूली, पटोल एवं बैंगन आदि का भी त्याग कर देना चाहिए।

शनिदेव को मनाने के लिए हनुमानजी को तेल क्यों चढ़ाते हैं?
हनुमानजी को संकटमोचन कहा जाता है। कहते हैं हनुमानजी अपने सभी भक्तों के जीवन से संकट को हर लेते हैं। अधिकतर ज्योतिष शनि देव को प्रसन्न करने के लिए या उनके कोप को कम करने के लिए हनुमान के पूजन को कहते हैं। पौराणिक ग्रंथों के अनुसार शनि और हनुमान से जुड़ी एक कथा है।

कथा के अनुसार शनि को स्वभाव से क्रुर ग्रह माना गया है। शनि का स्वभाव कुछ उद्दण्ड था। अपने स्वभाव के चलते उन्होंने श्री हनुमानजी को तंग करना शुरू कर दिया। बहुत समझाने पर भी वह नहीं माने तब हनुमानजी ने उसको सबक सिखाया। हनुमान की मार से पीडि़त शनि ने उनसे क्षमा याचना की तो करुणावश हनुमानजी ने उनको घावों पर लगाने के लिए तेल दिया। शनि महाराज ने वचन दिया जो हनुमान का पूजन करेगा और उन्हें तेल अर्पित करेगा वे उस पर कृपा करेंगे। इसीलिए शनि की साढ़े-साती या किसी भी तरह से शनि का अशुभ प्रभाव होने पर उससे मुक्ति के लिए हनुमानजी को तेल अर्पित किया जाता है।

सावन में शिवलिंग पर दूध क्यों चढ़ाया जाता है?
हमारे हिंदू धर्म में त्रिदेवों अर्थात भगवान ब्रह्मा, विष्णु व शंकर का अपना एक विशिष्ट स्थान है और इसमें भी भगवान शंकर का चरित्र जहाँ अत्यधिक रोचक हैं वहीं यह पौराणिक कथाओं में अत्यधिक गूढ रहस्यों से भी भरा हुआ है। भगवान शिव को विश्वास का प्रतीक माना गया है क्योंकि उनका अपना चरित्र अनेक विरोधाभासों से भरा हुआ है जैसे शिव का अर्थ है जो शुभकर व कल्याणकारी हो, जबकि शिवजी का अपना व्यक्तित्व इससे जरा भी मेल नहीं खाता, क्योंकि वे अपने शरीर में इत्र के स्थान पर चिता की राख मलते हैं तथा गले में फूल-मालाओं के स्थान पर विषैले सर्पों को धारण करते हैं। वे अकेले ही ऐसे देवता हैं जो लिंग के रूप में पूजे जाते हैं। सावन में शिवलिंग पर दूध चढ़ाने का विशेष महत्व माना गया है। इसीलिए शिव भक्त सावन के महीने में शिवजी को प्रसन्न करने के लिए उन पर दूध की धार अर्पित करते हैं।

पुराणों में भी कहा गया है कि इससे पाप क्षीण होते हैं। लेकिन सावन में शिवलिंग पर दूध चढ़ाने का सिर्फ धार्मिक ही नहीं वैज्ञानिक महत्व भी है। सावन के महीने में दूध का सेवन नहीं करना चाहिए। शिव ऐसे देव हैं जो दूसरों के कल्याण के लिए हलाहल भी पी सकते हैं। इसीलिए सावन में शिव को दूध अर्पित करने की प्रथा बनाई गई है क्योंकि सावन के महीने में गाय या भैस घास के साथ कई ऐसे कीड़े-मकोड़ो को भी खा जाती है। जो दूध को स्वास्थ्य के लिए गुणकारी के बजाय हानिकारक बना देती है। इसीलिए सावन मास में दूध का सेवन न करते हुए उसे शिव को अर्पित करने का विधान बनाया गया है।

आप जानते हैं,शाम के समय किसी को भी पैसे क्यों नहीं देने चाहिए?
हिन्दू धर्म में शाम के समय को पूजा व आराधना के लिए बहुत अधिक महत्वपूर्ण माना जाता है। शाम का समय भगवान की आराधना के लिए सबसे शुभ होता है ऐसी मान्यता है। सूर्यास्त के समय से जुड़ी सिर्फ यही एक मान्यता नहीं है। ऐसी अनेक मान्यताएं हैं जिनका पालन हमारे बड़े-बुजूर्गो ने जरूरी माना है या जिनका पालन ना करने पर किसी ना किसी तरह का आर्थिक या शारीरिक हानि होती है जैसे सूर्यास्त के समय भोजन ना करना, पढ़ाई ना करना, घर की साफ-सफाई ना करना आदि ऐसी ही कुछ मान्यताएं हैं। ऐसी ही एक मान्यता है कि सूर्यास्त के समय किसी को पैसा नहीं देना चाहिए।

हमारे शास्त्रों के अनुसार सूर्यास्त के समय पैसे देने से या मां लक्ष्मी रूष्ट हो जाती हैं। सूर्यास्त के समय किसी को पैसा देने से घर में व व्यापार में बरकत नहीं रहती क्योंकि शाम के समय को वैदिक काल से ही ऐसा समय माना जाता है जिसमें किसी भी तरह का मंत्र जप करने, पूजन करने से या दीप प्रज्वलित करने से विशेष फल प्राप्त होता है। चौबीस घंटे के पूरे दिन में सिर्फ सूर्य उदयके पूर्व व सूर्यास्त को ही सबसे अधिक शुभ व फलदायी माना जाता है। इसीलिए इस समय ध्यान व आराधना के लिए विशेष माना गया है।

इसीलिए इस समय किए गए हर कार्य का विशेष महत्व होता है और उसका विशेष फल प्राप्त होता है। इस समय किसी के द्वारा पैसे दिए जाते हैं तो लेने वाले के लिए इसे बहुत अच्छा शगुन माना जाता है क्योंकि इस समय किसी के द्वारा पैसा दिया जाना व घर में लक्ष्मी आने से घर से दरिद्रता मिटती है।

शनि की उतरती हुई साढ़ेसाती को अच्छा क्यों माना जाता है?
शनि को न्यायाधिश का पद प्राप्त है। यह हमें हमारे कर्मों का फल प्रदान करता है। जिस व्यक्ति के जैसे कर्म होते हैं उसी के अनुसार उन्हें फल की प्राप्ति होती है। शनि साढ़ेसाती और ढैय्या के समय सबसे अधिक प्रभावी होता है।किसी भी राशि पर शनि देव का अच्छा और बुरा असर साढ़े सात साल तक होता है। इस समय को शनि की साढ़े साती कहा जाता है।

कहा जाता है शनि की साढ़े साती बुरी होती है और इस समय में व्यक्ति परेशान हो जाता है। व्यक्ति के पास कुछ नही बचता। लेकिन ऐसा नही है खत्म होती शनि की साढ़े साती में जातक को शनि देव कुछ न कुछ देकर ही जाते हैं।

शनि की साढ़े-साती वह समय है जब इंसान के अच्छे और बुरे दोनों तरह के कार्यों को परिणाम मिलता है। शनि न्याय के देवता है। साढ़ेसाती की शुरूआत का समय जातक की परिक्षा का समय होता है। शनि जातक को इन साढ़े-सात सालों में सोने से तपाकर कुंदन बनाता है। साढ़े-सात सालों के बाद शनि जाते-जाते कुछ न कुछ देकर ही जाता है। इसीलिए शनि की साढ़ेसाती के अंतिम चरण को बहुत शुभ और अच्छे परिणाम देने वाली माना जाता है।

सावन में जरूर करना चाहिए स्फटिक शिवलिंग की पूजा क्योंकि...
स्फटिक को हीरे का उपरत्न कहा जाता है। स्फटिक को कांचमणि, बिल्लोर, बर्फ का पत्थर तथा अंग्रेजी में रॉक क्रिस्टल कहा जाता है। यह एक पारदर्शी रत्न है। इसे स्फटिक मणि भी कहा जाता है। स्फटिक बर्फ के पहाड़ों पर बर्फ के नीचे टुकड़े के रूप में पाया जाता है। यह बर्फ के समान पारदर्शी और सफेद होता है। यह मणि के समान है। इसलिए स्फटिक के श्रीयंत्र को बहुत पवित्र माना जाता है। यह यंत्र ब्रम्हा, विष्णु, महेश यानि त्रिमूर्ति का स्वरुप माना जाता है।स्फटिक श्रीयंत्र का स्फटिक का बना होने के कारण इस पर जब सफेद प्रकाश पड़ता है तो ये उस प्रकाश को परावर्तित कर इन्द्र धनुष के रंगों के रूप में परावर्तित कर देती है।

यदि आप चाहते है कि आपकी जिन्दगी भी खुशी और सकारात्मक ऊर्जा के रंगों से भर जाए तो घर में सावन में स्फटिक शिवलिंग स्थापित करें। यह शिवलिंग घर से हर तरह की नेगेटिव एनर्जी को दूर करता है। घर में पॉजिटिव माहौल को बनाता है। जिस घर में यह शिवलिंग स्थापित कर दिया जाता है। पूरे सावन के महीने इसका नियमित रूप से अभिषेक करने से घर से कई तरह के वास्तुदोष दूर होते हैं। जिस घर में ये शिवलिंग स्थापित करके एक महीने तक नियमित रूप से पंचामृत द्वारा अभिषेक किया जाता है।वहां पैसा बरसने लगता है साथ ही जो भी व्यक्ति इसे स्थापित करता है उसके जीवन में नाम पैसा दौलत शोहरत सब कुछ होता है।

नजर से बचने के लिए काला धागा क्यों बांधा जाता है?
जब भी हमारे खुशियां दुख में बदल जाए या हमेशा प्राप्त होने वाला धन लाभ अचानक हानि में बदल जाए या परिवार का आपसी तालमेल बिगड़ जाए इसी प्रकार की घटनाएं होने लगे तक संभव है कि आपको या आपके परिवार या आपकी जॉब या व्यवसाय को किसी की बुरी नजर लगी हो। इससे बचने के लिए ज्योतिष में कई तरीके बताए गए हैं। जैसे छोटे बच्चों या लड़कियों की सुंदरता को किसी भी बुरी नजर न लगे इसके लिए उन्हें काला टीका लगाना चाहिए। बुरी नजर लगने के पीछे वैज्ञानिक कारण भी मौजूद हैं। हमारा शरीर पंच तत्वों से मिलकर बना है। यह पंच तत्व हैं- पृथ्वी, वायु, अग्नि, जल और आकाश।

इन्हीं पंच तत्वों से मिलने वाली ऊर्जा ही हमारे शरीर का संचालन करती हैं। इनसे मिलने वाली ऊर्जा से ही हम सभी सुविधाओं को प्राप्त करते हैं। जब किसी इंसान की बुरी नजर हमारी सुविधाओं को लगती है तब इन पंच तत्वों से मिलने वाली संबंधित सकारात्मक ऊर्जा हम तक नहीं पहुंच पाती है। इसीलिए गले में काला धागा बांधा जाता है। यह तो वैज्ञानिक मान्यता है कि काला रंग उष्मा का अवशोषक होता है। यह माना जाता है कि काला धागा बुरी नजर को या बुरा ऊर्जाओं को अवशोषित कर लेता है व उनका प्रभाव हम पर नहीं पडऩे देता है। इसीलिए बुरी नजर लगने पर काला धागा बांधा जाता है।

हिन्दू धर्म के अनुसार मसुर की दाल क्यों नहीं खाना चाहिए?
हमारे धर्म की अनेक परंपराएं खाने से भी जुड़ी हैं। हमारे धर्मशास्त्रों के अनुसार कुछ चीजों को त्याज्य माना गया है। अधिकांश लोग जो पूजा-पाठ या ध्यान साधना करते हैं। वे सात्विक भोजन करते हैं। माना जाता है कि सात्विक भोजन लेने से साधक का ध्यान साधना से नहीं भटकता है। लहसून व प्याज की तरह ही मसुर की दाल को भी तामसिक स्वभाव का भोजन माना गया है। माना जाता है कि तामसिक चीजों के सेवन से कामवासना और क्रोध बढ़ते हैं।

मसुर की दाल के सेवन को धर्म शास्त्रों के अनुसार भी वर्जित माना गया है। दरअसल इससे जुड़ी एक कथा के अनुसार मसुर की दाल कामधेनु के रक्त का रूप मानी गई है। इसीलिए पूजा में मां काली को विशेष रूप से मसुर की दाल अर्पित की जाती है। कथा के अनुसार जमदग्रि ऋषि के पास कामधेनु गाय थी। जिसे सहस्त्रार्जुन ने आश्रम से ले जाना चाहा और उसने इसी कोशिश में कामधेनु को कुछ तीर मारे और जब उन तीरों से घायल कामधेनु का रक्त जमीन पर गिरा तो मसुर की दाल का पौधा उत्पन्न हुआ। इसीलिए हिन्दू धर्म शास्त्रों के अनुसार मसुर की दाल का सेवन अच्छा नहीं माना गया है।

शिवजी को नशीले पदार्थ क्यों चढ़ाए जाते हैं?
शिवजी उन सभी पदार्थों को ग्रहण करते हैं जो सामान्यत: ग्रहण करने योग्य नहीं माने जाते है। लेकिन ऐसा क्यों है? कि शिव को भांग व धतुरे जैसे नशीले पदार्थ चढ़ाए जाते हैं? दरअसल इसका कारण यह है कि भगवान शिव सन्यासी हैं और उनकी जीवन शैली बहुत अलग है। वे पहाड़ों पर रह कर समाधि लगाते हैं और वहीं पर ही निवास करते हैं। जैसे अभी भी कई सन्यासी पहाड़ों पर ही रहते हैं। पहाड़ों में होने वाली बर्फबारी से वहां का वातावरण अधिकांश समय बहुत ठंडा होता है। गांजा, धतूरा, भांग जैसी चीजें नशे के साथ ही शरीर को गरमी भी प्रदान करती हैं।जो वहां सन्यासियों को जीवन गुजारने में मददगार होती है।

अगर थोड़ी मात्रा में ली जाए तो यह औषधि का काम भी करती है, इससे अनिद्रा, भूख आदि कम लगना जैसी समस्याएं भी मिटाई जा सकती हैं लेकिन अधिक मात्रा में लेने या नियमित सेवन करने पर यह शरीर को, खासतौर पर आंतों को काफी प्रभावित करती हैं।इसकी गर्म तासीर और औषधिय गुणों के कारण ही इसे शिव से जोड़ा गया है। भांग-धतूरे और गांजा जैसी चीजों को शिव से जोडऩे का एक और दार्शनिक कारण भी है। ये चीजें त्याज्य श्रेणी में आती हैं, शिव का यह संदेश है कि मैं उनके साथ भी हूं जो सभ्य समाजों द्वारा त्याग दिए जाते हैं। जो मुझे समर्पित हो जाता है, मैं उसका हो जाता हूं।

सिर्फ शिवजी को चढ़ाना ही नहीं खाना भी चाहिए बिल्वपत्र क्योंकि....
शिव के पूजन अर्चन से भक्तों पर उनकी विशेष कृपा होती है। शिवजी को पूजन के समय बिल्वपत्र विशेष रूप से अर्पित किए जाते हैं। सावन में शिवलिंग पर नियमित रूप से बिल्वपत्र सिर्फ चढ़ाना ही नहीं बल्कि उसे प्रसाद के रूप में ग्रहण करने का सिर्फ धार्मिक ही नहीं वैज्ञानिक महत्व भी बहुत अधिक है। वैज्ञानिक प्रयोगों से सिद्ध हुआ कि बेल के पत्ते बिल्व पत्र में छूने से वह गुण है कि उक्त कमी को पूरा कर देता है।

बिल्व पत्र तोड़े जाने के बाद भी 20 -21 दिन तक यह गुण रहता है शायद इसीलिये सावन में बेल पत्ते को बार बार छूने के लिए इसको धार्मिक महत्व दिया गया हो वैसे बेल और बेल पत्ते में अन्य औषधीय गुण भी होते है। बिल्वपत्र उत्तम वायुनाशक, कफ- मिटाने वाला है। ये कृमि व दुर्गन्ध का नाश करते हैं। बिल्वपत्र उडऩशील तैल व इगेलिन, इगेलेनिन नामक क्षार-तत्त्व आदि औषधीय गुणों से भरपूर हैं।

बिल्वपत्र ज्वरनाशक, वेदनाहर, कृमिनाशक, संग्राही (मल को बाँधकर लाने वाले) व सूजन उतारने वाो हैं। ये मूत्र के प्रमाण व मूत्रगत शर्करा को कम करते हैं।कहते हैं सावन में नियमित रूप से शिव को बिल्व पत्र अर्पित करके यदि उसमे से बिल्वपत्र खाया भी जाए तो मधुमेह रोगियों को विशेष लाभ होता है। बिल्व शरीर के सूक्ष्म मल का शोषण कर उसे मूत्र के द्वारा बाहर निकाल देते हैं। इससे शरीर की शुद्धि हो जाती है। बिल्वपत्र दिल व दिमाग दोनों सवस्थ्य रहते हैं। शरीर को पुष्ट व सुडौल बनाते हैं।

धर्मशास्त्रों के अनुसार बर्थ-डे पर क्या और क्यों नहीं करना चाहिए?
जन्मदिन हर व्यक्ति के जीवन का बहुत ही विशेष दिन होता है। इसीलिए सभी लोग चाहे वो आम हो या खास अपने बर्थ-डे को विशेष तरह से मनाना पसंद करते हैं। कुछ लोग इस दिन अपने घर में कोई धार्मिक अनुष्ठान करना पसंद करते हैं तो कुछ अपने दोस्तों व रिश्तेदारों के साथ पार्टी करना पसंद करते हैं। जन्मदिन चाहे कैसे भी मनाएं। मतलब सिर्फ अपनी खुशियों और खास लम्हों को अपनों के साथ बांटने से है या कहें सेलीब्रेशन से है। हिन्दू धर्मशास्त्रों के अनुसार यदि हम अपना जन्मदिन मनाएं तो हमारे शास्त्रों के अनुसार जन्मदिन के दिन कुछ कार्य ऐसे हैं जिन्हें करना शास्त्रों में अच्छा नहीं माना गया है। ये कार्य इस प्रकार है।

जन्मदिन पर नाखून एवं बाल काटना, वाहन से यात्रा करना, कलह, हिंसाकर्म, अभक्ष्यभक्षण (न खाने योग्य पदार्थ खाना), अपेयपान (न पीने योग्य पदार्थ पीना), स्त्रीसंपर्क से प्रयत्नपूर्वक बचना चाहिए। इसी तरह दीपक का बुझना आकस्मिक मृत्यु, अर्थात् अपमृत्युसे संबंधित है। इसे अशुभ माना गया है। इसीलिए मोमबत्ती जलाकर जन्मदिन नहीं मनाना चाहिए। हिंदू संस्कृति के अनुसार दिन सूर्योदयसे आरंभ होता है। यह समय ऋषि-मुनियोंकी साधना का समय है, इसलिए वातावरणमें सात्त्विकता अधिक होती है और सूर्योदयके पश्चात् दी गई शुभकामनाएं फलदायी सिद्ध होती हैं। इसलिए रात के समय जन्मदिन की बधाई देने से बचना चाहिए।

इस समय ना सोएं ना लेटे क्योंकि...

कई लोग समय की कमी के कारण शाम के वक्त आराम करते हैं। शाम को सोना शास्त्रों की दृष्टि से अनुचित माना जाता है।क्या कारण है कि शाम को सोना वर्जित माना जाता है?वैसे देखा जाए तो सोने के रात्रि को ही श्रेष्ठ माना जाता है। शास्त्रों के अनुसार तो दिन भी नहीं सोना चाहिए। दिन में सोने से आयु घटती है, शरीर पर अनावश्यक चर्बी बढ़ती है, आलस्य बढ़ता है आदि। इसलिए दिन में सोना प्रतिबन्धित है। सिर्फ वृद्ध, बालक एवं रोगियों के मामले में यहां स्वीकृति है। इस प्रकार जब शास्त्रों में दिन में सोने पर पाबंदी है तो शाम का समय तो वैसे भी संध्या-आचमन का होता है। शाम का समय देवताओं की आराधना एवं संध्या का होता है।

इस समय सोने से शरीर में शिथिलता आती है और नकारात्मक विचारों का आगमन होता है। इस समय तो पूरे भक्तिभाव से भगवान की पूजा-अर्चना एवं संध्या करनी चाहिए।शाम को सोने के साथ ही खाना खाना, पढ़ाई करना एवं मैथुन कर्म करना भी वर्जित है। कहते हैं इन कर्मों को शाम को करने से आयु तो घटती ही है, साथ ही यश, लक्ष्मी, विद्या आदि सभी का नाश हो जाता है। इसलिए शाम को सोना शास्त्रोक्त विधान के अनुसार अनुचित माना गया है।

पीने के पानी के स्थान पर दीपक क्यों लगाना चाहिए?
वास्तु के अनुसार हमें प्राप्त होने वाले सुख-दुख हमारे घर की स्थिति पर भी निर्भर करते हैं। यदि घर में कोई वास्तु दोष होगा तो निश्चित ही इसके बुरे परिणाम ही हमें प्राप्त होंगे। वास्तु सकारात्मक ऊर्जा और नकारात्मक ऊर्जा के सिद्धांतों पर ही कार्य करता है।

अत: घर में जो भी वस्तुएं नेगेटिव एनर्जी को बढ़ाती हैं उनसे वास्तुदोष बढ़ता है। यदि किसी घर की आर्थिक तरक्की नहीं हो रही है। पूरी मेहनत के बाद भी घर के हर सदस्य को उसकी योग्यता के अनुसार सफलता नहीं मिल पाती है, किसी ना किसी तरह की समस्या या परेशानी हमेशा बनी रहती है।

घर में बार-बार एक्सीडेंट्स होते हैं तो निश्चित ही उस घर में पितृदोष होता है।

इसीलिए जिस घर में पीने के पानी का स्थान दक्षिण दिशा में हो उस घर को पितृदोष अधिक प्रभावित नहीं करता साथ ही यदि नियमित रूप से उस स्थान पर घी का दीपक लगाया जाए तो पितृदोष आशीर्वाद में बदल जाता है। ऐसा माना जाता है।

यदि पीने के पानी का स्थान उत्तर या उत्तर-पूर्व में भी है तो भी उसे उचित माना गया है और उस पर भी पितृ के निमित्त दीपक लगाने से पितृदोष का नाश होता है क्योंकि पानी में पितृ का वास माना गया है और पीने के पानी के स्थान पर उनके नाम का दीपक लगाने से पितृदोष की शांति होती है ऐसी मान्यता है।

चरणामृत लेकर सिर पर हाथ रखना सही है या नहीं
मंदिर जाने से जुड़ी हिन्दू धर्म में अनेक परंपराएं हैं। दर्शन के बाद सीधे हाथ में चरणामृत ग्रहण करना भी एक परंपरा है। कहते हैं सीधे हाथ में तुलसी चरणामृत ग्रहण करने से हर शुभ काम या अच्छे काम का जल्द परिणाम मिलता है। इसीलिए चरणामृत हमेशा सीधे हाथ से लेना चाहिए क्योंकि इससे किए जाने वाले कार्य का जल्द ही सकारात्मक परिणाम प्राप्त होता हैं।

इसीलिए हर धार्मिक कार्य चाहे वह यज्ञ हो या दान-पुण्य सीधे हाथ से ही किया जाना चाहिए। जब हम हवन करते हैं और यज्ञ नारायण भगवान को आहूति दी जाती है तो वो सीधे हाथ से ही दी जाती है।मंदिर में दर्शन के बाद सीधे हाथ से तुलसी चरणामृत ग्रहण करने से कई तरह की बीमारियां तो दूर होती ही हैं। साथ ही इससे नकारात्मक विचार दूर होते हैं।

लेकिन चरणामृत लेने के बाद अधिकतर लोगों की आदत होती है कि वे अपना हाथ सिर पर फेरते हैं। चरणामृत लेने के बाद सिर पर हाथ रखना सही है या नहीं यह बहुत कम लोग जानते हैं? दरअसल शास्त्रों के अनुसार चरणामृत लेकर सिर पर हाथ रखना अच्छा नहीं माना जाता है। कहते हैं इससे विचारों में सकारात्मकता नहीं बल्कि नकारात्मकता बढ़ती है। इसीलिए चरणामृत लेकर कभी भी सिर पर हाथ नहीं फेरना चाहिए।

पूजा के समय सिर पर रुमाल रखना जरूरी क्यों है?
पौराणिक कथाओं में नायक, उपनायक तथा खलनायक भी सिर को ढंकने के लिए मुकुट पहनते थे। यही कारण है कि हमारी परंपरा में सिर को ढकना स्त्री और पुरुषों सबके लिए आवश्यक किया गया था। सभी धर्मों की स्त्रियां दुपट्टा या साड़ी के पल्लू से अपना सिर ढंककर रखती थी। इसीलिए मंदिर या किसी अन्य धार्मिक स्थल पर जाते समय या पूजा करते समय सिर ढकना जरूरी माना गया था। पहले सभी लोगों के सिर ढकने का वैज्ञानिक कारण था। दरअसल विज्ञान के अनुसार सिर मनुष्य के अंगों में सबसे संवेदनशील स्थान होता है। ब्रह्मरंध्र सिर के बीचों-बीच स्थित होता है। मौसम के मामूली से परिवर्तन के दुष्प्रभाव ब्रह्मरंध्र के भाग से शरीर के अन्य अंगों पर आतें हैं।

इसके अलावा आकाशीय विद्युतीय तरंगे खुले सिर वाले व्यक्तियों के भीतर प्रवेश कर क्रोध, सिर दर्द, आंखों में कमजोरी आदि रोगों को जन्म देती है।

इसी कारण सिर और बालों को ढककर रखना हमारी परंपरा में शामिल था। इसके बाद धीरे-धीरे समाज की यह परंपरा बड़े लोगों को या भगवान को सम्मान देने का तरीका बन गई। साथ ही इसका एक कारण यह भी है कि सिर के मध्य में सहस्त्रारार चक्र होता है। पूजा के समय इसे ढककर रखने से मन एकाग्र बना रहता है। इसीलिए नग्र सिर भगवान के समक्ष जाना ठीक नहीं माना जाता है। यह मान्यता है कि जिसका हम सम्मान करते हैं या जो हमारे द्वारा सम्मान दिए जाने योग्य है उनके सामने हमेशा सिर ढककर रखना चाहिए। इसीलिए पूजा के समय सिर पर और कुछ नहीं तो कम से कम रूमाल ढक लेना चाहिए। इससे मन में भगवान के प्रति जो सम्मान और समर्पण है उसकी अभिव्यक्ति होती है।

ना पीठ देखें और ना दिखाएं इन दोनों भगवान की मूर्तियों को
शास्त्रों के अनुसार गणेशजी को बुद्धि के दाता व विष्णु भगवान को लक्ष्मीपति माना गया है। ये दोनों ही सभी सुखों को देने वाले माने गए हैं। अपने भक्तों के सभी दुखों को दूर करते हैं और उनकी शत्रुओं से रक्षा करते हैं। इनके नित्य दर्शन से हमारा मन शांत रहता है और सभी कार्य सफल होते हैं।गणेशजी को रिद्धि-सिद्धि का दाता माना गया है। इनकी पीठ के दर्शन करना वर्जित किया गया है। गणेशजी के शरीर पर जीवन और ब्रह्मांड से जुड़े अंग निवास करते हैं।

गणेशजी की सूंड पर धर्म विद्यमान है तो कानों पर ऋचाएं, दाएं हाथ में वर, बाएं हाथ में अन्न, पेट में समृद्धि, नाभी में ब्रह्मांड, आंखों में लक्ष्य, पैरों में सातों लोक और मस्तक में ब्रह्मलोक विद्यमान है। गणेशजी के सामने से दर्शन करने पर उपरोक्त सभी सुख-शांति और समृद्धि प्राप्त हो जाती है। ऐसा माना जाता है इनकी पीठ पर दरिद्रता का निवास होता है। गणेशजी की पीठ के दर्शन करने वाला व्यक्ति यदि बहुत धनवान भी हो तो उसके घर पर दरिद्रता का प्रभाव बढ़ जाता है। इसी वजह से इनकी पीठ नहीं देखना चाहिए। जाने-अनजाने पीठ देख ले तो श्री गणेश से क्षमा याचना कर उनका पूजन करें। तब बुरा प्रभाव नष्ट होगा। वहीं भगवान विष्णु की पीठ पर अधर्म का वास माना जाता है।

शास्त्रों में लिखा है जो व्यक्ति इनकी पीठ के दर्शन करता है उसके पुण्य खत्म होते जाते हैं और धर्म बढ़ता जाता है।इन्हीं कारणों से श्री गणेश और विष्णु की पीठ के दर्शन नहीं करने चाहिए। साथ ही यह भी मान्यता है कि इनके मंदिर में दर्शन करने जाएं तो दर्शन करते समय ये सावधानी रखें की इन्हें पीठ दिखाकर इन्हें पीठ दिखाकर बाहर ना आए। इससे भी बुद्धि और धन दोनों का नाश होता है।

क्यों शिवजी को पूजा में नहीं चढ़ाना चाहिए मेंहदी?
शिव को देवों के देव यानी महादेव माना गया है। कहते हैं शिव के पूजन से मनोकामना बहुत जल्दी पूरी होती है। वैसे तो भगवान शिव के पूजन की अनेकानेक विधियां हैं।इनमें से प्रत्येक अपने आप में पूर्ण है और आप अपनी इच्छानुसार किसी भी विधि से पूजन या साधना कर सकते हैं।भगवान शिव क्षिप्रप्रसादी देवता हैं,अर्थात सहजता से वे प्रसन्न हो जाते हैं। इसीलिए उनके पूजन की विधि भी उतनी ही सरल है। शिव मात्र एक लोटे जल से भी प्रसन्न हो जाते हैं तथा अपने भक्तों का उद्धार करते हैं। लेकिन भोलेनाथ को पूजा में मेंहदी नहीं चढ़ाई जाती।

दरअसल इससे जुड़ी एक कथा के अनुसार मेंहदी का पौधा कामधेनु के रक्त से उत्पन्न माना जाता है। इसीलिए पूजा में शिवजी को मेंहदी नहीं चढ़ाई जाती है। उस कथा के अनुसार जमदग्रि ऋषि के पास कामधेनु गाय थी। जिसे सहस्त्रार्जुन ने आश्रम से ले जाना चाहा और उसने इसी कोशिश में कामधेनु को कुछ तीर मारे और जब उन तीरों से घायल कामधेनु का रक्त जमीन पर गिरा तो मेंहदी का पौधा उत्पन्न हुआ। इसीलिए हिन्दू धर्म शास्त्रों के अनुसार शिवजी को मेंहदी नहीं चढ़ाई जाती।

ग्रहों के बुरे प्रभाव को दूर करने का सस्ता उपाय है पौधों की जड़े क्योंकि...
ग्रहों के अशुभ प्रभाव से बचने के लिए मंत्रपाठ, हवन ,ध्यान और उपाय संबंधी रत्नों का उपयोग किया जाता है। इन सभी के अत्यधिक मूल्यवान होने से कई बार ये सभी सामान्य लोगों की पहुंच से ये रत्न काफी दूर होते हैं। इसलिए ऐसे में मनुष्यों को वृक्षों की जड़ धारण करने को कहा जाता है। माना जाता है कि ये जड़े रत्नो से अधिक असरदार होती है।

हमारे ऋषि-मुनियों द्वारा इससे संबंधित व्याख्या ज्योतिष और वास्तु संबंधी ग्रंथों में विस्तार से की गई है। ज्योतिष ग्रंथों के अनुसार, हमारे सौरमंडल के विभिन्न ग्रहों का अलग-अलग प्रकार के वृक्षों पर आधिपत्य है। जो वृक्ष ऊंचे और मज़बूत तथा कठोर तने वाले हैं, उनपर सूर्य का विशेष अधिकार होता है। दूध वाले वृक्षों पर चंद्र का प्रभाव होता है।

लता , वल्ली इत्यादि पर चंद्र और शुक्र का अधिकार होता है। झाडिय़ों वाले पौधों पर राहू और केतू का विशेष अधिकार है। जिन वृक्षों में रस विशेष न हो, कमज़ोर, देखने में अप्रिय और सूखे वृक्षों पर शनि का अधिकार है। सभी फलदार वृक्षों पर बृहस्पति, बिना फल के वृक्षों पर बुध का और फल , पुष्प वाले चिकने वृक्षों पर शुक्र का अधिकार है। औषधीय जड़ी बूटियों का स्वामी चन्द्रमा है। आयुर्वेदिक चिकित्सा प्रणाली में किसी ग्रह के अधीन आने वाले वनस्पतियों और औषधियों से ही उस ग्रह-जनक रोग का उपचार किया जाता है।

पूजा के समय मंत्र बोलना जरूरी क्यों होता है?
हिन्दू धर्म में पूजा करने को बहुत महत्व दिया जाता है। छोटे या बड़े किसी भी तरह के उत्सव या आयोजन के प्रारंभ से पहले पूजा या अनुष्ठान जरूर किया जाता है। पूजा या अनुष्ठान चाहे किसी भी देवता का हो बिना मंत्र जप के पूरा नहीं होता है। लेकिन बहुत कम लोग ये जानते हैं कि पूजन के समय मंत्र जप क्यों किया जाता है? दरअसल मंत्र एक ऐसा साधन है, जो मनुष्य की सोई हुई सुषुप्त शक्तियों को सक्रिय कर देता है। मंत्रों में अनेक प्रकार की शक्तियां निहित होती है, जिसके प्रभाव से देवी-देवताओं की शक्तियों का अनुग्रह प्राप्त किया जा सकता है। रामचरित मानस में मंत्र जप को भक्ति का पांचवा प्रकार माना गया है।

मंत्र जप से उत्पन्न शब्द शक्ति संकल्प बल तथा श्रद्धा बल से और अधिक शक्तिशाली होकर अंतरिक्ष में व्याप्त ईश्वरीय चेतना के संपर्क में आती है। जिसके फलस्वरूप मंत्र का चमत्कारिक प्रभाव साधक को सिद्धियों के रूप में मिलता है।शाप और वरदान इसी मंत्र शक्ति और शब्द शक्ति के मिश्रित परिणाम हैं। साधक का मंत्र उच्चारण जितना अधिक स्पष्ट होगा, मंत्र बल उतना ही प्रचंड होता जाएगा।वैज्ञानिकों का भी मानना है कि ध्वनि तरंगें ऊर्जा का ही एक रूप है। मंत्र में निहित बीजाक्षरों में उच्चारित ध्वनियों से शक्तिशाली विद्युत तरंगें उत्पन्न होती है जो चमत्कारी प्रभाव डालती हैं।

क्यों कहा जाता है, बांए हाथ की ओर सूंड वाले गणेश शुभ होते हैं?

शिवजी ने गणेशजी को प्रथम पूज्य होने का वरदान दिया है। इसी वजह से कोई मांगलिक कर्म, पूजन आदि में सबसे पहले गणेशजी की आराधना ही की जाती है। सबसे पहले भगवान गणपति का ही स्मरण करना चाहिए। इससे आपकी सभी मनोकामनाएं शीघ्र पूर्ण होती है और सभी देवी-देवताओं की कृपा बनी रहती है।

इसलिए गणेश को परिवार का देवता माना गया है और नियमित रूप से इनके दर्शन मात्र से ही हमारी कई समस्याएं खुद की समाप्त हो जाती है।

गजानन को प्रथम पूज्य का पद प्राप्त हैं। इनकी आराधना से घर की सभी समस्याएं स्वत: ही खत्म हो जाती है और सुख-समृद्धि में बढ़ोतरी होती है। कहा जाता है विघ्नहर्ता की मूर्ति अथवा चित्र में उनके बाएं हाथ की और सूंड घुमी हुई हो इस बात का ध्यान रखना चाहिए। लेकिन ये बात बहुत कम लोग जानते हैं कि घर में पंडितों व वास्तुविदों द्वारा दाएं हाथ के तरफ घुमी हुई सूंड वाले गणेश रखने को ही क्यों कहा जाता है?

दरअसल वास्तु व अन्य शास्त्रों के अनुसार माना जाता है कि दाएं हाथ की ओर घुमी हुई सूँड वाले गणेशजी हठी होते हैं तथा उनकी साधना-आराधना कठिन होती है। वे देर से भक्तों पर प्रसन्न होते हैं क्योंकि दाएं हाथ की सूंड वाले गणेशजी को तंत्र विधि से पूजना या मनाना ज्यादा आसान होता है। इनके पूजन की विधि बहुत कठिन होती है। इसीलिए दक्षिण दिशा की ओर सूंड वाले गणेशजी की बजाए बांयी हाथ की ओर सूंड वाले गणेशजी के पूजन करने के लिए कहा जाता है।

दूध पीकर घर से निकलना अच्छा नहीं माना जाता क्योंकि...
दूध को हमारे संपूर्ण आहार का एक आवश्यक हिस्सा माना गया है। दूध से हमारे शरीर को भरपूर मात्रा में कैल्शियम मिलता है। इसीलिए कहा जाता है कि स्वस्थ्य शरीर के लिए हमें नियमित रूप से दूध का सेवन करना चाहिए। कुछ लोग हेल्थ बनाने के लिए नाश्ते के साथ दूध पीते हैं। जो कि विज्ञान के अनुसार फायदेमंद भी माना गया है लेकिन कभी भी कहीं जाने से पहले दूध नहीं पीएं। इस बात का विशेष रूप से ध्यान रखना चाहिए। ज्योतिष के अनुसार ऐसा करने पर आप जिस काम के लिए जा रहे हैं उसमें सफलता न मिले इसकी संभावना बहुत अधिक है। दरअसल इसका कारण यह है कि दूध को पितरों का मुख्य भोग माना गया है।

इसीलिए दूध को नाग को अर्पित करने की प्रथा भी हमारे देश में है। जिन लोगों के काम जल्दी पूरे नहीं होते या कामों में बार-बार रूकावटें आती है। ऐसा होने का कारण अधिकांश लोगों की जन्मकुं डली में उपस्थित कालसर्प दोष व पितृ दोष है। कहते हैं दूध से बनी चीजों या दूध से विशेष तरह की पूजा करने पर ये दोनों ही दोष शांत होते है। मान्यता है दूध को पीकर घर से निकलने पर दोनों में से किसी भी तरह का दोष कुंडली में होने पर कार्य में सफलता नहीं मिल पाती है। इसीलिए घर से कभी दूध पीकर बाहर नहीं निकलना चाहिए।

पूजा में क्यों और कैसे कपड़े पहनने चाहिए?
पूजा के समय अनेक मान्यताओं का पालन किया जाता है। हिन्दू परंपरा के अनुसार पूजा में पुरूषों के लिए धोती और महिलाओं के लिए पीले रंग की साड़ी को श्रेष्ठ माना गया है। यह भी कहा जाता है कि पूजा के वस्त्रों को अलग रखना चाहिए।

सामान्यत: यह बात सभी जानते हैं कि पूजा में काले कपड़े नहीं पहनना चाहिए। यदि पीले,लाल या केसरिया कपड़े पहने जाएं तो उसे बहुत शुभ माना जाता है। परंतु ऐसी मान्यता क्यों है,और इसकी क्या वजह है?दरअसल अगर ज्योतिष के दृष्टिकोण से देखा जाए तो पीले रंग को गुरु का रंग माना जाता है।

ज्योतिष के अनुसार गुरु ग्रह आध्यात्मिक और धर्म का कारक ग्रह है। ऐसा माना जाता है कि पूजा में पीले,लाल रंग के कपड़े पहनने से मन स्थिर रहता है और मन में अच्छे विचार आते हैं।साथ ही पीले,लाल व केसरिया रंग को अग्रि का प्रतीक माना जाता है।

अग्रि को हमारे धर्म ग्रंथों में बहुत पवित्र माना गया है। इसलिए ऐसी मान्यता है कि पीला रंग पहनने से मन में पवित्र विचार आते हैं। काले रंग को देखकर मन में नकारात्मक भावनाएं आती हैं। इसके विपरीत पीले रंग को देखकर मन में सकारात्मक भाव आते हैं। इसलिए पूजा में पीले,लाल व केसरिया रंग के कपड़े पहनना चाहिए।

सावन में शिवजी को पूजन में हल्दी क्यों ना चढ़ाएं?
शिवलिंग शिवजी का ही साक्षात रूप माना जाता है। विधि-विधान से शिवलिंग का पूजन करने से शिवजी प्रसन्न होते हैं और साथ ही सभी देवी-देवताओं की कृपा भी प्राप्त होती है। सामान्यत: देवी-देवताओं के विधिवत पूजन आदि कार्यों में बहुत सी सामग्रियां शामिल की जाती हैं। इन सामग्रियों में हल्दी भी शामिल की जाती है। हल्दी एक औषधि भी है और हम इसका प्रयोग सौंदर्य प्रसाधन में भी किया जाता हैं। धार्मिक कार्यों में भी हल्दी का महत्वपूर्ण स्थान है। कई पूजन कार्य हल्दी के बिना पूर्ण नहीं माने जाते।

पूजन में हल्दी गंध और औषधि के रूप में प्रयोग की जाती है। हल्दी शिवजी के अतिरिक्त सभी देवी-देवताओं को अर्पित की जाती है।

हल्दी का स्त्री सौंदर्य प्रसाधन में मुख्य रूप से उपयोग किया जाता है। शास्त्रों के अनुसार शिवलिंग पुरुषत्व का प्रतीक है, इसी वजह से महादेव को हल्दी इसीलिए नहीं चढ़ाई जाती है।जलाधारी पर चढ़ाते हैं हल्दी शिवलिंग पर हल्दी नहीं चढ़ाना चाहिए परंतु जलाधारी पर चढ़ाई जानी चाहिए। शिवलिंग दो भागों से मिलकर बनी होती है। एक भाग शिवजी का प्रतीक है और दूसरा हिस्सा माता पार्वती का। शिवलिंग चूंकि पुरुषत्व का प्रतिनिधित्व करता है अत: इस पर हल्दी नहीं चढ़ाई जाती है। हल्दी स्त्री सौंदर्य प्रसाधन की सामग्री है और जलाधारी मां पार्वती से संबंधित है अत: इस पर हल्दी जाती है।

सावन में नॉनवेज से करें तौबा, खाएं सादा खाना क्योंकि...
धर्म शास्त्रों में खाने से संबंधित कई नियम बनाए गए हैं ऐसा है सावन में सात्विक भोजन का। इस नियम का सबसे अधिक पालन जैन धर्म के लोग करते हैं। लेकिन बहुत कम लोग जानते हैं कि वाकई में सावन में नॉनवेज ना खाने के और सादा भोजन करने के अनेक फायदे हैं। दरअसल यह नियम व्यक्ति के स्वास्थ्य को ध्यान में रखकर बनाया गया है। इस माह में मांसाहार करने से कई तरह की बीमारियां लोगों को अपनी गिरफ्त में ले लेती हैं।

इस कारण बारिश के इस मौसम में विशेषज्ञ भी मांसाहार से दूर रहने की सलाह देते हैं। वहीं दूसरी ओर इस नियम के पीछे सबसे बड़ा कारण है कि बारिश के बाद मौसम में नमी बढ़ जाती है और इस नमी के कारण कई तरह के सूक्ष्म जीव और बैक्टिरिया उत्पन्न हो जाते है। सूर्य की रोशनी में ये गरमी के कारण पनप नहीं पाते हैं और बारिश के साथ ही जैसे ही नमी बढ़ती है ये जीव सक्रिय हो जाते हैं। इसलिए सावन में सादा भोजन ही साथ कई बीमारियों से भी बचाव होता है।

हनुमानजी की पूजा बंदर के रूप में ही क्यों की जाती है?
हनुमानजी को कलियुग में प्रत्यक्ष देव माना गया हैं। जो थोड़े से पूजन-अर्चन से अपने भक्त पर प्रसन्न हो जाते हैं और अपने भक्त की सभी प्रकार के दु:ख, कष्ट, संकटो का नाश कर उसकी रक्षा करते हैं। कहते हैं हनुमानजी के पूजन से व्यक्ति में भक्ति, धर्म, गुण, शुद्ध विचार, मर्यादा, बल , बुद्धि, साहस आदि गुणों का भी विकास हो जाता है।

शास्त्रों के अनुसार हनुमानजी के प्रति द्दढ आस्था और अटूट विश्वास के साथ पूर्ण भक्ति एवं समर्पण की भावना से हनुमानजी के विभिन्न स्वरूप पूजन-अर्चन कर व्यक्ति अपनी समस्याओं से मुक्त होकर जीवन में सभी प्रकार के सुख प्राप्त कर सकता हैं। हनुमानजी ही मात्र ऐसे देवता है जिनकी पूजा बंदर या वानर रूप में की जाती है। लेकिन बहुत कम लोग जानते हैं कि उनकी पूजा इस रूप में क्यों की जाती है।

दरअसल इस रहस्य को समझने के लिए हमें वानर शब्द के अर्थ को समझना पड़ेगा। वानर यानि वह प्राणी जो वन में रहता हो, जो वन में उत्पन्न आहार से ही अपने उदर की पूर्ति करता हो, जो गुफाओं में रहता हो, जो वन में रहने वाले अन्य प्राणी की ही तरह आचरण करता हो, जिसका स्वभाव वन्य जीवों के जैसा हो आदि ऐसे ही सभी गुण वाले प्राणी को वानर कहा जाना चाहिए। हमारे कई प्राचीन ग्रंथों में उल्लेख है कि बाली, सुग्रीव, हनुमान सहित सभी वानर, वानर बताए गए हैं। परंतु हनुमान के महान व्यक्तित्व को देखते हुए उन्हें बंदर मान लेना समझ से परे हैं। कुछ विद्वानों का मत यह भी है कि वानर समुदाय या जाति या आदिवासी समूह के आराध्य देव बंदर रहे हो जिससे उन्हें भी वानर ही समझा जाने लगा जाने लगा जैसे नाग की पूजा करने वाले समुदाय को नागलोकवासी कहा जाता है।

परंतु जिस तरह नागलोक के रहने वाले प्राणियों को सर्प की भांति नहीं समझा जाता उसी तरह चमत्कारी और बहुआयामी व्यक्तित्व के धनी हनुमान को वानर कैसे समझा जाएं? भगवान हनुमान शिव यानी रुद्र के अवतार हैं, उन्हें सामान्य वानर मान लेना ठीक नहीं है। वे मनुष्य जाति के लिए आदर्श हैं। मनुष्य में छिपी प्रतिभा और संभावनाओं के साक्षात प्रतिनिधि है।

नाग पंचमी पर नागों की पूजा क्यों जाती है?
हमारी सं स्कृति में हर साल नागपूजा की जाती है जिसे आम भाषा में नाग-पंचमी कहा जाता है। भगवान शिव भी सर्पों की माला गले में धारण करके मानो नाग देवता के प्रति आदर करने का उपदेश देते हैं।जैन धर्म, दर्शन तथा साहित्य में भी नाग को विशिष्ट स्थान दिया गया है। तेईसवें तीर्थंकर पाश्र्वनाथ के गर्भकाल में ही मां वामादेवी ने समीप में सरकते नाग को देखा जो दैवी दिव्यता का प्रतीक था। मान्यता है कि श्रावण मास के शुक्लपक्ष की पंचमी नागों को आनंद देने वाली तिथि है, इसलिए इसे नागपंचमी कहते हैं।

पौराणिक कथा के अनुसार, एक बार मातृ-शाप से नागलोक जलने लगा, तब नागों की दाह-पीड़ा श्रावण शुक्ल पंचमी के दिन ही शांत हुई थी। इस कारण नागपंचमी पर्व विख्यात हो गया। प्राचीन समय में जनमेजय के द्वारा नागों को नष्ट करने के लिए किए जा रहे यज्ञ से जब नाग-जाति के समाप्त हो जाने का संकट उत्पन्न हो गया, तब श्रावण-शुक्ल-पंचमी के दिन ही तपस्वी जरत्कारु के पुत्र आस्तीक ने उनकी रक्षा की थी। यह भी एक कारण है श्रावण शुक्ला पंचमी के नागपंचमी कहे जाने का।

कहीं-कहीं पर सोने, चांदी अथवा लकड़ी की कलम द्वारा पांच फन वाले पांच सर्पो को बनाने की प्रथा भी है। सर्पो के पूजन में दूध, पंचामृत या खीर चढ़ाई जाती है।सही मायने में नागपंचमी का त्योहार हमें नागों के संरक्षण की प्रेरणा देता है। पर्यावरण की रक्षा और वनसंपदा के संवर्धन में हर जीव-जंतु की अपनी भूमिका तथा योगदान है, फिर सर्प तो लोक आस्था में भी बसे हुए है।

ध्यान रखें गणेशजी को कभी तुलसी ना चढ़ाएं क्योंकि....
गणेशजी को प्रथम पूज्य और विघ्नहर्ता माना जाता है। गणेशजी के नियमित रूप से पूजन करने से घर में बुद्धि और लक्ष्मी का स्थाई निवास होता है। माना जाता है।कहा जाता है कि गणेशजी मोदक के भोग से शीघ्र प्रसन्न होते हैं। सभी देवताओं को भोग तुलसी के बिना नहीं लगाया जाता है। लेकिन कहा जाता है कि गणेशजी को भोग लगाते समय तुलसी कभी ना रखी जाए। इस बात का विशेष ध्यान रखना चाहिए लेकिन ऐसा क्यों। दरअसल शास्त्रों के अनुसारएक बार गणेशजी गंगाजी के पावन तट पर तपस्या कर रहे थे। वे अक्सर उस जगह पर बैठे ध्यान किया करते थे।

उस समय वे एक रत्न जटित सिंहासन पर विराजमान थे। समस्त अंगों पर चन्दन लगा हुआ था। गले में पारिजात पुष्पों के साथ स्वर्ण-मणि रत्नों के अनेक हार पड़े थे। कमर में अत्यन्त कोमल रेशम का पीताम्बर लिपटा हुआ था। इसी अवसर पर धर्मात्मज की नवयौवनाकन्या तुलसी देवी श्री भगवान् श्रीहरि का स्मरण करती हुई विभिन्न तीर्थों में भ्रमण करने को निकली। वह विभिन्न स्थानों पर होती हुई उसी गंगातट पर जा पहुँची उन्होंने जब गणेशजी को देखा तो वे मोहित हो गई। उसने सोचा-कितना अद्भुत और अलौकिक रूप है गणेशजी का? इनसे वार्तालाप करके विचार जानने चाहिए। उन्होंने सोचा इनसे बात करके इनके विचार मुझे जरूर जानने चाहिए।ऐसा विचार कर तुलसी ने उनके समीप जाकर कहा हे एकदन्त!मुझे यह तो बताओ कि संसार भर के समस्त आश्चर्य एक मात्र तुम्हारे ही विग्रह में किस प्रकार एकत्र हो गये हैं। क्या इसके लिए तुमने कोई तपस्या की है? यदि की है तो किस देवता की थी? गणेशजी तुलसी को देखकर कुछ सकुचाए। सोचा-यह कौन है? मेरे पास आने का क्या प्रयोजन है इसका? जब कोई समाधान न हुआ तो बोले-तुम कौन हो? यहाँ किस प्रयोजन से आई हो? मेरी तप में विघ्न डालने का क्या कारण है? तुलसी बोली-श्रीगणेश मैं धर्मपुत्र की कन्या तुलसी हूँ। तुम्हें यहाँ तपस्या करते देखकर उपस्थित हो गई।

यह सुनकर पार्वतीनन्दन ने कहा-माता तपस्या में विघ्न कभी भी उपस्थित नहीं करना चाहिये। इसमें सर्वथा अकल्याण ही होता है। अब तुम यहाँ से चली जाओ।यह सुनकर तुलसी ने अपनी व्यथा कही उसने कहा मेरी बात सुनो। मैं मनोनुकूल वर की खोज में ही इस समय तीर्थाटन कर रही हूँ। अनेक वर देखे, किन्तु आप पसन्द आये हो मुझे। अतएव आप मुझे भार्या रूप में स्वीकार कर मेरे साथ विवाह कर लीजिये। गणेशजी बोले-माता! विवाह कर लेना जितना सरल है उतना ही कठिन उसके दायित्व का निर्वाह करना है।

इसलिये विवाह तो दु:ख का ही कारण होता है। उसमें सुख की प्राप्ति कभी नहीं होती। विवाह में काम वासना की प्रधानता रहती है, जो कि तत्वज्ञान का उच्छेद करने वाली तथा समस्त संशयों को उत्पन्न करने वाली है। अतएव हे माता! तुम मेरी ओर से चित्त हटा लो। यदि ठीक प्रकार से खोज करोगी तो मुझसे अच्छे अनेक वर तुम्हें मिल जायेंगे।तुलसी बोली-एकदन्त! मैं तो तुमको ही अपने मनोनुकूल देखती हूँ इसलिये मेरी याचना को ठुकराकर निराश करने का प्रयत्न न करो। मेरी प्रार्थना स्वीकार कर लो प्रभो!गणेश बोले-परन्तु, मुझे तो विवाह ही नहीं करना है तब तुम्हारा प्रस्ताव कैसे स्वीकार कर लूँ। माता! तुम कोई और वर देखो और मुझे क्षमा करो। तुलसी को गणेशजी की बात बहुत अप्रिय लगी और उसने कुछ रोषपूर्वक कहा- कहती हूँ कि तुम्हारा विवाह तो अवश्य होगा।

मेरा यह वचन मिथ्या नहीं हो सकता। गणपति का तुलसी को शाप तुलसी प्रदत्त शाप को सुनकर गणपति भी शाप दिये बिना न रह सके। उन्होंने तुरन्त कहा-देवि! तुमने मुझे व्यर्थ ही शाप दे डाला है, इसलिए मैं भी कहता हूँ कि तुम्हें भी जो पति प्राप्त होगा वह असुर होगा तथा उसके पश्चात् महापुरुषों के शापवश तुम्हें वृक्ष होना पड़ेगा। इसी शाप के कारण तुलसी पौधा बनी और यही कारण है कि गणेशजी को तुलसी नहीं चढ़ाई जाती है।

खाना खाने पहले जरूर करें ये काम क्योंकि....
भोजन से हमें संतुष्टि और ऊर्जा दोनों मिलते हैं। भारतीय संस्कृति में भोजन के पहले भी मंत्र बोलने का विधान है। आखिर भोजन के पहले मंत्र बोलने से क्या लाभ होता है? क्या मंत्रों का भोजन पर भी कोई प्रभाव पड़ता है?कहते हैं-मननात् त्रायते इति मंत्र:। अर्थात मनन करने पर जो प्राण दे या रक्षा करे वही मंत्र है। वैदिक काल से ही मंत्र जप की परंपरा रही है। हिन्दू धर्म में जीवन के हर छोटे-बड़े कार्य के पहले मंत्रोच्चार किया जाने की परंपरा है। सुबह उठने से लेकर रात को सोने तक हर कार्य के पहले बोलने वाले मंत्र हमारे वेदों और धर्मशास्त्रों में है। ऐसी ही एक परंपरा भोजन से पहले भगवान को मंत्र के माध्यम से धन्यवाद देने की।

ऐसा माना जाता है कि भोजन से पहले यदि भोजन मंत्र बोला जाए तो भूख बढ़ती है, भोजन सुपाचित होने के साथ ही पूरे शरीर को भोजन से सकारात्मक ऊर्जा मिलती है। हमारा शरीर भोजन से ही मिली ऊर्जा पर ही पूरी तरह निर्भर रहता है। ऐसी मान्यता है कि भोजन से पहले मंत्रोच्चार से जो ऊर्जा मिलती है, वह ऊर्जा सकारात्मक कार्यों में खर्च होती है। आपको कार्य करने की दोगुनी ऊर्जा मिलती है।

शिवजी की पूजा में शहद का विशेष महत्व क्यों?
भगवान शिव के अभिषेक में इसका उपयोग सबसे ज्यादा होता है। शहद में ऐसे कौन से गुण होते हैं जिनके कारण यह इतना खास माना गया है?वास्तव में शहद को उसके गुणों के कारण ही पूजा में उपयोग किया जाता है। शहद तरल होकर भी पानी में नहीं घुलता है। जैसे संसार में रहकर भी अलग रहने के भाव का प्रतीक है। यह घी या तेल की तरह पानी में बिखरता भी नहीं है। यह पंच तत्वों में आकाश तत्व का प्रतीक भी माना गया है। शहद में कई औषधीय गुण भी होते हैं। इसे आयुर्वेद में भी स्थान दिया गया है। शहद ऐसा पदार्थ होता है जिसे पेट और शारीरिक कमजोरी संबंधी सभी बीमारियों में इस्तेमाल किया जा सकता है। इसकी तासिर ठंडी होती है।

एक दार्शनिक कारण यह भी है कि शहद ही ऐसा तत्व है जो जिसके लिए इंसान को प्रकृति पर निर्भर रहना पड़ता है, इसे कृत्रिम रूप से नहीं बनाया जा सकता। मधुमक्खियों द्वारा तैयार किया गया एकदम शुद्ध पदार्थ होता है। जिसके निर्माण में कोई मिलावट नहीं हो सकती। शहद को भगवान को इसी भाव से चढ़ाया जाता है कि हमारे जीवन में भी शहद की तरह ही पवित्र और पुण्य कर्म हों। चरित्र और व्यवहार में शहद जैसा ही गुण हो, जो संसार में रहकर भी उसमें घुले मिले नहीं, उसमें रहे भी और उससे अलग भी हो।

अच्छा नहीं माना जाता सोना मिलना या गुम होना, ऐसा क्यों?
सोना एक ऐसी धातु है जिसे लेकर प्राचीन समय से ही मनुष्यों में विशेष आकर्षण रहा है। सोने को बहुमूल्य धातु माना गया है। सोने का पीला रंग और उसकी चमक बरबस सभी को अपनी तरफ आकर्षित कर लेती है। लेकिन महिलाओं का सोने के प्रति विशेष लगाव होता है।

सोना खरीदने के लिए भी हमारे यहां मुर्हूत देखा जाता है माना जाता है कि इससे घर में लक्ष्मी का स्थाई निवास होता है। लेकिन सिर्फ यही नहीं हमारे यहां सोने के बारे में एक और मान्यता प्रचलित है। वह यह कि कहीं से सोना मिलना या सोना गुम होना ज्योतिष के अनुसार एक अच्छा शकुन नहीं माना गया है।दरअसल ज्योतिष के अनुसार गुरु ग्रह का रंग पीला होता है।

इसी कारण सोना वह धातु जिस पर गुरु का प्रभाव माना जाता है। गुरु को परिवार का कारक माना गया है। इसीलिए सोना खोने पर गुरु के अशुभ प्रभावों का सामना करना पड़ता है। कहा जाता है कि गुरु के नाराज हो जाने यानी रुठ जाने पर परिवारिक कलह का सामना करना पड़ता है। साथ ही दांपत्य सुख में भी कमी आती है। अगर किसी को सोना मिलता है और वह जब तक घर में रखा होता है। तब तक परिवार का कोई सदस्य बीमार रहता है या घर में हमेशा कलह बना रहता है। यदि किसी को सोना मिलता है तो उसे सोने को बेचकर उसका कुछ भाग दान कर देने से उसका अशुभ प्रभाव खत्म हो जाता है।

शिवलिंग पर रोज जरूर चढ़ाना चाहिए कच्चा दूध क्योंकि....
शिव के पूजन का विशेष महत्व माना गया है। इसलिए श्रृद्धालु भगवान शिव का जलाभिषेक,दुग्धाभिषेक,करते हैं तो कोई व्रत रखता है।भगवान शंकर को भोलेनाथ कहा गया है अर्थात् शिवजी अपने भक्तों की आस्था और श्रद्धा से बहुत ही जल्द प्रसन्न हो जाते हैं। शिवजी के प्रसन्न होने के अर्थ यही है कि भक्त को सभी मनोवांछित फलों की प्राप्ति हो जाती है। भोलेनाथ को प्रसन्न करने के कई उपाय बताए गए हैं। इनकी पूजा, अर्चना, आरती करना श्रेष्ठ मार्ग हैं। प्रतिदिन विधिविधान से शिवलिंग का पूजन करने वाले श्रद्धालुओं को अक्षय पुण्य की प्राप्ति होती है।

शिवजी को जल्द ही प्रसन्न के लिए शिवलिंग पर प्रतिदिन कच्चा गाय का दूध अर्पित करें। गाय को माता माना गया है अत: गौमाता का दूध पवित्र और पूजनीय है। इसे शिवलिंग पर चढ़ाने से महादेव श्रद्धालु की सभी मनोकामनाएं पूर्ण करते हैं।दूध की प्रकृति शीतलता प्रदान करने वाली होती है और शिवजी को ऐसी वस्तुएं अतिप्रिय हैं जो उन्हें शीतलता प्रदान करती हैं। इसके अलावा ज्योतिष में दूध चंद्र ग्रह से संबंधित माना गया है। चंद्र से संबंधित सभी दोषों को दूर करने के लिए प्रति सोमवार को शिवजी को दूध अर्पित करना चाहिए। मनोवांछित फल प्राप्त करने के लिए यह भी जरूरी है कि आपका आचरण पूरी तरह धार्मिक हो। ऐसा होने पर आपकी सभी मनोकामनाएं बहुत ही जल्द पूर्ण हो जाएंगी।

शनिवार के दिन घर में क्या और क्यों नहीं लाना चाहिए?
विद्वानों द्वारा शनि के कोप से बचने के लिए कई ऐसे कार्य है जिन्हें शनिवार को करने से मना किया है। इसका कारण शनि का क्रुर स्वभाव है। इन्हीं कार्यों में से एक कार्य यह वर्जित है कि शनिवार को घर में नया लोहा लेकर नहीं आना चाहिए।इस बात विशेष ध्यान रखना चाहिए कि शनिवार को किसी प्रकार की लोहा की कोई नई वस्तु घर में न लेकर आए।

लोहा की वस्तु या जिसके निर्माण में लोहा का उपयोग होता है जैसे: बिल्डिंग मटेरियल में उपयोग होने वाला सरिया, मोटर बाइक, कार, कम्प्यूटर आदि वस्तुएं जिनमें लोहा का प्रयोग होता है।वे सभी शनिवार को घर नहीं लेकर आना चाहिए। लोहा शनि की धातु है और शनिवार को लोहा लेकर आने से हमारे घर पर शनि का प्रभाव बढ़ता है।

यदि घर के किसी सदस्य पर शनि की अशुभ दृष्टि हो तो उसके लिए यह बुरा फल देने वाला सिद्ध होगा। ऐसे उस सदस्य को कई प्रकार की असफलताएं तथा मानसिक तनाव का सामना करना पड़ सकता है। शनिवार को घर में लोहा के कोई भी नई वस्तु लेकर आने से घर के सदस्य बीमार रहने लगते हैं। इसीलिए शनिवार के दिन लोहे के सामान घर में नहीं लेकर आने चाहिए।

तो इसलिए शादी से पहले जरूरी होती है सगाई
जिंदगी में विवाह एक बेहद महत्वपूर्ण घटना है। जब दो इंसान जीवन भर साथ में मिलकर धर्म के रास्ते से जीवन लक्ष्य की प्राप्ति का प्रयास करते हैं।शादी में हर परिस्थिति में एक -दूसरे का साथ निभाने का संकल्प लिया जाता है। शादी के इस बंधन से दो दिलों का नहीं बल्कि दो परिवारों का मिलन होता है। हिन्दू शादी में कई महत्वपूर्ण परम्पराएं होती हैं जिनका निर्वाह करना जरूरी माना जाता है।

ऐसी ही एक परम्परा है सगाई की।शादी के पवित्र बंधन में बंधने के बाद दो जुदा लोग एक साथ अपनी जिंदगी की शुरुआत करते हैं। जाहिर सी बात है कि बिना जान-पहचान के जिंदगी की गाड़ी पटरी पर चलाना आसान काम नहीं है।

जब दो समाज या समुदाय शादी के पवित्र बंधन के कारण एक होते हैं तो उनमें बहुत से वैचारिक या सैद्धान्तिक मतभेद होते हैं। दोनों के रीति-रिवाज काफी अलग होते हैं। दोनों की धार्मिक मान्यताओं में अंतर होता है।अगर उन्हें एक-दूसरे को समझने का पर्याप्त समय न मिले तो यह अंतर या मतभेद और गहरे हो सकते हैं। ऐसे में तो शादी की सामाजिक मान्यता पर ही प्रश्रचिन्ह लग सकते हैं।इस अप्रिय स्थिति से बचने के लिए ही शादी के पहले सगाई करवाने की प्रथा है। सगाई से शादी होने तक का समय एक-दूसरे को समझने तथा उनकी मान्यताओं को स्वीकार करने का होता है।

यही वह समय होता है जब भावी दम्पत्ति आपस में सामन्जस्य स्थापित कर भावी जीवन की शुरुआत के लिए मानसिक और शारीरिक रूप से ढ़ृढ़ होते हैं।सगाई के पीछे एक और मान्यता है कि इससे भावी दम्पत्ति एक-दूसरे को जान सकते हैं, आपस में संवाद स्थापित कर भावी जीवन की बेहतरी के लिए प्रेरणा ले सकते हैं। इसलिए शादी से पहले सगाई करवाने की प्रथा है।

कुछ देवताओं को तेल का और कुछ को घी का दीपक क्यों लगाते हैं?
शास्त्रों के अनुसार श्रृष्ठि को संचालित करने वाली देवी देवताओं की शक्ति को तीन भाग में बांटा गया है। सात्विक, राजसिक और तामसिक। ये तीनों तरह की शक्तियां श्रृष्ठि पर रहने वाले जीवों का पालन - पोषण अपने गुण के अनुसार करती है। हिन्दू धर्म के अनुसार पूजा के समय दीपक लगाना आवश्यक माना जाता है। लेकिन कहा जाता है कि कुछ देवताओं की कृपा तेल का दीपक लगाने पर और कुछ की कृपा घी का दीपक लगाने पर शीघ्र प्राप्त होती है। लेकिन ऐसा क्यों है ये बहुत कम लोग जानते हैं।

दरअसल इसका कारण भी यही तीन गुण है। कुछ देवताओं का प्रभाव तामसिक गुणों पर होता है तो कुछ का सात्विक या राजसिक पर। इसलिए जिन देवताओं का प्रभाव तामसिक गुणों पर होता है उन्हें तेल का दीपक लगाया जाता है क्योंकि तेल तामसिक गुण का कारक हैं। इसके विपरित जिन देवी देवताओं का प्रभाव सात्विक व राजसिक गुणों पर होता है उन्हे घी का दीपक लगाया जाता है क्योंकि घी में सात्विक और राजसिक गुण होते हैं।

तो इसलिए शादी से पहले जरूरी होती है सगाई
जिंदगी में विवाह एक बेहद महत्वपूर्ण घटना है। जब दो इंसान जीवन भर साथ में मिलकर धर्म के रास्ते से जीवन लक्ष्य की प्राप्ति का प्रयास करते हैं।शादी में हर परिस्थिति में एक -दूसरे का साथ निभाने का संकल्प लिया जाता है। शादी के इस बंधन से दो दिलों का नहीं बल्कि दो परिवारों का मिलन होता है। हिन्दू शादी में कई महत्वपूर्ण परम्पराएं होती हैं जिनका निर्वाह करना जरूरी माना जाता है।

ऐसी ही एक परम्परा है सगाई की।शादी के पवित्र बंधन में बंधने के बाद दो जुदा लोग एक साथ अपनी जिंदगी की शुरुआत करते हैं। जाहिर सी बात है कि बिना जान-पहचान के जिंदगी की गाड़ी पटरी पर चलाना आसान काम नहीं है।

जब दो समाज या समुदाय शादी के पवित्र बंधन के कारण एक होते हैं तो उनमें बहुत से वैचारिक या सैद्धान्तिक मतभेद होते हैं। दोनों के रीति-रिवाज काफी अलग होते हैं। दोनों की धार्मिक मान्यताओं में अंतर होता है।अगर उन्हें एक-दूसरे को समझने का पर्याप्त समय न मिले तो यह अंतर या मतभेद और गहरे हो सकते हैं। ऐसे में तो शादी की सामाजिक मान्यता पर ही प्रश्रचिन्ह लग सकते हैं।इस अप्रिय स्थिति से बचने के लिए ही शादी के पहले सगाई करवाने की प्रथा है। सगाई से शादी होने तक का समय एक-दूसरे को समझने तथा उनकी मान्यताओं को स्वीकार करने का होता है।

यही वह समय होता है जब भावी दम्पत्ति आपस में सामन्जस्य स्थापित कर भावी जीवन की शुरुआत के लिए मानसिक और शारीरिक रूप से ढ़ृढ़ होते हैं।सगाई के पीछे एक और मान्यता है कि इससे भावी दम्पत्ति एक-दूसरे को जान सकते हैं, आपस में संवाद स्थापित कर भावी जीवन की बेहतरी के लिए प्रेरणा ले सकते हैं। इसलिए शादी से पहले सगाई करवाने की प्रथा है।

घर से गुड़ खाकर जरूर निकलना चाहिए क्योंकि...
मिठास हो तो जिंदगी के पल कुछ ज्यादा खूबसूरत, कुछ ज्यादा मधुर और कुछ ज्यादा यादगार बन जाते हैं। लेकिन जिंदगी में मिठास हो इसके लिए जीवन में पूर्णता होना जरूरी है। पूर्णता यानी हर तरह से सुखी और सम्पन्न जीवन और यह तभी संभव है जब आप सफल हो। सफल होने के लिए आत्मविश्वास और सकारात्मक सोच जरूरी है। ऐसा माना जाता है गुड़ खाकर कुछ भी कार्य करने से हमें सफलता मिलती है।घर से गुड़ खाकर निकलना शुभ होता है। इसे एक अच्छा शकुन माना जाता है। गुड़ खाने से हमारा मन शांत रहता है। हमारे विचार भी गुड़ की तरह ही मीठे और सकारात्मक हो जाते हैं। हमारी वाणी में मिठास आ जाती है।

यदि हमारा मन किसी दुखी करने वाली बात में उलझा हुआ है और हम गुड़ खा लेते हैं तुरंत ही मन प्रसन्न हो जाता है। गुडख़ाने के बाद हम किसी भी कार्य को ज्यादा अच्छे से कर सकते हैं। दरअसल ज्योतिष के अनुसार जन्मकुंडली में सूर्य ग्रह अधिक मजबूत स्थिति में ना होने पर या अशुभ होने पर नकारात्मक विचार अधिक आते हैं। माना जाता है कि गुड़ खाने से इसका अशुभ प्रभाव कम हो जाता है। इसीलिए कहा जाता है कि घर से निकलते समय गुड़ खाने से हमारे सभी नकारात्मक विचार समाप्त हो जाते हैं और हमारे अंदर सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है। साथ ही यह वैज्ञानिक मान्यता है कि मीठा खाने से रक्त संचार बढ़ जाता है। एनर्जी मिलती है। इसलिए घर से निकलने से पहले से थोड़ा गुड़ जरूर खाना चाहिए।

अगर आप किसी के साथ खाना खाएं तो यह बात जरूर ध्यान रखें
हमारे बड़े-बूजुर्गों यह कहते हैं कि किसी का झूठा नहीं खाना चाहिए। आजकल अधिकतर लोग ऐसी बातों को अंधविश्वास मानकर उन पर भरोसा नहीं करते हैं लेकिन यह कोई अंधविश्वास नहीं है बल्कि इसके पीछे स्वास्थ्य से जुड़ा कारण भी है। अधिकांश लोग ऑफिस में या कॉलेज में अपने मित्रों के साथ भोजन करते हैं। एक साथ बैठकर भोजन करने को बहुत अच्छा माना गया है क्योंकि इससे प्रेम बढ़ता है।वहीं इस संबंध में आपने हमेशा अपने बढ़े- बूजुर्गो को यह कहते भी सुना होगा कि हमें किसी का झूठा नहीं खाना चाहिए।

दरअसल इसका कारण यह है कि हर व्यक्ति का भोजन करने का तरीका अलग होता है। कुछ लोग भोजन करने से पहले हाथ नहीं धोते हैं जिसके कारण उनका झूठा खाने वाले को भी संक्रमण हो सकता है। यदि कोई बीमार हो या उसे किसी तरह का संक्रमण हो तो उसका झूठा खाने से आप भी उस संक्रमण से प्रभावित हो सकते हैं। साथ ही ऐसी भी मान्यता है कि आप जिस व्यक्ति का झूठा खाते हैं उसके विचार नकारात्मक हैं तो वे विचार आपकी सोच को भी प्रभावित करते हैं।

गणेशजी को ही दूर्वा क्यों चढ़ाई जाती है?
गणों के स्वामी होने के कारण उनका एक नाम गणपति भी है। ज्योतिष में इनको केतु का देवता माना जाता है, और जो भी संसार के साधन हैं, उनके स्वामी श्री गणेशजी हैं। हाथी जैसा सिर होने के कारण उन्हें गजानन भी कहते हैं। गणेशजी का नाम हिन्दू शास्त्रो के अनुसार किसी भी कार्य के लिये पहले पूज्य है। गणेश ही ऐसे देव है जिनको यह चढ़ाई जाती है। दूर्वा से गणेश जी प्रसन्न होते हैं। दूर्वा गणेशजी को अतिशय प्रिय है।

इक्कीस दूर्वा को इक्कठी कर एक गांठ बनाई जाती है तथा कुल 21 गांठ गणेशजी को मस्तक पर चढ़ाई जाती है। इस बारे में एक कथा प्रचलित है। ऋषि मुनि और देवता लोगों को एक राक्षस परेशान किया करता था। जिसका नाम था अनलासुर (अनल अर्र्थात् आग) देवताओं के अनुरोध पर गणेशजी ने उसे निगल लिया। इससे उनके पेट में तीव्र जलन हो गई तब कश्यप मुनि ने दूर्वा की 21 गांठ बनाकर उन्हें खिलाई जिससे यह जलन शांत हो गई। दूर्वा एक औषधि है।

इस कथा द्वारा हमे यह संदेश प्राप्त होता है की पेट की जलन, तथा पेट के रोगों के लिए दूर्वा औषधि का कार्य करती है। मानसिक शांति के लिए यह बहुत लाभप्रद है। यह विभिन्न बीमारियों में एंटिबायोटिक का काम करती है, उसको देखने और छूने से मानसिक शांति मिलती है और जलन शांत होती है। वैज्ञानिको ने अपने शोध में पाया है कि कैंसर रोगियों के लिए भी यह लाभप्रद है।

किसी की मृत्यु हो जाने पर क्या करें?
संसार का प्रत्येक प्राणी जन्म लेता है और मृत्यु को प्राप्त हो जाता है, यह चक्र सदा से चलता आया है और चलता रहेगा। मृत्यु के समय की हिन्दू धर्म में अनेक परंपराएं है। लेकिन बहुत कम लोग जानते है कि मृत्यु के समय कौन से रिवाज है। जिन्हें हमारे धर्म शास्त्रों के अनुसार निभाना जरूरी माना गया है। ये रिवाज कुछ इस तरह है।

- मृतकका सिर दक्षिणमें तथा पैर उत्तर दिशा की ओर हो इस बात का ध्यान रखें।

- उसके मुखमें गंगाजल जल डालें और तुलसीदल रखें।

- तुलसीदलके गुच्छेसे मृत व्यक्तिके कानों और नासिकाओंको बंद करें।

- परिवारका विधिकर्ता पुरुष अपना सिर मुड़वाए।

- मृत्योपरांत कुछ समय के लिए जीव की सूक्ष्म देह परिजनों के आस-पास ही घूमती रहती है।

- उससे प्रक्षेपित रज-तम तरंगें परिजनों के केश के काले रंग की ओर आकर्षित होते हैं।

- गोमूत्र अथवा तीर्थ छिडककर, यदि संभव हो तो धूप दिखाकर, शुद्ध किए गए नए वस्त्र मृत व्यक्ति को पहनाएं।

- घर में गेहूं के आट का गोला बनाकर उस पर मिट्टीका दीप जलाएं।

- दीपक की ज्योति दक्षिण दिशा की ओर हो।

शुभारंभ से पहले नारियल क्यों फोड़ा जाता है?
नारियल ऊपर से जितना कठोर होता है अंदर से उतना मुलायम। नारियल को श्रीफल भी कहा जाता है। पूजा में हम भगवान को श्रीफल अर्पित करते हैं।हिन्दू धर्म में हर कार्य शुभ मुहूर्त देखकर किया जाता है। साथ ही मुहूर्त के समय नारियल फोडऩा और दीपक जलाना हमारी परंपरा है। लेकिन किसी भी कार्य का शुभारंभ करने से पहले नारियल फोडऩा जरूरी क्यों होता है?

दरअसल इसका कारण अनिष्ट शक्तियों के संचार पर अंकुश लगाना उन्हें प्रसन्न करना। इसलिए प्रथम नारियल फोडकर स्थान देवता का आवाहन कर वहां की स्थानीय अनिष्ट शक्तियों को नियंत्रित करने की उनसे प्रार्थना की जाती है। प्रार्थना द्वारा स्थान देवता के आवाहन से उनकी कृपा स्वरूप नारियल-जल के माध्यम से स्थान देवता की तरंगें सभी दिशाओं में फैलती हैं। इससे कार्यस्थल में प्रवेश करने वाली कष्टदायी स्पंदनों की गति पर अंकुश लगाना संभव होता है। माना जाता है इससे उस परिसर में स्थान-देवता की सूक्ष्म-तरंगोंका मंडल तैयार होता है व समारोह निर्विघ्न संपन्न होता है।

जरूरी काम से पहले कुछ देर रूकें और देखें....फिर डिसाइड करें

हमारे शास्त्रों में कहा गया है कि किसी भी शुभ काम या जरूरी काम पर जाने से पहले शुभ मुहूर्त के अलावा नासिका के स्वर पर भी ध्यान देना चाहिए। कहते हैं अगर पैसों के लेन देन या किसी व्यापारिक सौदे के लिए जा रहे हो तो पहले स्वर देखना चाहिए। फिर डिसाइड करना चाहिए कि काम करें या नहीं।

ज्योतिष के अनुसार हमारे शरीर में दो स्वर होते हैं। जिन्हें चंद्र नाड़ी स्वर व सूर्य स्वर कहा जाता है। नाक के दाहिने छिद्र से चलने वाले स्वर को सूर्य स्वर कहते हैं। यह साक्षात शिव का प्रतीक है। जबकि बायें छिद्र से चलने वाले स्वर को चंद्र स्वर कहते हैं। बायें स्वर से सांस लेने को इडा तथा दाहिने से लेने पर उसे पिंगला कहते हैं।

कभी-कभी ऐसा होता है कि दोनों स्वर एक साथ चलते हैं तो उसे सुषुन्मा कहा जाता है। दाहिना स्वर चलने पर पश्चिम और दक्षिण दिशा में गमन नहीं करना चाहिए। इस नियम से बहुत सारी समस्याओं का समाधान होता है। जब चंद्र स्वर चले तो पूर्व और उत्तर दिशा में गमन नहीं करना चाहिए। जिस तरफ का स्वर चल रहा हो उस तरफ का पैर घर से निकलने से पहले आगे बढ़ाना चाहिए। चंद्र स्वर चलने पर निकट की यात्रा और सूर्य स्वर चलने पर दूर की यात्रा अशुभ मानी जाती है। यदि किसी महत्वपूर्ण काम के लिए जा रहे हैं तो सूर्य स्वर चलने पर ज्यादा अनुकूल परिणाम मिलते हैं। पैसे, व्यापार, नौकरी व कोर्ट कचहरी के काम के लिए जाते समय इस स्वर का चलना अधिक सिद्धिदायक होता है। जबकि सुषुम्रा चल रही हो तो सभी काम टाल देना चाहिए।

आप जानते हैं, तिलक लगवाते समय सिर पर हाथ क्यों रखते हैं?

तिलक बिना लगाएं हिन्दू मान्यताओं के अनुसार किसी की कोई भी पूजा-प्रार्थना नहीं होती। धर्म मान्यतानुसार सूने मस्तक को अशुभ माना जाता है। तिलक लगाते समय सिर पर हाथ रखना भी हमारी एक परंपरा है। लेकिन बहुत कम लोग जानते हैं कि इसका कारण क्या है?

दरअसल धर्म शास्त्रों के अनुसार सूने मस्तक को अशुभ और असुरक्षित माना जाता है। तिलक लगाने के लिए अनामिका अंगुली शांति प्रदान करती है। मध्यमा अंगुली मनुष्य की आयु वृद्धि करती है। अंगूठा प्रभाव और ख्याति तथा आरोग्य प्रदान कराता है। इसीलिए राजतिलक अथवा विजय तिलक अंगूठे से ही करने की परंपरा रही है। तर्जनी मोक्ष देने वाली अंगुली है। ज्योतिष के अनुसार अनामिका तथा अंगूठा तिलक करने में सदा शुभ माने गए हैं। अनामिका सूर्य पर्वत की अधिष्ठाता अंगुली है। यह अंगुली सूर्य का प्रतिनिधित्व करती है, जिसका तात्पर्य यही है कि सूर्य के समान, दृढ़ता, तेजस्वी, प्रभाव, सम्मान, सूर्य जैसी निष्ठा-प्रतिष्ठा बनी रहे।

दूसरा अंगूठा है जो हाथ में शुक्र क्षेत्र का प्रतिनिधित्व करता है। शुक्र ग्रह जीवन शक्ति का प्रतीक है। जीवन में सौम्यता, सुख-साधन तथा काम-शक्ति देने वाला शुक्र ही संसार का रचयिता है। माना जाता है कि जब अंगुली या अंगूठे से तिलक किया जाता है तो आज्ञा चक्र के साथ ही सहस्त्रार्थ चक्र पर ऊर्जा का प्रवाह होता है। सकारात्मक ऊर्जा हमारे शीर्ष चक्र पर एकत्र हो साथ ही हमारे विचार सकारात्मक हो व कार्यसिद्ध हो। इसीलिए तिलक लगावाते समय सिर पर हाथ जरूर रखना चाहिए।

बिना जल चढ़ाए शिव पूजा मानी जाती है अधूरी क्योंकि...
भगवान शिव आदि व अनंत है। इनकी पूजा करने से तीनों लोकों का सुख प्राप्त होता है। भगवान शंकर ने जगत कल्याण के लिए कई अवतार लिए। भगवान शिव के इन अवतारों में कई संदेश भी छिपे हैं। ऐसे ही शिव के पूजन में उन्हें प्रसन्न करने के लिए भी जो सामान उपयोग किए जाते हैं। उनमें भी कई संदेश हैं।भगवान शंकर के जलाभिषेक का भी विशेष महत्व है। कहते है जलाभिषेक से शिव प्रसन्न होते हैं और भक्तों की मनोकामना पूरी करते हैं।

धर्म शास्त्रों की एक पौराणिक कथा के अनुसार समुद्र मंथन के समय जब कालकूट विष निकला तो तीनों लोकों में त्राहिमाम मच गया। सभी देवी-देवताओं की प्रार्थना पर शिवजी ने वह विष ग्रहण कर लिया। शिव कालकूट विष की गर्मी से शिवजी व्याकुल हो गए। इसीलिए शिवलिंग पर जल अर्पित किया जाता है। कहते हैं जल अर्पित करके हमें जन्म-मरण से मुक्त होने की भावना रखनी चाहिए।

जल को ज्ञान का प्रतीक माना गया है और अज्ञानता को जन्म-मरण का कारण माना है, इसलिए ज्ञानरूपी जल हमें जन्म-मरण से मुक्त कराने में सहायक बनता है। साथ ही जल हमें यह संदेश देता है कि हम सभी के साथ घुलमिलकर जीना सीखें। जल की तरह, तरल और निर्मल होना भी सीखें। इससे संदेश मिलता है कि श्रद्धा और आस्था भी ईश्वर की समीपता के लिए महत्वपूर्ण है, चाहे वह किसी भी रूप या अनजाने में हो।

राखी सीधे हाथ में ही बांधी जाती है, उल्टे में नहीं, ऐसा क्यों?
राखी का त्यौहार भाई-बहन के प्यार का प्रतीक है। इस दिन बहन अपने भाइयों की कलाई में राखी बांधती है और उनकी दीर्घायु व प्रसन्नता के लिए प्रार्थना करती हैं ताकि विपत्ति के दौरान वे अपनी बहन की रक्षा कर सके।

बदले में भाई, अपनी बहनों की हर प्रकार की परेशानी से रक्षा करने का वचन उपहार के रूप में देते हैं। राखी एक धागे की डोर है जिसको बहन भाई की कलाई पर प्रेम पूर्वक बांधती है और सदा विजयी होने का आशीर्वाद देती है। यह त्योहार बहन-भाई के रिश्ते को सदा जीवित रखता है और प्रेम में बान्धे रखता है।

दरअसल रक्षाबन्धन का त्योहार बहन भाई के रिश्ते को मजबूत करता है। राखी के त्योहार का अर्थ बहुत गहरा है। यह एक दूसरे के प्रति प्यार, विश्चास, आशा. बलिदान, की भावना जगाता है। बहन अपने भाई के लिये सदा मंगल कामना करती है व भाई बहिन के लिये रक्षा का वादा करता है। लेकिन राखी हमेशा सीधे हाथ में ही बांधी जाती है उल्टे में क्यों नहीं?

इसका कारण यह है कि ज्योतिष के अनुसार हमारा शरीर सूर्य और चंद्र से प्रभावित माना जाता है। इसलिए सीधे हाथ की तरफ वाले नासिका सुर को सूर्य स्वर कहा जाता है व उल्टे हाथ की ओर के सुर को चंद्र स्वर कहते हैं। यही कारण है कि शरीर का सीधे हाथ की तरफ वाला हिस्सा सूर्य से प्रभावित व उल्टे हाथ वाला चंद्र से प्रभावित माना गया है।

सभी ग्रहों की उत्पति सूर्य से मानी गई है चूंकी अपने हिन्दू धर्म में सूर्य ही एकमात्र प्रत्यक्ष देवता है। साथ ही इसे आत्माकारक ग्रह कहा गया है। इसी के कारण हमें सकारात्मक विचार आते हैं। इसीलिए कहा जाता है कि सीधे हाथ से किए गए कार्यों का सकारात्मक फल मिलता है। सीधे हाथ से ही हर शुभ काम की शुरूआत की जाती है। इसीलिए राखी सीधे हाथ में बांधी जाती है, उल्टे में नहीं।

पूजा में कैसे बर्तन उपयोग में लाएं और कैसे नहीं?
सोना, चांदी, तांबा इन तीनों धातुओं को पवित्र माना गया है। हिन्दू धर्म में ऐसा माना गया है कि ये धातुएं कभी अपवित्र नहीं होती है। पूजा में इन्ही धातुओं के यंत्र भी उपयोग में लाए जाते हैं क्योंकि इन से यंत्र को सिद्धि प्राप्त होती है।लेकिन सोना, चांदी धातुएं महंगी है जबकि तांबा इन दोनों की तुलना में सस्ता होने के साथ ही मंगल की धातु मानी गई। माना जाता है कि तांबे के बर्तन का पानी पीने से खून साफ होता है।

इसलिए जब पूजा में आचमन किया जाता है तो अचमनी तांबे की ही रखी जानी चाहिए क्योंकि पूजा के पहले पवित्र क्रिया के अंर्तगत हम जब तीन बार आचमन करते हैं तो उस जल से कई तरह के रोग दूर होते हैं और रक्त प्रवाह बढ़ता है। इससे पूजा में मन लगता है और एकाग्रता बढ़ती है।

क्योंकि लोहा, स्टील और एल्यूमीनियम को अपवित्र धातु माना गया है तथा पूजा और धार्मिक क्रियाकलापों में इन धातुओं के बर्तनों के उपयोग की मनाही की गई है। इन धातुओं की मूर्तियां भी नहीं बनाई जाती। लोहे में हवा पानी से जंग लगता है।

एल्यूमीनियम से भी कालिख निकलती है। इसलिए इन्हें अपवित्र कहा गया है। जंग आदि शरीर में जाने पर घातक बीमारियों को जन्म देते हैं। इसलिए लोहा, एल्युमीनियम और स्टील को पूजा में निषेध माना गया है। पूजा में सोने, चांदी, पीतल, तांबे के बर्तनों का उपयोग करना चाहिए।

मंदिर जाएं तो चरणामृत जरूर लें क्योंकि...
मंदिर जाने से मन को शांति मिलती है। कहते हैं कि मंदिर कभी खाली हाथ नहीं जाना चाहिए और बिना चरणामृत लिए मंदिर से नहीं लौटना चाहिए। मंदिर से लौटने से पहले वहां थोड़ी देर जरूर बैठना चाहिए। मंदिर जाने से जुड़ी इस तरह की अनेक परंपराएं है जिन्हें हिन्दू धर्म में बहुत महत्वपूर्ण माना गया है। दरअसल इसका कारण यही है कि इन सभी परंपराओं से जुड़े कुछ वैज्ञानिक कारण भी हैं। इसीलिए भगवान के चरणों का जल यानी चरणामृत को ग्रहण करने को बहुत महत्व दिया गया है।

शास्त्रों में कहा गया है

अकालमृत्युहरणं सर्वव्याधिविनाशनम्।

विष्णो: पादोदकं पीत्वा पुनर्जन्म न विद्यते ।।

भगवान विष्णु के चरण का अमृतरूपी जल समस्त पाप-व्याधियों का शमन करने वाला है तथा औषधी के समान है। भगवान के चरणों से प्राप्त अमृत। हिंदू धर्म में इसे बहुत ही पवित्र माना जाता है तथा मस्तक से लगाने के बाद इसका सेवन किया जाता है। चरणामृत का सेवन अमृत के समान माना गया है। कहते हैं भगवान श्रीराम के चरण धोकर उसे चरणामृत के रूप में स्वीकार कर केवट न केवल स्वयं भव-बाधा से पार हो गया बल्कि उसने अपने पूर्वजों को भी तार दिया। चरणामृत का महत्व सिर्फ धार्मिक ही नहीं चिकित्सकीय भी है। चरणामृत का जल हमेशा तांबे के पात्र में रखा जाता है।

आयुर्वेदिक मतानुसार तांबे के पात्र में अनेक रोगों को नष्ट करने की शक्ति होती है जो उसमें रखे जल में आ जाती है। उस जल का सेवन करने से शरीर में रोगों से लडऩे की क्षमता पैदा हो जाती है तथा रोग नहीं होते। इसमें तुलसी के पत्ते डालने की परंपरा भी है जिससे इस जल की रोगनाशक क्षमता और भी बढ़ जाती है। तुलसी के पत्ते पर जल इतने परिमाण में होना चाहिए कि सरसों का दाना उसमें डूब जाए। ऐसा माना जाता है कि तुलसी चरणामृत लेने से मेधा, बुद्धि, स्मरण शक्ति को बढ़ाता है। इसीलिए यह मान्यता है कि भगवान का चरणामृत औषधी के समान है। यदि उसमें तुलसीपत्र भी मिला दिया जाए तो उसके औषधीय गुणों में और भी वृद्धि हो जाती है।

क्यों किया जाता है मरने के एक साल तक पिंड दान?
हिंदू संस्कृति में जिंदगी और जिंदगी के बाद भी कई संस्कार किए जाते हैं। इंसान के पैदा होने से पहले से लेकर मरने के बाद तक कई तरह की रस्में निभाई जाती हैं, संस्कार किए जाते हैं।

मौत के समय और मरने के तेरह दिन तक पिंडदान किया जाता है। इसे उत्तर कार्य कहा जाता है। इसके साथ ही व्यक्ति के मरने के एक साल तक हर माह पिंड दान किया जाता है। आखिर पूरे एक साल तक हर महीने पिंडदान क्यों किया जाता है? इसके पीछे क्या कारण है? क्यों सालभर के 12 महीने पिंड दान के बाद बरसी की की जाती है?

वास्तव में यह हमारे शास्त्रों में इसके लिए पूरी व्यवस्था दी गई है। किसी की मृत्यु के बाद पिंडदान क्यों किया जाता है, इसका जवाब कठोपनिषद, गरूड़ पुराण, अग्रिपुराण जैसे ग्रंथों में दिया गया है। गरूड़ पुराण के अनुसार मृत्यु के तेरह दिन बाद आत्मा यमपुरी के लिए यात्रा शुरू करती है। यहां वह 17 दिन में पहुंचती है।

इसके बाद लगातार उसे यमपुरी के उपनगरों में घूमना पड़ता है। इस रास्ते में 11 नगर आते हैं और इस पूरी यात्रा में उसे अन्न-जल उपलब्ध नहीं होता। मृतात्मा के पुत्र और परिजन जो तर्पण करते हैं, वो जल ही उसे मिलता है और पिंडदान करते हैं, वही पिंड उसे यमपुरी में खाने को मिलता है। ग्यारह महीने में लगातार यात्रा के बाद वह बारहवें महीने में यमराज के दरबार में पहुंचता है।

तब एक साल पूरा हो चुका होता है। यमराज के सामने पहुंचने के बाद उसे अपने कर्मों के अनुसार नर्क की यंत्रणा या स्वर्ग का सुख भोगना होता है। इस कार्य में जीव को शक्ति मिल सके, इसके लिए बारहवें महीने में बरसी की जाती है।

शास्त्रों के अनुसार इन पांच देवताओं का पूजन जरूरी माना गया है क्योंकि ...
हमारे शास्त्रो में पंच देव के नित्य पूजन का विधान बताया गया है। परंतु भाग दौड भरे जीवन में यह अब संभव नही रहा। बहुत लोग तो जानते भी नही होंगे कि पंच देव कौन-कौन से है। सर्वविदित है कि हमारा शरीर पंच तत्वो से निर्मित है।तथा पांचो तत्वो के एक-एक देवता है। यह पांचो तत्व ओर उनके देवता निम्र प्रकार है।

- श्री गणेश-जल तत्व श्री विष्णु

- वायु तत्व श्री शंकर- पृथ्वि तत्व श्री देवी

- अग्रि तत्व श्री सूर्य

- आकाश् तत्व जीवन के लिए सर्वप्रथम जल की आवश्यकता होती है।

इसलिए प्रथम पूज्य गणेश जल के अधिष्ठात्र देवता है। वायु साक्षात विष्णु देवता से संबधित तत्व है। शंकर पृथ्वि तत्व, देवी अग्नि तत्व तथा सूर्य आकाश तत्व के देवता है। इस प्रकार इन पांचों का पूजन कर हम अपने आप का ही पूजन करते है।

जब भी भगवान की परिक्रमा करें तो ये बातें जरूर ध्यान रखें...
पूजा-अर्चना आदि के बाद भगवान की मूर्ति के आसपास सकारात्मक ऊर्जा एकत्रित हो जाती है, इस ऊर्जा को ग्रहण करने के लिए परिक्रमा की जाती है। सभी देवी-देवताओं की परिक्रमा की अलग-अलग संख्या है।

किस देवी-देवता की कितनी परिक्रमा:

- शिवजी की आधी परिक्रमा की जाती है।

- देवी मां की तीन परिक्रमा की जानी चाहिए।

- भगवान विष्णुजी एवं उनके सभी अवतारों की चार परिक्रमा करनी चाहिए।

- श्रीगणेशजी और हनुमानजी की तीन परिक्रमा करने का विधान है।

परिक्रमा के संबंध में नियम-

परिक्रमा शुरु करने के पश्चात बीच में रुकना नहीं चाहिए। साथ परिक्रमा वहीं खत्म करें जहां से शुरु की गई थी। ध्यान रखें कि परिक्रमा बीच में रोकने से वह पूर्ण नही मानी जाती। परिक्रमा के दौरान किसी से बातचीत कतई ना करें। जिस देवता की परिक्रमा कर रहे हैं, उनका ही ध्यान करें। इस प्रकार परिक्रमा करने से पूर्ण लाभ की प्राप्ती होती है।

7 फायदों को जानकर आप भी हो जाएंगे ध्यान के मुरीद!
लोगों की स्वास्थ्य के प्रति बढ़ती हुई जिज्ञासा और समझ ने कुछ बातों को एकाएक काफी बढ़ा दिया है। कुछ ही साल पहले की बात करें तो योग-प्राणायाम या ध्यान के बारे में लोगों की जानकारी और दिलचस्पी काफी कम या न के बराबर ही थी।
लेकिन इधर दो-चार सालों में योग (आसान, प्राणायाम,ध्यान...) की तरफ लोगों का रुझान काफी बढ़ गया है।

योग के 8 स्तरों- यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधी, में से भी ध्यान को सबसे ज्यादा लोकप्रिय, मान्य और तुरंत फायदा पहुंचाने वाला माना जाता है। सही रीति से ध्यान करने से उतने फायदे मिल सकते है, जितने कि किसी से सोचा भी न हो।

आइये जानते हैं कि नियमित रूप से ध्यान करने वाले साधक को कैसे आश्चर्यजनक लाभ मिल सकते हैं...

1. हृदय संबंधी समस्याओं से जूझ रहे लोगों के लिये नियमित ध्यान बेहद मददगार साबित होता है।

2. मानसिक चंचलता और अस्थिरता पर नियंत्रण होता है।

3. मानसिक तनाव, चिंता, भय और हीनभावना से छुटकारा मिलता है।

4. कमजोर दिमाग और याद्दाश्त की समस्या से मुक्ति मिलती है।

5. गुस्सा करने की आदत धीरे-धीरे काबू में आ जाती है।

6. सूर्योदय के समय ध्यान करके दिन का प्रारंभ करने से पूरा दिन अच्छा और सकारात्मक माहौल बना रहता है।

7. लगातार लंबे समय तक ध्यान साधना करने से व्यक्ति में कुछ असामान्य शक्तियां या क्षमताएं आने लगती हैं-जैसे भविष्य में घटित होने वाली घटनाओं का पूर्वज्ञान, किसी के मन की बात जान लेना आदि...

शिवजी के मंदिर जाएं तो पहले करें गणेशजी के दर्शन क्योंकि....
किसी भी मंदिर में भगवान के होने की अनुभूति प्राप्त की जा सकती है। भगवान की प्रतिमा या उनके चित्र को देखकर हमारा मन शांत हो जाता है। हर व्यक्ति भगवान के मंदिर अनेक तरह की प्रार्थनाएं और समस्याएं लेकर जाता है। भगवान के सामने सपष्ट रूप से अपने मन के भावों को प्रकट कर देने से भी मन को शांति मिलती है, बेचैनी खत्म होती है।

शिव मंदिर में जाने से पूर्व ध्यान रखें कि सबसे पहले किसे प्रणाम करना चाहिए? सभी शिव मंदिरों के मुख्य द्वार पर श्रीगणेश की प्रतिमा या कोई प्रतीक चिन्ह अवश्य ही रहता है, सबसे पहले इन्हीं श्री गणेशजी को प्रणाम करना चाहिए। श्रीगणेश को प्रथम पूज्य माना गया है। वेद-पुराण के अनुसार इस संबंध में कई कथाएं प्रचलित हैं। शिवजी ने गणेशजी को प्रथम पूज्य होने का वरदान दिया है।इसी वजह से कोई मांगलिक कर्म, पूजन आदि में सबसे पहले गणेशजी की आराधना ही की जाती है। किसी भी भगवान के मंदिर में जाए सबसे पहले भगवान गणपति का ही स्मरण करना चाहिए। इससे आपकी सभी मनोकामनाएं शीघ्र पूर्ण होती है और सभी देवी-देवताओं की कृपा आप पर बनी रहती है।

हाथ में धातु का कड़ा क्यों पहनना चाहिए?
हाथ में कड़ा पहनने का चलन बहुत पहले से है। सिक्ख धर्म में कड़े को धारण करना आवश्यक माना गया है। सिक्ख धर्म में अधिकांश लोग चांदी या अष्टधातु का कड़ा धारण करते हैं। इसे सिक्ख लोगों के पंच क कारो में से एक माना जाता है। दरअसल कड़ा पहनने के रिवाज के पीछे वैज्ञानिक कारण भी है। माना जाता है कि हाथ में कड़ा धारण करने से कई तरह की बीमारियों से रक्षा होती है। वहीं ज्योतिष के अनुसार चंद्र को मन का कारक माना गया है। चांदी को चंद्र की धातु माना गया है। इसीलिए माना जाता है कि चांदी का कड़ा धारण करने से बीमारियां दूर होने के साथ ही चंद्र से जुड़े दोष भी समाप्त होते हैं व एकाग्रता बढ़ती है।

जो व्यक्ति बार-बार बीमार होता है उसे सीधे हाथ मे अष्टधातु का कड़ा पहनना चाहिए। मंगलवार को अष्टधातु का कड़ा बनवाएं। इसके बाद शनिवार को वह कड़ा लेकर आएं। शनिवार को ही किसी भी हनुमान मंदिर में जाकर कड़े को बजरंग बली के चरणों में रख दें। अब हनुमान चालिसा का पाठ करें। इसके बार कड़े में हनुमानजी का थोड़ा सिंदूर लगाकर बीमार व्यक्ति स्वयं सीधे हाथ में पहन लें।ध्यान रहे यह कड़ा हनुमानजी का आशीर्वाद स्वरूप है अत: अपनी पवित्रता पूरी तरह बनाए रखें। कोई भी अपवित्र कार्य कड़ा पहनकर न करें। अन्यथा कड़ा प्रभावहीन हो जाएगा।

तारीख नहीं तिथि के अनुसार मनाएं बर्थ-डे क्योंकि...
हर व्यक्ति के लिए उसका जन्मदिन बहुत विशेष होता है। यही कारण है कि इस दिन को हर व्यक्ति अपने तरीके से मनाना पसंद करता है। कुछ लोग पूजा-पाठ करते हैं तो कुछ लोग पार्टी मनाकर व केक काटकर अपना जन्मदिन मनाते है।

लेकिन हिन्दू धर्म शास्त्रों के अनुसार वर्तमान में जन्मदिन मनाने का जो तरीका है। वह सही नहीं है। हमारे यहां पश्चिमी संस्कृति के बढ़ते प्रभाव के कारण अब लगभग सारे लोग अपना जन्मदिन तिथि के अनुसार नहीं मनाते हैं। लेकिन धर्मशास्त्रों के अनुसार जन्मदिन हमेशा तिथि के अनुसार ही मनाना चाहिए।

जिस तिथिपर हमारा जन्म होता है, उस तिथि के स्पंदन हमारे स्पंदनोंसे सर्वाधिक मेल खाते हैं । इसलिए उस तिथिपर परिजनों एवं हितचिंतकोंद्वारा हमें दी गई शुभकामनाएं एवं आशीर्वाद सर्वाधिक फलित होते हैं । इसलिए जन्मदिन तिथि के अनुसार मनाना चाहिए।

साथ ही पश्चिमी संस्कृति का अनुकरण कर लोग मोमबत्तियां जलाकर एवं केक काटकर जन्मदिन मनाते हैं । मोमबत्ती तमोगुणी होती है उसे जलानेसे कष्टदायक स्पंदन प्रक्षेपित होते हैं। उसी प्रकार हिंदू धर्म में ज्योत बुझाने की कृति अशुभ मानी गई है। इसीलिए जन्मदिनपर मोमबत्ती जलानेके उपरांत उसे जानबूझकर न बुझाएं।

देवताओं को पूजन में क्यों नहीं चढ़ाया जाता कुमकुम?
मान्यताओं के अनुसार, सूने मस्तक को शुभ नहीं माना जाता। पूजन के समय माथे पर अधिकतर कुमकुम का तिलक लगाया जाता है। सुहागन स्त्री कुमकुम श्रृंगार के बिना अधूरी मानी जाती है। पूजा में अधिकतर कुमकुम का तिलक ही लगाया जाता है। इसके पीछे कारण यह है कि कुमकुम हल्दी का चूर्ण होता है। जिसमें नींबु का रस मिलाने से लाल रंग का हो जाता है। आयुर्वेद के अनुसार कुमकुम त्वचा के शोधन के लिए सबसे बढिय़ा औषधी है। इसका तिलक लगाने से मस्तिष्क तन्तुओं में क्षीणता नहीं आता है। इसीलिए पूजा में कुमकुम का तिलक लगाया जाता है।

शास्त्रों में बताया गया है कि पुरुष देवताओं की पूजा में कुमकुम नहीं चढ़ाया जाता है। जबकि देवीयों की पूजा कुमकुम के बिना अधूरी मानी जाती है। लेकिन ऐसा विधान सिर्फ इसलिए नहीं बनाया गया है क्योंकि पुरुष देवताओं को अप्रिय माना जाता है बल्कि इसका कारण कुमकुम का एक तरह की सौभाग्य सामग्री होना है। जिस तरह महिलाओं के सौन्दर्य प्रसाधन केवल महिलाओं के ही उपयोग के लिए होते हैं।

इसी कारण कुमकुम जो कि सुहागनों का श्रृंगार माना गया है। माना जाता है कि देवी को कुमकुम चढ़ाने से उनका विशेष आशीर्वाद प्राप्त होता है।अगर अविवाहित कन्याएं कुमकुम से देवी की पूजा करती हैं तो उनको अच्छा पति मिलता है। विवाहित स्त्रियां तीज, त्यौहार या व्रत में कुमकुम से पूजा करती हैं तो उनको पति की लंबी उम्र का आशीर्वाद प्राप्त होता है। इसीलिए कुमकुम का उपयोग सिर्फ देवी पूजा में ही किया जाता है। देवताओं के तिलक व पूजन के लिए चंदन का उपयोग किया जाना चाहिए।

तो ऐसे लोगों ने पिछले जन्म में की होगी आत्महत्या!
वेद-पुराणों के अनुसार मृत्युलोक अथवा पृथ्वी पर जन्म लेने वाले प्राणियों के शरीर नश्वर होते हैं लेकिन उनकी आत्माएं अमर मानी गई हैं। आत्मा केवल शरीर बदलती है और निश्चित समय के लिए उस शरीर में निवास करती है।

गीता में श्रीकृष्ण ने अर्जुन को यही बताया है कि केवल आत्मा अमर है और शरीर नश्वर है। सभी व्यक्तियों का जीवन कैसा रहेगा यह उनके कर्म ही निर्धारित करते हैं। मृत्यु के बाद जीवित रहते किए कर्मों के आधार पर नया जीवन प्राप्त होता है।

ज्योतिष के अनुसार पूर्व जन्म में किए कर्मों के आधार पर जब ग्रह-नक्षत्रों के उचित स्थिति बनती है तभी इंसान को नया शरीर प्राप्त होता है अर्थात् नया जन्म मिलता है। किसी भी व्यक्ति की कुंडली में ग्रहों की स्थिति का गहराई से अध्ययन करने के बाद पिछले जन्म के संबंध में भी सभी जानकारी प्राप्त की जा सकती है। पिछले जन्म में व्यक्ति की मृत्यु कैसे हुई? यह भी ग्रह-नक्षत्रों से मालुम हो जाता है।

परलोक और पुनर्जन्मांक के अनुसार यदि किसी व्यक्ति की कुंडली में राहु प्रथम भाव या सप्तम भाव में बैठा हो तो ऐसा समझना चाहिए कि उस व्यक्ति की पूर्व जन्म में मृत्यु स्वाभाविक नहीं थी। उसकी मृत्यु किसी दुर्घटना के कारण हुई होगी। इसके अलावा यदि किसी व्यक्ति की कुंडली में एक साथ चार या इससे अधिक ग्रह नीच राशि के हों तो उस व्यक्ति ने पूर्व जन्म में निश्चय ही आत्महत्या की होगी। ऐसा समझना चाहिए।

नदी में सिक्के डालने की परंपरा क्यों?
भारत देश में अनेक परंपराएं ऐसी हैं जिन्हें कुछ लोग अंधविश्वास मानते हैं तो कुछ लोग उन परंपराओं पर विश्वास करते हैं।ऐसी ही एक परंपरा है नदी में सिक्के डालने की। आपने अक्सर देखा होगा कि ट्रेन या बस जब किसी नदी के पास से गुजरती है तो उसमे बैठे लोग या नदी के पास से गुजरने वाले लोग नदी को नमन करने के साथ ही उसमें सिक्के डालते हैं। दरअसल यह कोई अंधविश्वास नहीं बल्कि एक उद्देश्य से बनाइ गई परंपरा है। इसका पहला कारण तो यह था कि प्राचीन समय में चांदी व तांबे के सिक्के हुआ करते थे।

जब उन सिक्को को नदी में डाला जाता था तो नदी में एकत्रित होने वाले ये सिक्के जल के शुद्धिकरण का कार्य करते थे। साथ ही इसके पीछे एक कारण यह है कि नदी में सिक्के डालना एक तरह का दान भी होता है क्योंकि पवित्र नदियों वाले क्षेत्र में कई गरीब ब'चे नदी से सिक्के एकत्रित करते हैं। इसलिए नदी में सिक्के डालने से दान का पुण्य भी प्राप्त होता है। साथ ही ज्योतिष के अनुसार ऐसी मान्यता है कि यदि बहते पानी में चांदी का सिक्का डाला जाए तो अशुभ चंद्र का दोष समाप्त हो जाता है।

कैसे चुनें अपने लिए सही भाग्यशाली रत्न
आज कल राशि के अनुसार रत्न पहनने का चलन है। कुछ लोगों को अपनी कुंडली नही पता होती है इसलिए वो लोग अपनी राशि के अनुसार ही रत्न पहन लेते हैं लेकिन जिन लोगों को अपनी कुंडली पता होती है उनको कुंडली के अनुसार ही अपना भाग्यशाली रत्न चुनना चाहिए।

कैसे चुनें भाग्यशाली रत्न
- अगर आपकी कुंडली के पहले भाव में 1 नंबर है तो आपका भाग्यशाली रत्न पुखराज होगा जो आपकी किस्मत का स्वामी होगा।

- आपकी कुंडली में पहले भाव में अंक 2 होने से आपकी किस्मत का स्वामी शनि है। निलम रत्न पहनना इस राशि वालों के लिए अच्छा रहेगा।

- अगर किसी कुंडली के पहले भाव में 3 नंबर है तो ऐसे लोगों को किस्मत चमकाने के लिए शनि का ही रत्न पहनना चाहिए।

- 4 नंबर से शुरू होने वाली कुंडली में किस्मत का स्वामी गुरु होता है इसलिए ऐसी कुंडली वालों को सिधे हाथ की पहली अंगुली में सोने की अंगुठी पहनना चाहिए।

- जो कुंडली 5 अंक से शुरू होती है उस कुंडली में मंगल किस्मत का स्वामी होता है। इसलिए ऐसे लोगों को मूंगा पहनना चाहिए।

- अगर कोई कुंडली 6 नंबर से शुरू हो रही है तो ऐसी कुंडली वालों को अपनी किस्मत चमकाने के लिए अमेरिकन डायमंड या असली हीरा पहनना चाहिए।

- तुला राशि यानी 7 नंबर से शुरू होने वाली कुंडली जिन लोगों की होती है उनके लिए पन्ना भाग्यशाली रत्न होता है।

- 8 नंबर वाली कुंडली के लोगों को चंद्रमा का रत्न मोती पहनना चाहिए।

- जिन लोगों की कुंडली के पहले भाव में 9 नंबर होता है ऐसे लोगों को सूर्य का रत्न यानी माणिक पहनना चाहिए।

- 10 नंबर जिन लोगों की कुंडली में पहले घर में होता है उन लोगों की किस्मत का स्वामी बुध होता है। इसलिए उन्हे पन्ना पहनना चाहिए।

- जिस कुंडली के पहले भाव में 11 नंबर हो ऐसी कुंडली वालों को किस्मत चमकाने के लिए हीरा पहनना चाहिए। यह शुक्र का रत्न है।

- अगर किसी कुंडली के पहले घर में 12 नंबर है तो ऐसे लोगों को मंगल का रत्न यानी मूंगा पहनना चाहिए।

आरती पूरी होने के बाद आरती क्यों लेते हैं?
पूजा के अंत में हम सभी भगवान की आरती करते हैं। आरती के दौरान कई और बाद में अनेक परंपराएं निभाई जाती है। इन सबका विशेष अर्थ होता है। ऐसी मान्यता है कि न केवल आरती करने, बल्कि इसमें शामिल होने पर भी बहुत पुण्य मिलता है। किसी भी देवता की आरती करते समय उन्हें 3बार पुष्प अर्पित करते हैं। ढोल, नगाडे, घडियाल आदि भी बजाते हैं व अंत में आरती लेते हैं।

दरअसल आरती उतारने के पश्चात् दोनों हथेलियों को दीप की ज्योतिपर कुछ क्षण रखकर उनका स्पर्श अपने मस्तक, कान, नाक, आंखें, मुख, छाती, पेट, पेटका निचला भाग, घुटने व पैरों पर करें। इसे आरती ग्रहण करना कहते हैं। मान्यता है कि आरती के बाद दीप से निकलने वाली तरंगे जो कि गोलाकार पद्धति से गतिमान होती हैं। आरती लेने वाले जीव के चारों ओर इन तरंगों का कवच निर्माण होता है । इस कवच को तरंग कवच कहते हैं। किसी भी व्यक्ति का आरती लेते समय आरती के प्रति भाव जितना अधिक होगा, उतना ही यह कवच अधिक समय तक बना रहेगा । इससे विचारों की सात्विकता में भी वृद्धि होती है और वह ब्रह्मांड की ईश्वरीय तरंगोंको अधिक मात्रामें ग्रहण कर सकता है। इससे मन से नकारात्मक विचार तो मिटते ही हैं साथ ही बहुत पुण्य मिलता है।

हर काम बन जाता है गणेशजी की ऐसी मूर्ति से क्योंकि....
हर मांगलिक कार्य की शुरुआत श्री गणेश के नाम से ही होती है। प्रथम पूज्य श्री गणेश जल्द ही प्रसन्न होने वाले देवता है। धर्म ग्रंथों जब गणपति कमल पर विराजित हों तो वे घर की सारी नकारात्मक शक्तियों को निष्क्रिय कर देते हैं। कमल पर बैठे गणेश के इस रूप को विघ्नर्हता कहा जाता है। इसके बारे में कहा जाता हैं कि गणेश ने अपने कमल के फूल की गंध से समस्त देव सेना को बेहोश कर दिया था। इसलिए इस गणेश के कमल के फूल पर बैठे या फू ल को हाथ में लिए हुए स्वरूप को विघ्र को मिटाने वाला माना जाता है।

गणेश का यह स्वरूप सकारात्मक उर्जा उत्पन्न करने में सक्षम माना जाता है, गणेश के इस स्वरूप को यदि घर के मध्य स्थापित कर लिया जाए तो घर में उपस्थित कई तरह के वास्तुदोष में कमी आने के साथ ही जो काम सालों से नहीं बन पा रहा हो विघ्न आ रहा हो तो गजानन के इस रूप की स्थापना से हर काम शीघ्र पूर्ण होने के साथ ही जीवन में आने वाली मुसीबतों में कमी आने लगती है।

जन्माष्टमी पर ऐसे करें श्रीकृष्ण का पूजन व व्रत
22 अगस्त, सोमवार को श्रीकृष्ण जन्माष्टमी का पर्व है। इस दिन भगवान श्रीकृष्ण के निमित्त व्रत रखा जाता है व विशेष पूजन किया जाता है। धर्म शास्त्रों के अनुसार इस दिन जो प्राणी व्रत रखता है उसे मोक्ष की प्राप्ति होती है और वह मोह-माया के जाल के मुक्त हो जाता है। यदि यह व्रत किसी विशेष कामना के लिए किया जाए तो वह कामना भी शीघ्र ही पूरी हो जाती है। श्रीकृष्ण जन्माष्टमी की पूजन व व्रत की विधि इस प्रकार है-

व्रत व पूजन विधि
जन्माष्टमी (22 अगस्त, सोमवार) के दिन सुबह जल्दी उठें और नित्य कर्म से निवृत्त होकर स्नान करें व साफ वस्त्र धारण करें। इसके बाद सभी देवताओं को नमस्कार कर पूर्व या उत्तर की ओर मुख करके श्रीकृष्ण जन्माष्टमी व्रत का संकल्प लें (जैसा व्रत आप कर सकते हैं वैसा संकल्प लें यदि आप फलाहार कर व्रत करना चाहते हैं तो वैसा संकल्प लें और यदि एक समय भोजन कर व्रत करना चाहते हैं तो वैसा संकल्प लें)। इसके बाद पंचामृत व गंगा जल से माता देवकी और भगवान श्रीकृष्ण की सोने, चांदी, तांबा, पीतल, मिट्टी की मूर्ति या चित्र पालने में स्थापित करें। श्रीकृष्ण को नए वस्त्र अर्पित करें। पालने को सजाएं। इसके बाद सोलह उपचारों से भगवान श्रीकृष्ण का पूजन करें।

पूजन में देवकी, वासुदेव, बलदेव, नंद, यशोदा और लक्ष्मी आदि के नाम उच्चारण करें। अंत में माता देवकी को अघ्र्य दें। भगवान श्रीकृष्ण को पुष्पांजलि अर्पित करें। चन्द्रमा को शंख में जल, फल, कुश, फूल, गंध डालकर अघ्र्य दें एवं पूजन करें। रात्रि में 12 बजे के बाद श्रीकृष्ण का जन्मोत्सव मनाएं। पालने को झूला करें। पंचामृत में तुलसी डालकर व माखन मिश्री का भोग लगाएं। आरती करें और रात्रि में शेष समय स्तोत्र, भागवद्गीता का पाठ करें। दूसरे दिन पुन: स्नान कर जिस तिथि एवं नक्षत्र में व्रत किया हो, उसकी समाप्ति पर व्रत पूर्ण करें।

क्यों लिया भगवान विष्णु ने श्रीकृष्ण अवतार?
द्वापर युग में पृथ्वी पर मानव रुपी राक्षसों के अत्याचार बढऩे लगे। तब पृथ्वी दु:खी होकर भगवान विष्णु के पास गईं। तब भगवान विष्णु ने कहा मैं शीघ्र ही पृथ्वी पर जन्म लेकर दुष्टों का सर्वनाश करूंगा। द्वापर युग के अन्त में मथुरा में उग्रसेन राजा राज्य करते थे। उग्रसेन के पुत्र का नाम कंस था। कंस ने उग्रसेन को बलपूर्वक कारागार में डाल दिया और स्वयं राजा बन गया।

कंस की बहन देवकी का विवाह यादव कुल में वासुदेव के साथ तय हुआ। जब कंस देवकी को विदा करने के लिए जा रहा था तो आकाशवाणी हुई कि- देवकी का आठवां पुत्र तेरा वध करेगा । यह सुनकर कंस डर गया और उसने देवकी और वासुदेव को कारागार में डाल दिया। और एक-एक कर देवकी की होने वाली संतानों का वध करने लगा।

आठवें गर्भ से श्रीकृष्ण का जन्म हुआ। लेकिन माया के प्रभाव से किसी को इस बात का पता नहीं चला कि देवकी की आठवी संतान गोकुल में नंदबाबा के यहां पल रही है। यहां भी श्रीकृष्ण ने अपनी लीला से कई राक्षसों का वध किया और अंत में कंस का वध कर राजा उग्रसेन को सिंहासन पर बैठाया। श्रीकृष्ण ने महाभारत के युद्ध में पाण्डवों का साथ दिया और अधर्म का नाश कर धर्म रुपी युधिष्ठिर को सिंहासन पर बैठाया।

क्यों और कब दीपक लगाने से दूर होती है आर्थिक तंगहाली?
हिन्दू धर्म के अनुसार हम जब भी पूजा करते हैं तो दीपक जरूर जलाते हैं क्योंकि दीपक ज्ञान और रोशनी का प्रतीक है। पूजा में दीपक का विशेष महत्व है। शास्त्रों के मुताबिक ऐसे ही पुण्यकाल में धन और ऐश्वर्य की देवी विष्णु पत्नी लक्ष्मी भ्रमण पर निकलती है। इसलिए घर-परिवार से कलह, दरिद्रता, रोग या आर्थिक तंगहाली को दूर करने के लिए ऐसे वक्त घर में दीप लगाना बहुत ही शुभ होता है। पवित्रता और प्रकाश खुशहाली का ही प्रतीक होता है। मान्यता है कि ऐसे दीप से माता लक्ष्मी प्रसन्न होकर वहीं वास करने लगती है। परिवार धन की कमी से नहीं जूझता।

प्रतिदिन शाम के समय कीचन में जहां पानी रखा जाता है उस स्टेंड पर पानी का घड़ा भरकर रखें। घड़े के नीचे तेल का दीपक जलाएं। ऐसा प्रतिदिन करने पर घर की आर्थिक परेशानियां समाप्त होने लगेंगी। इसके अलावा अपनी पूरी मेहनत ईमानदारी के साथ करें तो बहुत जल्द आपका कर्ज उतर जाएगा।पैसों से संबंधित समस्याएं तो खत्म होंगी इसके साथ ही घर के कई वास्तुदोषों का भी नाश होगा। वातावरण में फैली नकारात्मक ऊर्जा नष्ट हो जाएगी। सकारात्मक ऊर्जा में बढ़ोतरी होगी। घर में फैले कई विषैले सुक्ष्म कीटाणुदीपक के धुंए से खत्म हो जाएंगे।

पूजन में महिलाओं की चूडिय़ों पर क्यों लगाते हैं तिलक?
पूजन कर्म में स्त्री हो या पुरुष, दोनों को कुमकुम, चंदन आदि का तिलक लगाने की परंपरा है। सभी पंडित पुरुषों के मस्तक या माथे पर तिलक लगाते हैं लेकिन स्त्रियों के संबंध में कुछ पंडित या ब्राह्मण माथे पर नहीं चुडिय़ों पर तिलक लगाते हैं। इसके पीछे कुछ खास कारण मौजूद है।

शास्त्रों के अनुसार सभी प्रकार के विधिवत पूजन कर्म ब्राह्मण या पंडितों द्वारा ही कराए जाने चाहिए। यदि कोई पति-पत्नी कोई धार्मिक कार्य करवाते हैं तब उन दोनों का पूजन में सम्मिलित होना अनिवार्य माना गया है। इस प्रकार के आयोजन में ब्राह्मण द्वारा यजमान को कई बार तिलक लगाया जाता है। कई वेदपाठी ब्राह्मण स्त्रियों की चुडिय़ों पर ही तिलक लगाते हैं मस्तक पर नहीं। इसकी वजह यह है कि विवाहित स्त्री को पति के अलावा किसी अन्य पुरुष का स्पर्श करना निषेध माना गया है। वेद-पुराण के अनुसार किसी भी विवाहित स्त्री को स्पर्श करने का अधिकार अन्य महिलाओं के अतिरिक्त केवल उसके पति को ही प्राप्त है। अन्य पुरुषों का स्पर्श होने से उसका पतिव्रत धर्म प्रभावित होता है। इसी वजह से वेदपाठी ब्राह्मण महिलाओं की चुडिय़ों पर तिलक लगाते हैं, माथे पर नहीं ताकि उन्हें स्पर्श न हो सके। स्त्री के बीमार होने पर या संकट में होने पर कोई वैद्य या डॉक्टर स्पर्श कर सकता है, इससे स्त्री का पतिव्रत धर्म नष्ट नहीं होता है।

ऐसी मान्यता है कि धार्मिक कर्म में चुडिय़ों पर तिलक लगाने से विवाहित स्त्री पतिव्रत धर्म हमेशा पवित्र रहता है और पति की उम्र लंबी होने के साथ स्वस्थ और सुखी जीवन रहता है। पति और पत्नी दोनों के जीवन में सुख, समृद्धि और शांति बनी रहती हैं, उन्हें धन आदि की भी कमी नहीं होती।

कुछ रोचक बातें: कैसी होती थीं पुराने समय में शादियां?
विवाह या शादी हमारे जीवन का सबसे अनिवार्य संस्कार माना गया है। प्राचीन काल से ही विवाह के संबंध में कई नियम और सावधानियां बनाई गई हैं। तरह-तरह की परंपराएं पुराने समय से ही चली आ रही हैं जिन्हें हम आज भी निभाते हैं। परिवार की स्थिरता, सुख, शांति, कल्याण के लिए विवाह की अनिवार्यता मानी गई है।

महिलाओं के संबंध में माना जाता था कि विवाह उनका दूसरा जन्म ही है। पुराने समय में शादी से पहले वर और वधू में परिचय या जान-पहचान, मिलना-जुलना नहीं होता था। कन्याओं को पति चुनने की पूर्ण स्वतंत्रता नहीं थी। विवाह के लिए पिता की आज्ञा अनिवार्य होती थी। यहां तक ही पुत्रों के लिए भी पिता की आज्ञा मिलने के बाद भी विवाह करने का विधान था। इसका सटीक प्रमाण भगवान श्रीराम के जीवन से मिलता है। रामायण या रामचरितमानस के अनुसार महाराजा जनक द्वारा सीता के विवाह के लिए स्वयंवर आयोजित किया गया था। स्वयंवर में केवल श्रीराम ने ही जनक द्वारा रखी शर्तों को पूरा किया था। इसके बाद श्रीराम को सीता से विवाह करने का अधिकार प्राप्त हो गया था लेकिन श्रीराम ने अपने पिता महाराजा दशरथ की आज्ञा न मिलने तक सीता को स्वीकार करने से इंकार कर दिया था। शायद इसी प्रथा की वजह से उस काल में होने वाले विवाह में दुख या पति-पत्नी के बीच क्लेश आदि का उल्लेख नहीं मिलता है।

विवाह में कन्याओं को बहुत सा धन, उपहार देने की प्रथा काफी पुराने समय से चली आ रही है। पहले तलाक या विवाह विच्छेद जैसी कोई परंपरा नहीं थी। पिता द्वारा कन्या का विवाह जिस पुरुष से कर दिया जाता था वह मृत्यु के बाद परलोक में भी उसी पुरुष की पत्नी होती थी। ऐसा माना जाता था। उस समय कन्याओं से घृणा या उपेक्षा या द्रोह का कहीं भी उल्लेख नहीं मिलता है। पिता द्वारा अपनी कन्या का पालन-पोषण बहुत अच्छे से ही किया जाता था। विवाह के बाद पति अपनी पत्नी के सुख-दुख का पूरा-पूरा ध्यान रखते थे।

रामायण में सभी स्त्री पात्रों की स्थिति को देखते हुए समझा जा सकता है कि उन्हें अपने पिता के घर से ही समुचित ज्ञान और शिक्षा प्राप्त हुई थी। तभी वे आज तक पतिव्रता स्त्रियों के रूप में प्रसिद्ध हैं। विवाह के बाद कन्याओं को पति के घर में सास और ससुर सहित पूरे ससुराल पक्ष से असीम प्रेम और सम्मान प्राप्त होता था। इसके साथ ही पत्नी के लिए पति ही उसका देवता या भगवान माना जाता था। पत्नी अपने पति के सभी कार्यों में बराबरी से सहयोग प्रदान करती थी। पति की मृत्यु के बाद विधवा स्त्रियां अनादर का पात्र नहीं होती थीं। राजा दशरथ की मृत्यु के बाद उनकी विधवा रानियों के सम्मान में किसी प्रकार की कोई नहीं आई थी।

शनिवार को ऐसे नहाएं, शनि से मिलेगा धन लाभ
ज्योतिष शास्त्र के अनुसार शनि एक मात्र ऐसा ग्रह बताया गया है जो एक साथ पांच राशियों पर सीधा प्रभाव डालता है। एक समय में शनि की तीन राशियों पर साढ़ेसाती और दो राशियों पर ढैय्या चलती है। शनिदेव का स्वभाव क्रूर माना गया है। इसी वजह से अधिकांश लोगों को साढ़ेसाती और ढैय्या में कड़ी मेहनत करना होती है।

जिस व्यक्ति की कुंडली में शनि अशुभ फल देने वाला होता है उसे किसी भी कार्य में आसानी से सफलता प्राप्त नहीं होती है। इसके साथ राहु-केतु भी बुरा प्रभाव डालते हैं। पिता-पुत्र में अक्सर वाद-विवाद होता रहता है। परिवार में भी अशांति बनी रहती है और इसी वजह से व्यक्ति को मानसिक तनाव झेलना पड़ता है। साढ़ेसाती और ढैय्या के समय इस प्रकार की परेशानियां और अधिक बढ़ जाती हैं।

शनिदेव के बुरे प्रभावों से निजात पाने के लिए कई उपाय बताए गए हैं। ज्योतिष के अनुसार शनिवार शनिदेव की आराधना के लिए खास दिन माना गया है। इस दिन शनि के निमित्त पूजन-कर्म करने से विशेष लाभ प्राप्त होता है। शनिवार को स्नान के संबंध में खास नियम बताया गया है। इस दिन ब्रह्म मुहूर्त में उठकर नित्य क्रियाओं से निवृत्त होने के बाद पूरे शरीर पर तेल लगाएं। तेल की मालिश करें। इसके बाद नहाने के पानी में काला तिल मिलाकर स्नान करें।

स्नान के बाद एक कटोरी में तेल लेकर उसमें अपना चेहरा देखें और फिर यह तेल शनिदेव को अर्पित कर दें या किसी ब्राह्मण या किसी जरूरतमंद को दान कर दें। ऐसा करने पर कुछ ही दिनों में लाभ प्राप्त होने लगेगा। धन संबंधी परेशानियां दूर हो जाएंगी। इसके साथ ही घर-परिवार की समस्याओं से भी आजादी मिल जाएगी।

ऐसे लोग मरने के बाद बन जाते हैं भूत-प्रेत..
पिशाच योनि में गईं जीवात्मा खुद पर हुए अत्याचारों का बदला लेने के लिए हानि पहुंचाने वालों को अनेक प्रकार से कष्ट देती है। प्रेत योनि में गए जीव अपने परिवार और कुल वालों को परेशान करते हैं और दुख देते हैं। ऐसे प्रेत रूष्ट होकर वंश वृद्धि को भी रोकते हैं। प्रेत योनि की आयु लगभग 12 वर्ष बताई गई है।

- मरने के बाद जिन लोगों की श्राद्ध, तर्पण या पिण्ड दान आदी क्रिया नही हो पाती जिससे वह अतृप्त होता है और ऊर्जा नही मिल पाने के कारण आगे की यात्रा नही करता ऐसे लोगों को मरने के बाद प्रेत योनि मिलती है।

- अपमृत्यु यानी युवा अवस्था में मरने से, हत्या, आत्महत्या, सांप या अन्य जीव के काटने पर मरने से, पानी में डूबकर या आग में जलकर मरने से या फिर किसी भी प्रकार के एक्सीडेंट से मरने वाला व्यक्ति पिशाच योनि में चला जाता है।

- प्रेत और पिशाच बाधा से पिड़ीत व्यक्ति आचानक मर जाता है ऐसी आकाल मृत्यु प्राप्त करने वाले लोग मरने के बाद प्रेत ही बन जाते हैं।

- कुछ विद्वानों का मानना है कि प्रेत और पिशाच साधना करने वाले तांत्रिकों को भी मरने के बाद ऐसी ही योनि प्राप्त होती है।

पुराने समय के लोग कैसे जीते थे सैकड़ों साल?
जन्म और मृत्यु के संबंध में आज भी यही कहा जाता है कि किसी भी व्यक्ति का जन्म और मृत्यु, दोनों ही परमात्मा पर निर्भर है। वर्तमान समय में इंसान की औसत आयु लगभग 60 वर्ष मानी जा रही है जबकि प्राचीन काल में इंसान सैकड़ों साल जीवित रहते थे। इसके पीछे कई स्वास्थ्य संबंधी कारण मौजूद हैं।

काफी हद तक आज का वातावरण और खानपान इस बात के लिए जिम्मेदार है कि व्यक्ति की औसत आयु केव 60 वर्ष रह गई है। पुराने समय में वातावरण और खानपान दोनों ही दृष्टि से काफी स्वास्थ्यवर्धक था। तब न तो वाहनों का धुआं होता था और ना ही जंक फूड या आज के जैसा असंतुलित खाना।

शास्त्रों के अनुसार उस समय भोजन के चार प्रकार थे- भक्ष्य, भोज्य, चोप्य और लेह्य। तब अधिकतर लोगों का पंसदीदा आहार गेहूं और चावल ही था। चावल से बने पकवानों में घी में उबले चावल, दूध की खिचड़ी, चावल, दाल और चीनी के लड्डू, चावल के मालपुए, खीर आदि प्रचलन थे। शास्त्रों में कई स्थानों घी का उल्लेख मिलता है। उस समय मांसाहार से कहीं अधिक शाकाहार को महत्व दिया जाता था।

उस समय लोगों का आपसी व्यवहार भी प्रेममय होता था। इसके अलावा प्रत्येक व्यक्ति के द्वारा कई प्रकार के पूजनकर्म किए जाते थे और देवी-देवताओं को तृप्त किया जाता था। तब मनोरंजन के भी जो साधन थे वे भी इंसान के स्वास्थ्य को अच्छा बनाए रखते थे। तब शतरंज, द्यूत, संगीत, नृत्य और नाटक, विहार, जलविहार, व्यायाम आदि मनोरंजन के साधन थे। वे लोग केवल प्राकृतिक वातावरण में ही निवास करते थे। इन सभी कारणों के चलते उन्हें बीमारियां होने की संभावनाएं बहुत कम रहती थी। रोगियों के लिए उच्च क्वालिटी की औषधियां रहती थीं, जो इंसानों से मृत्यु को दूर रखती थीं।

जब भी मंदिर जाएं, भगवान को जरूर करें ये काम...
शास्त्रों के अनुसार सुख हो दुख हर पल भगवान का ध्यान करने पर अक्षय पुण्य की प्राप्ति होती है, जो कि हमारे कई जन्मों पापों को नष्ट कर देता है। आजकल की भागती-दौड़ती जिंदगी में बहुत कम लोग हैं जिन्हें विधिवत भगवान की पूजा-आराधना का समय मिल पाता है। ऐसे में भगवान की पूजा के लिए सभी मंदिर जाते हैं और केवल हाथ जोड़कर प्रार्थना करते हैं। जबकि भगवान के सामने साष्टांग प्रणाम करने पर आश्चर्यजनक शुभ फल प्राप्त होते हैं।

भगवान को साष्टांग प्रणाम करना, केवल एक परंपरा या बंधन नहीं है। इस परंपरा के पीछे विज्ञान भी है जो हमारे शारीरिक, मानसिक और वैचारिक विकास से जुड़ा है। साष्टांग प्रणाम का सबसे बड़ा फायदा यह है कि इससे हमारे शरीर का व्यायाम होता है। साष्टांग प्रणाम की बहुत ही सामान्य विधि हैं। इसके लिए भगवान के सामने आराम से बैठ जाएं और फिर धीरे-धीरे पेट के बल जमीन पर लेट जाएं। दोनों हाथों को सिर के आगे ले जाकर जोड़कर नमस्कार करें। इस प्रणाम से हमारे सारे जोड़ थोड़ी देर के लिए तन जाते हैं, इससे भी स्ट्रेस दूर होता है। इसके अलावा झुकने से सिर में रक्त प्रवाह बढ़ता है, जो स्वास्थ्य और आंखों के लिए लाभप्रद होता है। प्रणाम करने की यही विधि सबसे ज्यादा फायदेमंद है। इसका धार्मिक महत्व काफी गहरा है ऐसा माना जाता है कि इससे हमारा अहंकार कम होता है। भगवान के प्रति हमारे मन में समर्पण का भाव आता है तो अहंकार स्वत: ही खत्म होता है। जब भगवान के समक्ष हम तन और मन समर्पण कर देते हैं तो यह अवस्था निश्चित ही हमारे मन को असीम शांति प्रदान करती हैं। इसके अलावा इस प्रकार प्रणाम करने से हमारे जीवन की कई समस्याएं स्वत: ही समाप्त हो जाती हैं।

घर में धन, संपत्ति और शांति के लिए क्या और क्यों करें?
लगभग सभी घरों में छोटी-छोटी लड़ाई-झगड़े, वाद-विवाद आदि सामान्य बात है। कुछ परिस्थितियों में यही छोटे वाद-विवाद बड़ा रूप ले लेते हैं जिससे घर की शांति और सुख-समृद्धि नष्ट होने लगती है। साथ ही कई बार ऐसा होने पर परिवार के सामने आर्थिक समस्याएं भी उत्पन्न हो जाती हैं। इन परेशानियों से बचने के लिए बहुत सामान्य सा उपाय है, जिसे हम सभी अपनाते ही हैं।

प्राय: अधिकांश श्रद्धालु जब भी शिव मंदिर जाते हैं तब वहां शिवलिंग का पूजन करते समय दूध भी अर्पित करते हैं। जो व्यक्ति प्रतिदिन शिवलिंग पर दूध अर्पित करता है उसके घर में कभी भी धन की कमी नहीं होती और ना ही परिवार में वाद-विवाद होते हैं।

यदि किसी व्यक्ति के घर में शांति नहीं रहती हो तथा परिवार के सदस्य आपस में विवाद करते हो, तो शिवलिंग पर दूध की चढ़ाएं। दूध चढ़ाते समय ध्यान रखें की दूध धारा एक जैसी शिवलिंग के पर अर्पित की जाएं। दूध चढ़ाने के लिए तांबे के लौटे का उपयोग करें। इस धारा को कुछ देर तक लगातार चलने दें तथा ऊँ नम: शिवाय मंत्र का जप करते रहे। मन में शांति की कामना करें। कुछ ही दिनों में गृहक्लेश समाप्त हो जाएगा। धन से जुड़ी समस्याएं समाप्त हो जाएंगी।

घर में बनवाएं पिरामिड जैसा मंदिर, क्योंकि...
भगवान की भक्ति के लिए सभी के घरों में देवस्थान या मंदिर अवश्य ही होते हैं। घर में मंदिर कैसा होना चाहिए इस संबंध में सर्वाधिक बात यह है कि मंदिर का शिखर पिरामिड के आकार होना बहुत शुभ माना जाता है। इसी वजह से बड़े-बड़े मंदिरों के शिखर भी पिरामिड के आकार के ही होते हैं।

घर में ऐसे शिखर वाला मंदिर होने से परिवार के सभी सदस्यों की चिंताएं दूर हो जाती हैं, जहां हमारे मन की सारी अंशाति, आत्मिक शांति में बदल जाती है। पिरामिड वाले मंदिर की वजह से घर में शांति की अनुभूति होती है। पिरामिड की बनावट ऐसी होती है कि यह वातावरण से सकारात्मक ऊर्जा को ग्रहण करता है। जहां पिरामिड होता है वहां नकारात्मक ऊर्जा यानि बुरी शक्तियां अपना प्रभाव नहीं दिखा पाती।

वास्तु के अनुसार पिरामिड का शाब्दिक अर्थ है अग्नि शिखा। अग्नि शिखा का मतलब है कि एक ऐसी अदृश्य ऊर्जा जो आग के समान होती है। यह शक्ति पिरामिड के प्रभाव में रहने वाले लोगों को मिलती है। पिरामिड प्रकृति से ऊर्जा एकत्रित करता है। पिरामिड की छोटी-छोटी प्रतिकृतियां अंदर से खाली होती हैं जो कि विद्युत चुंबकीय वर्ग आदि की ऊर्जा निर्मित करती है। इसी वजह से मंदिरों के शिखर पिरामिड की तरह बनाए जाते हैं जिससे वहां आने वाले व्यक्तियों को ऊर्जा मिल मिलती है।

ज्योतिष शास्त्र के अनुसार भी घर के मंदिर का शिखर पिरामिड जैसा बनाने से घर के वास्तु दोष और कई प्रकार के ग्रह दोष भी स्वत: ही समाप्त हो जाते हैं। ऐसे मंदिर के समक्ष प्रार्थना करने पर हमारी इच्छाएं जल्द ही पूर्ण हो जाती हैं। ऐसे में मंत्र जप का भी चमत्कारिक प्रभाव पड़ता है।

इन 6 अद्भुत नक्षत्रों में जन्म हो तो जरूरी है विशेष पूजा, क्योंकि...
जब किसी बच्चे का जन्म होता है तब एक बात पर खास ध्यान दिया जाता है कि बच्चे का जन्म किस नक्षत्र में हुआ है? ज्योतिष शास्त्र के अनुसार 27 नक्षत्र बताए गए हैं। जिस प्रकार जन्म पत्रिका में ग्रह हमारे जीवन को प्रभावित करते हैं, ठीक उसी प्रकार नक्षत्रों का भी शुभ और अशुभ प्रभाव होता है।

सभी 27 नक्षत्रों का प्रभाव अलग-अलग होता है। अत: नक्षत्रों की स्थिति के अनुसार ही हमारा भाग्य बनता है और बिगड़ भी सकता है। इन 27 में से 6 नक्षत्रों का प्रभाव काफी अधिक बताया गया है। व्यक्ति के जन्म के समय ये नक्षत्र अशुभ फल देने वाले होते हैं तो इनकी शांति पूजा करना अतिआवश्यक होता है। इन 6 नक्षत्रों में अश्लेषा, मघा, ज्येष्ठा, रेवती, मूल, अश्विनी शामिल हैं।

इन 6 नक्षत्रों में से किसी एक नक्षत्र में किसी बच्चे बच्चे का जन्म हो तो मूल शांति की पूजा कराई जाती है। ज्योतिष के अनुसार ऐसा माना जाता है कि मूल नक्षत्र में जन्म लेने वाले बच्चे माता-पिता के लिए शुभ नहीं होते हैं। अत: मूल शांति की पूजा न कराई जाए माता-पिता को कई प्रकार की परेशानियों का सामना करना पड़ सकता है। कई ऐसी तिथियां और योग होते हैं जिनमें बच्चे का जन्म होने पर कुछ आवश्यक पूजन-कर्म कराए जाना आवश्यक है। अन्यथा घर-परिवार में कई समस्याएं प्रारंभ हो जाती हैं।

मूल शांति की पूजा कब और कैसे कराई जाना चाहिए? इस संबंध में जल्द ही जीवन मंत्र पर आवश्यक जानकारियां प्रकाशित की जाएंगी।

गणेशजी का चूहा बताता है अचूक फंडे, सफलता चूमेगी कदम
शास्त्रों के अनुसार सभी देवी-देवताओं के वाहन अलग-अलग और विचित्र बताए हैं। किसी भी देवता का वाहन अज्ञान और अंधकार की शक्तियों का प्रतिनिधित्व करते हैं जिसका नियंत्रण वह देवता करते हैं। गणेशजी का वाहन है मूषक यानि चूहा। गणपति को विशालकाय बताया गया है जबकि उनका वाहन मूषक अति लघुकाय है।

आज जीवन के अनुसार गणेशजी का चूहा हमें कई महत्वपूर्ण लाइफ मैनेजमेंट के फंडे बताता है जिन्हें अपनाकर हम हर क्षेत्र में सफलता प्राप्त कर सकते हैं। चूहा जिस प्रकार हमारे घर में कहीं बिल बनाकर रहता है और हम चूहे को बिल के अंदर देख नहीं पाते हैं। इसी वजह से चूहे को अंतर्यामी ब्रह्म का प्रतीक माना गया है। अंतर्यामी ब्रह्म से तात्पर्य है कि सृष्टि के सभी पदार्थों, सभी स्थानों में ईश्वर का वास है लेकिन दिखाई नहीं देते। जिस प्रकार हम हमारे ही घर में रहने वाले चूहे को बिल के अंदर नहीं देख पाते, ठीक उसी प्रकार मोह, अविद्या, अज्ञानवश हम भगवान को भी समझ नहीं पाते हैं। अत: हमें भी अपना अभिमान त्याग कर परमात्मा को जानकर उनकी उपासना करनी चाहिए।

गणेशजी को बुद्धि और ज्ञान का देवता माना जाता है। उनका वाहन चूहा भी जिस प्रकार किसी भी वस्तु को कुतर-कुतर कर उसके छोटे-छोटे टुकड़े कर देता है उसी प्रकार हमें भी बुद्धि के प्रभाव से जीवन की सभी समस्याओं अलग-अलग कर विश्लेषण करना चाहिए और सत्य और ज्ञान तक पहुंचना चाहिए। जिन लोगों पर गणपति की कृपा होती है, उन्हें अच्छी बुद्धि और ज्ञान प्राप्त होता है।

चूहा बिल में छुपकर रहने वाला अंधकार प्रिय प्राणी हैं। इस वजह से यह नकारात्मक और अज्ञानी शक्तियों का प्रतीक भी है। ये शक्तियां ज्ञान और प्रकाश से डरती हैं और अंधेरे में अन्य लोगों को हानि पहुंचाती हैं। जो व्यक्ति गणेशजी की कृपा प्राप्त करना चाहता है उसे इन सभी नकारात्मक शक्तियों और भावनाओं का त्याग करना होगा। तभी वह व्यक्ति ज्ञान और बुद्धि प्राप्त कर सकता है। अंधकार और नकारात्मक विचारों को छोडऩे के बाद व्यक्ति को जीवन के हर कदम पर सफलता ही प्राप्त होती है।

जिस प्रकार चूहा हमेशा ही सर्तक और जागरुक रहता है उसी प्रकार हमें भी हर प्रकार की परिस्थितियों का सामना करने के लिए सदैव तैयार रहना चाहिए और समस्याओं को तुरंत सुलझा लेना चाहिए।

चूहे को धान्य अर्थात् अनाज का शत्रु माना जाता है। अत: श्रीगणेश का वाहन मूषक यह संकेत देता है कि हमें भी हमारे अनाज, संपत्ति आदि को बचाकर रखने के लिए उन विनाशक जीव-जंतुओं पर नियंत्रण करना चाहिए। वहीं हमारे जीवन में जो लोग हमें नुकसान पहुंचा सकते हैं उन पर भी पूर्ण नियंत्रण किया जाना चाहिए। ताकि जीवन की सभी समस्याएं समाप्त हो जाए और हम सफलताएं प्राप्त कर सके।

इन सभी बातों को अपनाने से हमारे जीवन की कई परेशानियां दूर हो जाएंगी। धन, संपत्ति और धर्म के क्षेत्र में उल्लेखनीय सफलताएं प्राप्त होंगी। घर-परिवार और समाज में मान-सम्मान मिलेगा।

चूहे को ही अपना वाहन क्यों बनाया श्रीगणेश ने?
मूषक (चूहा) भगवान गणेश का वाहन है। गणेश का स्वरूप जितना विचित्र है उतना ही अजीब उनका वाहन है। शिवपुराण में प्रसंग आता है कि गणेश ने मूषक पर सवार होकर ही अपने माता-पिता की परिक्रमा की। कहां विशालकाय गणेश और कहां चूहे का छोटा-सा शरीर, कहीं कोई तालमेल ही नहीं। पुराण कहते हैं-

मूषकोत्तममारुह्यï देवासुरमहाहवे।

योद्धुकामं महाबाहुं वन्देऽहं गणनायकम्॥

पद्मपुराण, सृष्टिखंड 66/4

भावार्थ- उत्तम मूषक पर विराजमान देव-असुरों में श्रेष्ठ तथा युद्ध में महाबलशाली गणों के अधिपति श्रीगणेश को प्रणाम है।

भगवान गणेश के वाहन मूषक के बारे में कई प्राचीन कथाएं प्रचलित हैं। उसी के अनुसार गजमुखासुर नामक दैत्य ने अपने बाहुबल से देवताओं को बहुत परेशान कर दिया। सभी देवता एकत्रित होकर भगवान गणेश के पास पहुंचे। तब भगवान श्रीगणेश ने उन्हें गजमुखासुर से मुक्ति दिलाने का भरोसा दिलाया। तब श्रीगणेश का गजमुखासुर दैत्य से भयंकर युद्ध हुआ। युद्ध में श्रीगणेश का एक दांत टूट गया। तब क्रोधित होकर श्रीगणेश ने टूटे दांत से गजमुखासुर पर ऐसा प्रहार किया कि वह घबराकर चूहा बनकर भागा लेकिन गणेशजी ने उसे पकड़ लिया। मृत्यु के भय से वह क्षमायाचना करने लगा। तब श्रीगणेश ने मूषक रूप में ही उसे अपना वाहन बना लिया।

मंदिर में क्या और क्यों पहनकर नहीं जाना चाहिए?
जब भी हमें कोई समस्या सताती है तो हम ऐसे स्थान की ओर भागते हैं जहां हमें मन की शांति मिले और परेशानियों दूर हो जाए। शास्त्रों के अनुसार परेशानियों को दूर करके मन को शांति प्रदान करने वाला स्थान है भगवान का मंदिर। मंदिर ऐसा स्थान हैं जहां आने वाले प्रत्येक व्यक्ति प्रसन्नता अवश्य प्राप्त करता है। इसी वजह से सभी दैव स्थानों पर श्रद्धालुओं की भीड़ लगी रहती है।

मंदिर पूजनीय और पवित्र स्थान है, अत: यहां आने वाले भक्तों के लिए कुछ अनिवार्य नियम बनाए गए हैं। धर्म शास्त्रों के अनुसार इन नियमों का पालन करना हमारा पहला कर्तव्य है। मंदिर जाने से पहले ध्यान रखें कि आपके पास चमड़े की कोई भी वस्तु न हो। चमड़े की वस्तु जैसे बेल्ट, पर्स, जैकेट आदि। आजकल सामान्यत: अधिकांश लोग चमेड़े से बना बेल्ट पहनते हैं। ऐसे में मंदिर जाने से पहले उस बेल्ट को उतार देना चाहिए।

शास्त्रों के अनुसार चमड़े से बनी वस्तुएं अपवित्र मानी गई हैं। चूंकि ये वस्तुएं जानवरों की खाल या चमड़ी से बनाई जाती हैं। इन वस्तुओं को बनाने के लिए बड़ी संख्या में मरे हुए जानवरों की खाल उतार ली जाती है इसके बाद इसप्रकार की चमड़े की वस्तुएं बनाई जाती हैं। इसी वजह से मंदिर जैसे पवित्र स्थान पर इन वस्तुओं को ले जाना भगवान के अपमान के समान ही है। इसके अलावा इन वस्तुओं से निकलने वाली दुर्गंध भी अन्य श्रद्धालुओं के लिए परेशानी का कारण बन सकती है।

इसी वजह से देव स्थानों की पवित्रता बनाए रखने के लिए चमड़े से बनी वस्तुएं लेकर या पहनकर मंदिरों में नहीं जाना चाहिए।

क्यों गणपति को विसर्जित करते हैं जल में?
सभी देवी-देवताओं में अग्र पूज्य गणपति को ही माना गया है। हर मंगल कार्य में गणपति को पहले मनाया जाता है, इसके बाद अन्य देवी-देवताओं की पूजा होती है। गणपति को सबसे पहले पूजने के कई कारण हैं, पंच देवों में भी सबसे पहले इन्हें ही पूजा जाता है। गणेशोत्सव के बाद भगवान गणपति को जल में ही विसर्जित क्यों किया जाता है? आखिर जल से गणपति का क्या रिश्ता है?

भगवान गणेश को बुद्धि का देवता माना गया है। इस कारण इन्हें सबसे पहले पूजा जाता है, व्यक्ति की बुद्धि जागृत और तीव्र रहे तो कामों में विघ्र नहीं आते। गणपति की पूजा में बुद्धि और विद्या की मांग की जाती है ताकि हमारे कामों में कोई रुकावट न आए। दूसरा कारण है पृथ्वी के प्रमुख पांच तत्वों में गणपति को जल का अधिपति माना गया है।

गणपति को इसी कारण बुद्धि का देवता भी कहा गया है क्योंकि यह एक वैज्ञानिक तथ्य है कि मनुष्य के मस्तिष्क में अधिकांश तरल भाग ही है। इसलिए गणपति को गणेशोत्सव के बाद जल में विसर्जित किया जाता है। क्योंकि जल को उनका निवास भी माना गया है।

मनुष्य की उत्पत्ति जल से ही मानी गई है। भगवान का पहला अवतार (मत्स्य अवतार) भी जल में ही अवतरित हुआ था। इसलिए जल को भी मानव संस्कृति में प्रथम पूज्य माना गया है। भगवान गणपति जल तत्व के अधिपति देवता हैं इसलिए भी इन्हें प्रथम पूज्य माना गया है।

कब और क्यों लड़की की शादी पहले भगवान विष्णु की कराई जाती है?
विवाह या शादी को वर-वधु दोनों के लिए दूसरा जन्म माना जाता है। शादी के बाद न केवल उन दोनों का जीवन बदलता है बल्कि दोनों के परिवारों पर भी इसका गहरा प्रभाव पड़ता है। कुछ परिस्थितियों में विवाह के बाद पति-पत्नी दोनों के जीवन में कई प्रकार की परेशानियां प्रारंभ हो जाती हैं। इस संबंध में ज्योतिष के अनुसार यदि लड़के या लड़की की कुंडली में कोई ग्रह दोष हो तो उनके विवाहित जीवन पर बुरा प्रभाव पड़ता है।

शादी के बाद आने वाली परेशानियों से बचने के लिए लड़के या लड़की की कुंडली में यदि कोई ग्रह दोष हो तो उसका उचित उपचार किया जाना चाहिए। जन्मपत्रिका में कुछ विशेष योग होते हैं तब उनका ज्योतिषीय उपचार करना अतिआवश्यक होता है अन्यथा वर-वधु दोनों को ही गंभीर परेशानियों का सामना करना पड़ सकता है।

सामान्यत: किसी मांगलिक लड़के का विवाह मांगलिक लड़की से ही होना चाहिए। यदि वर या वधु दोनों में से कोई एक मांगलिक है तो विवाह के बाद इन्हें कई प्रकार की गंभीर परेशानियां झेलना पड़ सकती हैं। ऐसे में इस प्रकार के विवाह नहीं होना चाहिए लेकिन यदि ऐसा विवाह करना ही हो तो ज्योतिष में कुछ उपाय बताए गए हैं।

यदि वर या वधु कोई एक मांगलिक हैं तो लड़की का विवाह पहले भगवान विष्णु से किया जाना चाहिए। विधि-विधान से जब कन्या का विवाह भगवान श्रीहरि से हो जाता है तब उसकी जन्मपत्रिका के कई गंभीर ग्रह दोष समाप्त हो जाते हैं। इसके बाद उस लड़की का दूसरा विवाह अन्य वर के साथ किया जा सकता है। इससे वर-वधु दोनों का जीवन सुखी और संपन्न होगा।

यदि किसी कन्या की कुंडली में विधवा योग हो तब भी इसप्रकार भगवान विष्णु से पहले विवाह कराना चाहिए। इसके अलावा यदि किसी की कुंडली में शत्रु राशि का मंगल सप्तम स्थान में हो, सप्तम या अष्टम भाव में नीच का सूर्य हो, सप्तम में सूर्य-चंद्र की युति हो, सप्तम स्थान में नीच का बुध हो, सप्तम भाव में नीच का गुरु हो तो लड़की की शादी पहले भगवान श्रीहरि से कराई जाती है। ज्योतिष के अनुसार कुंडली में सप्तम भाव विवाह या शादी का कारक भाव है। अत: इस भाव के दूषित होने पर उचित उपचार भी किया जाना चाहिए।

देव और गंधर्व विवाह सहित आठ प्रकार से होती थी शादी...
आजकल मुख्य रूप से सात फेरे लेने पर विवाह संपूर्ण माना जाता है। यही एक सर्वमान्य विवाह की प्रचलित विधि या परंपरा है। पुराने समय में विवाह के लिए आठ प्रकार की परंपराओं का प्रचलन था। इनमें से कुछ परंपराएं नैतिक थीं तो कुछ अनैतिक परंपराएं।

विवाह का अवसर सामान्यत: सभी के जीवन में एक बार अवश्य आता है। सभी धर्म में विवाह की अलग-अलग विधियां बताई है। जिनके अनुसार स्त्री-पुरुष को जीवनभर के लिए एक रिश्ते में बांधा जाता है। हिंदू शास्त्रों के अनुसार विवाह की आठ विधियां बताई गई हैं। इन आठ विधियों में 4 विधियां श्रेष्ठ और नैतिक तथा अन्य 4 को पूर्णतया अनैतिक माना गया है।

विवाह की श्रेष्ठ व नैतिक विधियां हैं देव, आर्णु, ब्राह्म और प्राजान्य। विवाह की अनैतिक विधियां हैं गंधर्व, असुर, राक्षस और पिशाच। सामान्यत: हमारे समाज ने श्रेष्ठ और नैतिक विधियों से विवाह ही कराए जाते हैं।

क्यों कहते हैं शिव को कालों का काल?
भगवान शिव को कई नामों से पुकारा जाता है। वे महाकाल भी कहे जाते हैं और कालों के काल भी। शिव को सृजन का अधिपति और मृत्यु का देवता भी माना जाता है। आखिर क्यों शिव को सृजन और विनाश दोनों का भगवान कहा जाता है।

शिव शरीर में प्राण के प्रतीक माने गए हैं। इसलिए पंच देवों में उनका स्थान सबसे महत्वपूर्ण है। बिना प्राण के शरीर को शव कहा जाता है, प्राण ही उसे जीवित यानी शिव बनाता है। शिव प्रकृति के देवता हैं, उनके पूजन और शृंगार में उपयोग होने वाली सारी सामग्रियां भी पूर्ण रूप से प्रकृति का हिस्सा होती हैं।

शिव मृत्यु के देवता हैं और त्रिदेव में उन्हें संहारक माना जाता है। ब्रह्म सृष्टि के रचयिता, विष्णु संचालक और शिव संहारक हैं। लेकिन शिव संहार के अधिपति होने के बावजूद भी सृजन का प्रतीक हैं। वे सृजन का संदेश देते हैं। हर संहार के बाद सृजन शुरू होता है। पंच तत्वों में शिव को वायु का अधिपति भी माना गया है।

वायु जब तक शरीर में चलती है, प्रेम से चलती है, तब तक शरीर में प्राण बने रहते हैं। यह हमारा सृजन करती है, लेकिन जब वायु क्रोधित होती है तो विनाश का प्रतीक बन जाती है। जब तक वायु है, तभी तक शरीर में प्राण होते हैं। शिव अगर वायु के प्रवाह को रोक दें तो फिर वे किसी के भी प्राण ले सकते हैं, वायु के बिना किसी भी शरीर में प्राणों का संचार संभव नहीं है।

मध्यप्रदेश, राजस्थान और गुजरात में होती तेजाजी की पूजा...
हिंदी कैलेंडर भादौ मास में शुक्ल पक्ष की दशमी मध्यप्रदेश, राजस्थान और गुजरात के खास होती है। इस तिथि पर तेजाजी महाराज का जन्मदिन बड़े हर्षोल्लास से मनाया जाता है। इन प्रदेशों के ग्रामीण अंचलों में कई जुलुस, चल समरोह आयोजित किए जाते हैं। यह परंपरा काफी पुराने समय से चली आ रही है।

लोक मान्यताओं के अनुसार तेजाजी को देवता के समान ही माना जाता है और भगवान की तरह इनकी पूजा की जाती है। तेजा दशमी यानि तेजाजी के जन्मदिन पर मध्यप्रदेश, राजस्थान और गुजरात के कई ग्रामीण अंचलों के किसान वर्ग अपनी खेती की खुशहाली के लिये धार्मिक कार्यक्रम आयोजित करते हैं। ऐसा माना जाता है कि तेजाजी के वंशज मध्यभारत के खिलचीपुर से आकर मारवाड़ मे बसे थे।

लोकमान्यता है कि तेजाजी ने ग्याहरवीं सदी में गायों की डाकुओं से रक्षा करने में अपने प्राण दांव पर लगा दिये थे। भादो शुक्ला दशमी को तेजाजी का पूजन होता है। तेजाजी का भारत के जाटों में महत्वपूर्ण स्थान है। तेजाजी सत्यवादी और दिये हुए वचन पर अटल थे। उन्होंने अन्य लोगों के कल्याण के लिए कई कार्य किए और अमरत्व प्राप्त किया। उन्होंने अपने धार्मिक विचारों से जनसाधारण को धर्म के मार्ग पर चलने के लिए प्रेरित किया। तेजाजी के मंदिरों में निम्न वर्गों के लोग पुजारी का काम करते हैं। समाज सुधार का इतना पुराना कोई और उदाहरण नहीं है। इन सारी बातों की वजह से आज भी ग्रामीणों में तेजाजी के लिए अटूट आस्था और विश्वास बना हुआ है।

सुबह और शाम, जरूर करें ये एक काम...
हिंदू संस्कृति में कई ऐसे नियम बताए गए हैं जिनका पालन करने पर हमें स्वास्थ्य लाभ होता है साथ ही धर्म लाभ भी प्राप्त होता है। शास्त्रों के अनुसार बताए गए इन कार्यों को दिनचर्या में शामिल करने वाले व्यक्ति को जीवन में कई परेशानियों से मुक्ति मिल जाती है।

हमारी काफी ऊर्जा बोलने में नष्ट हो जाती है, इस ऊर्जा को बचाने के लिए प्रतिदिन कुछ समय मौन रहना चाहिए। वैदिक काल से ही ऋषिमुनियों और विद्वानों द्वारा मौन रहने के फायदे बताए गए हैं। सुबह और शाम को कुछ समय मौन रहने से हमारा मानसिक तनाव तो कम होता है साथ ही स्वास्थ्य को भी लाभ प्राप्त होता है।

शास्त्रों के अनुसार प्रात:काल और सायंकाल व्यक्ति को जितनी देर संभव हो सके मौन रहना चाहिए। दिनभर के कई जरूरी काम मौन रहकर भी किए जा सकते हैं। मन शांत मिलती है जिससे ध्यान, पूजा, स्वाध्याय आदि से मानसिक शक्ति मिलती है। सुबह-सुबह मौन रहने से हमारा मन एकाग्र रहता है और प्रतिदिन के खास कार्यों को हम ठीक से कर पाते हैं। इसके बाद शाम के समय मौन रहने से दिनभर के कार्य से जो मानसिक तनाव उत्पन्न होता से उससे मुक्ति मिलती है। जिससे पारिवारिक जीवन पर बाहरी तनाव का बुरा प्रभाव नहीं पड़ता है। इसी वजह से प्रतिदिन सुबह और शाम के समय कुछ समय मौन रहकर मन को एकाग्र करना चाहिए।

आप खाने में हमेशा ध्यान रखें ये बातें, नहीं होंगे बीमार...
खाना, हमारे लिए प्राथमिक आवश्यकता है और इसकी पूर्ति के लिए ही सभी दिन-रात मेहनत करते हैं। खाना हमें जीने के लिए शक्ति प्रदान करता है तो कभी-कभी यही खाना हमारे स्वास्थ्य को नुकसान भी पहुंचा सकता है। इसी वजह से कुछ बातें हैं जिनका हमेशा ध्यान रखने से आप की कई परेशानियों से बच सकते हैं।

कई विद्वानों और डॉक्टर्स द्वारा अक्सर बताया जाता है कि खाने के संबंध में कई सावधानियां बताई जाती हैं। इनका ध्यान रखना अतिआवश्यक है। हमें खाने के लिए समय निर्धारित करना चाहिए और केवल उसी निर्धारित समय पर भोजन करना चाहिए। इसके अलावा कई लोगों की आदत होती है राह चलते खाने की, तो कभी भी चलते समय खाना नहीं खाना चाहिए। खाना हमेशा शांति से बैठकर ही खाएं। इसके अलावा यह भी ध्यान रखें कि पूरी तरह सात्विक हो।

खाने के संबंध में शास्त्रों में भी कई नियम बताए गए हैं। इनके अनुसार खाने से पहले भगवान का स्मरण करना चाहिए। खाते वक्त शांत रहना चाहिए, बातचित नहीं करना चाहिए। खाने के बाद भोजन की थाली में हाथ न धोएं। भोजन हमेशा सोने के समय से कम से कम 1 घंटे पहले करना चाहिए। इसके अलावा खाने के बाद थोड़ी देर टहलना चाहिए फिर वज्रासन में बैठना चाहिए।

ये पौधा घर में होगा तो नहीं आएंगे यमराज या यमदूत
यमराज या यमदूत का नाम आते हैं मौत का डर सताने लगता है। हिंदू धर्म में यमराज को मृत्यु का देवता बताया गया है। ऐसा माना जाता है कि जिस व्यक्ति की मृत्यु का समय आ जाता है उसकी आत्मा को लेने के लिए यमराज या यमदूत आते हैं। यमराज आने का अर्थ है साक्षात मृत्यु का आना। मृत्यु के भय को समाप्त करने के लिए शास्त्रों में कई उपाय बताए गए हैं। इन्हीं उपायों में से एक है घर में तुलसी का पौधा लगाना।

शास्त्रों में तुलसी की बड़ी महिमा बताई गई है-

तुलसीकाननं चैव गृहे यस्यावतिष्ठते।

तद्गृहं तीर्थभूतं हि नायांन्ति यमकिंकरा:।

तुलसीमंजरीभिर्य: कुर्याद्धरिहर्रानम्।

न स गर्भगृहं याति मुक्तिभागी भवेन्नर:।।

वेद-पुराण में दिए गए श्लोक का अर्थ है- जिसके व्यक्ति के घर में तुलसी का पौधा होता है वह घर तीर्थ के समान है। वहां मृत्यु के देवता यमराज नहीं आते हैं। जो मनुष्य तुलसीमंजरी से भगवान श्रीहरि की पूजा करता है उसे फिर गर्भ में नहीं आना पड़ता अर्थात उसे मोक्ष प्राप्त हो जाता है, पुन: धरती पर जन्म नहीं लेना पड़ता। इस श्लोक से स्पष्ट है कि तुलसी के पौधे को पवित्र और पूजनीय माना गया है।

यहां यमराज या यमदूत से यही तात्पर्य है कि जिस घर में तुलसी का पौधा होगा वहां रहने वाले लोगों का जीवन स्वर्ग के समान होगा। तुलसी के प्रभाव से घर में सभी सुख-सुविधा के साधन होंगे। किसी को भी मृत्यु का भय नहीं रहेगा। तुलसी का पौधा होने से वातावरण में मौजूद कई विषैले जीवाणु नष्ट हो जाते हैं। वास्तु के अनुसार तुलसी के पौधे से कई वास्तु दोषों का निवारण हो जाता है।

इन सातों तिथियों पर न करें कोई शुभ काम, नहीं तो बुरा होगा...
किसी भी शुभ कार्य को प्रारंभ करने से पहले शुभ मुहूर्त या विशेष ग्रह स्थिति देखी जाती हैं। शास्त्रों और ज्योतिष के अनुसार कुछ ऐसी तिथियां बताई गई हैं जो कुछ विशेष परिस्थितियों में अशुभ फल देती हैं। अत: इन तिथियों पर कोई भी नए कार्य का प्रारंभ नहीं करना चाहिए।

यदि आप किसी शुभ का शुभारंभ करने जा रहे हैं तो ध्यान रखें कि उस दिन यह तिथि और वार न हो। शास्त्रों के अनुसार किसी भी माह की द्वादशी, एकादशी, दशमी, तृतीया, षष्ठी, द्वितीया और सप्तमी यदि क्रमश: रविवार, सोमवार, मंगलवार, बुधवार, बृहस्पतिवार, शुक्रवार और शनिवार को आ रही हो तो उसी शुभ कार्य प्रारंभ न करें। इन वारों पर यह तिथियों अशुभ फल देने वाली बताई गई हैं। इन दिनों में कार्य प्रारंभ करने पर वह कार्य बिगडऩे की संभावनाएं रहती हैं और इन योगों को कुयोग समझा जाता है। अत: इन तिथियों का विशेष ध्यान रखना चाहिए।

यदि इन योगों में कोई कार्य प्रारंभ करना अतिआवश्यक हो तो भगवान से प्रार्थना कर ही प्रारंभ करें। इस हेतु विधि विधान से संबंधित पूजा कराई जाना चाहिए। इन तिथियों के स्वामी देवताओं का पूजन करके ही कार्य शुरू करें।

सब हो जाएगा पॉजीटिव, सोमवार और शुक्रवार को करना चाहिए ये उपाय
यदि आप जीवन में चल रही परेशानियों से त्रस्त हैं, घर-परिवार के सभी सदस्यों को मानसिक तनाव और क्लेश झेलना पड़ रहा है तो इन पीछे छुड़ाने के लिए कई परंपराएं प्रचलित हैं। वैदिक काल से ही कई ऐसी पंरपराओं चलन है जो घर को पवित्र और समृद्धिशाली बना रखती हैं।

सभी परंपराओं के पीछे मनोवैज्ञानिक या वैज्ञानिक कारण कार्य करते हैं और इनका संबंध धर्म से भी है। घर-परिवार में चल रही समस्याओं से निजात पाने के लिए विद्वानों और ज्योतिषियों द्वारा गौमूत्र छिड़काव करने का अचूक उपाय बताया गया है। पुराने समय से ही घरों में गौमूत्र के छिड़काव की परंपरा चली आ रही है। शास्त्रों के अनुसार गाय को पूजनीय और पवित्र बताया गया है। गाय को माता भी माना है, इसी वजह से गाय से मिलने वाली सभी चीजें पवित्र हैं।

यदि आप महसूस करते है कि आपकी कुंडली में कोई ग्रह दोष है या आपके घर में कोई वास्तु दोष है और इसी वजह से आपको परेशानियां झेलना पड़ रही हैं। ऐसा होने पर प्रति सोमवार या शुक्रवार को थोड़ा-थोड़ा गौमूत्र को पूरे घर में छिड़कने से इसप्रकार के दोष दूर हो जाते हैं।

क्रमश:...

जो भी इसमें अच्छा लगे वो मेरे गुरू का प्रसाद है,
और जो भी बुरा लगे वो मेरी न्यूनता है......MMK

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