Sunday, October 3, 2010

Land of civilization, etc.(सभ्यता का आदि देश)

सभ्यता का आदि देश
विद्यार्थी जीवन में एक प्रसिद्घ जासूसी कहानी पढ़ी थी। यदि एक बात को आधार मानकर चला जाय तो एक निष्कर्ष पर पहुँचते हैं, जो निश्चित दिशा को इंगित करता है। पर यदि क्षण भर दूसरा आधार, जो उतना ही सुसंगत है, मानें तो सारा दृश्य उलट जाता है और सभी संकेत एवं मार्गपट्ट विपरीत दिशा में इंगित करने लगते हैं। ऎसा ही पुरातत्व में होता है। यदि हम इस पूर्व धारणा से चलें कि आर्य बाहर से भारत में आए तो सारी संस्कृति, भाषा और संसार की पुरानी घटनाएँ सब बदल जाती हैं; सभी 'सच्चे' तथ्य 'झूठे' हो जाते हैं। आज तक यही होता आया है। और इसी से पुरातत्व में अनेक प्रश्न अनुत्तरित हैं। कुछ पश्चिमी विद्वानों के पाखंड और ढकोसले पुरातत्व की राह में सबसे बड़े रोड़े हैं।

संसार की सभी प्राचीन सभ्यताओं में कुछ समान रीतियाँ पाई जाती हैं, जो सबको आश्चर्य में डाल देती हैं। यह कहना ठीक नहीं कि भिन्न समय पर और दूर महाद्वीपों में उत्कर्ष करने वाली अनेक प्रकार सभ्यताओं में सूर्य-पूजा, नाग-पूजा एवं स्वस्तिक चिन्ह स्वत: स्फूर्ति से आए। देखें-अध्याय २, जहाँ सभी प्राचीन सभ्यताओं में फैली इन रीतियों -पूजा एवं प्रतीक- का वर्णन है। इनकी प्रथम कल्पना तथा बोध भारत में आया।

सूर्य भारत के जीवन-दर्शन का अनिवार्य केंद्र था। शास्त्रों ने सूर्य को 'जीवन का दाता' कहा और इसी से सूर्य के उत्तरायण होने का त्योहार 'मकर संक्रांति' भारत में आज तक मनाते आते हैं। इस विशुद्घ भारतीय त्योहार का ईसाई मत के प्रचारकों ने अपहरण कर लिया। उसे ईसा का कल्पित जन्मदिवस मान लिया। तब मकर राशि में सूर्य का प्रवेश २५ दिसम्बर को होता था। वास्तव में सूर्य के उत्तरायण होने का दिन २३ दिसंबर है और जब भारत ने अतीत में गणना में सुधार किया तब वह सूर्य के मकर राशि में प्रवेश का दिन था। इसी से कहलाई 'मकर रेखा', जहाँ से सूर्य उत्तरायण होना प्रारंभ करता है और वह संक्रमण 'मकर संक्रांति'। पर जिस दीर्घवृत्त पर पृथ्वी सूर्य के चारों ओर घूमती है, उसके कोने (पात : nodes) भी पीछे हटते जाते हैं, इसलिए मकर राशि में सूर्य के प्रवेश का दिन आगे बढ़ता जाता है। आज सूर्य १४ जनवरी को मकर राशि में प्रवेश करता है। ईसाई जगत ने अपने पंचांग में अंतिम संशोधन दो शताब्दी पूर्व पोप ग्रेगरी के समय में किया। इसी से उनका संशोधित पंचांग ग्रेगोरियन पंचांग (Gregorian Calendar) कहलाया। इसमें ईसा की कल्पित जन्मतिथि, अर्थात सूर्य के मकर राशि में उस समय प्रवेश का दिन, २५ दिसंबर पुन: उनके पंचांग में संशोधन से आया। बड़े दिन को ईसा का जन्म मानने के कारण, भारतीय परंपरा के अनुसार छठी का दिन १ जनवरी और बरहों का दिन ६ जनवरी आज भी ईसाई मनाते हैं। हिंदु संस्कारों में यह छठी तथा बरहों शिशु के स्नान एवं अन्य कर्म के दिन हैं।

भारतीय गणना-पद्घति में वर्ष का प्रारंभ मार्च में प्रतिपदा से, अर्थात ऋतु के बाद दिन-रात बराबर हों, मानते हैं। पृथ्वी के उत्तरी एवं दक्षिणी गोलार्द्घ, दोनों के लिए समान, हिंदु वर्ष-प्रतिपदा का दिन ही वर्ष का वैज्ञानिक और स्वाभाविक प्रारंभ है। भारत में समय-समय पर पंचांग में संशोधन किया जाता रहा। कुंभ मेले ऎसे सम्मेलनों के लिए थे, जहाँ विद्वान इकट्ठा होकर देश, धर्म एवं रीति के सुधार की बातें करें। पर इस बीच भारत में परतंत्रता की लंबी छाया पड़ी। उस समय संशोधन संभव नहीं हुआ। इसी से अपने यहाँ अंतिम संशोधन के बाद से मकर संक्रमण का दिन २३ दिसंबर से आगे बढ़ता गया। राजनीतिक दृष्टि से भारत के स्वतंत्र होने के बाद भी हम अपना अधिक वैज्ञानिक तंत्र अभी तक लागू नहीं कर सके।


इसी प्रकार संसार को धारण किए 'शेषनाग' की कल्पना। शेषनाग से नि:सृत हुयी नाग-पूजा। यवन साहित्य और यूरोप में तो एक दैत्य 'एटलस' (Atlas) की कल्पना थी, जो अपने कंधों पर पृथ्वी को धारण किए है। जब वह थककर करवट बदलता है तब भूकंप आते हैं ! आज भी भारत में नाग-पंचमी (श्रावण शुक्ल ५) के दिन नाग-पूजा होती है। 'आर्य कहीं बाहर से आए थे' की विकृत धारणा को ले पश्चिमी विचारकों ने भारत में एक अलग नाग जाति की कल्पना की। उनके अनुसार इस 'अनार्य' जाति में, जो भारत में पहले से रहती थी, नाग-पूजी प्रचलित थी। यह जनप्रिय हो जाने के कारण आर्यों में 'शेषनाग' एवं बौद्घों में 'मुचलिद नाग' अपनाया गया। गलत अभिधारणा से कैसे इतिहास उलटने के परिणाम दिखते हैं, उसका यह एक उदाहरण है।

इतिहास में कुषाण का राज्य और गुप्तवंश के उत्थान के बीच लगभग पाँच शताब्दियाँ उत्तर भारत में नागवंशी शासकों का कालखंड कही जाती हैं। पुराण (विष्णु पुराण :पद्मावती में नौ नाग राजाओं ने शासन किया), मुद्रा और अभिलेखों में इन नागवंशी राजाओं के लिए 'भारशिव' (जो शिवलिंग को सिर पर धारण करें) शब्द का प्रयोग आया है। इसी से अगली विकृति उत्पन्न हुई कि 'शिव शायद अनार्यों के देवता थे, जिन्हें आर्यों ने अपना लिया।' प्रयाग, मथुरा तथा विदिशा के चारों ओर सारे भूभाग में इन राजाओं की मुद्रा और अभिलेख मिलते हैं। कहते हैं, चंद्रगुप्त (द्वितीय) की पुत्री प्रभावती की माँ नागवंशी थी। वैसे विक्रम संवत् से पूर्व के जो सिक्के इस वंश के मिलते हैं उनमें नामांत में 'नाग' शब्द का प्रयोग नहीं है। यही नहीं, अभिलेख वर्णन करते हैं कि भारशिव ('नाग') राजाओं ने कुषाणों को हराकर वाराणसी में गंगा के किनारे दस अश्वमेध यज्ञ किए, जिससे उस स्थान का नाम 'दशाश्वमेध घाट' हो गया। इस पर भी इनके आर्यों से भिन्न होने की कल्पना करना धृष्टता है।

सिन्धु घाटी में मिली - स्वस्तिक चिन्ह की सील

ऎसा ही है स्वस्तिक चिन्ह। विदेशी यात्रियों ने भारत में इसका प्रयोग शुभ चिन्ह के रूप में कहा है। सभी प्राचीन सभ्यताओं में इस प्रतीक ने और इन पूजा-पद्घतियों ने क्यों संसार का चक्कर काटा ? यह किसी साम्राज्य- विस्तार का परिणाम न था। इतिहासकारों ने सभी प्राचीन सभ्यताओं में पाई गयी इस विलक्षणता की ओर इंगित किया है और बिना निष्कर्ष निकाले बारंबार कहा, 'यदि कभी स्भ्यताओं के मूल स्त्रोत का पता चलेगा तो वह होगा जहाँ के जीवन में धूप मूलभूत महत्व की होगी (सूर्य-पूजा), जहाँ 'सर्प' ('नाग') की पूजा होती होगी और जहाँ स्वस्तिक का शुभ चिन्ह के रूप में प्राचीन काल में प्रयोग होता होगा।' (देखें-पृष्ठ ४८ में एच.जी.वेल्स की उक्ति।)

भारत ने साम्राज्य लिप्सा नहीं, मानवता का संदेश फैलाया। जहाँ कहीं हिंदु गए वहाँ के लोगों को सभ्यता दी, उनहें प्रेम से सुसंस्कारित करने का यत्न किया। उन्हें स्वशासन और गणतंत्र का मंत्र दिया, उनके ऊपर शासन नहीं थोपा। श्रेष्ठ गुण प्राप्त करने की प्रेरणा दी, दंड नहीं। मानवता का शंख फूँकने का उपक्रम किया। पर संसार में दानव भी होते हैं और दानवी प्रवृत्ति भी। भोलेभाले लोगों को अनेक तरीकों से गुलाम बनाकर स्वार्थ साधने से बड़े साम्राज्य खड़े हुए। इन लोगों के द्वारा लिखित इतिहास इन दानवों का या दानवी प्रवृत्ति के देशों के गुण (?) गाता फिरता है। परंतु वे संस्कृति के दूत कौन थे जिन्होंने सभ्यता की परंपराओं और मानव-मूल्यों की, अस्त्र-शस्त्रों की झनझन और साम्राज्यों के कटाजुद्घ के बीच, जीवित रखा, उन्हें फैलाया ? आज मानवता उन्हीं की ऋणी है।

No comments:

Post a Comment